शनिवार, 25 दिसंबर 2021

है कोई 'आधार' मतदाता सूची को जोड़ने का

 पिछले चार माह से बेटे को  कह रही थी तुम अठारह के हो चुके हो अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा लो लेकिन वह टाल रहा था। हाल ही जब नए मतदाताओं  को जोड़ने का संदेश फ़ोन पर आया तो मैंने उसे फिर याद दिलाया वह तपाक से बोला -"मां आधार है न अब क्या " जरूरत है वोटर आईडी की उसी से हो जाएगा मतदान।" मैं उसका चेहरा देखती रह गई कि ये दोनों अलग-अलग पहचान हैं कि एक से तुम्हारी नागरिकता, तुम्हारी उम्र, तुम्हारा अधिकार प्रमाणित होता है जो संवैधानिक इकाई प्रदान करती है  तो दूसरी ओर आधार सरकारी योजनाओं का अधिकाधिक लाभ आमजन तक कैसे पहुंचे उसके लिए दी गई पहचान है। बेशक यह उस दोहराव से बचाव करती है कि कोई एकाधिक बार इन योजनाओं का लाभ न ले ले लेकिन चुनाव में इसका इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट के उस टिप्पणी का भी उल्लंघन है जिसमें आधार को निजता का हनन मानते हुए अनिवार्य नहीं किया जाना था । उसका स्वाभाविक सवाल था कि फिर यहां इसकी ज़रुरत क्या है और जो ज़रुरत है तो फिर इसी से पूरा मतदान क्यों नहीं ?

बहरहाल बीते सोमवार को लोकसभा और मंगलवार को राज्यसभा में चुनाव कानून संशोधन विधेयक 2021 भारी शोरगुल और विरोध के बीच पास हो गया जिसके तहत अब मतदाता सूची को आधार डेटाबेस से लिंक कर दिया जाएगा। ऐसे ही शोरगुल के बीच कृषि कानून भी पारित कर दिया गया था जिसका हश्र हम सबने देखा। क्या यह कानून भी ऐसे विरोध का आधार बनेगा इसकी संभावना कम लगती है क्योंकि बिना किसी बारीकियों को साझा किये और बहस के यह संशोधन पारित हो गया है। यह सच है कि देश में चुनाव सुधार की ज़रुरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है, खासकर फर्जी मतदान की दिशा में । आगे पूरे देश में समान मतदाता  सूची के  सुधार का कार्यक्रम भी  प्रस्तावित है। अभी कुछ राज्य पंचायत और नगर निकाय चुनाव के लिए अलग और राष्ट्रिय और विधानसभा चुनावों के लिए अलग-अलग मतदाता सूची का उपयोग करते हैं। 

मैंने अपना पहला मतदान इंदौर में किया लेकिन पिछले कई बरसों से राजस्थान में हूं। अब मुझे नहीं मालूम कि उस नाम का क्या हुआ ?कोई उस पर वोट तो नहीं कर आता या कोई राजनीतिक दल अंतिम समय में इन बचे हुए नामों पर ठप्पा तो नहीं लगा देता ? यह शक बेबुनियाद नहीं है क्योंकि  हम सबने देखा है तमाम राजनीतिक दलों को खर्च की सीमा रेखा पार करते हुए ,मतदाताओं को प्रलोभन देते हुए ,समय सीमा समाप्त हो जाने के बावजूद अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह को लहराते हुए। ऐसे में क्या आधार कार्ड  डुप्लीकेट वोटिंग से बचा सकता है। जवाब होगा हां। मतदाता का डेटा जब आधार से जुड़ेगा तो वह नए रजिस्ट्रेशन के साथ ही  सभी पुराने रजिस्ट्रेशन को सामने ला कर सचेत कर देगा । ऐसे में सभी पुराने पते ठिकाने खारिज होकर एक नया रजिस्ट्रेशन किया जा  सकेगा लेकिन चूंकि  सरकार ने साफ तौर पर इसे अनिवार्य की बजाय इच्छा पर आधारित बताया है तो इस  सुधार की उम्मीद यहीं ख़त्म हो जाती है। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट आधार को निजता में दखल का आधार मानता है इसलिए इसकी अनिवार्यता में भी संदेह तो है ही। 

दूसरा आधार कोई नागरिकता प्रमाण पत्र नहीं बल्कि एक अंकवाली पहचान मात्र है जबकि मतदाता पहचान पत्र है।केवल 182  दिन का रहना किसी को भी आधार की पहचान दिला सकता है, मतदाता पहचान पत्र नहीं। समय समय पर सरकारी इकाइयों के बयान बताते हैं कि आधार को पता प्रमाणित करने वाला नहीं माना  जा सकता जबकि मतदाता पहचान पत्र मतदाता के पते की पुष्टि करता है। सच तो यह है कि आधार अन्य पहचान पत्रों के आधार पर दी गई पहचान है जबकि मतदाता चुनाव आयोग के अधिकारी के जरिये तस्दीक हुई आईडी है।मतदाता पहचान पत्र गरीब, पिछड़े और बेघर को भी दिया जा सकता है बशर्ते बीएलओ इसे प्रमाणित करता हो । आधार ऐसी कोई सहूलियत नहीं देता और न ही यह कहा जा सकता है कि आधार के  डेटा में सेंध नहीं लगी या यह पूरी तरह से डुप्लिकेटरोधी है। 

इस डिजिटल दौर में जहां डेटा सबकुछ है और इलेक्ट्रॉनिक मशीनों की थोड़ी-सी  छेड़छाड़ भी बड़े फेरबदल कर सकती हैं वहां सतर्क होना बहुत जरूरी है। मतदाता सूची का मामूली विश्लेषण भी नतीजे बदलने की ताकत रखता है खासकर तब जब नतीजे बूथ स्तर पर उपलब्ध हों। किसी क्षेत्र विशेष में अगर यह पता चल जाए कि  हार केवल एक फीसदी के मतान्तर से होने वाली है, वहां हल्का  हेरफेरभी बड़े परिवर्तन में बदल सकता है। क्यों नहीं कोई उस मतदाता को निशाना बनाएगा जो कमज़ोर है। यह लकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक कदम  हो सकता है। जाहिर है निजता और ईमानदारी मतदान प्रक्रिया  के लिए इस डिजिटल दौर में और भी जरूरी हो जाते हैं। खासकर तब जब हर सरकार जीतने के लिए परिसीमन से लेकर जातिगत पहचान को पहचान लेने के लिए आतुर हो , हर पैंतरें अपना रही हो। आरईआर 1960 यानी निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम चुनाव में पारदर्शिता की वकालत करता है। इसमें मतदाता के नाम जोड़ने हटाने की पारदर्शिता पर भी जोर है जो 1922 में तकनीक की मदद से और बेहतर हो सकती है लेकिन एक दूसरे पक्ष की आवाज़ को सुने बिना उठाया गया कदम लोकतंत्र को मजबूत करनेवाला तो नहीं लगता। जोड़ना हटाना निर्वाचित सरकार का हक है लेकिन यहां सुनना भी जरूरी है क्योंकि कदम निर्वाचन के लिए  ही उठाया जा रहा है बल्कि उठा लिया गया है बस संशोधन पर राष्ट्रपति के मुहर लाने की देर है। 






 








 

मंगलवार, 30 नवंबर 2021

डॉक्टर कोटनिस के देश में अस्पताल से डरते मरीज

  पवित्र पेशे से जुड़े ये अनुभव महज दो शहरों और दो अस्पतालों के नहीं हैं बल्कि भारत के हर शहर में हर किसी के हो सकते हैं।अस्पताल  मॉडर्न मेडिकल साइंस के  केंद्र हैं लेकिन यहां जाने  से पहले मनुष्य डरने लगा है उसका विश्वास डगमगाने लगा  है। ऐसा उस देश में हैं जहाँ के एक डॉक्टर द्वारकानाथ शांताराम कोटनिस ने दूसरे देश में सेवाएं देते हुए अपनी जान कुरबान कर दी थी। आखिर क्या है जो इस पेशे को यूं भरोसा खो देने की कगार पर ले आया ? अपनी बात रखने से पहले यह डिस्क्लेमर ज़रूरी है कि कई चिकित्सक ऐसे हैं जो इस पेशे की आबरू भी बचाए हुए हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि ये अच्छे डॉक्टर भी बाजार के दबाव में कसमसा रहे हैं लेकिन कोई चारा न देखक कुव्यवस्था के चक्रव्यूह में घिर गए हों 


