शुक्रवार, 11 मार्च 2022

वे हमसे नफरत करते हैं

पाव्लो सत्ताईस साल का एक यूक्रेनी युवा है जो कम्प्यूटर्स में मास्टर्स है। उसकी गर्लफ्रेंड का नाम लूबा है। ये दोनों यूक्रेन की राजधानी कीव से दो सौ किलोमीटर  दूर पालतोवा में रहते हैं। पाव्लो के माता पिता गांव में रहते हैं। उसका एक भाई भी है जो पुलिस में था लेकिन हालात की वजह से आर्मी में है। अब आर्मी पुलिस सब एक है। एक पखवाड़े पहले तक पाव्लो यूक्रेन के गांव, देहात, शहरों से दुनिया को रूबरू कराया करता था लेकिन आज सन्नाटा है। पाव्लो के व्लॉग्स में ज़िन्दगी यूं ही हंसती थी जैसे किसी भी शांत, सद्भावी  और सुंदर देश में। गांव में उसकी मां बत्तख और मुर्गियां पाला करती है और उसके पड़ोस की सफेद  गाय बारह लीटर तक दूध दे देती है।अपने पिता के साथ कैमरे के सामने वह पूछता है क्या मैं इनके जैसा दिखता हूं..  नहीं बिल्कुल नहीं मैं तो मेरी मां जैसा हूं। फिर मजाक करते हुए अपने पिता से पूछता है कि क्या मैं आप ही का बेटा हूं। भोले पिता मुस्करा देते हैं क्योंकि अंग्रेजी में उन्हें कुछ पल्ले  नहीं पड़ता।   पाव्लो के आलावा कोई अंग्रेजी नहीं बोलता यहां  तक कि लूबा भी सारे जवाब यूक्रेनी भाषा में ही देती है। ये दोनों कभी कभार किसी सुपर मार्केट में भी घुस जाते हैं और बताते हैं कि हमारा देश कितने कम खर्च में कितना खाना मुहैय्या करा देता है। फिर ये खाना लेकर बैठ जाते हैं और पेपर सिजर खेलते हुए खाना खाते जाते हैं। यानी  जो जीता वो पहले अपनी पसंदीदा डिश चखता है । 
लेकिन यह सूरत एक पखवाड़े पहले की है। ये दोनों अब अपने अपार्टमेंट में कैद हैं। आस -पास धमाकों का शोर लगातार गूंजता है। माता -पिता के पास गांव जा नहीं सकते क्योंकि रूसी हमले में जान का खतरा है। भाई रूसी बॉर्डर पर लड़ रहा है।

 पाव्लो की आंखें दुःख और  भय में  घिरी नजर आती है जैसे किसी ने विश्वासघात कर दिया हो। वह रोता नहीं लेकिन आवाज़ भरी हुई है। वह कहता है वे हमसे नफरत करते हैं और उनका एक ही मकसद है तबाही तबाही और तबाही। हम में से किसी ने भी नहीं सोचा था कि इक्कीसवीं सदी में कोई देश किसी देश पर यूं हमला करेगा। पुतिन पागल हो चुके हैं। हमारे देश में कोई फासीवादी ,कोई नार्सिस्ट नहीं है। मैंने कभी नहीं देखा। उन्होंने खारकीव में चार सौ रहवासी इमारतों पर हमले किये हैं। बच्चे मारे गए हैं। हम फ़िलहाल सुरक्षित हैं लेकिन मैं अपना देश छोड़कर कहीं नहीं जाने वाला। मैं यूक्रेनी हूं ,यहीं बड़ा हुआ हूं। मैं लड़ने जाना चाहता हूँ लेकिन फिलहाल मेरे आगे काफी लोगों के आवेदन हैं।  जो कभी परिंदों की तरह उड़ता था आज एक कमरे में कैद है। वहां अपने कंप्यूटर की खिड़की खोल वह दुनिया से जुड़ता है। बदले में दुनिया के लोग उसकी झोली  समर्थन,स्नेह और आर्थिक सहयता की पेशकश से भर देते हैं। हमेशा मुस्कुराने वाला यह जोड़ा
 तकलीफ के बावजूद हिम्मत बांधे दिखता है। दुनिया के लिए यह नए किस्म का अनुभव है।  युद्धरत या कहें कि युद्ध में धकेल दिए  गए  छोटे-से   देश के वासी सीधे तकनीक के ज़रिये अपनी बात कह रहे हैं। बिना डरे साहस के साथ। जंग के इलाकों से इतना सीधा संपर्क शेष दुनिया को पहली बार हो रहा है। उम्मीद की यह बुरा वक्त जल्द खत्म हो और कोई देश यूं किसी देश के वजूद को न रौंदे।







