मंगलवार, 30 नवंबर 2021

डॉक्टर कोटनिस के देश में अस्पताल से डरते मरीज

  पवित्र पेशे से जुड़े ये अनुभव महज दो शहरों और दो अस्पतालों के नहीं हैं बल्कि भारत के हर शहर में हर किसी के हो सकते हैं।अस्पताल  मॉडर्न मेडिकल साइंस के  केंद्र हैं लेकिन यहां जाने  से पहले मनुष्य डरने लगा है उसका विश्वास डगमगाने लगा  है। ऐसा उस देश में हैं जहाँ के एक डॉक्टर द्वारकानाथ शांताराम कोटनिस ने दूसरे देश में सेवाएं देते हुए अपनी जान कुरबान कर दी थी। आखिर क्या है जो इस पेशे को यूं भरोसा खो देने की कगार पर ले आया ? अपनी बात रखने से पहले यह डिस्क्लेमर ज़रूरी है कि कई चिकित्सक ऐसे हैं जो इस पेशे की आबरू भी बचाए हुए हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि ये अच्छे डॉक्टर भी बाजार के दबाव में कसमसा रहे हैं लेकिन कोई चारा न देखक कुव्यवस्था के चक्रव्यूह में घिर गए हों 


करीब महीना हुआ होगा घर की बालकनी से चमकता हुआ बड़ा -सा साइन बोर्ड  दिखाई दिया निविक हॉस्पिटल। तसल्ली हुई कि चलो एक अस्पताल घर के पास ही हो गया। यह शुक्रवार सुबह की बात है बेटे का कॉल आया कि उसका एक्सिडेंट हो गया है एक अंधे मोड़ पर कार ने उसे टक्कर मारकर गिरा दिया। कारवाले ने उसी कॉल पर  दबाव बनाया कि आपके बेटे कि गलती है आप मेरे नुकसान की भरपाई करो। बेटे का शरीर और दुपहिया तो ज़िक्र में भी नहीं थे। कारवाले ने बताया कि  मानसरोवर में उसका शोरूम है और मुझे वहीं आकर मिलना होगा। शाम को बेटे ने कहा कि वह ड्राइव नहीं कर सकता लेने आना होगा। उसकी कोहनी पर सूजन थी और वह हाथ नहीं उठा पा रहा था। सुबह किसी हड्डी विशेषज्ञ से मिलने और एक्स रे की नीयत से हम निविक पहुंचे जहां बताया गया कि ऑर्थो यानी हड्डी के डॉक्टर तो अभी नहीं हैं न्यूरो सर्जन हैं वे ही देख लेंगे । चार सौ की पर्ची और 100 रूपए  रजिस्ट्रेशन। उन्होंने पर्ची पर कोहनी का एक्स रे लिखते हुए कहा कि  मैं अभी यहीं हूँ आप जल्दी से करा लीजिए। साढ़े तीन सौ  जमा कराए गए । एक्स रे फिल्म लेकर ज्यों ही डॉक्टर के पास पहुंचे वे अपनी सीट पर नहीं थे। वहां मौजूद स्टाफ हर्षिता ने बताया कि वे एक दूसरे हॉस्पिटल मेट्रोमास  में  इमर्जेन्सी ऑपरेशन के लिए चले गए हैं। अब पूरे अस्पताल में इस एक्स रे को पढ़ सके ऐसा कोई नहीं था। हर्षिता ने कहा रुकिए मैं आपका एक्स रे डॉक्टर को भेज देती हूं। आधे घंटे बाद बताया गया कि फ्रैक्चर है। फिर तो तुरंत मरीज़ को बेड  पर लेटा  दिया गया। एक गोली खिलाई गई और आइस पैक पकड़ा दिया गया। कहा गया कि मरीज को आराम की जरूरत है। डॉक्टर शाम को आकर प्लास्टर करेंगे। एक्स रे रिपोर्ट  भी नहीं दी गई जिससे सच्चाई का पता लगता। खैर बेटे ने ही कहा मां चलो यहां से मुझे नहीं लगता कि हड्डी टूटी है। हम हैरान परेशान लौट आए।शाम को स्टाफ का फ़ोन आता है कि आप जल्दी आइये डॉक्टर आ गए हैं। हम बिना देर किये पंहुच गए। स्टाफ एक कच्ची पर्ची ले आया और बोला चौबीस सौ रूपए जमा कीजिये।। प्लास्टर होगा। हमने कहा एक बार डॉक्टर से तो मिलाइये वे देख लें। वे आ जाएंगे। आप तो पैसे जमा कीजिये और ये सामान लीजिये। स्टोर की और इशारा करते हुए स्टाफ ने कहा। कुछ समझ नहीं आ रहा था। प्लास्टर की जरूरत बेटे को नहीं लग रही थी।  हम फिर दुविधा और दुःख के बीच झूलते हुए लौट आए। 



इस बीच बहन ने एक विशेषज्ञ को एक्स रे भेजा। डॉक्टर ने हड्डी बिल्कुल सही होने की बात कही और इतवार की सुबह  वीडियो कॉल पर कुछ दवा के साथ एक्सरसाइज के लिए कहा। बेशक यह राहत भरी सुबह थी लेकिन कई सवाल लेकर आई थी।  राजधानी जयपुरमें ये कैसे अस्पताल सर उठा रहे हैं ?आधी अधूरी व्यवस्थाओं के साथ यह मनुष्य के स्वास्थ्य के साथ कैसे 'डील ' कर सकते हैं ? न मास्क न दस्ताने स्टाफ के दक्ष न होने की कहानी बयां कर रहे थे। इमर्जेन्सी में इलाज की कोई  सुविधा नहीं और  सफाई ये कि हम कॉल पर डॉक्टर बुला देते हैं और अभी मार्केट स्टडी चल रही है। 