करीब महीना हुआ होगा घर की बालकनी से चमकता हुआ बड़ा -सा साइन बोर्ड  दिखाई दिया निविक हॉस्पिटल। तसल्ली हुई कि चलो एक अस्पताल घर के पास ही हो गया। यह शुक्रवार सुबह की बात है बेटे का कॉल आया कि उसका एक्सिडेंट हो गया है एक अंधे मोड़ पर कार ने उसे टक्कर मारकर गिरा दिया। कारवाले ने उसी कॉल पर  दबाव बनाया कि आपके बेटे कि गलती है आप मेरे नुकसान की भरपाई करो। बेटे का शरीर और दुपहिया तो ज़िक्र में भी नहीं थे। कारवाले ने बताया कि  मानसरोवर में उसका शोरूम है और मुझे वहीं आकर मिलना होगा। शाम को बेटे ने कहा कि वह ड्राइव नहीं कर सकता लेने आना होगा। उसकी कोहनी पर सूजन थी और वह हाथ नहीं उठा पा रहा था। सुबह किसी हड्डी विशेषज्ञ से मिलने और एक्स रे की नीयत से हम निविक पहुंचे जहां बताया गया कि ऑर्थो यानी हड्डी के डॉक्टर तो अभी नहीं हैं न्यूरो सर्जन हैं वे ही देख लेंगे । चार सौ की पर्ची और 100 रूपए  रजिस्ट्रेशन। उन्होंने पर्ची पर कोहनी का एक्स रे लिखते हुए कहा कि  मैं अभी यहीं हूँ आप जल्दी से करा लीजिए। साढ़े तीन सौ  जमा कराए गए । एक्स रे फिल्म लेकर ज्यों ही डॉक्टर के पास पहुंचे वे अपनी सीट पर नहीं थे। वहां मौजूद स्टाफ हर्षिता ने बताया कि वे एक दूसरे हॉस्पिटल मेट्रोमास  में  इमर्जेन्सी ऑपरेशन के लिए चले गए हैं। अब पूरे अस्पताल में इस एक्स रे को पढ़ सके ऐसा कोई नहीं था। हर्षिता ने कहा रुकिए मैं आपका एक्स रे डॉक्टर को भेज देती हूं। आधे घंटे बाद बताया गया कि फ्रैक्चर है। फिर तो तुरंत मरीज़ को बेड  पर लेटा  दिया गया। एक गोली खिलाई गई और आइस पैक पकड़ा दिया गया। कहा गया कि मरीज को आराम की जरूरत है। डॉक्टर शाम को आकर प्लास्टर करेंगे। एक्स रे रिपोर्ट  भी नहीं दी गई जिससे सच्चाई का पता लगता। खैर बेटे ने ही कहा मां चलो यहां से मुझे नहीं लगता कि हड्डी टूटी है। हम हैरान परेशान लौट आए।शाम को स्टाफ का फ़ोन आता है कि आप जल्दी आइये डॉक्टर आ गए हैं। हम बिना देर किये पंहुच गए। स्टाफ एक कच्ची पर्ची ले आया और बोला चौबीस सौ रूपए जमा कीजिये।। प्लास्टर होगा। हमने कहा एक बार डॉक्टर से तो मिलाइये वे देख लें। वे आ जाएंगे। आप तो पैसे जमा कीजिये और ये सामान लीजिये। स्टोर की और इशारा करते हुए स्टाफ ने कहा। कुछ समझ नहीं आ रहा था। प्लास्टर की जरूरत बेटे को नहीं लग रही थी।  हम फिर दुविधा और दुःख के बीच झूलते हुए लौट आए। 



इस बीच बहन ने एक विशेषज्ञ को एक्स रे भेजा। डॉक्टर ने हड्डी बिल्कुल सही होने की बात कही और इतवार की सुबह  वीडियो कॉल पर कुछ दवा के साथ एक्सरसाइज के लिए कहा। बेशक यह राहत भरी सुबह थी लेकिन कई सवाल लेकर आई थी।  राजधानी जयपुरमें ये कैसे अस्पताल सर उठा रहे हैं ?आधी अधूरी व्यवस्थाओं के साथ यह मनुष्य के स्वास्थ्य के साथ कैसे 'डील ' कर सकते हैं ? न मास्क न दस्ताने स्टाफ के दक्ष न होने की कहानी बयां कर रहे थे। इमर्जेन्सी में इलाज की कोई  सुविधा नहीं और  सफाई ये कि हम कॉल पर डॉक्टर बुला देते हैं और अभी मार्केट स्टडी चल रही है। 

अब थोड़ा पीछे चलते हैं। तब कोरोना का कहर दस्तक दे रहा था 

 इंदौर में मरीज़ की  हिप जॉइंट रिप्लेस्मेंट सर्जरी हुई थी। डिस्चार्ज मिल चुका था। उस दिन टांके कटने थे तो उस बड़े   निजी अस्पताल की एम्बुलेंस घर से मरीज़ को लेने आई थी। एम्बुलेंस में दो डॉक्टर थे। हेल्पर भी।  ऑक्सीजन सप्लायर के साथ सभी लाइफ सेविंग इंस्ट्रूमेंट्स से सुसज्जित एम्बुलेंस मरीज़ को हॉस्पिटल ले आई।बताए गए  बिल का भुगतान हो चुका था।  मरीज़ के टांके कटते ही स्टाफ ने शोर  मचाना शुरू कर दिया कि आपको येलो ज़ोन के अस्पताल में शिफ़्ट होना पड़ेगा। इन्हें सांस की तकलीफ़ है। क्यों, हम क्यों जाएं येलो जोन में वहां कोरोना संक्रमित मरीज़ होंगे । इनका इलाज ग्रीन जोन के अस्पताल में ही होना चाहिए। कोरोना के कोई लक्षण हमारे मरीज़ में नहीं हैं। नहीं, आपको जाना ही होगा। आप पेशेंट को यहाँ से ले जाइये। हद हो गई आप ही ने बुलाया और आप ही रवाना  कर रे हैं । परिजनों को नहीं समझ आ रहा था कहाँ ले जाएं। अस्पतालों की लिस्ट थमा दी गई। एम्बुलेंस मांगी गई तो स्टाफ ने कहा कि केवल आने के लिए मिलती  है। बाहर प्राइवेट एम्बुलेंस खड़ी है।   आप जल्दी मरीज़ को यहाँ से ले जाइये। प्राइवेट एम्बुलेंस जिसके पास ढंग का स्ट्रेचर भी नहीं था दो हज़ार रुपए में छह किलोमीटर दूर स्थित एक अस्पताल में ले जाने के लिए तैयार हुई । एम्बुलेंस का एयर कंडीशनर पूरी तरह  ध्वस्त । कोई डॉक्टर हेल्पर भी नहीं।
इस  प्राइवेट एम्बुलेंस पर नंबर प्लेट भी हरियाणा की थी  । ख़ैर अस्पताल पहुंचे। वहां एक भले डॉक्टर ने कहा कि यहाँ हालात अच्छे नहीं है।  इन्हे यहाँ मत लाइये। दूसरे अस्पताल ले जाइये।  एम्बुलेंस के ड्राइवर ने कहा मैं नहीं जाऊंगा। आप मरीज़ उतार लीजिये। हाथ जोड़े तो कहा चार हज़ार लूंगा वहां छोड़ने के। मजबूर तीमारदार के पास क्या रास्ता बचा था । तीन दिन उस अस्पताल के ICU  में सांस लेने के बाद साँसे थम गईं। दो बार कोरोना टेस्ट हुआ। दोनों नेगेटिव लेकिन मरीज़ को बॉडी में तब्दील कर दिया गया था। जाने कैसी गाइडलाइन थी ये जिसमें न कोई गाइडेंस था न लाइन थी । 

अस्पतालों से जुड़े ऐसे कई अनुभव हम सबके हैं। इन्हें ऐसा क्यों नहीं होना चाहिए जैसे कोई सवाली ईश्वर के दरबार में चला जाए। इतना ही आसान और सुलभ  क्यों नहीं होना चाहिए इन्हें ?जवाब शायद इस पेशे की शिक्षा में भी छिपा है। नीट की परीक्षा बगैर बड़े कोचिंग संस्थाओं के पास कर पाना आसान नहीं। कम फीस  के साथ जो सरकारी शिक्षण संस्थाएं इसकी पढ़ाई कराते हैं वहां कड़ी प्रतिस्पर्धा है। राजस्थान में सात सौ बीस में से छह  सौ अंक लाने वाले को ही सरकारी कॉलेज में प्रवेश मिलता है। शेष सभी निजी कॉलेज में मोटी फीस देकर पढ़ाई कर सकते हैं। यहां डेढ़ सौ अंक लाने वाले को भी दाखिला मिल जाता है। सत्तर लाख से एक करोड़ तक फीस होती है। पांच सौ अस्सी अंक लानेवाल गरीब छात्र फिर परीक्षा देता है और नीट क्रैक करता है लेकिन अमीर पहले ही प्रयास में मोटी  फीस देकर एमबीबीएस की डिग्री ले लेता है। यहीं से बाजार भी इस पेशे में दाखिला ले लेता है। इन दिनों केवल प्रतिभा  ही डॉक्टर नहीं बनाती। फार्मा ,बीमा और फिर मार्केट और मनी की पढ़ाई कर के आनेवाले अस्पतालों को बड़ी बड़ी इमारत तो दे दी है लेकिन  वहां से आत्मा ले ली है। शायद चिकित्सक को ही समझना होगा कि  इसकी सबसे बड़ी कड़ी है और वही है जिसे खुद को बाजार की शक्तियों के हवाले नहीं करना है। उनकी साख बड़ी है। डॉ कोटनिस की विरासत उनसे जुड़ी है। वे डॉ कोटनिस जिन्होंने पराए मुल्क चीन में जाकर घायल सैनिकों की इतनी सेवा की कि अपनी जान कुरबान कर दी। आमजन डॉक्टर को भगवान का दर्जा देता है किसी मार्केट के नुमाइंदे को नहीं। चारागर को बाजार में लाकर सेहत का बड़ा नुकसान हम कर चुके हैं। 





मंगलवार, 20 जुलाई 2021

दो जासूस करें महसूस कि दुनिया बड़ी खराब है

 लाख छुपाओ छुप न सकेगा राज हो कितना गहरा ... दिल की बात बता देता है असली नकली चेहरा.. हिंदी फिल्म असली नकली के लिए हसरत जयपुरी साहब का लिखा  यह गीत जासूसी कांड पर मौजूं है। चेहरे आप सत्ता पक्ष के देख लीजिये,फक्क पड़े हैं  और शेष आबादी का चेहरा तो अब फ़ोन ही हो गया है उसे भांपने के लिए फोन हैकिंग करा लीजिये। क्रोनोलॉजी समझिये । पहले एक्टिविस्टों, पत्रकारों के कंप्यूटर की हैकिंग,उन पर देशद्रोह के मुकदमें और अब पैगसस का प्रोजेक्ट जासूसी। किसको रुचि हो सकती है इस जासूसी में ?किसे अपने खिलाफ उठी हर आवाज नागवार है?किसने अपना काम करते हुए पत्रकारों को जेल में डाला है। केरल के सिद्दीक कप्पन ,हरियाणा के मनदीप पूनिया और मणिपुर के पत्रकार की सामान्य ख़बरों पर किसे मिर्च लग रही थी  ? क्रोनोलॉजी तो जनता को समझनी है कि इन सबसे देश को दुनिया में कौन बदनाम कर रहा है। हर बात में विदेशी साजिश का हवाला अब न्यू नॉर्मल है। क्या परेशानी है जो इस जासूसी की परतें मानसून सत्र से पहले खुलीं? दूध और पानी का फर्क हो ही जाएगा।कोई क्यों डरता है यहां बात करने से? 

