शुक्रवार, 17 जून 2022

सरकार का आग से खेलने वाला पथ अग्निपथ

बुलेट ट्रैन के सपनों को जीते-जीते हम बुलडोज़र और अब अग्निवीर की  बुलेट ट्रेनिंग के पहले ही निशाने पर आ गए हैं। सरकार इसे नौकरी कह रही है लेकिन युवा को ऐसा नहीं लग रहा ।वह सड़क पर है आंदोलित है उद्वेलित है।  सरकार उस युवा को सेना में चार साल के लिए नौकरी देने की बात कर रही है  जो चार साल से कड़ी मेहनत सेना में भर्ती के लिए कर रहा था । कुछ तो इस अवधि में आयु सीमा भी पार कर चुके। तीनों सेनाओं के लिए छियालीस  हज़ार युवाओं  की भर्ती होगी जिनकी उम्र अठारह से इक्कीस साल होगी। पहले साल तीस हज़ार ,  दूसरे साल 33  तीसरे साल  36हजार पांच सो और चौथे साल 40 हज़ार रुपए दिए जाएंगे कुल लगभग ग्यारह  लाख सेवा के अंत में  इन सैनिकों  को मिलेंगे । कोई पेंशन नहीं कोई स्वास्थ्य सुविधा नहीं। अब भर्ती रैलियां भी नहीं होगी। तर्क ये कि बूढी सेना अब  जवान होगी लेकिन  वे जज़्बात जो मृत्यु से यारी के होते हैं प्रतिबद्धता के होते है, देश पर मर मिटने के होते हैं वे कहां से आएंगे? चार साल की तो डिग्री होती है और उसके बाद फिर इंटर्नशिप भी। चार साल बाद भी ये युवा तो  युवा ही रहेंगे। वे फिर बेरोज़गार की कतार में शामिल नहीं हो जाएंगे  ? आगे की नौकरी और लाभ इनमें से चुनिंदा पचीस फीसदी को मिलेंगे तब शेष फिर किन्हीं बड़े कॉर्पोरेट घरानो को  छोटी-छोटी  पगारों  पर सौंप दिए  जाएंगे  ? कुछ को पुलिस और  अर्द्धसैनिक बलों में शामिल कर भी लिया जाए  तब भी क्या ये दोनों सेवाएं प्रशिक्षण के एक ही पैमाने से होकर गुजरती हैं? अच्छे नतीजों की कल्पना कर भी ले  जाए तो क्या ये हो सकता है कि ये वाली पुलिस आरोपी को थाने में  कूटेगी  नहीं और खुद ही न्यायाधीश बनकर आरोपियों के (नहीं आरोपी की बीवी के) घर पर बुलडोज़र नहीं चलवाएगी। 

फिलहाल इन सबके  जवाब देश के युवाओं की आँखों से पढ़े जा सकते हैं।  वे  हताशा और गुस्से में है। राजस्थान ,बिहार, हरियाणा ,उत्तरप्रदेश,हिमाचल और मध्यप्रदेश का युवा सड़कों पर है। वह छला हुआ महसूस कर रहा है। दरअसल यह पूरी कवायद एक चतुर वणिक के सीईओ की मालूम होती है जिस पर कर्मचारियों की छटनी का दबाव हो  और वह एक ऐसी धांसू स्कीम मालिक के सामने रख देता है जिसमें नए कर्मचारी ठेके पर हों वह भी  बहुत कम समय के लिए हो। मालिक का आर्थिक भंडार बचने लगता है और कर्मचारी का संघर्ष बढ़ने।  दूसरे लफ़्ज़ों में कहें तो 'धंधा नी वात' है ये लेकिन कल्याणकारी राष्ट्र ऐसी  बुद्धि पर नहीं चलते । सामाजिक ताना बाना भी यूं नहीं चलता।

 वीर भूमि राजस्थान की धरा से लाखों सिपाही सेना में हैं। शांतिकाल में भी उनकी देह के गांवों में आने का सिलसिला बना रहता है। युद्ध के समय तो गिनती बहुत मुश्किल हो जाती है। वीर माताएं गांवों में शहीद की मूर्तियों और बहादुरी की गाथाएं सुना सुना कर बच्चों को बड़ा करती हैं तब कहीं जाकर मिलते हैं सेना को देश पर जान न्योछावर करनेवाले सपूत । सरकार में शामिल इसी सेना के मेजर कह रहे हैं कि देश की सेना बूढ़ी हो रही थी अब जवान होगी। 33 वर्ष की औसत आयु वाली इसी सेना ने देश पर कुर्बान करने वाले सैनिक दिए हैं जो कई मोर्चों पर कामयाब रहे हैं । मेजर जनरल डॉ यश मोर ने तो अपने ट्वीट में साफ कहा है   कि अब इस पर प्रतिक्रियाओं की बौछार होगी और फिर बदलाव। इस शानदार स्कीम को तुरंत प्रभाव से रोक दिया जाना चाहिए और पहले की तरह भर्ती की जानी  चाहिये। प्रतिरोध का नतीजा तुरंत मिला और अब फैरबदल  करते हुए अग्निपथ स्कीम की आयु सीमा साढ़े सत्रह से 21 की बजाय  23 कर दी गई है। 

हरियाणा के रोहतक जिले में सचिन नाम के एक युवा ने जन दे दी है । वह अपने गांव से आकर पीजी में रहकर सेना में भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रहा था ।दो साल पहले कोरोना की वजह से भर्ती टल रही थी और अब इस अग्निपथ योजना ने उसके सारे सपनो को आग के हवाले कर दिया। सरकार ने आयुसीमा में ढील की घोषणा अब की है लेकिन तब तक सचिन मौत को गले लगा चुका था।रोहतक में विरोध प्रदर्शन बढ़ गया है और किसान आंदोलन से जुड़े नेता भी इसमें शामिल हैं। फिलहाल यहां न जय जवान हैं और न जय किसान।हर साल एक करोड़ युवा इस परीक्षा की तैयारी करते हैं।ज्यादातर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं।इस वर्ग में निराशा है जिसका संज्ञान सरकार को लेना जरूरी है। 

ऐसा क्यों है कि बड़ी और देश की सुरक्षा और आत्मसम्मान से जुडी भर्तियां भी किसी पैकेज की तरह साधी जा रही हैं ?हम इजराइल से प्रभावित रहते हैं लेकिन इतना पैसा तो बल्कि इससे भी ज्यादा तो चार साल की ट्रेनिंग में सिपाहियों को जेबखर्च बतौर दे दिया जाता है। सबसे बड़ी सेना दुनिया में चीन के पास है इकीस लाख अस्सी हज़ार की जबकि भारत की तकरीबन साढ़े चौदह लाख और लगभग एक लाख खाली पड़े हैं । चीन रक्षा बजट में एक सौ बाईस लाख करोड़ खर्च करता है और भारत खर्च करता है छह लाख करोड़। बजट की इस कमी की गाज भर्ती रैलियों पर ही गिरी मालूम होती है। एक कॉन्ट्रैक्ट को नौकरी का नाम युवाओं को आक्रोशित कर रहा है। अग्निपथ के अग्निवीर किसी अग्नि परीक्षा से ही गुजरेंगे। हरिवंश राय बच्चन की कविता इस माहौल पर भी मौजूं होगी सोचा नहीं था शायद यही श्रेष्ठ कवि होना है। अंतिम चार पंक्तियां देखिये। 