गुरुवार, 3 मार्च 2022

चौकसे जी आप जो भी रहे परदे के सामने रहे

 


आदरणीय चौकसे जी के जाने के बाद मेरे लिखत पढ़त  की दुनिया अब दो भागों में बंट गई है। पहले उनके साथ और अब उनके बाद।  अब कोई इतनी साफगोई से मुझे नहीं बता सकेगा कि इस नए और भयावह युद्ध में रूस, यूक्रेन और भारत की भूमिका क्या और कैसे देखी जानी चाहिये। क्योंकर यूरोप और सशक्त देश आसुदाहाल होकर भी युद्ध को लेकर प्यासे हैं ? क्यों भारत में कोई ऐसे  नेता नहीं जो खुलकर हिंसा का विरोध करे ? क्या वे  भूल गए हैं  कि हम बापू के  देश से हैं ? बेशक ये जवाब  चौकसे जी से मिलते और इस मासूमियत पर कौन न कुर्बान  हो जाए कि वे फिल्म कॉलम लिखते थे। आज दैनिक भास्कर ने उनकी ख़ामोशी के बाद उन्हीं की लिखी  एक चिट्ठी प्रकाशित की है जो उन्होंने छह साल पहले कैंसर से ग्रस्त होने के बाद एम डी सुधीर अग्रवाल जी को लिखी थी। चौकसे जी तो  बड़े लेखक रहे ही। वे जीते जी इतना सोच सकते थे कि पाठक को उनके जाने के बाद भी नया मिल सके।  भास्कर ने जरूर उनका खत छापकर अपने प्रयोगों की सूची में एक और बड़ा प्रयोग शामिल कर दिया है। एक घटना मैं भी आज साझा करना चाहती हूं । 

बात 1996 की रही होगी। सुधीर अग्रवाल जी का एक प्रयोग था इंदौर विशेष जिसकी टीम में मैं भी शामिल थी। इन्हीं दिनों भास्कर की एक लाख प्रतियां होने पर इंदौर शहर में उत्सव एक लाख का मना रहा था। यह वह समय था जब इंदौरऔर देश भर में नईदुनिया की तूती बोलती थी और भास्कर एक-एक प्रति बढ़ाने के लिए नईदुनिया से लड़ रहा था। इस उत्सव में केपीएस गिल ,मंजीत बावा , इला अरुण ,प्रीतिश नंदी और नई -नई मिस वर्ल्ड बनी ऐश्वर्या राय  शामिल होने वाले थे। जिस शाम नेहरू स्टेडियम में इला अरुण का शो था उसी  सुबह मेरी एक खबर साक्षरता मिशन की धीमी गति को लेकर भास्कर के इंदौर विशेष पेज  पर प्रकाशित हुई । नया-नया उत्साह था।  हम सब भी  सुबह की मीटिंग के बाद नेहरू स्टेडियम पहुंच गए। वहां सुधीर जी किसी पर बरस रहे थे कि इतना बड़ा इवेंट कर रहे हैं और आप लोग ये क्या प्रशासन के खिलाफ छाप देते हैं।  व्यवस्थाएं बिगड़ीं तो कौन ज़िम्मेदार होगा। वे बहुत गुस्से में थे। सामने मैं थी और किसी ने उन्हें बता दिया कि खबर इसी ने लिखी है। फिर तो बंदूक मेरे आगे  तन गई। खूब डांट। मैं दुःख और शर्म के भाव लिए घर लौट आई और कहा कि मैंने नौकरी छोड़ दी है। अगले दिन मैं दादा -दादी  के पास देवास चली गई जो इंदौर से  चालीस किलोमीटर करीब  है। 

बात चौकसे जी तक पहुंची कि एक नई पत्रकार के साथ ऐसा हुआ है। उन्होंने सीधे सुधीर जी से कहा कि इस लड़की की कोई गलती नहीं है। उसे वापस काम पर बुलाओ। वे मेरे घर भी गए कुछ साथियों के साथ और कहा  कि लड़की कहां हैं उसे दफ्तर भेजो। घर पर माता-पिता हैरत में थे कि यह सब क्या हो रहा है। पता नहीं वह अच्छे लोगों का दबाव था या मेरी काम करने की  इच्छाशक्ति, मैं काम पर लौट आई।  चौकसे जी का एक छोटे से पत्रकार के लिए यूं संघर्ष करना मैं कैसे भूल सकती हूं ? आप जो भी रहे परदे के सामने रहे परदे के पीछे कुछ नहीं। पारदर्शी, कांच की तरह साफ़ धवल उज्ज्वल। एक सशक्त का यूं कमजोर  के पक्ष में खड़े होना..  आंखें धुंधला गई हैं ..  गोया कि मैं इतनी निष्णात नहीं हूं सर। सादर प्रणाम। अलविदा।