असहमति की आवाज दबाना भी अब न्यू नॉर्मल बनता जा रहा है।मानव अधिकार कार्यकर्ता फादर स्टैन स्वामी का कम्प्यूटर किसने हैक किया ? एक बीमार बुजुर्ग से कौन खौफ खा रहा था ? आखिर क्यों वे ज़मानत के इंतज़ार में मौत की नींद सो गए ? किसान आंदोलन में जब  मनदीप पुनिया ने फेसबुक लाइव किया कि दिल्ली  बॉर्डर पर विरोध करनेवाले स्थानीय लोग नहीं बल्कि पार्टी के कार्यकर्ता हैं तो किसे तकलीफ होनी थी ,किसके कहने पर दिल्ली पुलिस ने यह गिरफ्तारी की थी  ? क्रोनोलॉजी समझनी ही होगी कि अपने खिलाफ उठी हर आवाज़ का गला कौन घोंट देना चाहता है? ग्रीक पुराण में पैगसस एक पवित्र सफेद घोड़े की परिकल्पना है लेकिन यहाँ बहुत कुछ काला और अपवित्र है। स्वतंत्र आवाज को दबाने की चेष्टा और  लोकतंत्र को कमज़ोर करने की साजिश का पर्दाफाश जरूरी है। सर्वशक्तिमान को इतनी ओछी हरकत शोभा नहीं देती है। यह गरल उगलने जैसा है। उगलने जैसा क्योंकि रक्षा में विष का प्रयोग हो सकता है, सांप भी करता है। 



एक हिंदी फिल्म दो जासूस के नाम से भी बनी है। उसमें भी एक गाना है दो जासूस करें महसूस कि दुनिया बड़ी खराब है... 

मंगलवार, 11 मई 2021

जो मंटो आज होते इस कोविड 'काल' में क्या लिखते

 बेहतरीन कहानीकार सआदत हसन 'मंटो ' आज जो ज़िंदा होते 110 साल के होते।आज उनका जन्मदिन है।  बंटवारे पर लिखे उनके अफ़साने इंसानी हृदय को चीर कर रख देते हैं ,मनुष्य को ऐसा आईना दिखाते हैं कि फिर वह आंख नीची करने पर मजबूर हो जाता है। उनकी कहानियां टोबाटेक सिंह ,खोल दो, ठंडा गोश्त,काली शलवार  आम इंसान के जजबात को झिंझोड़  कर रख देती है तो सियासत और दुनिया पर राज करते रहने का सपना देखने वालों का खूनी पंजा भी दिखाती हैं। सवाल ये उठता है कि आज जब अस्पताल बेबस और सियासत अपने राज को कायम रखने के लिए सारी हदें पर कर रही हो तब मंटो क्या लिखते। क्या लिखते वे जब इंसान को एक कुत्ते की तरह सड़क पर फैला दूध चाटते देखते ?  बीमार को एक-एक सांस के लिए यूं  गिड़गिड़ाते हुए देखते? पार्थिव देव को अंतिम संसार के लिए कतार में देखते ? एक गरीब की ज़िन्दगी जो लॉकडाउन ने महामारी से पहले ही घोंट दी है इस समय बीसवीं सदी का यह लेखक इक्कीसवीं सदी में क्या लिखता ? 
शायद वह लिखता कि व्यवस्था आज खुद की नाकामी को छिपाने के लिए लोगों को घर के भीतर कैद कर चुकी है ,उसके पास अस्पताल नहीं है इसलिए उसने तालाबंदी का सस्ता रास्ता चुना ,उसके पास महामारी की  वैक्सीन होकर भी नहीं है इसलिए उसने लोगों को घर की दीवारों में चुनवाना बेहतर समझा। क्या भूखे इंसान की चार दीवारें उसे अनाज देंगी ? गरीब जब भूख से जूझ रहा होगा तो वह बाहर निकलना चाहेगा लेकिन यह व्यवस्था इसकी खौफनाक तालाबंदी उसे फिर भीतर धकेल देगी। यह सन्नाटा और भूख उसे जीते जी तबाह कर देगी। निज़ाम को यह भ्रम कैसे है कि चूल्हों में आग अपने आप लगती है और रोटी की फसल घर के भीतर लहलहाती है। सिस्टम औंधा पड़ा है ,उसकी जनता अस्पताल से गुहार लगा रही है कि हम मर रहे हैं हमारी सुध लो। उफ़ मंटो शब्द रीत जाते हैं आपकी युगांतरकारी कलम का कोई सानी नहीं ,वो दृष्टि नहीं जो इस दोजख के दर्द को कह सके। 
दरअसल रविशंकर बल के एक बेहतरीन बांग्ला उपन्यास दोज़ख़नामा में एक प्रयास हुआ है मंटो को ज़िंदा रखने का। रविशंकर बल का चार  साल पहले देहांत हो गया। हिंदी अनुवादक अमृता बेरा ने भाषा का प्रवाह कायम रखा है । दो नामचीन हस्तियों की मुलाकात का दस्तावेज है बल का उपन्यास दोज़खनामा। उन्नीसवीं सदी के महान शायर मिर्जा असदउल्ला बेग खां गालिब(1797-1869) और बीसवीं सदी के अफसानानिगार सआदत हसन मंटो (1912-1955 )की कब्र में हुई मुलाकात से जो अपने-अपने समय का खाका पेश होता है वही दोख़नामा है। गालिब अपने किस्से कहते हैं कि कैसे मैं आगरा से शाहजहानाबाद यानी दिल्ली में दाखिल हुआ जो खुद अपने अंत का मातम मनाने के करीब होती जा रही थी। बहादुरशााह जफर तख्त संभाल चुके थे और अंग्रेज आवाम का खून चूसने पर आमादा थे। 1857 की विफल क्रांति ने गालिब को तोड़ दिया था और उनके इश्क की अकाल मौत ने उन्हें तन्हाई के साथ-साथ कर्ज के भी महासागर में धकेल दिया था। सरकार जो पेंशन उनके वालिद के नाम पर दिया करती थी वह भी मिलनी बंद हो गई। ये सब सिलसिलावार किस्से मंटो के साथ जब गालिब साझा करते हैं तो मंटो भी हिंदुस्तान में जिए हुए किस्सों और पाकिस्तान से मिली निराशा को लफ्ज़ देते हैं। 
यूं तो मंटो के बारे में कहने को इतना कुछ है कि मंटो पढ़ाई-लिखाई में कुछ ख़ास नहीं थे कि मंटो कॉलेज में उर्दू में ही फ़ेल हो गए थे कि शायर फैज़ अहमद फैज़ मंटो से केवल एक साल बड़े थे कि उन्हें भी चेखोव कि तरह टीबी था कि वे बेहद निडर थे कि उनकी कई कहानियों पर अश्लीलता के मुक़दमे चले कि बटवारे के बाद वे  पकिस्तान चले गए कि उन्होंने दंगों की त्रासदी को भीतर तक उतारा कि वे मित्रों को लिखा करते कि यार मुझे वापस बुला लो कि उन्होंने ख़ुदकुशी की नाकाम कोशिश  की और ये भी कि वे बहुत कम [43] उम्र जी पाए गोया कि  चिंतन और जीवन का कोई रिश्ता हो। उनके बारे में पढ़ते-लिखते दिल दहल जाता है और उनकी कहानियां पढ़ते हुए  और ज्यादा। बेशक मंटो का फिर पैदा होना मुश्किल है।हमारा नसीब कि उनका लिखा अभी मिटा नहीं है। 


एक अर्थ में मंटो सव्यसाची थे हास्य व्यंग्य पर उनका बराबर का अधिकार था।बंटवारे से पहले उन्होंने मुंबई में बतौर फिल्म लेखक भी जिंदगी का जायका लिया। उन्हें समझने के लिए उन्हीं से जुड़ा  एक सच। 
मुग़ल ए आज़म से प्रसिद्धि पानेवाले के. आसिफ उन दिनों नए-नए डिरेक्टर थे और फूल नाम कि फिल्म बना रहे थे।  इसी काम के लिए वे एक  दिन मंटो के घर गए. मंटो से कहा कि कहानी सुनाने आया हूं  । मंटो ने मजाक किया -'तुम्हें पता है  कहानी सुनने  की भी फीस लेता हूं। ' यह सुनकर आसिफ उलटे पैर लौट गए।  मंटो मानाने के लिए दौड़े लेकिन आसिफ तब तक जा चुके थे। मंटो को बड़ा पछतावा हुआ। कुछ दिन बाद एक आदमी लिफाफा लेकर मंटो के घर आया ।मंटो ने लिफाफा खोला तो उसमें सौ-सौ के पांच नोट थे और एक चिट्ठी भी- 'फीस भेजी है कल आ रहा हूँ'   मंटो स्तब्ध रह गए उन दिनों कहानी लिखने के ही उन्हें बमुश्किल तीस पैैंतीस रुपए मिला करते  थे और फिर कहानी वह भी किसी और की लिखी हुई को सिर्फ सुनने का पांच सौ रुपए । दूसरे दिन सुबह नौ बजे आसिफ उनके घर पहुंचे। 'डॉक्टर साहब फीस मिल गयी न ? मंटो शर्मिंदा महसूस करने लगे।  पल भर सोचा  कि रुपए वापस कर दूं, तभी आसिफ बोले यह पैसा मेरे या मेरे पिता का नहीं है प्रोड्यूसर का है।  मेरी यह भूल थी कि आपकी फीस के बारे में सोचे बगैर ही आपके पास आ गया। चलिए कहानी सुनने के लिए तैयार हो जाइए।  किसी और की लिखी कहानी सुनाने के बाद आसिफ ने पूछा-'कैसी है ?' 'बकवास है', मंटो ने जोर देकर कहा. 'क्या कहा?' अपने होंठ काटते हुए आसिफ ने कहा।  मंटो ने फिर कहा बकवास। आसिफ ने उन्हें समझाने का का प्रयास किया। मंटो ने कहा - 'देखिये आसिफ साहब, आप एक बड़ा वज़नदार पत्थर लाकर भी मेरे सर पर रख दो फिर ऊपर बड़ा हथौड़ा मारो तब भी यही कहूँगा कि यह कहानी बेकार है। आसिफ ने मंटो का हाथ चूमते हुए कहा सचमुच ही बकवास है आपके पास यही सुनने आया था।  आसिफ ने उस कहानी पर फिल्म बनाने का इरादा छोड़ दिया। मंटो कि साफगोई पर आसिफ फ़िदा हो गए थे वर्ना 500  रुपये में इतनी ताकत है कि वह कचरा कहानी को भी बेमिसाल कहला सके। 
happy birthday मंटो साहब !!