यह महान दृश्य है, 

चल रहा मनुष्य है ,

अश्रु स्वेद रक्त से, 

लथपथ लथपथ  लथपथ ,

अग्निपथ अग्निपथ  अग्निपथ। 

यही सब जनता ने नोटबंदी ,कोरोना के समय देशबंदी , सीएए और  किसान अंदोलन के दौरान भी देखा था। बीच बीच में कई बदलाव और जनता सड़कों पर। इस बार सेना में भर्ती के  इच्छुक युवा की बारी है और वह सड़कों पर है। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल पी के सहगल को चार साल की अग्निपथ योजना किसी इंटर्नशिप और ड्यूटी पर किसी टूर की तरह लगती है। वे कहते हैं यह जल्दबाज़ी में लाई गई है, इसमें रिस्क है।  मौजूदा सिस्टम में कोई खामी नहीं है और इसमें छेड़छाड़ की कोई ज़रुरत ही नहीं है। फिर सरकार को इस योजना को इतनी जल्दबाजी में लाने की क्या पड़ी थी ?राजस्थान के नागौर के सांसद हनुमान बेनीवाल न कांग्रेस के हैं न भाजपा के हां  प्रधानमंत्री से अपनी सहमति वक्त-वक्त पर जताते रहते हैं  लेकिन उनकी राष्ट्रीय  लोकतान्त्रिक पार्टी ने भी अग्निपथ योजना के विरोध में राजस्थान भर में प्रदर्शन कर रही है । उनका कहना है एक मुलाकात में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कोरोना की वजह से आयु में दो साल की छूट का वादा किया था ये लेकिन वे मुकर गए। देश की सरकार ने पहले किसानों को छला और अब जवानों को छल रही है। ज़रुरत पडी तो हम विरोध प्रदर्शन करने के लिए दिल्ली कूच  करेंगे। 

देखा जाए सरकार के लिए बीता पखवाड़ा बड़ा ही कठिन साबित हो रहा है। नूपुर शर्मा के हज़रत मोहम्मद पैगम्बर को लेकर बयान के बाद कई देशों के सख्त रवैये के बाद देश में ही लोग सड़कों पर थे। बुलडोज़र बाबा की सरकार ने प्रयागराज ने उस महिला के मकान को ही गिरा दिया जो आरोपी भी नहीं। पुलिस खुद ही आरोपी बना रही है, पोस्टर लगा रही है जेल में डाल रही है और फिर बुलडोज़र से मकान भी गिरा रही है। बदले की कार्रवाई नोटिस भी दिलाएगी इसी डर से से लोग मकान- दुकान  बेच रहे हैं। क्या कोई सरकार इसलिए चुनकर आती है कि नागरिक की नाक में दम करे। उसे रोज़गार और जीने के अधिकार से अलग कर दे। नूपुर शर्मा को दूसरा पैनेलिस्ट उकसाता है वे नफरती बयान दे डालती है, पार्टी निलंबित कर कहती है कि कार्रवाई कर तो दी अब और क्या करें ? आप तो दंगाई हैं। उकसाना शायद ऐसा ही होता है। हिंसा और बलप्रयोग दोनों ही गलत है इसके लिए उकसाने वाले राष्ट्रविरोधी हैं। आंदोलन शांतिपूर्ण हो यही महात्मा गांधी के देश की पहचान और सलीका रहा है। यहां डेमोक्रेसी है बुलडो क्रेसी नहीं। 





शुक्रवार, 13 मई 2022

जनता के खिलाफ द्रोह से डरो सरकारो

 कानून 124 A पर सरकार पुनर्विचार करे इससे पहले एक मजबूत विचार सुप्रीम कोर्ट ने रख दिया है।  अब इस कानून के तहत नए मामले दर्ज़ होना स्थगित रहेगा ,जो जेल में हैं वे ज़मानत के लिए अपील कर सकते हैं। वाकई एक बड़ा दिशा निर्देश उन पत्रकारों , कॉमेडियंस ,मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए जो सत्ताधारी दल के निशाने पर केवल इसलिए होते क्योंकि वे अपनी राय रख रहे होते  हैं। वे  तोते की तरह नहीं बोलते जो अपने आकाओं की खुशामद में अपना विवेक अपना ज़मीर ताक पर रखकर चलता है। 1860का यह कानून अंग्रेज़ी हुकूमत की देन था एक अंग्रेज इतिहासकार जिसे हम थॉमस मैकाले के नाम से जानते हैं। जिसकी शिक्षा प्रणाली को हम कोसते नहीं थकते उसी कानून को हम आज़ादी के अमृत महोत्सव तक खींच कर ले आए हैं सिर्फ इसलिए कि असहमत की आवाज़ दबा सकें, उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट ला सकें ,जेल में सड़ा सकें। महात्मा गांधी ,बाल गंगाधर तिलक ,भगतसिंह, सुखदेव ,जवाहर लाल नेहरू जैसे कई देशभक्त इस राजद्रोह कानून के तहत जेल में डाले  जा चुके हैं।  अब जब कानून मंत्री किरण रिजिजू लक्ष्मण रेखा याद दिला रहे हैं तो सरकार की मंशा पर भी संदेह झलकता दिखाई देता है। 

बेशक सुनवाई की अगली तारीख जुलाई 23 तय की गई है लेकिन पत्रकारों,मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सत्ता से अलग अपनी सियासी आवाज रखने वालों के लिए यह भरी गर्मी में राहत  की फुहार का वक्त है। तपती धूप में ठंडी छांव का आभास है।  पत्रकार विनोद दुआ , कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी , मानवाधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी, क्लाइमेट  कार्यकर्ता दिशा रवि पर राजद्रोह की यह धारा लगाई गई। विनोद दुआ और स्टेन स्वामी तो अब इस दुनिया में नहीं रहे।सत्ता कोई भी हो किसी भी राज्य की हो वह इस कानून के जरिए कई विस्सल ब्लोअर्स की सीटी बंद करने का काम करती आई  है ताकि उनकी सत्ता निरंकुश रहे। विनोद दुआ भाजपा की वजह से और असीम त्रिवेदी कांग्रेस कार्यकाल में सताए गए। विनोद दुआ यू ट्यूब पर एक शो करते थे जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की गई थी। उन पर हिमाचल प्रदेश के एक भाजपा नेता ने प्राथमिकी दर्ज की और राजद्रोह का मुकदमा कायम हुआ। कार्टूनिस्ट असीम ने यूपीए दो के कार्यकाल में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के तहत कार्टून अभियान चलाया था और फिर उनके खिलाफ राजद्रोह लगा दिया गया। दिशा रवि ने किसान आंदोलन के समय महज एक टूल किट शेयर की थी और दिल्ली पुलिस उन्हें बंगलौर से गिरफ्तार कर दिल्ली ले आई। किशोरचंद्र वांगखेम  मणिपुर के पत्रकार हैं उन्होंने मुख्यमंत्री बीरेन सिंह की आलोचना में एक वीडियो सोशल मीडिया पर डाला और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज  दिया गया, उनकी पत्नी दो बच्चों के साथ पति की जमानत के लिए भटकती रहीं।एक बार फिर  एक दूसरी पोस्ट जिसमें उन्होंने गाय के गोबर से कोरोना के इलाज  का मज़ाक उड़ाया था  , राष्ट्रिय सुरक्षा कानून के तहत जेल भेज दिया गया। सत्ता ऐसी आवाजों को कुंद करने के लिए 124 A का हमेशा दुरूपयोग करती आईं हैं जबकि 1962 के केदारनाथ केस के समय सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट कर चुका था कि जब तक हिंसा की आशंका ना हो तब तक इस धारा के तहत मुकदमा ना हो। इस लिहाज से राणा दंपति की बातों से इस बात की आशंका स्टेट को हो सकती है फिर भी महाराष्ट्र सरकार के राजद्रोह लगाने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। 

इस कानून का इस्तेमाल हमेशा अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए सरकारें करती रही हैं और आकाओं  के अंधभक्त अपने अंक बढ़वाने के लिए। आरोपी दरअसल यहां पीड़ित होता है ,मीडिया में उसके खिलाफ हैडलाइन बन जाती है, जमानत नहीं हो पाती और ट्रायल सालों साल चलती है।  कोई अपराध सिद्ध नहीं हो पाता। ऐसा इसलिए क्योंकि अपराध साबित होने की दर दो  फीसदी भी नहीं है। 2018 में 70 मामलों में से एक भी नहीं,2019 में 93 में से दो और 2020 में 73  में से  केवल एक मामले में अपराध साबित हुआ। जाहिर है यह धारा केवल उत्पीड़न का एक हथियार भर है। रिटायर्ड आईपीएस विजयशंकर सिंह साफ़ कहते हैं कि राजद्रोह हो या राष्ट्रिय सुरक्षा कानून इसमें कुछ मामले ऐसे भी होते हैं जो केवल राजनैतिक संकेतों के आधार पर कायम किए जाते हैं। हमें अच्छी तरह से पता होता है कि ये अदालत में टिक नहीं पाएंगे। उस समय तो यही होता है कि चार्जेस लगाओ, देखा जाएगा। दिक्कत ये भी है कि पुलिस का  न्यायायिक दिमाग दक्ष नहीं होता और न ही इस दिशा में कोई प्रयास होते हैं ये बीमारी ब्रिटिश काल से है ,अफसर भी इस बात को जानते हैं लेकिन अफसर भी तो वही होता है जो सत्ता को पसंद होता है तो निष्पक्ष सरकार का होना जरूरी है। 

