शनिवार, 24 अप्रैल 2021

मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यों रात भर नहीं आती

मौत  का एक दिन मुअय्यन  है 
नींद क्यों रात भर नहीं आती  

चचा ग़ालिब इस शेर को भले ही दो सदी पहले लिख गए हों लेकिन आज यह हर हिन्दुस्तानी का हाल हो गया है। डर का साया उसके दिल ओ दिमाग पर खुद गया है।इस हाल में उसे कोई उम्मीद तसल्ली के दो शब्द कहीं नज़र नहीं आते। हमने अपने ध्येय वाक्य 'प्राणी मात्र पर दया' से भी मुँह मोड़ लिया है और आज प्राणवायु के लिए ठोकरे खा रहे हैं। इस बुरे वक्त में प्राण निकल भी  रहे हैं तो भी तसल्ली कहाँ है। दो गज  जमीन का भी संकट है और बैकुंठ जाने के लिए लकड़ी भी रास्ता रोक रही है। श्मशान घाट और
 कब्रिस्तान दोनों एक ही कहानी कह  रहे हैं। ऐसे में इंसान के कोमल मन पर रुई के फाहे रखे कौन ? हम सब जानते हैं कौन ,उम्मीद भी बहुत रखी लेकिन अब सिर्फ और सिर्फ हमें करना होगा। किसी से उम्मीद न रखते हुए हमारी प्राचीन विरासत और संस्कारों के हवाले से। 
हमें बिना किसी अपेक्षा के बस मदद के हाथ बढ़ाने होंगे। मानव सभ्यता पर ऐसा संकट अभूतपूर्व है। आज़ाद भारत के लिए तो और भी नया क्योंकि  इंसान-इंसान के बीच दूरी को ही जीवन रक्षक कहना पड़ रहा है । इस अजीब समय में हम सब नए नहीं हैं, पिछला साल भी ऐसा ही था।  फिर भी अब मदद के भाव को केंद्र में रखना ही होगा। किसी अपने और किसी भी हेल्थ  वर्कर की बेरुखी वक्त से पहले प्राण लेने के लिए काफी होगी। जो सबसे नेक काम होगा वह डर को कम करने का। सूचना के तमाम माध्यम जाने किस हक़ से डर फैलाए जा रहे हैं। जो डर गया वो मर गया समझाने वाले अब चीखते फिर रहे हैं कि डरो और डरो। बेशक शेर के आने का डर है लेकिन उससे पहले ही चीख देना बहुत के दिल डूबने का सामान बन रहा है। इतना  डर फैलाने का कोई लाइसेंस इन माध्यमों के पास नहीं लेकिन फिर भी लगे  हुए हैं डराने में।  पिछले लॉकडाउन में तो फिर भी हिमालय के पहाड़ दिखा रहे थे ,चिड़ियाएं चहका रहे थे ,मम्मी की रसोई महका रहे थे ,इस बार होश गुम है। डराने में सब खर्च हो रहा है। इनके पास साबित करने का कोई पैमाने नहीं कि हमारे डराने ने इतनी जानें बचा ली। 

इज़राइल जैसा छोटा सा देश 65 फीसदी टीकाकरण तक पहुँचने वाला है। टीकाकरण से पहले ताइवान ,न्यूजीलैंड, वियतनाम जैसे छोटे मुल्कों  संक्रमितों को पूरी तरह ठीक होने तक ट्रैक किया। वे आज कोविड से मुकाबले में आगे हैं। पिछले साल हमसे बुरे हाल वाले देशों ने अपने संसाधनों को और बेहतर किया और वो आज हमसे बेहतर हालात में हैं। हमारे यहां राज्य-केंद्र उलझ रहे हैं। मानव त्रासदी के इस दौर में यूं उलझना कितनी छोटी सोच का प्रतीक बन रहा है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ऑक्सीजेंकी उपलब्धता पर टकरा जाते हैं।वे दिल्ली के लिए ऑक्सीजन मांग रहे हैं और पीएम प्रोटोकॉल याद दिला रहे हैं। Cm ne मौके का फायदा उठाया तो पीएम भी देश को लाइव और बड़ा संदेश दे सकते थे प्राणवायु के बारे में बोलकर।
बहरहाल जिस भारतीय विरासत से मदद सहायता यहां तक की पूरी दुनिया की मदद का दर्शन आता हो वहां इतना संकट ,अच्छा संकेत नहीं है। सोमवार को  टीवी पर एक बड़े डॉक्टर कह रहे थे कि हम दिन रात एक करते हुए थक चुके हैं। वाकई मरीज़ों का यह दबाव अभूतपूर्व है लेकिन क्या एक साल में ऐसे प्रयास नहीं होने चाहिए थे कि वॉलन्टियर्स की नई कतार खड़ी की जाए। ऐसे बहुत से युवा देश में हैं जो देश को अपनी सेवाएं देना चाहते
 हैं। जब पहली वैक्सीन के ट्रायल्स के लिए युवा आगे आ सकते हैं तो यहाँ क्यों नहीं। बेशक सोच और नेतृत्व  की कमी  नज़र आती है। चुनाव जीतने की मशीन बन चुके राजनीतिक दलों से बड़ी उम्मीद अब भी ना रखते हुए हम कितना योगदान इस दौर में दे सकते हैं यह बड़ा फ़र्ज़ होगा। बिच्छू काटने की ही प्रवृत्ति रखता है लेकिन साधु अपने प्रवृत्ति  से नहीं डिगता, वह तब तक काटते हुए बिच्छू को  हटाता है जब तक उसका साहस है। जीत साधु की ही होती है। दलाई लामा की इस बात में कितनी सच्चाई है 