मंटो के बारे में कहने को इतना कुछ है कि मंटो पढ़ाई-लिखाई में कुछ ख़ास नहीं थे कि मंटो कॉलेज में उर्दू में ही फ़ेल हो गए थे कि शायर फैज़ अहमद फैज़ मंटो से केवल एक साल बड़े थे कि उन्हें भी चेखोव कि तरह टीबी था कि वे बेहद निडर थे कि उनकी कई कहानियों पर अश्लीलता के मुक़दमे चले कि बटवारे के बाद वे  पकिस्तान चले गए कि उन्होंने दंगों की त्रासदी को भीतर तक उतारा कि वे मित्रों को लिखा करते कि यार मुझे वापस बुला लो कि उन्होंने ख़ुदकुशी की नाकाम कोशिश  की और ये भी कि वे बहुत कम [४३] उम्र जी पाए गोया कि  चिंतन और जीवन का कोई रिश्ता हो . उफ़... उनके बारे में पढ़ते-लिखते दिल दहल जाता है






रविवार, 9 मई 2021

यह पेंडेमिक नहीं इन्फोडेमिक है

 यह पेंडेमिक नहीं इन्फोडेमिक है। यह  ज़्यादा नुकसान कर रहा है। महामारी को सूचनामारी क्यों बनाया जा रहा है ?

हम संकट से विध्वंस की ओर कूच कर गए हैं। ऐसा कोविड -19 की वजह से हो रहा है। क्या सचमुच इस विध्वंस का सारा दोष इस वायरस पर ही मढ़ दिया जाना चाहिए ? अगर जो यह कोढ़ है तो सूचना तंत्र की बाढ़ और अव्यवस्था ने इसमें खाज का काम नहीं  किया है? खौफ ऐसा है कि कोविड जान ले इससे पहले हम फंदों पर झूल रहे हैं ,पटरियों पर लेट रहे हैं ,छत से कूद रहे हैं। अपनों को ख़त्म भी कर रहे हैं। बीते रविवार को राजस्थान के कोटा जिले में दादा-दादी इसलिए ट्रैन के नीचे आ गए क्योंकि उन्हें डर था कि उनका पोता भी कोरोना संक्रमित न हो जाए। उनकी रिपोर्ट कोरोना पॉजेटिव आई थी। दोनों ने अपने पोते को बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। इस वायरस का व्यवहार देखा जाए तो तथ्य यही है कि यह बच्चों को कम प्रभावित करता है और जो बच्चे संक्रमित हो भी जाएं तो यह उनके लिए जानलेवा नहीं है। कोरोना के  डर और व्यवस्था से  उपजी निराशा ने लोगों को कोरोना से पहले ही अपनी जान लेने पर मजबूर कर दिया है। सोचकर ही रूह कांपती है कि महामारी से पहले ही हम हार रहे हैं। सोमवार को रेवाड़ी में एक रिटायर्ड एसडीओ ने छत से कूदकर जान दे दी। कोरोना पोजेटिव आने के बाद उन्हें रेवाड़ी के ही अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड  में रखा गया था।  वायरस से भय और निराशा का यह वायरल विडिओ जाने कितने लोगों में दहशत भर रहा है।इससे पहले एक युवक ने पहले पत्नी, बच्चे और फिर खुद  का जीवन समाप्त कर लिया क्योंकि पत्नी ब्याह में मायके जाना चाहती थी।  यह खौफ कोरोना से ज्यादा तेजी से फ़ैल रहा है इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे इन्फोडेमिक भी कहा है। 

इन्फोडेमिक पर चर्चा से पहले यहां यह बताना ज़रूरी है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री लगातार जनता से संवाद तो कर रहे हैं लेकिन इस बार यानी दूसरी लहर में जनता ने उनकी निराशा को भी पढ़ा  है। वे कहते हैं कि इस बार 80 फीसदी को ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ रही है पिछली बार 20 को पड़ रही थी ,आज लगभग डेढ़ सौ मौतें प्रतिदिन हो रही हैं, पिछली बार यह संख्या  पूरे साल शून्य से बीस ही थी। वे यह भी कहते हैं कि हालात हृदय विदारक हैं ,जीवन रक्षक दवाइयां और ऑक्सीजन की कमी पड़ रही है जिसका कि प्रबंधन केंद्र सरकार द्वारा  किया जाता है। हमें गृहमंत्री से ऑक्सीजन की मांग फोन पर करनी पड़ती है। उधर निजी अस्पताल साफ़ कह रहे हैं कि ऑक्सीजन लाइये हम भर्ती कर लेंगे। ऑक्सीजन व्यवस्था इस कदर हांफ रही है कि अलवर के एक अस्पताल ने गेट पर ही बोर्ड लटका दिया कि प्रशासन की तरफ से ऑक्सीजन सप्लाई में निरंतर हो रही कमी के कारण हमारा अस्पताल कोविड -19 के मरीजों का इलाज नहीं कर पा रहा  है। 

अव्यवस्था,अभाव और भय ने नागरिकों को जीते जी मार दिया है। कोई कह रहा है ऑक्सीजन नापते रहो ,कोई स्टीम लेने की बात करता है तो कोई पेट  के बल लेट कर ऑक्सीजन बढ़ाने की ,कोई काढ़ा पीने की. कोई कहता है केवल पैरासिटोमोल और विटामिन से ही दुरुस्त  हो जाओगे। कोई कहता है रेमडेसवीर प्रभावी है, कोई कहता है यह WHO से स्वीकृत ही नहीं है।कोई कहता है वैक्सीन जरूरी है कोई कहता है रक्त का  थक्का  जमा देती है।  महामारी को सूचनामारी क्यों बनाना? महामारी के बीच सूचना की ऐसी महामारी मानव सेहत  के साथ न केवल अभूतपूर्व है बल्कि खिलवाड़ है,जानलेवा है। शायद यही कारण है कि  WHO ने इसे  इन्फोडेमिक भी कहा है। यह शब्द इंफोर्मेशन और पंडेमिक से मिलकर बना है।  इन्फोडेमिक यानी ऐसी भ्रामक सूचनाओं का प्रचार प्रसार जो उसके सुलझने से पहले ही हालात को और गंभीर और भयावह बना देता  है। इससे इतना ज्यादा कंफ्यूजन और खुद को खतरे में डालने वाला व्यवहार बढ़ रहा जो सेहत पर खराब असर  डाल रहा  है। अफवाह और डर जंगल की आग से भी तेज फ़ैल रहे हैं। कोरोना के सन्दर्भ में सोशल मीडिया और इंटरनेट के जरिये यही हो रहा है । तो फिर क्या हो ?

विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO ने इससे लड़ने के लिए इन्फोडेमिक मैनेजमेंट की स्थापना की है  जिसका मकसद इस आपात स्थिति में सही जानकारी देना है। पहला लोगों की तकलीफ और उनके सवालों को सुनना।दूसरा  खतरनाक व्यवहार  का अध्ययन  और विशषज्ञों की बात  का प्रचार।तीसरा गलत सूचना से मुक्ति दिलाना और चौथा कम्युनिटीज को सकारात्मक प्रभाव देने  के लिए तैयार करना। इन्फोडेमिक मैनेजमेंट कारगर होने में वक्त लग  सकता है तब तक  हमारा फर्ज यही हो कि बीमारी से भी और उससे  पहले भी कोई न मरे। अफसोस मौत  बीमारी से पहले आ रही है जबकि 85 फीसदी मरीज सामान्य इलाज से ठीक हो रहे हैं। इस दुष्प्रचार को समझिये ,कमज़ोर मत पड़िए।संकट से समाधान की ओर चलिए विध्वंस की ओर नहीं।  कफ़स को उदास मत होने दीजिये,मौसम का कारोबार पहले की तरह चलने दीजिये।  फैज अहमद फैज का शेर है  

कफ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो 

कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले। 

मंगलवार, 4 मई 2021

ये जो सिस्टम है

 सात साल पहले भारत वर्ष की पवित्र संसद की देहरी पर जब उस लोकप्रिय शख्स ने शीश नवाया था तो लगा था ,देश को उसका नेता मिल  गया है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक समान और संवेदनशील निगाह रखेगा। अतीत के कुछ संदेह थे भी तो भोले-भाले मतदाताओं ने ताक पर रख दिए और आस भरी नज़र से






