सरकार  की निष्पक्षता का तो ये हाल है कि उसे तो मसखरे भी  बर्दाश्त नहीं होते। कॉमेडियंस वीर दास ,मुनव्वर फारुकी , कुणाल कामरा ,श्याम रंगीला का व्यंग्य ही सरकारों को बाण की तरह चुभता है। मुनव्वर को दो महीने तक मध्यप्रदेश सरकार ने जेल में रखा। वह  इंदौर में शो से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया। क्या करता है एक पत्रकार और व्यंग्यकार लिखता बोलता ही तो है। ऐसा करने पर ही सत्ता उसे अपराधी मानने लगती है। वह लिखेगा बोलेगा नहीं तो क्या करेगा। आपका काम नेतागिरी है तो उसका लिखना। वह कैसे अपना काम करे। प्रजातंत्र में इस पाए का मज़बूत होना बहुत जरूरी है और सुप्रीम कोर्ट के इस कानून के स्थगन से इस बिरादरी की बाकायदा सुध ली गई है। आशंका होती है जब कानून मंत्री कहते हैं कि एक लक्ष्मण रेखा होती है जिसका सभी को ध्यान रखना चाहिए लेकिन क्या कानून मंत्री ने इस बात में लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखा है जब वे कहते हैं कि  प्रधामंत्री की इच्छा से कोर्ट को अवगत करा दिया गया है?


 



मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

खबर और मनोहर कहानियां का फर्क मिटा दिया इस दौर ने

जेएनयू में अब वेज v/ s नॉनवेज हो गया। रामनवमी पर मांसाहार नहीं परोसना तय किया गया। दूसरा पक्ष भिड़ गया कि दिखाओ कहां कोई लिखित आदेश है। अब ऐसे तमाम मसलो के कहां कोई आदेश-वादेश होते हैं। रामनवमी थी। आराध्य  का दिन था ,इससे बड़ा क्या कोई मौका होता विवाद पैदा करने के लिए। वे लड़ लिए। नए नवेलों की राजनीति चमक गई, उनके बुजुर्ग नेताओं ने भी देख लिया और अख़बार टीवी की कृपा दृष्टि भी हो गई। ये  ऐसे ही चटपटे मसालों की तलाश में रहते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि ये चटपटे मसाले पुराने हो गए हैं। जाले पड़ गए हैं इनमें,बांस रहे हैं बांसी सामग्रियों के साथ। घिन आती है ऐसे मुद्दों पर और ऐसी सियासत पर। मत खाओ एक दिन। शोर नहीं मचाओगे तो वे भी क्या  कर लेंगे। तुम शोर मचाते जाते हो, वे मामले ढूंढ के लाते जाते है। सब मौजूद है हमारे देश में । वेज -नॉनवेज,पर्दा बेपर्दगी , मूर्त-अमूर्त। सब एक साथ। अब आप इन्हीं पर भिड़ रहे हो ,लड़ रहे हो ,अड़ रहे हो। क्या बेरोज़गारी ख़त्म हो गई ?महंगाई मर गई ?बलात्कारी बेहोश हो गए ? पत्रकार बेखौफ लिख रहे ? गैर ज़रूरी मुद्दों पर आप लड़ रहे हो। आप कायदे के मुद्दे उठाओगे तो वे भी रास्ते पर आएंगे। बड़ी ज़िम्मेदारी है।  पाश को याद करते हो। उनकी लिखी कविता  दोहराते हो कि हम लड़ेंगे कि बगैर लड़े कुछ नहीं मिलता। फिर ये कहां चूक हो रही है । सब कुछ साथ रहता  रहा है और अब बेवजह टकरा रहा है। उफ ये टकराहट के सौदागर। 

सियासत हो या मीडिया इन्हें सिर्फ विवाद चाहिये। पहले इवेंट ,फिर वहां विवाद और फिर इन कच्ची पक्की जानकारियों को वायरल कराती आई टी सेल। पहले सनसनी लपकने का काम मीडिया करता था अब सियासत करने लगी। काम का नमूना देखिये। क्या कहा समाजवादी अखिलेश ने अपने समाजवादी पिता मुलायम सिंह को चाटा मारा। कब हुआ ,क्या प्रमाण है यह मत ढूंढो ,वायरल कर दो। फैला दो सब जगह। एक कद्दावर  भाजपा नेता का यह बयान था। सोशल मीडिया पर तथ्य जांचने की कोई ज़रुरत नहीं है चलने दो ,छलने दो जनता को। असर हुआ तो ठीक ,नहीं हुआ तो भी क्या घटा। न हींग चाहिए न फिटकरी रंग चोखा आ ही जाता है क्योंकि जनता भोली है। तभी तो आए दिन हिजाब ,हलाल ,महंत के मजहब विशेष की महिलाओं से दुष्कर्म की धमकी जैसे मुद्दे सुर्खियां बनते हैं। खबर और मनोहर कहानियां का फर्क ही मिटा दिया इस अजीब दौर ने। 

खाने -पीने  , पहनने -ओढ़ने  ,प्रेम -मित्रता जैसी  बेहद निजी बातों को चौराहे की बात बना देने वाली व्यवस्था जिसमें मीडिया का बड़ा हाथ है , आखिर किसे प्रिय लग रही है ? मध्यप्रदेश में पत्रकारों के कपड़े उतरवाने ,उत्तरप्रदेश में  दलित लड़की के उत्पीड़न और फिर हत्या को कवर करने वाले पत्रकार सिद्दीक कप्पन को जेल में डालने ,पत्रकार राणा अय्यूब को हवाई अड्डे पर हिरासत में ले लेने जैसी घटनाओं पर मीडिया की ज़ुबां बंद रहती है। पत्रकार राणा दिल्ली उच्चा न्यायालय के दखल के बाद इटली जा पाती हैं। वहां जो आपबीती उन्होंने दुनिया को सुनाई है वह देश का सर शर्म से झुका देती है। वे साफ कहती हैं मैं भाग्यशाली पत्रकार हूं जिसकी आवाज सुनी जाती है। मेरे कई साथियों की आवाज दबाई जा रही है ,उन्हें डराया जा रहा है।वे कहती हैं मैं नहीं जानती देश लौटकर मेरा क्या होगा लेकिन भारत की आवाज सुनना जरूरी है। सोचने की बात है कि यहां देश के नेताओं को यह फिक्र क्यों नहीं हो रही है कि दुनिया भारत को किस नजरिये से देखेगी। ऐसे ही एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुखिया और लेखक आकार पटेल को भी अमेरिका जाने से रोक दिया गया । अभिव्यक्ति को यूं दबाने का सिलसिला कुछ कुछ बदले की भावना जैसा है । पत्रकार सत्ता के खिलाफ हमेशा लिखते रहे हैं । पत्रकार राजेंद्र माथुर ने भी  सत्ता के खिलाफ लिखा लेकिन उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव शोक प्रकट करने उनके निवास पर गए थे। इन दिनों हालात यूं हैं कि पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी जाती है और शिखर नेतृत्व से कोई स्वर सुनाई नहीं देता। 

