शुक्रवार, 29 मई 2020

तीन शहर तीन मरीज़ और कोरोना

कोविड-19 वायरस से जूझते हुए भारत को लगभग चार महीने बीत चुके हैं। हममें से कई जो अब तक न्यूज़ सुनकर ही परेशान और दुखी हो रहे थे अब उन्हें भी अपने परिचितों यां परिजनों के लिए कोरोना से टकराना पड़ रहा है। वे सब हालात से परेशान और दुखी हैं। आज आपसे  साझा हैं तीन शहरों के  तीन परिजनों से जुड़े अपने अनुभव।
शहर अहमदाबाद
मरीज़ अपनी बहूरानी को ऑफिस ड्रॉप करते  और लौट आते यानी उनकी जीवनचर्या केवल घर तक सीमित नहीं थी। बिलकुल स्वस्थ। उम्र अट्ठावन-साठ के आसपास। एक दिन खांसी और बुख़ार के लक्षण सामने आए ,फिर सांस लेने में तकलीफ़ हुई। सब मान के चल रहे थे कि यह  कोरोना का ही संक्रमण है लेकिन रिपोर्ट नेगेटिव। फिर एक दिन सब ख़त्म। अस्पताल से देह भी ऐसी सील मिली जैसे खोली गई तो कोरोना देकर ही रुख़सत होगी। 
शहर जयपुर
 मरीज़ को हार्ट, शुगर की तकलीफ़ पहले ही थी। तबियत बिगड़ने पर अजमेर के अस्पताल ने जयपुर रैफ़र कर दिया। जयपुर के निजी अस्पताल ने मरीज़ को बाहर से ही सरकारी अस्पताल SMS  सवाई मानसिंह चिकित्सालय रैफ़र कर दिया जहाँ पहुँचते ही उनकी मृत्यु हो गई। कहा गया बॉडी तो कोरोना टेस्ट के बाद ही मिलेगी। नमूना लिया गया और रात भर के लिए शव मुर्दाघर में रखवा दिया गया। सुबह सूचना दी गई कि जो नमूना लिया था वह ग़ुम हो चुका है। स्वैब दोबारा लिया जाएगा। लम्बे इंतज़ार के बाद नमूना लिया गया और पता नहीं क्यों शव का पोस्टमार्टम भी किया गया। पूरे दिन जूझने के बाद अस्पताल ने शाम को  शव सौंपा। दुखी परिजन ऐसे उलझते गए  कि आंसू भी दग़ा दे गए । 
शहर इंदौर 
तीसरा शहर  इंदौर भी रेड जोन का शहर  है। मरीज़ की  हिप जॉइंट रिप्लेस्मेंट सर्जरी हुई थी। डिस्चार्ज मिल चुका था। उस दिन टांके कटने थे तो उसी  निजी अस्पताल की एम्बुलेंस घर से मरीज़ को लेने आई थी। एम्बुलेंस में दो डॉक्टर थे। हेल्पर भी।  ऑक्सीजन सप्लायर के साथ सभी लाइफ सेविंग इंस्ट्रूमेंट्स से सुसज्जित।   एम्बुलेंस मरीज़ को हॉस्पिटल ले आई। बिल का भुगतान हो चुका था।  मरीज़ के टांके कटते ही स्टाफ ने शोर  मचाना शुरू कर दिया कि आपको येलो ज़ोन के अस्पताल में शिफ़्ट होना पड़ेगा। इन्हें सांस की तकलीफ़ है। क्यों, हम क्यों जाएं येलो जोन में वहां कोरोना संक्रमित मरीज़ होंगे । इनका इलाज ग्रीन जोन के अस्पताल में ही होना चाहिए। कोरोना के कोई लक्षण हमारे मरीज़ में नहीं हैं। नहीं, आपको जाना ही होगा। आप पेशेंट को यहाँ से ले जाइये। हद हो गई आप ही ने बुलाया और आप ही रवाना  कर रे हैं । परिजनों को नहीं समझ आ रहा था कहाँ ले जाएं। अस्पतालों की लिस्ट थमा दी गई। एम्बुलेंस मांगी गई तो स्टाफ ने कहा कि केवल आने के लिए मिलती  है। बाहर प्राइवेट एम्बुलेंस खड़ी है आप जल्दी मरीज़ को यहाँ से ले जाइये। प्राइवेट एम्बुलेंस जिसके पास ढंग का स्ट्रेचर भी नहीं था दो हज़ार रुपए में छह किलोमीटर दूर स्थित एक अस्पताल में ले जाने के लिए तैयार हुई । एम्बुलेंस का एयर कंडीशनर पूरी तरह  ध्वस्त । कोई डॉक्टर हेल्पर भी नहीं।

ड्राइवर एक लड़का है और बताता है कि ये एम्बुलेंस एक डॉक्टर की है । इस  प्राइवेट एम्बुलेंस पर नंबर प्लेट भी हरियाणा की थी  । ख़ैर अस्पताल पहुंचे। वहां एक भले डॉक्टर ने कहा कि यहाँ हालात अच्छे नहीं है।  इन्हे यहाँ मत लाइये। दूसरे अस्पताल ले जाइये।  एम्बुलेंस के ड्राइवर ने कहा मैं नहीं जाऊंगा। आप मरीज़ उतार लीजिये। हाथ जोड़े तो कहा चार हज़ार लूंगा वहां छोड़ने के। मजबूर तीमारदार के पास क्या रास्ता बचा था । तीन दिन उस अस्पताल के ICU  में सांस लेने के बाद साँसे थम गईं। दो बार कोरोना टेस्ट हुआ। दोनों नेगेटिव लेकिन मरीज़ को बॉडी में तब्दील कर दिया गया था। जाने कैसी गाइडलाइन थी ये जिसमें न कोई गाइडेंस था न लाइन थी । कोरोना का यह रोना अनंत है जिसे हमारी व्यवस्था ने और करुण कर दिया है। अस्पतालों को वाकई कोरोना हो रखा है। 

3 टिप्‍पणियां:

Teena Sharma 'Madhvi' ने कहा…

Mam wakaii apne sach hi likha he.. Na guidance he na hi line... Kon kisse aur kya kahe .. Ye bebsi ka aalam he ya bebas jindgiya..

varsha ने कहा…

Bebas zindagiyan jo chali gaeen aur jo zinda hain ve bhi...moonh par mask zaroor lagana hai Lekin chup nahin rahna hai😷😷

Kavita Agrawal ने कहा…

वाकई इन गाइडलाइंस के चक्कर मे असंवेदनशील होते का रहे हैं।