 नेता की ओर देखने लगे। फिर देश ने देखा मॉब लिंचिंग यानी भीड़ जब घेरकर किसी को मार दे तो व्यवस्था का मौन ,नागरिकता कानून के खिलाफ जब महिलाएं शाहीन बाग़ में विरोध प्रकट करें तो व्यवस्था ने संवेदना की बजाय उन्हें खदेड़ने में दिलचस्पी ,यहां तक की व्यवस्था ने राजधानी के एक हिस्से को दंगे की भेंट चढ़ जाने का मंज़र भी आँख मूंद कर  देखा। किसानों ने सिस्टम से खेती कानून पर फिर विचार करने की गुहार लगाई वह तब भी मौन साध गया। 

   कोरोना महामारी के पहले दौर के बाद जब सिस्टम अपनी पीठ  रहा था, देश ने वह भी देखा।  यह समय से पहले आया पार्टी का जयघोष था।   'भारत ने न केवल प्रधानमंत्री  के नेतृत्व में कोविड को हरा दिया है बल्कि अपने सभी नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाने के प्रति विश्वास से भी भर दिया है। पार्टी कोविड के खिलाफ जंग के मामले में भारत को दुनिया के सामने एक गौरवशाली और विजेता देश रूप में पेश करने के लिए निर्विवाद  रूप से अपने नेतृत्व को सलाम करती है। ' क्या यह दूसरी लहर के प्रति अनभिग्यता थी यां हर बार उत्सव मानाने में हुई जल्दबाजी ?यह अनभिग्यता तो खतरनाक है ,अवैज्ञानिक है ,दूसरे देशों से भी सबक न लेने की एक बुरे अंत वाली कहानी है। नहीं भूलना है कि कोविड से हुई हर मृत्यु अपने प्रिय के अंत की कहानी है। 

 व्यवस्था के चौपट होनेका आलम तो यह है कि छोटा सा पड़ोसी देश पाकिस्तान भी मदद पेश करने लगे। इस पेशकश में  कोई बुराई नहीं लेकिन साधनहीन भी आपके सामने साधन संपन्न लगने लगे यह शर्म से माथा झुका देने वाली बात है।  बेशक शेष दुनिया भी मदद का भाव रख रही है लेकिन विदेशी मीडिया हमें बख्श नहीं रहा है। देश की आपात स्थिति पर निरुत्तर कर देने वाले शब्द और व्यंग्य मीडिया में बिखरे पड़े हैं। ऑस्ट्रेलिया के मशहूर कार्टूनिस्ट ने डेविड रो ने प्रधानमंत्री की शाही सवारी को एक मरे हुए हाथी पर दिखया है। यह समय उन्हें विदेशी ताकतों की कुदृष्टि कहने का भी नहीं है जैसा सिस्टम ने पर्यवरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग  और दिशा रवि के समय किया था। यह समय अपने गिरेबान में झांकने का है कि क्यों केंद्र जो ऑक्सीजन और वैक्सीन आपूर्ति के लिए ज़िम्मेदार है वह जरूरत  नहीं पूरी कर पा  रहा है। वैक्सीन के अलग अलग दाम की बात ही तकलीफदेय  लगती है। जब देश की अवाम इस वायरस से अपने प्राण हार रही है सिस्टम उसे प्राणवायु नहीं दे पा रहा है । वैक्सीन को लेकर यह कितना अजीब है कि निर्माता केवल दो हैं लेकिन  देश के तमाम मुख्यमंत्री इनसे अलग -अलग भावताव करेंगे। एक दाम होने पर क्या वैक्सीन के उत्पादन में तेज़ी लाते हुए काम नहीं होना था ? अच्छी बात ये हुई है कि सिरम इंस्टीट्यूट क अदार पूनावाला के अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन को ट्वीट करने के बाद वैक्सीन से जुड़ा कच्चा माल मिलने की राह आसान हुई है। 

क्या यह केंद्रीय सिस्टम का फर्ज नहीं था कि पूरे देश को वैक्सीनेट किया जाए। वैक्सीन अभियान को विकेन्द्रित करना है उसकी खरीद को नहीं। आपक कितने में  खरीद रहे कितने में नहीं उससे देश की जनता को क्या लेना-देना। क्या अवाम के रखवाले इस तरह पैसा  दिखा दिखा के खर्च करेंगे ,एहसान जताते हुए। वे पिता की तरह क्यों नहीं हो सकते ?देश क्यों फिर अब भी उन्हें माई -बाप माने बैठा है ?राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वैक्सीन खरीदने और जनता को फ्री देने का का अच्छा ऐलान किया साथ ही यह भी कह दिया कि इसके बाद राज्य की कल्याणकारी योजनाओं पर असर पड़ेगा। दिल्ली के सीएम ने भी कहा है कि एक देश में एक दाम क्यों नहीं ?बेशक यह महामारी का समय है हर जान कीमती है जो टीकाकरण के बाद खुद तो सुरक्षित रहेगी ही इस जानलेवा वायरस को फैलने से भी रोकेगी। यह राष्ट्रहित का मसला है। राज्यों की सरहदों में तो हम बंधे बैठे वायरस सर्वव्यापी है। सरहद विहीन। रौंद रहा है देश को। हमें एक होना है हर हाल में हर सरहद, हर मजहब ,हर दल से मुक्त एक भारत जिसका राष्ट्रीय नारा हो किल कोविड। 







शनिवार, 24 अप्रैल 2021

मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यों रात भर नहीं आती

मौत  का एक दिन मुअय्यन  है 
नींद क्यों रात भर नहीं आती  

चचा ग़ालिब इस शेर को भले ही दो सदी पहले लिख गए हों लेकिन आज यह हर हिन्दुस्तानी का हाल हो गया है। डर का साया उसके दिल ओ दिमाग पर खुद गया है।इस हाल में उसे कोई उम्मीद तसल्ली के दो शब्द कहीं नज़र नहीं आते। हमने अपने ध्येय वाक्य 'प्राणी मात्र पर दया' से भी मुँह मोड़ लिया है और आज प्राणवायु के लिए ठोकरे खा रहे हैं। इस बुरे वक्त में प्राण निकल भी  रहे हैं तो भी तसल्ली कहाँ है। दो गज  जमीन का भी संकट है और बैकुंठ जाने के लिए लकड़ी भी रास्ता रोक रही है। श्मशान घाट और
 कब्रिस्तान दोनों एक ही कहानी कह  रहे हैं। ऐसे में इंसान के कोमल मन पर रुई के फाहे रखे कौन ? हम सब जानते हैं कौन ,उम्मीद भी बहुत रखी लेकिन अब सिर्फ और सिर्फ हमें करना होगा। किसी से उम्मीद न रखते हुए हमारी प्राचीन विरासत और संस्कारों के हवाले से। 
हमें बिना किसी अपेक्षा के बस मदद के हाथ बढ़ाने होंगे। मानव सभ्यता पर ऐसा संकट अभूतपूर्व है। आज़ाद भारत के लिए तो और भी नया क्योंकि  इंसान-इंसान के बीच दूरी को ही जीवन रक्षक कहना पड़ रहा है । इस अजीब समय में हम सब नए नहीं हैं, पिछला साल भी ऐसा ही था।  फिर भी अब मदद के भाव को केंद्र में रखना ही होगा। किसी अपने और किसी भी हेल्थ  वर्कर की बेरुखी वक्त से पहले प्राण लेने के लिए काफी होगी। जो सबसे नेक काम होगा वह डर को कम करने का। सूचना के तमाम माध्यम जाने किस हक़ से डर फैलाए जा रहे हैं। जो डर गया वो मर गया समझाने वाले अब चीखते फिर रहे हैं कि डरो और डरो। बेशक शेर के आने का डर है लेकिन उससे पहले ही चीख देना बहुत के दिल डूबने का सामान बन रहा है। इतना  डर फैलाने का कोई लाइसेंस इन माध्यमों के पास नहीं लेकिन फिर भी लगे  हुए हैं डराने में।  पिछले लॉकडाउन में तो फिर भी हिमालय के पहाड़ दिखा रहे थे ,चिड़ियाएं चहका रहे थे ,मम्मी की रसोई महका रहे थे ,इस बार होश गुम है। डराने में सब खर्च हो रहा है। इनके पास साबित करने का कोई पैमाने नहीं कि हमारे डराने ने इतनी जानें बचा ली। 

इज़राइल जैसा छोटा सा देश 65 फीसदी टीकाकरण तक पहुँचने वाला है। टीकाकरण से पहले ताइवान ,न्यूजीलैंड, वियतनाम जैसे छोटे मुल्कों  संक्रमितों को पूरी तरह ठीक होने तक ट्रैक किया। वे आज कोविड से मुकाबले में आगे हैं। पिछले साल हमसे बुरे हाल वाले देशों ने अपने संसाधनों को और बेहतर किया और वो आज हमसे बेहतर हालात में हैं। हमारे यहां राज्य-केंद्र उलझ रहे हैं। मानव त्रासदी के इस दौर में यूं उलझना कितनी छोटी सोच का प्रतीक बन रहा है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ऑक्सीजेंकी उपलब्धता पर टकरा जाते हैं।वे दिल्ली के लिए ऑक्सीजन मांग रहे हैं और पीएम प्रोटोकॉल याद दिला रहे हैं। Cm ne मौके का फायदा उठाया तो पीएम भी देश को लाइव और बड़ा संदेश दे सकते थे प्राणवायु के बारे में बोलकर।
बहरहाल जिस भारतीय विरासत से मदद सहायता यहां तक की पूरी दुनिया की मदद का दर्शन आता हो वहां इतना संकट ,अच्छा संकेत नहीं है। सोमवार को  टीवी पर एक बड़े डॉक्टर कह रहे थे कि हम दिन रात एक करते हुए थक चुके हैं। वाकई मरीज़ों का यह दबाव अभूतपूर्व है लेकिन क्या एक साल में ऐसे प्रयास नहीं होने चाहिए थे कि वॉलन्टियर्स की नई कतार खड़ी की जाए। ऐसे बहुत से युवा देश में हैं जो देश को अपनी सेवाएं देना चाहते
 हैं। जब पहली वैक्सीन के ट्रायल्स के लिए युवा आगे आ सकते हैं तो यहाँ क्यों नहीं। बेशक सोच और नेतृत्व  की कमी  नज़र आती है। चुनाव जीतने की मशीन बन चुके राजनीतिक दलों से बड़ी उम्मीद अब भी ना रखते हुए हम कितना योगदान इस दौर में दे सकते हैं यह बड़ा फ़र्ज़ होगा। बिच्छू काटने की ही प्रवृत्ति रखता है लेकिन साधु अपने प्रवृत्ति  से नहीं डिगता, वह तब तक काटते हुए बिच्छू को  हटाता है जब तक उसका साहस है। जीत साधु की ही होती है। दलाई लामा की इस बात में कितनी सच्चाई है 