भारत जैसे विशाल प्रजातंत्र के शिखर नेतृत्व का मौन यूं मालूम होता है मानो कह रहा हो सब चलता है। एक भी पत्रकार वार्ता में सीधे सवालों का सामना नहीं हुआ है। जो प्रिय हैं उन्हें साक्षात्कार दिए गए ,वे अभिनेता भी हो सकते हैं। शेष को देशद्रोही तक कह दिया जाता है। लिखता ही तो है पत्रकार। उससे इतना भय क्यों कि उसे यात्रा से पहले हिरासत में लिया जाए या फिर जेल भेजा जाए ? चूक कहां हो रही है इसे देश के  सत्ता शिखर से अलग शक्तिशाली और वरिष्ठ नागरिकों को भी  देखना होगा। वोट लेने का गणित सत्ता का होता है लेकिन देशप्रेमी का मन अलग माटी का होता है। उसे हर मुद्दे पर लड़ाने -भिड़ाने का उद्देश्य अगर किसी पक्ष  का है तो फिर विपक्ष क्यों आंखें मूंदे पड़ा है। देश के कस्बे ,शहर, प्रदेश प्रयोगशाला बन रहे हैं लेकिन विपक्ष सुस्ता रहा है। वह  सत्ता पक्ष के मुद्दों की बीन पर नाच रहा है, उसकी अपनी सोच कुंद है जबकि जनता की तकलीफ कोई नहीं समझ पा रहा कि उसकी आठ हजार की पगार में उसका तीन हज़ार रूपया तेल पर खर्च हो रहा है। रसोई गैस, खाने का तेल का खर्च उसका अपना तेल निकालने के लिए काफी है। 

 रूसी लेखक इवान तुर्गनेव ने अपना पहला उपन्यास रूदिन लिखा था। रूदिन  खूबसूरत नौजवान और औजपूर्ण वक्त था लेकिन जीवन में कुछ भी पूरी तरह हासिल नहीं कर पाया। उसके साथी पैसा कमाकर परिवार बसा चुके लेकिन रूदिन केवल लोगों की भलाई और खुशहाली के सपने देखता रहा उसका प्रेम भी नाकाम रहा। फिर एक दिन  जब पेरिस की राष्ट्रीय वर्कशापों का विद्रोह कुचला जा चुका था एक आवाज को गोली लगी वह लाल झंडा हिला रहा था। शाही गार्ड की गोली उसे लग चुकी थी। वह ढेर हो चुका था और रूसी रूदिन को मारने वाले ने कहा एक और पोलैंडवासी मारा गया। 







शुक्रवार, 11 मार्च 2022

वे हमसे नफरत करते हैं

पाव्लो सत्ताईस साल का एक यूक्रेनी युवा है जो कम्प्यूटर्स में मास्टर्स है। उसकी गर्लफ्रेंड का नाम लूबा है। ये दोनों यूक्रेन की राजधानी कीव से दो सौ किलोमीटर  दूर पालतोवा में रहते हैं। पाव्लो के माता पिता गांव में रहते हैं। उसका एक भाई भी है जो पुलिस में था लेकिन हालात की वजह से आर्मी में है। अब आर्मी पुलिस सब एक है। एक पखवाड़े पहले तक पाव्लो यूक्रेन के गांव, देहात, शहरों से दुनिया को रूबरू कराया करता था लेकिन आज सन्नाटा है। पाव्लो के व्लॉग्स में ज़िन्दगी यूं ही हंसती थी जैसे किसी भी शांत, सद्भावी  और सुंदर देश में। गांव में उसकी मां बत्तख और मुर्गियां पाला करती है और उसके पड़ोस की सफेद  गाय बारह लीटर तक दूध दे देती है।अपने पिता के साथ कैमरे के सामने वह पूछता है क्या मैं इनके जैसा दिखता हूं..  नहीं बिल्कुल नहीं मैं तो मेरी मां जैसा हूं। फिर मजाक करते हुए अपने पिता से पूछता है कि क्या मैं आप ही का बेटा हूं। भोले पिता मुस्करा देते हैं क्योंकि अंग्रेजी में उन्हें कुछ पल्ले  नहीं पड़ता।   पाव्लो के आलावा कोई अंग्रेजी नहीं बोलता यहां  तक कि लूबा भी सारे जवाब यूक्रेनी भाषा में ही देती है। ये दोनों कभी कभार किसी सुपर मार्केट में भी घुस जाते हैं और बताते हैं कि हमारा देश कितने कम खर्च में कितना खाना मुहैय्या करा देता है। फिर ये खाना लेकर बैठ जाते हैं और पेपर सिजर खेलते हुए खाना खाते जाते हैं। यानी  जो जीता वो पहले अपनी पसंदीदा डिश चखता है । 
लेकिन यह सूरत एक पखवाड़े पहले की है। ये दोनों अब अपने अपार्टमेंट में कैद हैं। आस -पास धमाकों का शोर लगातार गूंजता है। माता -पिता के पास गांव जा नहीं सकते क्योंकि रूसी हमले में जान का खतरा है। भाई रूसी बॉर्डर पर लड़ रहा है।

 पाव्लो की आंखें दुःख और  भय में  घिरी नजर आती है जैसे किसी ने विश्वासघात कर दिया हो। वह रोता नहीं लेकिन आवाज़ भरी हुई है। वह कहता है वे हमसे नफरत करते हैं और उनका एक ही मकसद है तबाही तबाही और तबाही। हम में से किसी ने भी नहीं सोचा था कि इक्कीसवीं सदी में कोई देश किसी देश पर यूं हमला करेगा। पुतिन पागल हो चुके हैं। हमारे देश में कोई फासीवादी ,कोई नार्सिस्ट नहीं है। मैंने कभी नहीं देखा। उन्होंने खारकीव में चार सौ रहवासी इमारतों पर हमले किये हैं। बच्चे मारे गए हैं। हम फ़िलहाल सुरक्षित हैं लेकिन मैं अपना देश छोड़कर कहीं नहीं जाने वाला। मैं यूक्रेनी हूं ,यहीं बड़ा हुआ हूं। मैं लड़ने जाना चाहता हूँ लेकिन फिलहाल मेरे आगे काफी लोगों के आवेदन हैं।  जो कभी परिंदों की तरह उड़ता था आज एक कमरे में कैद है। वहां अपने कंप्यूटर की खिड़की खोल वह दुनिया से जुड़ता है। बदले में दुनिया के लोग उसकी झोली  समर्थन,स्नेह और आर्थिक सहयता की पेशकश से भर देते हैं। हमेशा मुस्कुराने वाला यह जोड़ा
 तकलीफ के बावजूद हिम्मत बांधे दिखता है। दुनिया के लिए यह नए किस्म का अनुभव है।  युद्धरत या कहें कि युद्ध में धकेल दिए  गए  छोटे-से   देश के वासी सीधे तकनीक के ज़रिये अपनी बात कह रहे हैं। बिना डरे साहस के साथ। जंग के इलाकों से इतना सीधा संपर्क शेष दुनिया को पहली बार हो रहा है। उम्मीद की यह बुरा वक्त जल्द खत्म हो और कोई देश यूं किसी देश के वजूद को न रौंदे।







गुरुवार, 3 मार्च 2022

चौकसे जी आप जो भी रहे परदे के सामने रहे

 


आदरणीय चौकसे जी के जाने के बाद मेरे लिखत पढ़त  की दुनिया अब दो भागों में बंट गई है। पहले उनके साथ और अब उनके बाद।  अब कोई इतनी साफगोई से मुझे नहीं बता सकेगा कि इस नए और भयावह युद्ध में रूस, यूक्रेन और भारत की भूमिका क्या और कैसे देखी जानी चाहिये। क्योंकर यूरोप और सशक्त देश आसुदाहाल होकर भी युद्ध को लेकर प्यासे हैं ? क्यों भारत में कोई ऐसे  नेता नहीं जो खुलकर हिंसा का विरोध करे ? क्या वे  भूल गए हैं  कि हम बापू के  देश से हैं ? बेशक ये जवाब  चौकसे जी से मिलते और इस मासूमियत पर कौन न कुर्बान  हो जाए कि वे फिल्म कॉलम लिखते थे। आज दैनिक भास्कर ने उनकी ख़ामोशी के बाद उन्हीं की लिखी  एक चिट्ठी प्रकाशित की है जो उन्होंने छह साल पहले कैंसर से ग्रस्त होने के बाद एम डी सुधीर अग्रवाल जी को लिखी थी। चौकसे जी तो  बड़े लेखक रहे ही। वे जीते जी इतना सोच सकते थे कि पाठक को उनके जाने के बाद भी नया मिल सके।  भास्कर ने जरूर उनका खत छापकर अपने प्रयोगों की सूची में एक और बड़ा प्रयोग शामिल कर दिया है। एक घटना मैं भी आज साझा करना चाहती हूं । 

