मंगलवार, 28 जुलाई 2020

वो जो अयोध्या नहीं जा रहे होते

वो जो अयोध्या नहीं जा रहे होते
हम अपना वजूद खो चुके होते
हमारी लड़कियां उनके चूल्हे जला रही 
होतीं 
उनके ढेर-ढेर बच्चे होते
फिर वे बच्चे घेरकर मारे जा रहे होते
घर-घर में जानवर कटते 
गौमाता का क्या हाल होता पूछो मत
और प्राचीन संस्कृति का तो समूल नाश हो गया होता

वो जो अयोध्या नहीं जा रहे होते
गुरुकुल मदरसा-मदरसा चीख़ रहे होते
पड़ोस का पला हुआ दुशमन
छुट्टा शेर हो जाता
जिसे  नहीं पाल सके वो देश में घुस आता।
बीमारी बला बनके फूटती
पंक्चर पकाने वाले महलों में आ जाते
और दाढ़ी वाले हुकूमत कर रहे होते

वो जो अयोध्या नहीं जा रहे होते
हमारा तो रुतबा ही ख़त्म हो गया होता
हम अपने ही देश में देशद्रोही करार  दिए जाते 
 
 मेहनतक़श सड़कों पर होते
सर पे गठरी, बगल में बच्चे
फटी बिवाइयां ,थकी ज़िंदगियां
लगातार सरक रही होतीं 

वो जो अयोध्या जा रहे हैं
अच्छा कर रहे हैं
लुटे गौरव को कायम कर रहे हैं
अस्पताल-अस्पताल क्या चिल्लाते हो
महामारी आई है चली जाएगी
इंसान को नहीं अहंकार को ज़िंदा रहना चाहिए
हमारे देश में हमारा अहंकार
हम वादे की ठसक में हैं
तुम हटो अलग।

कबीर कह गए हैं
भला हुआ मोरी गगरी फूटी
मैं पनिया भरन से छूटी
मोरे सर से टली बला....
अच्छा है जो वो अयोध्या जा रहे हैं 








शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

सावन चोर नेता




एक पखवाड़े से लग रहा है जैसे राजस्थान को किसी ने जकड़ रखा है। यूं सावन का महीना है, बूंदें भी मेहरबान हैं  लेकिन लगता है हमारे हिस्से सूखा आ रहा है। हमारे  झूले की रस्सी कोई काट रहा है। बणी--ठणी निराश है । घूमर का आनंद कोई और ले रहा है और लहरिया के रंग भी कोई  फ़ीके करते जा रहा है। मोर के नाच में भी रोड़े अटका रहा है। कोरोना के बीच नेताओं ने कोढ़ में खाज का काम कर दिया है। ये सब किसकी ग़लती  से हो रहा है, कौन कर रहा है लेकिन प्रदेश असर में है।  उसे लग रहा है कि उसके मत  को किसी तोड़ा -मरोड़ा है । जो कह रहे हैं हम तो तमाशबीन है ,उनकी आँखों में शरारत  है। 

इनका घूमर जो होटलों , कचहरियों और क़ानून निर्माण की देहरियों के बीच जारी है उसमें लय-ताल की कमी है। इनके झूलों की पींगें डरावनी हैं। कभी-कभी जो लहरिया किन्ही ख़ास मौकों पर अपने शीष पर सजाते हैं ,वह किसी को मोह नहीं पा रहा है। इस धरा  के जीवट रंगों  को कोई कोई गहरी ऊब में तब्दील कर चुका  है। जनमानस का लाखों का सावन किन्ही की बोलियों से तबाह होने की कगार पर है। किसकी कितनी बोली लगी जनता जानना तो  चाहती है लेकिन पता नहीं चलेगा यह भी जानती है। महामारी के बीच प्रदेश लगातार बेहतर चलने की कोशिश में था लेकिन अब दो पाटन  बीच जैसे कोई भी साबुत नहीं बचने के हालात में आ पहुँचा है ।  जनता के  प्रतिनिधियों  को इस कठिन दौर में जनता  के बीच होना चाहिए  या फिर  विधानसभा में लेकिन ये  होटलों में छिपे बैठे हैं। ठीक है चुन लो जिस पाले को तुम्हें चुनना हो लेकिन नैतिक साहस भी रखो यह कहने का कि यहां जनता के साथ न्याय नहीं हो रहा था । वोटर की इतना शर्मिंदा मत करो कि अगली बार वह किसी को भी चुनने से इंकार कर दे और तुम सिर्फ बोली लगाकर ही वहां पहुँचने के लिए मजबूर हो जाओ। 

शनिवार, 4 जुलाई 2020

तुम पानी


तुम पानी 
अपने आकार  की 
कोई पहल नहीं 
अपनी गहराई की कोई थाह नहीं 
 सरहद का कोई इल्म नहीं 
 दौड़ की कोई राह नहीं 
 भेद में कोई निष्ठा नहीं