'दुनिया  का अस्तित्व इन नेताओं से नहीं दुनिया का अस्तित्व मानवता से है '

इस मानवता के झंडाबरदार हम हैं। हम जीतेंगे इस लड़ाई को मदद के हाथ बढ़ाकर।जहां भी जिस रूप में
 हैं, वहां से। हमारी आत्मिक शांति में खलल डालने का हक हमें किसी को नहीं देना है। खुद पर भरोसा करना है। जो आज तक हमारा वजूद बना रहा है वह किसी राजे -रजवाड़े या सरकार की वजह से नहीं रहा है ,यह रहा है हमारे पुरखों के दमखम से। उनके अर्जित ज्ञान से। खुद को बुलंद करना समय की मांग है। 













मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

हे कलेक्टर! ये अपमान और एहसान क्यों


 हम सब अनजाने ही एक महामारी की चपेट में धकेल दिए गए हैं। ऐसी महामारी जिसके बारे  में किसी को भी सही-सही कुछ नहीं पता। सारे विशेषज्ञ इस कोरोना महामारी के लिए ज़िम्मेदार वायरस पर टकटकी लगाए बैठे हैं लेकिन हर रोज़ लगता है जैसे शिकार उनके हाथ आया है फिर अचानक किसी चंचल पंछी की तरह हाथ से छूट भागता है। विशेषज्ञ हाथ मलते रह जाते हैं और हाथ आए पंख या फिर पंछी की ऊष्मा के आधार पर अपनी समझ का गणित बैठाते रहते हैं। ठीक है माना कि इसके अलावा कोई और रास्ता भी नहीं लेकिन आधी-अधूरी जानकारी और शोध के आधार पर यह सख्ती का माद्दा अपनाने का हुनर भला कहां से आता है। शहरों की तालाबंदी ,वैक्सीन को लेकर जोर जबरदस्ती क्यों ? लॉकडाउन ज़िन्दगियों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। यह धीमा ज़हर है जो उन्हें मौत के करीब ले जा रहा है और जो मरेंगे उन्हें यह यकीन बिलकुल भी नहीं है कि कोरोना उन्हें मारेगा ही मारेगा। ये तम्बाकू चबाते और नशा पीती  ये बेरोज़गार आबादी जब बीमार होगी  तो उनके लिए अस्पताल होंगे आपके पास ?
खबर राजस्थान के धौलपुर से है।  यहाँ के कलेक्टर ने आदेश दिया है कि जब तक यहां के लोग टीका नहीं लगवा लेते तब तक उन्हें सरकारी सुविधाओं मसलन मनरेगा ,राशन और प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभ से वंचित रखा जाए। आपका सारा ज़ोर और जबर पावर बस गरीब पर ही चलता है। उसने तो आपको इतने मरीज़ भी नहीं दिए हैं जितने शहरों के अमीरों ने। जिन छह ज़िलों के आंकड़े आपने सौ मरीज़ों के पार दिए हैं उसमें धौलपुर कहीं नहीं। शहरों में कोरोना मापने का एक ही मापक है एक बिस्तर पर दो मरीज़। अब आपके अस्पताल ही कम हों और उनमें बिस्तर तो और भी कम तो इस मापक के कोई मायने नहीं रह जाते। एक अनार सौ बीमार के इन हालत में वैक्सीन का आंकड़ा बढ़ाने के लिए सरकारी नुमाइंदे ये जुगत लगा रहे हैं तो फिर संजय गांधी का जनसंख्या नियंत्रण क्या बुरा था।  वह भी तो जबरदस्ती थी।  हो ही जाती तो बेहतर था आज विस्फोटक आबादी यूं महामारी और फिर तालाबंदी की धीमी मौत से तो न रूबरू  हो रही होती। टीके अतीत में भी लगे हैं।  सरकारों ने पोलियो की बूंदे घर-घर जाकर पिलाई हैं लताड़ नहीं पिलाई। बच्चों को स्कूल स्टेशन सब जगह कई-कई बार पोलियो की बूंदे दी गई। अब भारत पोलियो मुक्त है और ये नामुराद वैक्सीन के बारे में तो यहां तक कहा जा रहा है कि हर साल नया टीका आ सकता है। अनिश्चिता। अंतहीन अनिश्चिता। इस बीमारी से ज़्यादा दखल तो सरकारों का जीवन में हो गया है। छोड़ दो यार हमको हमारे हाल पर। मोटा पहनकर और खा कर हमारे पूर्वज जीते ही आए हैं अपने बूते पर। धमकी क्यों देते हो कि यह नहीं देंगे वो नहीं देंगे। इतना अहसान जताना उफ़। अफ़सोस। 









सोमवार, 22 मार्च 2021

जीन्स तो फिर भी सिल जाएगी फटा दिमाग नहीं

 तीरथ भाई ने जब फटी जीन्स पर  बयान दिया था तब  कई लोगों ने लिखा और कहा कि दिमाग फटा हुआ नहीं होना चाहिए। मुझे लगा था कि कोई बात नहीं , ये मेरी दादी जैसे हैं जिन्हें गलती से  भी  बच्चों का कोई कपड़ा फटा या फिर कपड़े में लटकता धागा दिख जाए तो खुद कैंची लेकर आ जाती और कैंची-सी ही घायल करने वाली वो लताड़ लगातीं कि बच्चा  फिर  कभी  फटे कपड़े पहन उनके सामने नहीं आता। लेकिन वे लताड़ लड़का -लड़की देखकर नहीं लगाती सबको सामान रूप से पड़ती थी । तीरथ जी रावत फिर यहीं नहीं रुके। वे बोल गए तुमको अच्छा चावल ज़्यादा चाहिए था तो काहे को जल गए ज़्यादा बच्चे पैदा क्यों नहीं किये। इस बयानबाज़ी में बेचारे अमेरिका को भी कोस गए। बता गए कि अमेरिका ने भारत को दो सौ साल गुलाम रखा। वाह नए -नए बयानजीवी। गुलाम बनाया अमेरिका ने और आज़ादी फिर हम ब्रिटेन से मांगते रहे।   ये देश के  सबसे बड़े दल ने जो पहले के मुख्यमंत्री को खो किया क्या वह इसलिए कि उनका IQ थोड़ा ज्यादा था। खैर मज़ाक छोड़िये पहले बयान पढ़िए जो उन्होंने कल अंतर्राष्ट्रीय वन्य दिवस पर नैनीताल में दिया था।  यह भाषण पहले फेसबुक पर लाइव किया जा  रहा था जिसे बाद में हटा लिया गया । नए-नए सीएम ने कहा 

" हर घर में पर यूनिट पांच किलो राशन देने का काम किया। जिसके दस थे तो पचास किलो आ गया ,बीस थे तो क्विंटल (सौ  किलो )आ  गया। दो थे तो दस किलो आ गया ,लोगों ने स्टोर बना लिए। खरीदार सामने ढूंढ लिए। इतना बढ़िया चावल आया, कभी अपने आप भी लिया नहीं सामान्य जीवन के लिए। ... कि मुझे दो हैं तो दस किलो मिला बीस वाले को क्विंटल क्यों मिला ? अब इसमें जलन काहे कि जब समय था तो आपने दो ही पैदा किये, बीस क्यों नहीं किये ?"

हंसना मना है क्योंकि सवाल बड़ा है। नेताजी देश की कम आबादी पर चिंता ज़ाहिर कर रहे हैं।बता रहे हैं की  खामखां  ही हम चीन से दूसरे नंबर पर पिछड़े हैं। नेताजी आपके शयन कक्ष में दाखिल हो रहे हैं और आप हैं कि लगातार पिछड़  रहे हैं , जलने-भुनने में लगे हैं। बेवजह आपके अच्छे चावल का नुकसान हो गया। इसे देश का दूसरा नागरिक खा गया, खाता  ही रहा है, खता आपकी है । यह हरा -भरा बयान कुमाऊं से आया है। नैनीताल जहाँ  शेष भारत का मिडिल क्लास  एक बार जाकर बरसों तक उसकी ठंडक और पहाड़ जैसी  खूबसूरती में गुम रहता है। मैं भी। 

बहरहाल एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या इन्हीं बयानों को देने के लिए नया सीएम लाया गया ?  खैर  उत्तराखण्ड के मुखिया तो इसी  उत्तरदाईत्व को निभाने में मुस्तैदी से लग गए हैं। उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया  कि कोरोना महामारी कुम्भ के लिए कोई बाधा नहीं है ,वह तो केंद्र ने दखल दिया, झाड़ लगाई कि इसके पूरे इंतज़ाम किये जाएं। नए सीएम  को समझना होगा कि पार्टी  रात-दिन मेहनत कर बंगाल आसाम एक  कर रही है और वे अजीब -अजीब बयान दिए जा रहे हैं। दस महीने बाद देवभूमि में चुनाव हैं। जीन्स तो फिर भी सिल जाएगी ,फटे दिमाग की सिलाई अभी चिकित्सा विज्ञान के लिए भी मुमकिन नहीं है।


