मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

खबर और मनोहर कहानियां का फर्क मिटा दिया इस दौर ने

जेएनयू में अब वेज v/ s नॉनवेज हो गया। रामनवमी पर मांसाहार नहीं परोसना तय किया गया। दूसरा पक्ष भिड़ गया कि दिखाओ कहां कोई लिखित आदेश है। अब ऐसे तमाम मसलो के कहां कोई आदेश-वादेश होते हैं। रामनवमी थी। आराध्य  का दिन था ,इससे बड़ा क्या कोई मौका होता विवाद पैदा करने के लिए। वे लड़ लिए। नए नवेलों की राजनीति चमक गई, उनके बुजुर्ग नेताओं ने भी देख लिया और अख़बार टीवी की कृपा दृष्टि भी हो गई। ये  ऐसे ही चटपटे मसालों की तलाश में रहते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि ये चटपटे मसाले पुराने हो गए हैं। जाले पड़ गए हैं इनमें,बांस रहे हैं बांसी सामग्रियों के साथ। घिन आती है ऐसे मुद्दों पर और ऐसी सियासत पर। मत खाओ एक दिन। शोर नहीं मचाओगे तो वे भी क्या  कर लेंगे। तुम शोर मचाते जाते हो, वे मामले ढूंढ के लाते जाते है। सब मौजूद है हमारे देश में । वेज -नॉनवेज,पर्दा बेपर्दगी , मूर्त-अमूर्त। सब एक साथ। अब आप इन्हीं पर भिड़ रहे हो ,लड़ रहे हो ,अड़ रहे हो। क्या बेरोज़गारी ख़त्म हो गई ?महंगाई मर गई ?बलात्कारी बेहोश हो गए ? पत्रकार बेखौफ लिख रहे ? गैर ज़रूरी मुद्दों पर आप लड़ रहे हो। आप कायदे के मुद्दे उठाओगे तो वे भी रास्ते पर आएंगे। बड़ी ज़िम्मेदारी है।  पाश को याद करते हो। उनकी लिखी कविता  दोहराते हो कि हम लड़ेंगे कि बगैर लड़े कुछ नहीं मिलता। फिर ये कहां चूक हो रही है । सब कुछ साथ रहता  रहा है और अब बेवजह टकरा रहा है। उफ ये टकराहट के सौदागर। 

सियासत हो या मीडिया इन्हें सिर्फ विवाद चाहिये। पहले इवेंट ,फिर वहां विवाद और फिर इन कच्ची पक्की जानकारियों को वायरल कराती आई टी सेल। पहले सनसनी लपकने का काम मीडिया करता था अब सियासत करने लगी। काम का नमूना देखिये। क्या कहा समाजवादी अखिलेश ने अपने समाजवादी पिता मुलायम सिंह को चाटा मारा। कब हुआ ,क्या प्रमाण है यह मत ढूंढो ,वायरल कर दो। फैला दो सब जगह। एक कद्दावर  भाजपा नेता का यह बयान था। सोशल मीडिया पर तथ्य जांचने की कोई ज़रुरत नहीं है चलने दो ,छलने दो जनता को। असर हुआ तो ठीक ,नहीं हुआ तो भी क्या घटा। न हींग चाहिए न फिटकरी रंग चोखा आ ही जाता है क्योंकि जनता भोली है। तभी तो आए दिन हिजाब ,हलाल ,महंत के मजहब विशेष की महिलाओं से दुष्कर्म की धमकी जैसे मुद्दे सुर्खियां बनते हैं। खबर और मनोहर कहानियां का फर्क ही मिटा दिया इस अजीब दौर ने। 