बस वर्षा में ही तेरी आस्था रही।  
image:varsha

बरस जाता है 
बह जाता है 
अलौकिक रफ़्तार में 
उलझी जड़ों तक के रेशों में 
जो घोल ले ठोस से ठोस अहंकार को 
फिर भी आतुर और पी लेने को। 

और मैं 
अचंभित तुम्हें यूं 
बहते-चलते देखते हुए
शायद तुम इस पानी को कभी 
मेरी आँखों में देख सकते हो 
और हाँ यह सब मैंने
 पानी पर ही लिखा है 
मिटा देने के लिए। 
यही तो पानी भी चाहता है। 

बुधवार, 1 जुलाई 2020

कोरोना काल में कलाकार तकलीफ़ में हैं चाहिए नरेगा जैसी योजना 

 "ऐसे भी मामले हैं जब कलाकार पैसों की कमी से ख़ुदकुशी कर लेते हैं। इस महामारी में  नरेगा जैसी योजना उनके लिए भी संबल हो सकती हैं "-टी एम कृष्णा  
कर्नाटक संगीत  शैली के बेहद प्रयोगधर्मी गायक कलाकार  टी एम कृष्णा  का यह कहना सही  इसलिए भी मालूम होता है क्योंकि इस संवेदनशील कौम  के पास केवल अपनी कला होती है जिसे वे जुनून की हद तक जीते हैं। तथ्य यह भी है कि इसे अभिव्यक्त करने के लिए हमेशा उन्हें एक प्लेटफॉर्म की ज़रूरत होती है। सामान्य भाषा में हम जिसे काम मिलना कहते हैं। अमिताभ बच्चन काम मिलते रहने के अच्छे हालात पर अक्सर शुक्रिया जताते  नज़र आते हैं तो  कभी कभार इसी काम को पाने के लिए नीना गुप्ता जैसी अच्छी कलाकार को भी इल्तजा करनी पड़ती है। काम का मिलना हर हाल में ज़रूरी है और अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि यह अवसर कोई दूसरा ही मुहैया  करता है। इस व्यवस्था की चाबी अक्सर पूंजीपति के हाथ ही होती है।आत्मनिर्भर होकर भी आत्मनिर्भर नहीं होते हैं आप  । यही हिसाब मूर्तिकार , शिल्पकार, चित्रकार और   भारत की  तमाम पारम्परिक कलाकारों पर भी लागू होता है। भारत तो  कलाओं का ही देश है । चप्पे-चप्पे पर कला का असर है लेकिन आर्थिक अवसर नहीं। बिहार में मधुबनी ,पंजाब से फुलकारी, मध्यप्रदेश से कोसा चंदेरी की साड़िया राजस्थान से मूर्ती कला ,फर्नीचर,बांधनी ,आसाम से कलात्मक बांस,दक्षिण से शंख से बनी कलाकृतियां उड़ीसा से  धातु की आकर्षक मूर्तियां यह अंतहीन सिलसिला कभी ख़त्म नहीं होता और नहीं ख़त्म होती है कलाकारों की तकलीफ़। कोरोना  महामारी ने  तो सब कुछ और ठप कर दिया  है। कलाकारों के लिए यह संकट का समय है। 
इन्हीं के लिए टी एम कृष्णा कहते  हैं कि कलाकारों के पास भी शर्तिया काम देने वाली कोई योजना होनी चाहिए। बड़े कलाकारों को दिक्कत नहीं है लेकिन काम का न होना साधनहीन कलाकारों को तोड़ रहा है। यह ख़ामख़याली है कि सोशल मीडिया इस परेशानी को दूर करने में सफल है। सब मुफ़्त में ही सुनना पसंद करते हैं। नामचीन कलाकार ज़रूर बेहतर स्थिति में होते हैं जो डिजिटल शोज़ के ज़रिये धन जुटा पा रहे हैं। 

कृष्णा ने इन्हीं ऑनलाइन शोज़ के जरिये पैसा जमा कर कलाकारों को धन उपलब्ध कराया है। उन्होंने इक्यावन लाख ग्यारह हज़ार रूपए मई महीने तक जमा किए और और लगभग डेढ़ हज़ार कलाकार परिवारों को मदद पहुंचाई  लेकिन यह उन्हें नाकाफ़ी लगती है। वे कहते हैं सरकार को मनरेगा जैसी योजना जल्दी लागू करना चाहिए जो इन कलाकारों को सम्मान और कला को नया जीवन दे सके। नरेगा एक बेस मॉडल हो सकता है। कला समाज को उम्मीद ,कल्पना को उड़ान के साथ सवाल करने का साहस देती है और यह तब होता है जब कला से दर्शक जुड़ता है। बिना कला के समाज में  विघटन का  ख़तरा तो है ही संवेदनहीन होने की आशंका भी है। 

ps :सच पूछिए तो इस कठिन समय में पत्रकारों की भी नौकरियां जा रही हैं। बिना किसी पूर्व सूचना के बड़े-बड़े संस्थान एक चिट्ठी देकर उन्हें निकाल रहे हैं। रोज़गार की गारंटी तो उन्हें भी मिलनी ही चाहिए, चाहे काम छोटी तनख़्वाह वाला  ही हो।