गुरुवार, 18 मार्च 2021

भारतीय सांसद के घर से ब्रिटिश राजघराने तक बहुओं के बोलने पर है पाबंदी

 भारत हो या इंग्लैंड ,राजघराना हो या सांसद का घर, बहुओं की आवाज़ इन्हें कभी रास नहीं आती। सबका DNA सामंती रवैये को ही डिकोड करता है। 



भारत से ब्रिटेन तक सब एक हैं। यहाँ सांसद की बहू है वहां राजघराने की । एक को उस राजसी माहौल में खदकुशी कर लेने का मन कर रहा था तो एक ने खुद की नस ही काट ली है। ज़िंदा दोनों हैं लेकिन दोनों बिना किसी अपराध के गुनहगार साबित की जा रही हैं। हाँ एक गुनाह दोनों ने किया है। बोलने का गुनाह। एक को आज तक टीवी चैनल वालों ने मुर्गे की लड़ाई दिखाने की  तर्ज़ पर जेठ के सामने कर दिया तो दूसरी ने दिल की बात ओपरा विनफ्रे के शो पर कह डाली । कह दिया कि शाही खानदान को डर था कि प्रिंस हैरी के बच्चे की चमड़ी का रंग कहीं अलग न हो । एक का नाम  अंकिता है और दूसरी का मेगन मर्केल। दोनों की कहानी अलग-अलग है लेकिन पृष्ठभूमि बिलकुल एक है ससुराल और ये ससुराल बहू की ऊंची आवाज़ ज़रा भी बर्दाश्त नहीं कर पाता। 

ससुराल जिस जगह का नाम है क्या वह डिज़ाइन ही इस तरह से होती है? हिंदुस्तान से इंग्लिस्तान तक  बच्चे के रंग और लिंग को लेकर जद्दोजहद होती है और जो ऐसा ना हुआ तो लड़की ने लड़के को काबू कर लिया जैसे मुद्दे ससुराल की देहरी पर लटकते मिलते हैं। उत्तरप्रदेश के मोहनलालगंज से भाजपा सांसद कौशल किशोर की बहू अंकिता का सामना जब चैनल ने उसके जेठ से कराया तो वह लगातार एक ही बात कह रहा था कि तुम हमारे भाई को ले गई, तुमने उसे नशे की लत दे दी ,तुमने उसे बरबाद कर दिया। इस आमने -सामने के तीन दिन बाद ही अंकिता ने अपने हाथ की नस काट ली ,विडिओ में वे कह  रही हैं मेरे पति और ससुराल वालों के अत्याचार के कारण मैं ऐसा कर रही हूँ। मेरे ससुर भाजपा के सांसद हैं और सासू विधायक। मैं और नहीं लड़ सकती। 

अंकिता आयुष के परिवार की पसंद नहीं थी। मेगन मर्केल भी  प्रिंस हैरी की पसंद थी। वे दोनों तो शाही खानदान से अलग  एक आम ज़िन्दगी बसर करने की ख्वाहिश रखते हैं। अंकिता  के हवाले से एक बात तो साफ़ है कि  इन सुविधाभोगी लड़कों के सर से ज्यों ही प्रेम का भूत उतरता है इन्हें पापा याद आते हैं। पापा का ऐशो -आराम फिर हासिल करने के लिए ये फिर अपनी ही पत्नी को अपमानित करने से नहीं चूकते। कैमरा के सामने बेशर्मी से ये तक कह देते हैं कि इसके जिंदगी में आने से पहले क्या शानदार लाइफ थी हमारी। इसने सब बरबाद कर दिया। आयुष ने यही किया,अंकिता अपमानित किया। 

मेगन मर्केल जो छोटी उम्र से ही समानता की पैरोकार रही हैं और  अपनी बात कहने से हिचकती नहीं हैं। उन्होंने  जब ब्रिटिश शाही खानदान का नस्लभेदी रंग उजागर किया तो फिर वे चौतरफा हमलों से घिर गईं। इलज़ाम लगा कि वे महल के कर्मचारियों को धमकाती थीं। मर्केल ने भले ही सबूत मांगे हों लेकिन हम सब जानत हैं सिलसिला अब रुकने वाला नहीं। ज़्यादा पुरानी बात नहीं है जब प्रिंस हैरी और विलियम की माँ डायना को लोगों ने महल की ज़िन्दगी से ऊबते देखा था। प्रिंस चार्ल्स का दूसरी स्त्री से सम्बन्ध जो आज उनकी पत्नी है ,डायना को किस कदर तोड़ने वाला रहा होगा। शायद इसीलिए बेटे हैरी ने खुद को महल से दूर एक सामान्य ज़िन्दगी जीने के लिए तैयार किया। यह सब आसान नहीं होना था। हैरी अपनी माँ की तरह ही शाही खानदान की शान के बोझ को जीते हुए सहज नहीं महसूस कर रहे हों। डायना भले ही ना बोली हों लेकिन मेगन मर्केल बोली हैं और उसकी अनुगूंज दूर तक सुनाई दे रही है। 

भारत हो या इंग्लैंड ,राजघराना हो या सांसद का घर, बहुओं की आवाज़ इन्हें कभी रास नहीं आती। सबका DNA सामंती रवैये को ही डिकोड करता है। 

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

दिशाहीन सरकारें ही 'दिशा' के मिलने पर होती हैं बदहवास

 


जब मैं अपने टीन्स में थी तो आरक्षण विरोधी आंदोलन में मेरी आस्था बढ़ती गई और फिर बाबरी मस्जिद ढहाने के  कृत्य में भी मेरी पूरी रुचि और समर्थन था। फिर निर्भया के समयकाल में अन्ना हज़ारे से भी हमदर्दी रही। तब कोई ब्लॉग या ट्विटर अकाउंट होता तो मेरे पोस्ट इनके ही हक़ में होते। देश पिछले कुछ महीनों से किसान आंदोलन का साक्षी है। कई लोग सीधे या अप्रत्यक्ष तौर पर अपनी हमदर्दी और नाराजगी ज़ाहिर कर रहे हैं। नए समय के नए माध्यम हैं अपनी बात कहने के । एक गूगल डॉक्यूमेंट बनता है ,कुछ समूह उसे सम्पादित करने का अधिकार भी समूह के सदस्य को देते हैं। आंदोलन को गति देने के लिए के लिए अपनी अभिव्यक्ति इसके जरिए हो सकती है। फ्री स्पीच का अधिकार हमारे संविधान ने दिया है बशर्ते कि वह किसी भी तरह की हिंसा को प्रोत्साहित नहीं करता हो।  आज यही  फ्री स्पीच देशद्रोह के अपराध में लपेट दी गई है और देशद्रोह के ऐसे आरोप अभूतपूर्व संख्या में बढे हैं। कहीं से भी उठाके जेल में डाल दो । ताज़ा आरोप दिशा रवि का है जिसे बैंगलोर से पुलिस ने उठा लिया। दिल्ली हाईकोर्ट में पेश किया लेकिन उसेअपने किसी वकील की  सुविधा भी नहीं दी गई। एक वकील का कहना है की शनिवार को गिरफ्तार करना रविवार को पेश  करना साज़िश है जिसके तहत मुवक्किल के अधिकार कम किये जाते हैं। 

एक 21 साल की लड़की दिशा रवि की यूं गिरफ्तारी सरकारों के डर और असुरक्षा को बताती है जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने 1995 के  एक आदेश  में खालिस्तान ज़िंदाबाद के नारों को भी देशद्रोह नहीं माना था क्योंकि वहां भी इरादा  हिंसा का नहीं था। यहाँ खालिस्तान समर्थक ग्रुप से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। दिशा रवि पर्यावरण की सक्रिय कार्यकर्ता हैं और वही ग्रेटा थनबर्ग भी  हैं। जाने क्यों  सरकार के मुखियाओं को ये आवाज़ें खूब खटकती हैं। युवतियों को जेल में डालने का सिलसिला बढ़ता ही जा  रहा है। रिया चक्रवर्ती सुशांत मामले में ,नोदीप कौर लेबर एक्टिविस्ट और अब दिशा रवि किसान आंदोलन के समर्थन में ट्वीट की वजह से। ज़्यादातर मामलों में पुलिस एक थ्योरी गढ़ के  चलती है संभव  है कि यह थ्योरी सुनवाई के दौरान  असफल भी साबित हो लेकिन झूठी गिरफ़्तारी के  बाद किसी पुलिसकर्मी या अधिकारी की कभी गिरफ्त्तारी हुई हो  ऐसा  भी देखने में नहीं आता। आरुषि केस में पूरे देश ने पुलिस के दुविधाग्रस्त चेहरों को देखा। यह भयावह है कि आप केवल अपने शक की बुनियाद पर किसी को भी अपराधी मान जेल में डाल दें और अब तो लड़कियों को भी। जो ट्वविटर स्टॉर्म क्रिएट किये जाने का हवाला दिया जा रहा है तो हैश टैग के साथ भाजपा का आईटी सेल भी  करता है। कोई कभी पकड़ा नहीं गया।   

दिशा की गिरफ्तारी ने दुनिया को भारत सरकार के आत्मविशास को नहीं बल्कि कमज़ोर चेहरे  को दिखाया है। ऐसा लगता है जैसे ग्रेटा को जिसने भी इनपुट दिया हो, सरकार की उससे दुश्मनी हो। ऐसे में  दिशा रवि  समर्थन में दुनिया जुटने लगे यह भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। यह सरकार के लिए सही दिशा नहीं होगी।केवल दिशाहीन सरकारें ही दिशा के मिलने पर बदहवास हो सकती हैं।

रविवार, 24 जनवरी 2021

कोरोना नोट्स 2020

डायरी में लिखे कोरोना नोट्स आज ब्लॉग की  सैर पर निकल आए हैं।


 रद्दी का ढेर उस अख़बारनवीस ने कबाड़ी के सामने  रख दिया। फिर बोला जो मर्ज़ी हो दे दे ...  मोल-तौल  रहने दे। हम दोनों की रोज़ी बची रहे बस।