अब थोड़ा पीछे चलते हैं। तब कोरोना का कहर दस्तक दे रहा था 

 इंदौर में मरीज़ की  हिप जॉइंट रिप्लेस्मेंट सर्जरी हुई थी। डिस्चार्ज मिल चुका था। उस दिन टांके कटने थे तो उस बड़े   निजी अस्पताल की एम्बुलेंस घर से मरीज़ को लेने आई थी। एम्बुलेंस में दो डॉक्टर थे। हेल्पर भी।  ऑक्सीजन सप्लायर के साथ सभी लाइफ सेविंग इंस्ट्रूमेंट्स से सुसज्जित एम्बुलेंस मरीज़ को हॉस्पिटल ले आई।बताए गए  बिल का भुगतान हो चुका था।  मरीज़ के टांके कटते ही स्टाफ ने शोर  मचाना शुरू कर दिया कि आपको येलो ज़ोन के अस्पताल में शिफ़्ट होना पड़ेगा। इन्हें सांस की तकलीफ़ है। क्यों, हम क्यों जाएं येलो जोन में वहां कोरोना संक्रमित मरीज़ होंगे । इनका इलाज ग्रीन जोन के अस्पताल में ही होना चाहिए। कोरोना के कोई लक्षण हमारे मरीज़ में नहीं हैं। नहीं, आपको जाना ही होगा। आप पेशेंट को यहाँ से ले जाइये। हद हो गई आप ही ने बुलाया और आप ही रवाना  कर रे हैं । परिजनों को नहीं समझ आ रहा था कहाँ ले जाएं। अस्पतालों की लिस्ट थमा दी गई। एम्बुलेंस मांगी गई तो स्टाफ ने कहा कि केवल आने के लिए मिलती  है। बाहर प्राइवेट एम्बुलेंस खड़ी है।   आप जल्दी मरीज़ को यहाँ से ले जाइये। प्राइवेट एम्बुलेंस जिसके पास ढंग का स्ट्रेचर भी नहीं था दो हज़ार रुपए में छह किलोमीटर दूर स्थित एक अस्पताल में ले जाने के लिए तैयार हुई । एम्बुलेंस का एयर कंडीशनर पूरी तरह  ध्वस्त । कोई डॉक्टर हेल्पर भी नहीं।
इस  प्राइवेट एम्बुलेंस पर नंबर प्लेट भी हरियाणा की थी  । ख़ैर अस्पताल पहुंचे। वहां एक भले डॉक्टर ने कहा कि यहाँ हालात अच्छे नहीं है।  इन्हे यहाँ मत लाइये। दूसरे अस्पताल ले जाइये।  एम्बुलेंस के ड्राइवर ने कहा मैं नहीं जाऊंगा। आप मरीज़ उतार लीजिये। हाथ जोड़े तो कहा चार हज़ार लूंगा वहां छोड़ने के। मजबूर तीमारदार के पास क्या रास्ता बचा था । तीन दिन उस अस्पताल के ICU  में सांस लेने के बाद साँसे थम गईं। दो बार कोरोना टेस्ट हुआ। दोनों नेगेटिव लेकिन मरीज़ को बॉडी में तब्दील कर दिया गया था। जाने कैसी गाइडलाइन थी ये जिसमें न कोई गाइडेंस था न लाइन थी । 

अस्पतालों से जुड़े ऐसे कई अनुभव हम सबके हैं। इन्हें ऐसा क्यों नहीं होना चाहिए जैसे कोई सवाली ईश्वर के दरबार में चला जाए। इतना ही आसान और सुलभ  क्यों नहीं होना चाहिए इन्हें ?जवाब शायद इस पेशे की शिक्षा में भी छिपा है। नीट की परीक्षा बगैर बड़े कोचिंग संस्थाओं के पास कर पाना आसान नहीं। कम फीस  के साथ जो सरकारी शिक्षण संस्थाएं इसकी पढ़ाई कराते हैं वहां कड़ी प्रतिस्पर्धा है। राजस्थान में सात सौ बीस में से छह  सौ अंक लाने वाले को ही सरकारी कॉलेज में प्रवेश मिलता है। शेष सभी निजी कॉलेज में मोटी फीस देकर पढ़ाई कर सकते हैं। यहां डेढ़ सौ अंक लाने वाले को भी दाखिला मिल जाता है। सत्तर लाख से एक करोड़ तक फीस होती है। पांच सौ अस्सी अंक लानेवाल गरीब छात्र फिर परीक्षा देता है और नीट क्रैक करता है लेकिन अमीर पहले ही प्रयास में मोटी  फीस देकर एमबीबीएस की डिग्री ले लेता है। यहीं से बाजार भी इस पेशे में दाखिला ले लेता है। इन दिनों केवल प्रतिभा  ही डॉक्टर नहीं बनाती। फार्मा ,बीमा और फिर मार्केट और मनी की पढ़ाई कर के आनेवाले अस्पतालों को बड़ी बड़ी इमारत तो दे दी है लेकिन  वहां से आत्मा ले ली है। शायद चिकित्सक को ही समझना होगा कि  इसकी सबसे बड़ी कड़ी है और वही है जिसे खुद को बाजार की शक्तियों के हवाले नहीं करना है। उनकी साख बड़ी है। डॉ कोटनिस की विरासत उनसे जुड़ी है। वे डॉ कोटनिस जिन्होंने पराए मुल्क चीन में जाकर घायल सैनिकों की इतनी सेवा की कि अपनी जान कुरबान कर दी। आमजन डॉक्टर को भगवान का दर्जा देता है किसी मार्केट के नुमाइंदे को नहीं। चारागर को बाजार में लाकर सेहत का बड़ा नुकसान हम कर चुके हैं।