बात 1996 की रही होगी। सुधीर अग्रवाल जी का एक प्रयोग था इंदौर विशेष जिसकी टीम में मैं भी शामिल थी। इन्हीं दिनों भास्कर की एक लाख प्रतियां होने पर इंदौर शहर में उत्सव एक लाख का मना रहा था। यह वह समय था जब इंदौरऔर देश भर में नईदुनिया की तूती बोलती थी और भास्कर एक-एक प्रति बढ़ाने के लिए नईदुनिया से लड़ रहा था। इस उत्सव में केपीएस गिल ,मंजीत बावा , इला अरुण ,प्रीतिश नंदी और नई -नई मिस वर्ल्ड बनी ऐश्वर्या राय  शामिल होने वाले थे। जिस शाम नेहरू स्टेडियम में इला अरुण का शो था उसी  सुबह मेरी एक खबर साक्षरता मिशन की धीमी गति को लेकर भास्कर के इंदौर विशेष पेज  पर प्रकाशित हुई । नया-नया उत्साह था।  हम सब भी  सुबह की मीटिंग के बाद नेहरू स्टेडियम पहुंच गए। वहां सुधीर जी किसी पर बरस रहे थे कि इतना बड़ा इवेंट कर रहे हैं और आप लोग ये क्या प्रशासन के खिलाफ छाप देते हैं।  व्यवस्थाएं बिगड़ीं तो कौन ज़िम्मेदार होगा। वे बहुत गुस्से में थे। सामने मैं थी और किसी ने उन्हें बता दिया कि खबर इसी ने लिखी है। फिर तो बंदूक मेरे आगे  तन गई। खूब डांट। मैं दुःख और शर्म के भाव लिए घर लौट आई और कहा कि मैंने नौकरी छोड़ दी है। अगले दिन मैं दादा -दादी  के पास देवास चली गई जो इंदौर से  चालीस किलोमीटर करीब  है। 

बात चौकसे जी तक पहुंची कि एक नई पत्रकार के साथ ऐसा हुआ है। उन्होंने सीधे सुधीर जी से कहा कि इस लड़की की कोई गलती नहीं है। उसे वापस काम पर बुलाओ। वे मेरे घर भी गए कुछ साथियों के साथ और कहा  कि लड़की कहां हैं उसे दफ्तर भेजो। घर पर माता-पिता हैरत में थे कि यह सब क्या हो रहा है। पता नहीं वह अच्छे लोगों का दबाव था या मेरी काम करने की  इच्छाशक्ति, मैं काम पर लौट आई।  चौकसे जी का एक छोटे से पत्रकार के लिए यूं संघर्ष करना मैं कैसे भूल सकती हूं ? आप जो भी रहे परदे के सामने रहे परदे के पीछे कुछ नहीं। पारदर्शी, कांच की तरह साफ़ धवल उज्ज्वल। एक सशक्त का यूं कमजोर  के पक्ष में खड़े होना..  आंखें धुंधला गई हैं ..  गोया कि मैं इतनी निष्णात नहीं हूं सर। सादर प्रणाम। अलविदा। 




शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2022

यह बयान चुनावी सियासत का सबसे घृणित बयान है ?

" जनरल बिपिन रावत हमारा उत्तराखंड का गौरव था ,उनका नेतृत्व में भारत ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक किया। राहुल गांधी क्या बोला प्रूफ देओ प्रमाण देओ। रे भाई आप कौनसे पिता का बेटा हो कभी हमने प्रूफ मांगा है क्या। "

ये वह बयान है जो असम के मुख्यमंत्री हिमंता  बिस्वा  सरमा  ने उत्तराखंड की एक रैली में दिया। कुछ समय के लिए ये भूल जाएं कि हिमंता किस दल के हैं और फिर विचार करें कि यह बयान किस कदर स्त्री विरोधी ,समाज विरोधी और भारतीय संस्कृति विरोधी है। मुख्यमंत्री का यह बयान उत्तेजना में निकल आए शब्द भर नहीं है बल्कि उत्तराखंड के जनरल रावत के नाम पर पहले भावनात्मक माहौल बनाने  और फिर अपने विरोधी राहुल को गाली देने से जड़े हैं  ताकि जनता अपने लाड़ले सपूत के अपमान पर राहुल गांधी के विरोध में आ जाए और यह विरोध फिर वोट में तब्दील हो जाए। बेशक चुनाव के माहौल में पक्ष विपक्ष एक दूसरे पर टीका टिप्पणी करते हैं लेकिन किसी  मां का यूं अपमान दलों की हताशा और स्टार प्रचारकों की  मानसिकता का ही सबूत देता है। 

स्त्री को अपमानित करने के प्रयास भारतीय राजनीति में नए नहीं हैं। एक और पूर्व मुख्यमंत्री ने सुनंदा पुष्कर को हिमाचल की चुनावी रैली में पचास  करोड़ की गर्ल फ्रेंड कहा था। हम यह जानते ही  हैं और यह भी कि  मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मंदसौर की सांसद मीनाक्षी नटराजन को सौ टंच माल कहा था। उन्होंने भले ही सफाई दी हो कि उनका इरादा खरेपन और साफ छवि वाली कहने का था, लेकिन मध्यप्रदेश, यूपी, बिहार में सब जानते हैं कि यह किन संदर्भों में इस्तेमाल किया जाता है।  'टंच माल' टिप्पणी  है जो कतई किसी स्त्री की कार्यकुशलता को पूरे अंक देने के लिए नहीं दी जाती । इन दलों के नेता आपसी बैठकों में लाख कह लें कि बयानबाजी बहुत सोच समझकर की जानी चाहिए लेकिन जब वरिष्ठ नेताओं की  ज़ुबां  ही सार्वजनिक मंचों पर अब फिसलती नहीं है बल्कि सोच समझकर कही जाती हैं 

त्रेता युग में माता सीता भी कहां इस अपमान से बच सकीं लेकिन आज


तक वह चरित्र हिकारत से ही देखा जाता है। सीता जो अपने तप  के बल पर रावण से मुकाबला कर पाईं, एक बयान के आधार पर अग्निपरीक्षा की भागी बनी। सियासत और सिंहासन अक्सर  स्त्री के अपमान का कारण बनता  है लेकिन समाज इसे नहीं स्वीकारता । द्वापर युग में द्रौपदी कौरवों द्वारा अपमानित हुई। भरी सभा में चीरहरण के कुत्सित प्रयास और सिंहासन पर बने रहने की लालसा को महाभारत ग्रन्थ में बहुत बेहतर व्यक्त किया  गया है। वह दृश्य हर पाठक के रोंगटे खड़े करता है फिर कौरवों के प्रति नफरत से भर देता है और यह नफरत कौरवों को अंत की ओर जाते  हुए ही देखना चाहती हैं। 

मुख्यमंत्री का यह बयान अब भी वहीं का वहीं हैं। उदासीनता और पतन का ये हाल है कि कोई भी उन्हें इस बयान पर खेद व्यक्त करने के लिए बाध्य नहीं कर पाया है । असम के कांग्रेस पदाधिकारी पुलिस के पास एफआईआर दर्ज़ कराने गए जिसे नहीं लिया गया। हैदराबाद में ज़रूर तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमिटी की शिकायत दर्ज की गई हैं। असम मख्यमंत्री के खिलाफ धारा 504 और 505के तहत मुकदमा कायम किया आया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रेशखर राव ने कहा है -" पार्टी का एक सीएम तुम किस बाप के पैदा हुए ऐसा बोल सकते हैं क्या ?ये हमारा संस्कार है ? हिन्दू धर्म को बेच के उसके नाम पर वोट कमाने वाले आप लोग गंदे लोग हो। मैं भाजपा अध्यक्ष नड्डा जी से पूछ रहा हूं क्या यह हमारे संस्कार हैं ?अगर आप ईमानदार हैं ,धर्म को निभाने वाले हैं तो बर्खास्त करो असम चीफ मिनिस्टर को। क्या एक चीफ मिनिस्टर ऐसा बात कर सकता है इस देश में ?सहनशीलता की भी एक सीमा होती है। "