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रुक्मणि ने अपना टीवी, ठीक कराने के लिए एक दुकान पर दिया था। लॉकडॉउन के बाद जब वह दुकान पर पहुंची तो उसे कहा गया कौनसा टीवी था, मुझे तो याद नहीं।रुक्मणि के पास न रसीद थी न टीवी की तस्वीर ।

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डॉक्टर जो मोटी फीस लेकर उनके कूल्हे की हड्डी जोड़ चुके थे,फेफड़ों में पानी भरते ही बोले हमारा अस्पताल तो ग्रीन ज़ोन में है, आप इनके लिए कोई दूसरा अस्पताल देख लीजिए।

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क्या नाम बताया आपने -बिल्किस बेगम। आप उस एरिया के अस्पताल में फोन कर लीजिए शायद वहां कोई बेड खाली हो, यहां तो सब फुल है।

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मैंने मास्क लगा रखा था। पेशेंट लॉबी में स्ट्रेचर पर था।डॉक्टर कंपलीट ppe किट में थे।मेरे सामने पड़ते ही लगभग चिल्ला उठे। दूर रहिए ...दूर रहिए ...कहते हुए पूरे-पूरे सवालों के आधे-आधे जवाब देने लगे।

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अस्पताल जाते हुए रास्ते में पुलिस वाले ने रोका। डंडा दिखाकर मुझे पीछे खदेड़ा। मैंने कहा इमरजेंसी है आप चाहें तो मेरे साथ चल सकते हैं। डंडा हटा दिया गया था ।

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उसके मोबाइल पर कोई लगातार कॉल कर रहा था । उसे खून देना था। चौराहे पर तैनात पुलिस ने उसे लफंगा मान दो डंडे उसकी टांगों पर जमा दिए ।वह लंगड़ाते हुए लौट गया। पुलिस को मनचलों को पहचानने में महारत हासिल होती है।

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घर में पैसे ख़त्म होने को आए थे। सुबह चार बजे खेत से सब्जी लाते हुए वह पुलिस की निगाह से  बचना चाहता था। पुलिस को बताया गया था, सब्जियों में वायरस है।  निगम की गाड़ी ने ठेला उलट उसके टुकड़े टुकड़े कर दिए थे । गरीब की सब्ज़ी पर शिकंजा था बड़े व्यापारी माल बेच रहे थे 
 

आंसू यूं भी सबके अपने  होते  हैं। 

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मोहल्ले की दुकान में शटर के नीचे से घुसकर उसने सामान की पर्ची थमाई। बताया गया था कि इस लॉक  डाउन काल में केवल वही दुकान  खुलेगी। फिर अचानक  दुकानदार चिल्लाया। भागो पुलिस की गाड़ी आ रही है।दुकान बंद हो गई । बचे -खुचे हम सब बिना अपराध के एक दूसरे को अपराधी की तरह देख रहे थे। 

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महीनों से घर बैठे -बैठे वे दोनों ही ऊबने लगे थे। सास बहू को डांट रही थी कि उस दिन बहुत गलत किया तुमने। अपनी धब्बे  वाली चादर पलट कर ससुरजी के बाजू में रख दी। 

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पुलिस हैरान थी वह तो प्याज़ के बोरे जब्त करने आई थी। बोरियों में छिपे थे 22 मजदूर जिनमें पांच बाल श्रमिक थे।भूखे प्यासे। पुलिस ने उन्हें खाना खिलाया। 

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नमिता अपने पोते के लिए इतनी चिंतित थी कि उसने अपनी धूप से खिली बालकनी को अँधेरे में बदल दिया। उसे यही समझ आया था की बाहर कोविड  फन फैलाए बैठा है। 


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पुलिस के डर से उसने रास्ते का मास्क उठाकर पहन लिया।

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अब हर उत्पाद बिकने के लिए तैयार है वायरस का नामो-निशान मिटा देने की गारंटी के साथ।




शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

रोमियो जूलियट और अंधेरा


रोमियो जूलियट और अंधेरा इस चेक उपन्यास  को पढ़ने की एक जो बड़ी वजह थी, प्रख्यात हिंदी कथाकार  निर्मल वर्मा का अनुवादक होना । निर्मल वर्मा का चेक भाषा से हिंदी में हुआ यह अनुवाद इस कदर सरल, सहज और प्रवाह में  है कि आप भूले रहते हैं कि यह हिंदी का नहीं है। बीच-बीच  में कहीं जब  वे चेक भाषा के शब्द जस के तस लिखते हुए अर्थ बताते हैं , केवल तब ही आभास होता है  लेकिन फिर यह रोचकता को और बढ़ा देता है। ऐसा इसलिए भी कि निर्मल जी प्राग में दस साल रहे और चेक भाषा सीखी। 

चेक लेखक यान ओत्चेनाशेक   के  कथानक को दूसरे विश्व्युद्ध के अँधेरे  का उजला लेखन कहा जा सकता है। 1924 में जन्में यान उस समय युवावस्था में दाख़िल हो रहे थे जब समूचा यूरोप महायुद्ध की विभीषिका से टकरा रहा था। नाज़ियों का कहर चैस्लोवाकिया पर भी उतर आया था और उस वक्त कथा का  नायक पॉल उम्र के  सबसे नर्म और ख़ूबसूरत हिस्से में दाख़िल हो रहा था ।  विज्ञान में गहरी  रूचि रखने वाला छात्र पॉल युवा चेकोस्लोवाक लड़का तो दूसरी ओर नर्तकी बनने  का  ख़्वाब संजोए  यहूदी लड़की एस्थर।  ये दो छोर ही तो थे जो एक हो जाने को आतुर थे ,अधीर थे। पॉल, एस्थर से  उस समय मिलता है जब नाज़ी सेना उसे किसी अज्ञात कैम्प में भेजने का हुकुम सुना चुकी होती है। एस्थर के डॉक्टर पिता और मां को किसी यातना ग्रह में भेज दिया  गया  है जहां वे जिंदा भी हैं या नहीं , एस्थर नहीं जानती । इस टूटी बिखरी एस्थर को पॉल यूं बेसहारा नहीं छोड़ पाता। प्राग शहर में वह अपने पिता की टेलरिंग शॉप के पीछे खाली पड़े छोटे से कमरे में उसे छिपा देता है। उसके साथ अपना खाना साझा करते हुए हुए , वह प्रसन्न है। एस्थर के रहने से सुवासित हुए उस अकेले कमरे की गंध में डूबते वह कभी उलझता तो कभी प्रेम में डूबता चला जाता। 

पॉल का शहर  प्राग किसी समय नाज़ियों को कोसने लगता तो कभी अपनी तबाही के लिए यहूदियों को ज़िम्मेदार मानने लगता।  जो नज़रें लड़की को मिली इस पनाह से इत्तेफाक नहीं रखती थी ,उससे निजात पाना चाहती थीं। उसका मानना था कि नाज़ी सेना जो  रोज़  फ़ौजी दमन के बाद शहर के चौराहे पर मरनेवालों के नाम की सूची टांग देती थी, एक दिन यहां  आ धमकेगी। नाज़ी  ढूंढ-ढूंढकर यहूदियों को मौत  के घाट उतार  रहे थे। अफवाहें और दमन शहर के लोगों को भी दो फाड़ में तब्दील करती जाती थीं । इस भय का भय बताकर पॉल के कुछ पड़ोसी मासूम एस्थर को वहां से दफ़ा या दफ़न कर देने पर आमादा थे। बेशक ऐसे लोग संख्या में बहुत नहीं  थे लेकिन वे एस्थर के खिलाफ नरेटिव बनाने में कामयाब हो रहे थे। एक लड़की जिसके माता पिता का कोई पता न था ,उसे लोग मार डालना चाहते थे। पॉल के प्रेम का कोई मोल उनकी आँखों  में नहीं था।ऐसी श्रेष्ठता उनके भीतर पसर गई थी जहाँ एस्थर का यहूदी होना उसके क़त्ल हो जाने के लिए काफी था। 

पॉल सा दिल इन लोगों के पास नहीं था, ये नाज़ियों के प्रोतेंतोक्रात (चेक भाषा में जिसका अर्थ थोड़ी देर के लिए )शब्द के बहकावे में वे लंबे समय के  लिए आ गए थे। पॉल अपने सिलेबस में नाज़ी सेना की जीवनियां नहीं रटना चाहता था। वह अपने हिसाब से अपनी दुनिया में रंग भरने की ख़्वाहिश  रखता था। अपने माता -पिता जिन्हें वह ब्याह के काफी समय बाद पैदा हुआ था,कोई कष्ट नहीं देना चाहता था क्योंकि वे पॉल  के लिए इतने निर्मल,उदार और पारदर्शी थे कि वह अनजाने में  भी ऐसा कुछ नहीं करना चाहता  जिससे उन्हें तकलीफ हो। पिता जानते थे कि पॉल एक होनहार विद्यार्थी है लेकिन उनकी अनुभवी आँखें यह भी देख पा रहीं थीं कि देश पर फ़िलहाल शैतान का साया पड़ चुका है शहर फ़ौजी बूटों और गोलियों की आवाज़ से कांप रहा था और कांप रही थी एस्थर की देह अपने क़रीब फ़ौजी गाड़ियों की आवाज़ सुनते  हुए। पॉल दौड़ रहा था। 

अर्नेस्ट! ज़रा देख तो. ..  एक जवान यहूदिन !!

जर्मन भाषा में ऐसा बोलकर वे उसे घेर कर खड़े हो गए। 



P S: राजकमल पेपरबैक्स  का यह पहला संस्करण 1984 में प्रकाशित हुआ था ,आवरण चित्र एफ एन सूजा का है।