खाने -पीने  , पहनने -ओढ़ने  ,प्रेम -मित्रता जैसी  बेहद निजी बातों को चौराहे की बात बना देने वाली व्यवस्था जिसमें मीडिया का बड़ा हाथ है , आखिर किसे प्रिय लग रही है ? मध्यप्रदेश में पत्रकारों के कपड़े उतरवाने ,उत्तरप्रदेश में  दलित लड़की के उत्पीड़न और फिर हत्या को कवर करने वाले पत्रकार सिद्दीक कप्पन को जेल में डालने ,पत्रकार राणा अय्यूब को हवाई अड्डे पर हिरासत में ले लेने जैसी घटनाओं पर मीडिया की ज़ुबां बंद रहती है। पत्रकार राणा दिल्ली उच्चा न्यायालय के दखल के बाद इटली जा पाती हैं। वहां जो आपबीती उन्होंने दुनिया को सुनाई है वह देश का सर शर्म से झुका देती है। वे साफ कहती हैं मैं भाग्यशाली पत्रकार हूं जिसकी आवाज सुनी जाती है। मेरे कई साथियों की आवाज दबाई जा रही है ,उन्हें डराया जा रहा है।वे कहती हैं मैं नहीं जानती देश लौटकर मेरा क्या होगा लेकिन भारत की आवाज सुनना जरूरी है। सोचने की बात है कि यहां देश के नेताओं को यह फिक्र क्यों नहीं हो रही है कि दुनिया भारत को किस नजरिये से देखेगी। ऐसे ही एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुखिया और लेखक आकार पटेल को भी अमेरिका जाने से रोक दिया गया । अभिव्यक्ति को यूं दबाने का सिलसिला कुछ कुछ बदले की भावना जैसा है । पत्रकार सत्ता के खिलाफ हमेशा लिखते रहे हैं । पत्रकार राजेंद्र माथुर ने भी  सत्ता के खिलाफ लिखा लेकिन उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव शोक प्रकट करने उनके निवास पर गए थे। इन दिनों हालात यूं हैं कि पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी जाती है और शिखर नेतृत्व से कोई स्वर सुनाई नहीं देता। 

भारत जैसे विशाल प्रजातंत्र के शिखर नेतृत्व का मौन यूं मालूम होता है मानो कह रहा हो सब चलता है। एक भी पत्रकार वार्ता में सीधे सवालों का सामना नहीं हुआ है। जो प्रिय हैं उन्हें साक्षात्कार दिए गए ,वे अभिनेता भी हो सकते हैं। शेष को देशद्रोही तक कह दिया जाता है। लिखता ही तो है पत्रकार। उससे इतना भय क्यों कि उसे यात्रा से पहले हिरासत में लिया जाए या फिर जेल भेजा जाए ? चूक कहां हो रही है इसे देश के  सत्ता शिखर से अलग शक्तिशाली और वरिष्ठ नागरिकों को भी  देखना होगा। वोट लेने का गणित सत्ता का होता है लेकिन देशप्रेमी का मन अलग माटी का होता है। उसे हर मुद्दे पर लड़ाने -भिड़ाने का उद्देश्य अगर किसी पक्ष  का है तो फिर विपक्ष क्यों आंखें मूंदे पड़ा है। देश के कस्बे ,शहर, प्रदेश प्रयोगशाला बन रहे हैं लेकिन विपक्ष सुस्ता रहा है। वह  सत्ता पक्ष के मुद्दों की बीन पर नाच रहा है, उसकी अपनी सोच कुंद है जबकि जनता की तकलीफ कोई नहीं समझ पा रहा कि उसकी आठ हजार की पगार में उसका तीन हज़ार रूपया तेल पर खर्च हो रहा है। रसोई गैस, खाने का तेल का खर्च उसका अपना तेल निकालने के लिए काफी है। 

 रूसी लेखक इवान तुर्गनेव ने अपना पहला उपन्यास रूदिन लिखा था। रूदिन  खूबसूरत नौजवान और औजपूर्ण वक्त था लेकिन जीवन में कुछ भी पूरी तरह हासिल नहीं कर पाया। उसके साथी पैसा कमाकर परिवार बसा चुके लेकिन रूदिन केवल लोगों की भलाई और खुशहाली के सपने देखता रहा उसका प्रेम भी नाकाम रहा। फिर एक दिन  जब पेरिस की राष्ट्रीय वर्कशापों का विद्रोह कुचला जा चुका था एक आवाज को गोली लगी वह लाल झंडा हिला रहा था। शाही गार्ड की गोली उसे लग चुकी थी। वह ढेर हो चुका था और रूसी रूदिन को मारने वाले ने कहा एक और पोलैंडवासी मारा गया।