हाल ही मैं दक्षिण की एक फिल्म पुष्पा जबरद्दस्त हिट रही है। पुष्पा अपनी  मां का लड़ला बेटा है लेकिन दूसरा पक्ष उसे नाजायज ही पुकारता है। पुष्पा इस का बदला जिस तरह फूल की बजाय फायर बन के लेता  है उसे दर्शकों ने खूब पसंद किया। समाज के बड़े हिस्से को  मां को यूं अपमानित करना सर्वाधिक नापसंद है। जाहिर है नेता अपनी हदें भूल रहे हैं लेकिन समाज अपनी मर्यादा जनता है और उसकी निगाह में मां का दर्जा बहुत ऊंचा है। भले असम के मुख्यमंत्री को अपने बड़े नेताओं से फटकार या आलोचना न मिली हो आम इंसान इस भाषा को अपमान की श्रेणी में ही रखेगा। बेहद घृणित कि हमने कभी पूछा कि आप कौनसे पिता का बेटा हो। चुनाव आते -जाते रहेंगे लेकिन यह बयान बर्छी की तरह ही चलता है। पिछले कई बयानों का पछाड़ता हुआ जो उनके पूर्ववर्ती नेताओं ने दिए हैं। 


 

शनिवार, 12 फ़रवरी 2022

पर्दा बुर्का हिजाब और घूंघट

एक पंक्ति पर बात खत्म हो सकती है कि किसी भी तरह का पर्दा बुरका हिजाब घूंघट इंसानियत के नाम पर कलंक है और इस कलंक धो दिया जाना चाहिए। वैसे ही तीन तलाकऔर बिना किसी तलाक के पत्नी को छोड़ देना भी कलंक ही है।

मेरे साथ जयपुर के दफ्तर में एक महिला पत्रकार साथी काम किया करती थी। एक दिन मैंने देखा कि रास्ते में मेरे आगे बुर्का पहने एक स्त्री दुपहिया पर सवार है। यह वही होनहार साथी थी। दफ्तर पहुंचते ही मैंने थोड़ी सख्त आवाज में कहा -कमाल है तुम बुरका पहनती हो,मुझे लगा था यह लड़ाई तो तुम बहुत पहले खुद से और फिर बाकियों से भी जीत चुकी होगी लेकिन मैं गलत  थी। उसने शांत स्वर में जवाब दिया -"यह मुझे भी पसंद नहीं लेकिन मुझे अपना काम बहुत पसंद है।  बहुत संभव है कि अगर मैं इसे ना पहनूं तो परिवार में कुछ बातें हों।  मेरे बुजुर्ग ससुर को इससे खुशी मिलती है तो मुझे इसमें दिक्कत नहीं है। मुझे परिवार भी चाहिए। एक क्षण लगेगा बुर्का  उतार फेंकने में लेकिन मैं थोड़ा समय लुंगी, उन्हें अपने हक़ में करने के लिए।" इस बात को लगभग सात आठ साल बीत चुके हैं और आज वह पत्रकार लेखन की दुनिया में सक्रिय और पहचाना नाम है। बुर्का  वह अब नहीं पहनती और अपनी तस्वीरों को नुमाया करने  से उसे कोई गुरेज भी नहीं है। 

क्या कोई समाज महिलाओं की तकलीफ को इस नज़रिये से देखने में  यकीन रखता है। पहले शिक्षा और फिर काम करने की जगहों पर वे कितनी मुश्किल राहें तय कर पहुंची हैं ? समाज शायद रखता भी है लेकिन  राजनीतिक दलों और गोदी मीडिया में तो यह सलाहियत बिल्कुल भी नहीं। इतना धैर्य रख लिया तो वोटों की कटती हुई फसल कहीं और निकल जाएगी। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा लगाना आसान है उसकी तकलीफों को बैठकर समझना दूसरी बात जिसमें किसी की कोई दिलचस्पी नहीं। कौन भूल सकता है जब जयपुर की लड़कियों को पढ़ाने के लिए पूर्व महारानी गायत्री देवी ने स्कूल खोला था तब परदे वाली बस ही लड़कियों को लाती और ले जाती थी। स्कूल परिसर की दीवारें इतनी ऊंची कि परिंदों की निगाह भी मुश्किल से जा पाएं। साहित्यकार मनीषा कुलश्रेष्ठ कहती हैं - "मैं पर्दा, घूंघट और हिजाब तीनों का साथ नहीं दे पाती लेकिन निजी स्वंत्रता की हामी हूं। सर ढकने और  हिजाब के लिए फिर भी जजमेंटल नहीं। मुझे एक प्रोफेसर साहब की बात याद आती है। कैसे कैसे हालात में लड़कियां पढ़ने निकलती है तो पढ़ने दो न। उन पर ड्रेसकोड मत लागू करो। जीन्स पहने तो भी,हिजाब पहने तो भी । साड़ी  पहने  माथा ढकें ,सिंदूर लगाएं तब भी। क्या फायदा आपकी हठ के चलते वे पढ़ने से ही वंचित हो जाएं।"  

बात ज़रूरी है क्योंकि अगर धार्मिक पहचान चिन्हों को ही हटाने का आधार माना  जाए तो फिर हम तो वे नागरिक हैं जो जीते ही इसी तरह हैं। सबके अपने अपने पहचान चिन्ह हैं जो वे धारण करते हुए चलते हैं। वे किसी भी पद पर कोई भी हो सकते हैं। यह तटस्थता कैसे  हासिल की जाएगी ?यह रोक और दबाव का सिलसिला कहां जाकर थमेगा ?शिक्षा के मंदिर में ऐसा दृश्य कि एक तरफ कैसरिया पगड़ी और शॉल दी जा रही हो और दूसरी तरफ लड़कियां बुर्का और हिजाब पहने आमने-सामने हो। एक नागरिक होने के नाते खुद पर शर्म सी आने लगती है। आखिर किसे मज़ा आता है इन दृश्यों में? किसकी सोच में यह मंज़र फिट बैठता है ? क्या कोई सोच भी सकता है कि बुर्का पहनी लड़कियों को यूं  दूसरे  रंग से सामना कराया जाएगा ? यह दृश्य दुःखद है।  दो कॉलेजों की तकलीफदेह कहानी है कि एक को कोई एतराज नहीं लड़कियां कुछ भी पहने जबकि दूसरे ने इस पर प्रतिबंध लगाया। मुस्कान जिसकी तस्वीर लगातार देखी जा रही है वह कर्नाटक  के मांड्या  स्थित कॉलेज की सेकंड ईयर बीकॉम की छात्रा है। उसकी साथी छात्राओं को कॉलेज में दाखिल होने से रोका गया तो उसने फिर खुद को पूरे आत्मविश्वास से रखा जिसकी सोशल मीडिया पर भूरी भूरी प्रशंसा भी हो रही है। वह साफ़ कहती है कि हम इसी तरह कॉलेज आते रहे हैं हमारे कॉलेज प्रशासन और  प्रिंसिपल ने यह अनुमति हमें दी है । यह बाहर से आए लोग हम पर दबाव  हैं। मैं उनकी क्यों सुनूं ? मेरे साथ सभी छात्राएं हैं लेकिन मेरी मां अब डरने लगी है। 