'दुनिया  का अस्तित्व इन नेताओं से नहीं दुनिया का अस्तित्व मानवता से है '

इस मानवता के झंडाबरदार हम हैं। हम जीतेंगे इस लड़ाई को मदद के हाथ बढ़ाकर।जहां भी जिस रूप में
 हैं, वहां से। हमारी आत्मिक शांति में खलल डालने का हक हमें किसी को नहीं देना है। खुद पर भरोसा करना है। जो आज तक हमारा वजूद बना रहा है वह किसी राजे -रजवाड़े या सरकार की वजह से नहीं रहा है ,यह रहा है हमारे पुरखों के दमखम से। उनके अर्जित ज्ञान से। खुद को बुलंद करना समय की मांग है। 













मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

हे कलेक्टर! ये अपमान और एहसान क्यों


 हम सब अनजाने ही एक महामारी की चपेट में धकेल दिए गए हैं। ऐसी महामारी जिसके बारे  में किसी को भी सही-सही कुछ नहीं पता। सारे विशेषज्ञ इस कोरोना महामारी के लिए ज़िम्मेदार वायरस पर टकटकी लगाए बैठे हैं लेकिन हर रोज़ लगता है जैसे शिकार उनके हाथ आया है फिर अचानक किसी चंचल पंछी की तरह हाथ से छूट भागता है। विशेषज्ञ हाथ मलते रह जाते हैं और हाथ आए पंख या फिर पंछी की ऊष्मा के आधार पर अपनी समझ का गणित बैठाते रहते हैं। ठीक है माना कि इसके अलावा कोई और रास्ता भी नहीं लेकिन आधी-अधूरी जानकारी और शोध के आधार पर यह सख्ती का माद्दा अपनाने का हुनर भला कहां से आता है। शहरों की तालाबंदी ,वैक्सीन को लेकर जोर जबरदस्ती क्यों ? लॉकडाउन ज़िन्दगियों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। यह धीमा ज़हर है जो उन्हें मौत के करीब ले जा रहा है और जो मरेंगे उन्हें यह यकीन बिलकुल भी नहीं है कि कोरोना उन्हें मारेगा ही मारेगा। ये तम्बाकू चबाते और नशा पीती  ये बेरोज़गार आबादी जब बीमार होगी  तो उनके लिए अस्पताल होंगे आपके पास ?
खबर राजस्थान के धौलपुर से है।  यहाँ के कलेक्टर ने आदेश दिया है कि जब तक यहां के लोग टीका नहीं लगवा लेते तब तक उन्हें सरकारी सुविधाओं मसलन मनरेगा ,राशन और प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभ से वंचित रखा जाए। आपका सारा ज़ोर और जबर पावर बस गरीब पर ही चलता है। उसने तो आपको इतने मरीज़ भी नहीं दिए हैं जितने शहरों के अमीरों ने। जिन छह ज़िलों के आंकड़े आपने सौ मरीज़ों के पार दिए हैं उसमें धौलपुर कहीं नहीं। शहरों में कोरोना मापने का एक ही मापक है एक बिस्तर पर दो मरीज़। अब आपके अस्पताल ही कम हों और उनमें बिस्तर तो और भी कम तो इस मापक के कोई मायने नहीं रह जाते। एक अनार सौ बीमार के इन हालत में वैक्सीन का आंकड़ा बढ़ाने के लिए सरकारी नुमाइंदे ये जुगत लगा रहे हैं तो फिर संजय गांधी का जनसंख्या नियंत्रण क्या बुरा था।  वह भी तो जबरदस्ती थी।  हो ही जाती तो बेहतर था आज विस्फोटक आबादी यूं महामारी और फिर तालाबंदी की धीमी मौत से तो न रूबरू  हो रही होती। टीके अतीत में भी लगे हैं।  सरकारों ने पोलियो की बूंदे घर-घर जाकर पिलाई हैं लताड़ नहीं पिलाई। बच्चों को स्कूल स्टेशन सब जगह कई-कई बार पोलियो की बूंदे दी गई। अब भारत पोलियो मुक्त है और ये नामुराद वैक्सीन के बारे में तो यहां तक कहा जा रहा है कि हर साल नया टीका आ सकता है। अनिश्चिता। अंतहीन अनिश्चिता। इस बीमारी से ज़्यादा दखल तो सरकारों का जीवन में हो गया है। छोड़ दो यार हमको हमारे हाल पर। मोटा पहनकर और खा कर हमारे पूर्वज जीते ही आए हैं अपने बूते पर। धमकी क्यों देते हो कि यह नहीं देंगे वो नहीं देंगे। इतना अहसान जताना उफ़। अफ़सोस।