शनिवार, 25 दिसंबर 2021

है कोई 'आधार' मतदाता सूची को जोड़ने का

 पिछले चार माह से बेटे को  कह रही थी तुम अठारह के हो चुके हो अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा लो लेकिन वह टाल रहा था। हाल ही जब नए मतदाताओं  को जोड़ने का संदेश फ़ोन पर आया तो मैंने उसे फिर याद दिलाया वह तपाक से बोला -"मां आधार है न अब क्या " जरूरत है वोटर आईडी की उसी से हो जाएगा मतदान।" मैं उसका चेहरा देखती रह गई कि ये दोनों अलग-अलग पहचान हैं कि एक से तुम्हारी नागरिकता, तुम्हारी उम्र, तुम्हारा अधिकार प्रमाणित होता है जो संवैधानिक इकाई प्रदान करती है  तो दूसरी ओर आधार सरकारी योजनाओं का अधिकाधिक लाभ आमजन तक कैसे पहुंचे उसके लिए दी गई पहचान है। बेशक यह उस दोहराव से बचाव करती है कि कोई एकाधिक बार इन योजनाओं का लाभ न ले ले लेकिन चुनाव में इसका इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट के उस टिप्पणी का भी उल्लंघन है जिसमें आधार को निजता का हनन मानते हुए अनिवार्य नहीं किया जाना था । उसका स्वाभाविक सवाल था कि फिर यहां इसकी ज़रुरत क्या है और जो ज़रुरत है तो फिर इसी से पूरा मतदान क्यों नहीं ?

बहरहाल बीते सोमवार को लोकसभा और मंगलवार को राज्यसभा में चुनाव कानून संशोधन विधेयक 2021 भारी शोरगुल और विरोध के बीच पास हो गया जिसके तहत अब मतदाता सूची को आधार डेटाबेस से लिंक कर दिया जाएगा। ऐसे ही शोरगुल के बीच कृषि कानून भी पारित कर दिया गया था जिसका हश्र हम सबने देखा। क्या यह कानून भी ऐसे विरोध का आधार बनेगा इसकी संभावना कम लगती है क्योंकि बिना किसी बारीकियों को साझा किये और बहस के यह संशोधन पारित हो गया है। यह सच है कि देश में चुनाव सुधार की ज़रुरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है, खासकर फर्जी मतदान की दिशा में । आगे पूरे देश में समान मतदाता  सूची के  सुधार का कार्यक्रम भी  प्रस्तावित है। अभी कुछ राज्य पंचायत और नगर निकाय चुनाव के लिए अलग और राष्ट्रिय और विधानसभा चुनावों के लिए अलग-अलग मतदाता सूची का उपयोग करते हैं। 

मैंने अपना पहला मतदान इंदौर में किया लेकिन पिछले कई बरसों से राजस्थान में हूं। अब मुझे नहीं मालूम कि उस नाम का क्या हुआ ?कोई उस पर वोट तो नहीं कर आता या कोई राजनीतिक दल अंतिम समय में इन बचे हुए नामों पर ठप्पा तो नहीं लगा देता ? यह शक बेबुनियाद नहीं है क्योंकि  हम सबने देखा है तमाम राजनीतिक दलों को खर्च की सीमा रेखा पार करते हुए ,मतदाताओं को प्रलोभन देते हुए ,समय सीमा समाप्त हो जाने के बावजूद अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह को लहराते हुए। ऐसे में क्या आधार कार्ड  डुप्लीकेट वोटिंग से बचा सकता है। जवाब होगा हां। मतदाता का डेटा जब आधार से जुड़ेगा तो वह नए रजिस्ट्रेशन के साथ ही  सभी पुराने रजिस्ट्रेशन को सामने ला कर सचेत कर देगा । ऐसे में सभी पुराने पते ठिकाने खारिज होकर एक नया रजिस्ट्रेशन किया जा  सकेगा लेकिन चूंकि  सरकार ने साफ तौर पर इसे अनिवार्य की बजाय इच्छा पर आधारित बताया है तो इस  सुधार की उम्मीद यहीं ख़त्म हो जाती है। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट आधार को निजता में दखल का आधार मानता है इसलिए इसकी अनिवार्यता में भी संदेह तो है ही। 

दूसरा आधार कोई नागरिकता प्रमाण पत्र नहीं बल्कि एक अंकवाली पहचान मात्र है जबकि मतदाता पहचान पत्र है।केवल 182  दिन का रहना किसी को भी आधार की पहचान दिला सकता है, मतदाता पहचान पत्र नहीं। समय समय पर सरकारी इकाइयों के बयान बताते हैं कि आधार को पता प्रमाणित करने वाला नहीं माना  जा सकता जबकि मतदाता पहचान पत्र मतदाता के पते की पुष्टि करता है। सच तो यह है कि आधार अन्य पहचान पत्रों के आधार पर दी गई पहचान है जबकि मतदाता चुनाव आयोग के अधिकारी के जरिये तस्दीक हुई आईडी है।मतदाता पहचान पत्र गरीब, पिछड़े और बेघर को भी दिया जा सकता है बशर्ते बीएलओ इसे प्रमाणित करता हो । आधार ऐसी कोई सहूलियत नहीं देता और न ही यह कहा जा सकता है कि आधार के  डेटा में सेंध नहीं लगी या यह पूरी तरह से डुप्लिकेटरोधी है। 

इस डिजिटल दौर में जहां डेटा सबकुछ है और इलेक्ट्रॉनिक मशीनों की थोड़ी-सी  छेड़छाड़ भी बड़े फेरबदल कर सकती हैं वहां सतर्क होना बहुत जरूरी है। मतदाता सूची का मामूली विश्लेषण भी नतीजे बदलने की ताकत रखता है खासकर तब जब नतीजे बूथ स्तर पर उपलब्ध हों। किसी क्षेत्र विशेष में अगर यह पता चल जाए कि  हार केवल एक फीसदी के मतान्तर से होने वाली है, वहां हल्का  हेरफेरभी बड़े परिवर्तन में बदल सकता है। क्यों नहीं कोई उस मतदाता को निशाना बनाएगा जो कमज़ोर है। यह लकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक कदम  हो सकता है। जाहिर है निजता और ईमानदारी मतदान प्रक्रिया  के लिए इस डिजिटल दौर में और भी जरूरी हो जाते हैं। खासकर तब जब हर सरकार जीतने के लिए परिसीमन से लेकर जातिगत पहचान को पहचान लेने के लिए आतुर हो , हर पैंतरें अपना रही हो। आरईआर 1960 यानी निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम चुनाव में पारदर्शिता की वकालत करता है। इसमें मतदाता के नाम जोड़ने हटाने की पारदर्शिता पर भी जोर है जो 1922 में तकनीक की मदद से और बेहतर हो सकती है लेकिन एक दूसरे पक्ष की आवाज़ को सुने बिना उठाया गया कदम लोकतंत्र को मजबूत करनेवाला तो नहीं लगता। जोड़ना हटाना निर्वाचित सरकार का हक है लेकिन यहां सुनना भी जरूरी है क्योंकि कदम निर्वाचन के लिए  ही उठाया जा रहा है बल्कि उठा लिया गया है बस संशोधन पर राष्ट्रपति के मुहर लाने की देर है।