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का एक फिल्म अलंकृता श्रीवास्तव ने बनाई  थी जिसमें चार महिलाएं अपनी सड़ी गली ज़िन्दगी को बदल देना चाहती हैं। आवाज़ लड़कियों की ही होगी, किसी दबाव की नहीं या फिर तीन तलाक की तरह इसे भी कानून के दायरे में लिया जाए। दूसरे पक्ष को प्रभावित कर सके उतने वोट बुर्के के जरिये नहीं मिलेंगे। वोट लेने के लिए आपकी प्रयोगशालाओं को प्रयोगधर्मी और प्रगतिशील होना पड़ेगा। सब जानते हैं कि किसी भी इंसान को सिर से पांव तक वह लिबास कैसे बर्दाश्त होगा जो उसे हवा पानी से महरूम करता हो। यह न्याय नहीं है।घूंघट भी ऐसी ही चेष्टा करता हुआ प्रयास है। राजस्थान से कोलायत की एक प्रतिष्ठित परिवार की बहू ने विधायकी का परचा घूंघट के साथ भरा तो लिखकर ,बोलकर कहा गया कि कैसे इनसे उम्मीद की जाए कि इनके मतदाता इनसे संवाद कर पाएंगे ?ऐसे ही ये खाइयां पाटी जा सकती हैं। सस्ते हथकंडो से चर्चा हो जाएगी गंभीर बहस नहीं होगी। बदलाव की बयार नहीं बहेगी। लड़कियां बोले। फैज़ अहमद फैज़ तो बहुत पहले बोल चुके हैं बोल कि अब आजाद हैं तेरे बोल जुबां अब तेरी है   

 









मंगलवार, 18 जनवरी 2022

इसका मतलब न जबरदस्ती टीका लगे न प्रमाण मांगा जाए



यह खबर किसी के लिए भी अचरज  भरी हो सकती है कि जबरदस्ती किसी को भी  वैक्सीन लगाई जाए और न ही हरेक के लिए वैक्सीन सर्टिफिकेट अनिवार्य किया जाए। वाकई यह बात एक नागरिक की आज़ादी का पूरा समर्थन करती हुई लगती है खासकर तब और भी ज्यादा जब सरकार यह जवाब सर्वोच्च न्यायालय को देती है। सच यही है कि एक याचिका की सुनवाई पर सरकार ने अपने जवाब में इसी नागरिक स्वतंत्रता पर मुहर लगाई  है। यह बात इस परिदृश्य में और भी जरूरी हो जाती  है जब टेनिस खिलाड़ी नोवाक जोकोविच को ऑस्ट्रेलिया छोड़ना पड़ता है क्योंकि उनहोंने कोविड का टीका नहीं लगवाया है और दुनिया वैक्सीन पासपोर्ट पर फिर से बहस कर रही है 


भारत सरकर का यह रुख उस वक्त सामने आया जब वह एलुरु फाउंडेशन की  याचिका के संदर्भ में  दिव्यांगों से जुड़े उस सवाल का जवाब दे रही थी कि उनके सम्प्पूर्ण टीकाकरण के लिए सरकार की क्या तैयारी है। बेशक अनिवार्य टीकाकरण की सूरत में यह बहुत ही मुश्किल होगा कि हर दिव्यांग और बिस्तर पर रहनेवाले गंभीर रोगी तक भी टीका पहुंचे। इस बारे में सरकार का यह भी कहना था कि राज्य सरकारों को निर्देश दे दिए गए थे कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की टीम बनाकर उन तक भी पहुंचा जाए। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी कोई गाइडलाइन जारी नहीं की गई है कि व्यक्ति की मर्जी के खिलाफ उसे वैक्सीन लगाई जाए या फिर वह टीकाकरण का प्रमाणपत्र साथ लेकर चले। सरकार का सर्वोच्च न्यायालय को यह जवाब बहुत मायने रखता है और उस वक्त तो और भी जब पूरी दुनिया इस बारे में गहन विचार विमर्श में जुटी हो और दुविधा में  हो कि वैक्सीन पासपोर्ट जरूरी किया जाए या नहीं  ?

तो क्या इसके मायने ये हुए कि सरकार टीकाकरण को लेकर गंभीर नहीं है ? यह जो वैक्सीन टेरर जो कुछ राज्यों में जारी है वह निराधार है? मामले की सुनवाई में इसका भी जवाब मिलता है कि टीका बेहद जरूरी है और सरकार सभी सूचना माध्यमों से आम जनता तक यह बात पहुंचा चुकी है। निजी अनुभव यह कहता है कि पिछले महीनों में हुई तमाम यात्राओं और विवाह समारोहों में कहीं कोई अड़चन नहीं डाली गई और ना ही सर्टिफिकेट देखने को लेकर कोई सरकारी नुमाइंदा अड़ा। पिछले महीने  आणंद से सूरत जाते  हुए एक निजी बस की सवारियों को उतारकर उनकी कोरोना जांच की गई फिर  रिपोर्ट नेगेटिव आते ही बस को रवाना कर दिया गया। यह और बात है कि लम्बे जाम ने यात्रा को दुगुने समय में पूरा करवाया। ट्रेन में भी जयपुर से सूरत या कोलकाता जाते हुए  कोई वैक्सीन प्रमाण पत्र नहीं मांगा गया। कोलकाता में जरूर ठाकुर बाड़ी, रवीन्द्रनाथ टैगोर की  जन्मस्थली पर बने संग्रहालय में प्रवेश से पहले टीके के प्रमाण मांगे गए लेकिन  फिर भीतर भी जाने दिया गया। सिनेमाघरों में भी कोई दबाव नहीं देखा गया। फिर भी अगर किसी नागरिक के साथ ऐसा हुआ हो तो वह नियम के खिलाफ ही होगा। बहरहाल यदि  टेनिस की बड़ी प्रतियोगिता भारत में हो रही होती और नोवाक जोकोविच भारत में होते तो उन्हें टीका न लगवाने के कारण देश नहीं छोड़ना पड़ता। 


सर्बियाई टेनिस स्टार नोवाक जोकोविच ने यह कहकर टीका नहीं लगवाया कि दिसंबर में उन्हें  कोविड हो चुका है। विशेष वीजा छूट  के चलते वे ऑस्ट्रेलिया में उतर तो गए लेकिन मेलबोर्न पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। इस गिरफ्तारी को जोकोविच ने अदालत में चुनौती दी। अदालत ने उनके हक में फैसला देते हुए वीज़ा को वैध माना। इससे पहले कि जोकोविच एक और ग्रैंड स्लैम अपने नाम करते ऑस्ट्रेलिया के इमीग्रैशन मंत्री ने अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उन्हें ऑस्ट्रेलिया से बाहर का रास्ता दिखा दिया। नियमानुसार वे तीन साल तक ऑस्ट्रेलिया नहीं आ सकेंगे। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री  ने  ज़रूर  कहा है कि सही परिस्थितियां होते ही वे ऑस्ट्रेलिया आ सकते हैं।  सर्बियाई  खिलाड़ी जोकोविच के देश सर्बिया में ऑस्ट्रेलिया के इस व्यवहार  के विरोध में गुस्सा है। सर्बिया के राष्ट्रपति ने कहा है कि ऑस्ट्रेलिया ने खुद को ही शर्मिंदा किया है। उन्होंने यह भी कहा कि  खिलाड़ी  का एयरपोर्ट पर भारी संख्या में जुटकर स्वागत किया जाए। स्पष्ट है कि ऑस्ट्रेलियाई अदालत ने  जोकोविच के हक में फैसला दिया था जिसे  ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने बदला। सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार का जवाब भी ऐसी किसी दुविधा से बचने का स्पष्ट इरादा है।  क्या  वैक्सीन पासपोर्ट में भी ऐसी ही छूट दी जाएगी । 

असल में वैक्सीन पासपोर्ट तभी किसी इंसान को एक देश से दूसरे देश की यात्रा करने देंगे जब उन्हें वैक्सीन लगी हुई हो। सवाल यह उठता है कि दुनिया या उसके संगठन ही अभी तय नहीं कर पाए हैं कि कितने बूस्टर डोज़ लगेंगे ऐसे में कोई नियम कैसे लागू किया जा सकता है ? यात्रा पर रोक नागरिक के अधिकारों का हनन ही होगा। ऐसे में बेहतर यही होगा की महामारी को देखते हुए अधिकाधिक टीके लगें लेकिन इसके अभाव में उनके मौलिक अधिकार न छीने जाएं। कम अज कम भारत सरकार ने तो सुप्रीम कोर्ट को दिए अपने शपथ पत्र में यही कहा है कि न तो किसी को जबरन टीका लगाया जाए और ना ही इसका सर्टिफिकेट मांगा जाए। भारत टीकाकरण लक्ष्य के बहुत करीब होते हुए भी दबाव की रणनीति नहीं अपनाएगा तो वह अलग मिसाल होगी। ऐसे में राज्य सरकारों को भी यही करना चाहिए। होना तो यह भी चाहिए कि अब जब टीके की प्रक्रिया को शुरू हुए एक साल बीत चुका है इसके प्रभाव का डेटा भी जनता के सामने आए। 










