रविवार, 24 जनवरी 2021

कोरोना नोट्स 2020

डायरी में लिखे कोरोना नोट्स आज ब्लॉग की  सैर पर निकल आए हैं।


 रद्दी का ढेर उस अख़बारनवीस ने कबाड़ी के सामने  रख दिया। फिर बोला जो मर्ज़ी हो दे दे ...  मोल-तौल  रहने दे। हम दोनों की रोज़ी बची रहे बस।

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रुक्मणि ने अपना टीवी, ठीक कराने के लिए एक दुकान पर दिया था। लॉकडॉउन के बाद जब वह दुकान पर पहुंची तो उसे कहा गया कौनसा टीवी था, मुझे तो याद नहीं।रुक्मणि के पास न रसीद थी न टीवी की तस्वीर ।

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डॉक्टर जो मोटी फीस लेकर उनके कूल्हे की हड्डी जोड़ चुके थे,फेफड़ों में पानी भरते ही बोले हमारा अस्पताल तो ग्रीन ज़ोन में है, आप इनके लिए कोई दूसरा अस्पताल देख लीजिए।

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क्या नाम बताया आपने -बिल्किस बेगम। आप उस एरिया के अस्पताल में फोन कर लीजिए शायद वहां कोई बेड खाली हो, यहां तो सब फुल है।

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मैंने मास्क लगा रखा था। पेशेंट लॉबी में स्ट्रेचर पर था।डॉक्टर कंपलीट ppe किट में थे।मेरे सामने पड़ते ही लगभग चिल्ला उठे। दूर रहिए ...दूर रहिए ...कहते हुए पूरे-पूरे सवालों के आधे-आधे जवाब देने लगे।

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अस्पताल जाते हुए रास्ते में पुलिस वाले ने रोका। डंडा दिखाकर मुझे पीछे खदेड़ा। मैंने कहा इमरजेंसी है आप चाहें तो मेरे साथ चल सकते हैं। डंडा हटा दिया गया था ।

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उसके मोबाइल पर कोई लगातार कॉल कर रहा था । उसे खून देना था। चौराहे पर तैनात पुलिस ने उसे लफंगा मान दो डंडे उसकी टांगों पर जमा दिए ।वह लंगड़ाते हुए लौट गया। पुलिस को मनचलों को पहचानने में महारत हासिल होती है।

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घर में पैसे ख़त्म होने को आए थे। सुबह चार बजे खेत से सब्जी लाते हुए वह पुलिस की निगाह से  बचना चाहता था। पुलिस को बताया गया था, सब्जियों में वायरस है।  निगम की गाड़ी ने ठेला उलट उसके टुकड़े टुकड़े कर दिए थे । गरीब की सब्ज़ी पर शिकंजा था बड़े व्यापारी माल बेच रहे थे 
 

आंसू यूं भी सबके अपने  होते  हैं। 

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मोहल्ले की दुकान में शटर के नीचे से घुसकर उसने सामान की पर्ची थमाई। बताया गया था कि इस लॉक  डाउन काल में केवल वही दुकान  खुलेगी। फिर अचानक  दुकानदार चिल्लाया। भागो पुलिस की गाड़ी आ रही है।दुकान बंद हो गई । बचे -खुचे हम सब बिना अपराध के एक दूसरे को अपराधी की तरह देख रहे थे। 

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महीनों से घर बैठे -बैठे वे दोनों ही ऊबने लगे थे। सास बहू को डांट रही थी कि उस दिन बहुत गलत किया तुमने। अपनी धब्बे  वाली चादर पलट कर ससुरजी के बाजू में रख दी। 

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पुलिस हैरान थी वह तो प्याज़ के बोरे जब्त करने आई थी। बोरियों में छिपे थे 22 मजदूर जिनमें पांच बाल श्रमिक थे।भूखे प्यासे। पुलिस ने उन्हें खाना खिलाया। 

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नमिता अपने पोते के लिए इतनी चिंतित थी कि उसने अपनी धूप से खिली बालकनी को अँधेरे में बदल दिया। उसे यही समझ आया था की बाहर कोविड  फन फैलाए बैठा है। 


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पुलिस के डर से उसने रास्ते का मास्क उठाकर पहन लिया।

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अब हर उत्पाद बिकने के लिए तैयार है वायरस का नामो-निशान मिटा देने की गारंटी के साथ।




1 टिप्पणी:

Nitish Tiwary ने कहा…

सही है। ऐसी ही कुछ घटनाएँ विगत वर्ष हमने देखी।