 

शनिवार, 1 जनवरी 2022

बाइस को इक्कीस से शांत और स्वस्थ क्यों नहीं होना चाहिए

इक्कीस से विदा ले हम बाईस में दाखिल हो चुके हैं। दिल बेशक उम्मीद से भरा होना चाहिए कि देश और दुनिया अब और सेहतमंद और शांत होंगे लेकिन  वाकई ऐसा है ? क्या इक्कीस ने हमारी सर पर मंडराती हुई इन बालाओं से हमें मुक्त किया है ? क्या ऐसे प्रयास हुए हैं जो इंसान पर आई इस आपदा से हमें आजाद करे। शायद नहीं क्योंकि कोरोना वायरस रूप बदलकर और मजहबीं ताकतें सर उठाकर नगाड़े कूटती हुई बाईस में भी घुसपैठ कर गईं हैं। कोरोना के डर को फैलाया जा रहा है और इन ताकतों पर शीर्ष  की चुप्पी चुपचाप इस नए साल में भी चली आई है। गौर करे तो हमारे गांव कोरोना से खौफजदा नहीं है। वहां शायद  है।बाईस को इक्कीस से शांत और स्वस्थ क्यों नहीं होना चाहिए रोज़ी रोटी के संघर्ष में कोरोना सर नहीं उठा पा रहा है। वहां तो अब तक मास्क भी मुंह का हिस्सा नहीं बने  हैं।  शहर के विशेषज्ञ चीखें जा रहे हैं कि डरो ओमिक्रोन आ गया है यह डेल्टा वेरिएंट जैसा खतरनाक नहीं लेकिन कुछ भी हो सकता है। जर्मन कवि  बर्तोल ब्रेख्त ने लिखा भी है 

मैं खूब जानता था 

कि शहर 

बनाए जा रहे हैं 

मैं नहीं गया 

उन्हें देखने 

इसका सांख्यिकी वालों से ताल्लुक है 

न की इतिहास से 

मैंने सोचा 

क्या होगा शहरों के बनाने से  

यदि उन्हें  बगैर 

लोगों की बुद्धिमानी के बनाया। 

अब ये शहर सच ही मैं एक सांख्यिकी में उलझ गए हैं। कोरोना का संख्याबल शहर में ही सर उठा रहा है। बर्तोल ब्रेख्त की कविता से उस लेख की शुरुआत भी हुई है जिसे वाशिंगटन पोस्ट ने प्रकाशित किया है। आलेख उस चुप्पी पर है जो इस समय भारत सरकार की ओर से बरती गई है। आलेख का शीर्षक है भारत में मुसलमानों के नरसंहार की आवाज तेज, मोदी का मौन इसे स्वीकृति देता हुआ। शुरूआत में बर्तोल ब्रेख्त की जिन पंक्तियों का उल्लेख है उनका आशय है जब पहली बार हमारे मित्र मारे गए तब स्याह डर सब तरफ फ़ैल गया फिर सौ और मारे गए और जब यह तादाद हजार हुई तब इस अंत का कोई अंत नहीं था  बल्कि चुप्पी का कंबल ताने सब पड़े रहे और उसके बाद   कोई इन शैतानी ताकतों को रोक नहीं पाता । दरअसल ब्रेख्त की यह कविता उस रहस्य से परदा उठा देती है कि फिर चीजों को बेकाबू मान लिया जाता है और जलते हुए मकान उस  गरीब के ही होते हैं जो न उकसाने वालों का जानता है और न किसी बचाने वालों  को। 

हरिद्वार और रायपुर में आयोजित धर्म संसद किस किस्म की धर्म संसद थी जिसमें कत्ले आम का आव्हान किया जा रहा है। साधु फ़कीर के भेष में ये किसे अपमानित कर रहे हैं? इन्हें कोई कैसे स्वामी ,बाबा या महाराज कह सकते हैं जबकि इन उपाधियों  के साथ भारत वर्ष की  महान  संतानों के नाम जुड़े हैं ? किस धर्म संसद में अध्यात्म की जगह मरने-मारने के लिए उकसाया जाता है। बात बात पर देशद्रोह और U A P A का सहारा लेने वाली सरकार यहां चुप है और जब गांधी को अपमानित करनेवाले कालीचरण को छत्तीसढ़ पुलिस गिरफ्तार करती है तो सरकार के मंत्री गिरिराजसिंह उल्टे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को ही कटघरे में खड़ा करते हैं। यहां राज की मंशा  भी जाहिर हो जाती है और सत्ता का संरक्षण किसे मिला हुआ है यह भी। 

धर्म संसद की अवधारणा में एक को दूसरे के खिलाफ भड़काने की शैली भला क्यों और कैसे जुड़ जाती है ? अक्सर यह  चुनाव के नजदीक होने को  ही पुष्ट करता है । अब तो सीमा पर नहीं घर में तनाव पैदा किया जाता है। द वाशिंगटन पोस्ट के आलेख पर लोटते हैं। लेख कहता है यह देश में हो क्या  रहा है जातीय संहार और महात्मा गांधी की हत्या करनेवालों का महिमामंडन राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हो जाता है। यह देश में हो क्या  रहा  कि भीड़ के पीट पीट  कर किसी मुसलमान को मार देने का बहुसंख्यक विरोध तक नहीं कर पाते और जहां पर सरकार मदर टेरेसा जो विश्व में मानव सेवा की मिसाल हैं उनकी  संस्था के अंतर्राष्ट्रीय दान पर रोक लगा देती है। यह देश में हो क्या  रहा है जहां एक टीवी चैनल का मालिक देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए लड़ो, मारो और मर जाओ की बात कहता है। यह देश में हो क्या  रहा जब क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली को हटा दिया जाता है क्योंकि वह अपने मुस्लिम साथी के साथ खड़े रहते हैं फिर  कट्टरवादी जिन्हें निशाना बनाते हैं। 

उत्तर साफ और  सीधा है कि सत्ता उस पक्ष  के बचाव में खड़ा  है जो अल्पसंख्यक पर वार करता है। राणा अयूब के इस लेख के बाद यकीनन देश की साख नहीं बढ़नेवाली क्योंकि सरकार की और से अब तक कोई सख्त आवाज़ नहीं आई है जो इन देशरोधी ताकतों के कान उमेठे । हां बस इतनी ही चेष्टा एक बड़ा कदम हो सकती है। कान धरने पर यही समझ आता है कि चुनावी दिनों में यह सब बहुत बढ़ जाता है और ऐसा सिर्फ इसलिए होता है कि उन्हें लगता है इससे चुनाव में फायदा होता है। क्या पार्टी विशेष की यह चुप्पी जनता को पसंद है क्या जनता इस तरह की भाषाशैली को वोट में तब्दील करती है। महात्मा गांधी का अपमान करते हुए रायपुर की धर्म संसद में कालीचरण महाराज कह जाते हैं कि कट्टर हिंदूवादी को चुनने के लिए भर भर के वोट करो। क्या वाकई जनता इस नफरती भाषा के आधार पर वोट देने का मन बनाती है? तब तो खामी हमारी ही हुई। एक दल को यह आभास क्योंकर हुआ कि अभद्र और  उकसानेवाली भाषा पर उसकी चुप्पी उसे वोट दिला सकती है। जवाब जनता को ही देना होगा क्योंकि लोकतंत्र में उसी की आवाज के मायने हैं, वही दलों की गलतफहमी भी दूर कर सकती है। दल विशेष को तात्कालिक लाभ ज़रूर हो भी सकता है लेकिन देश के लिए यह अच्छा समय नहीं है यह इसके महीन ताने बाने के साथ छेड़छाड़ है।बाईस को इक्कीस से शांत और स्वस्थ क्यों नहीं होना  चाहिए?