शनिवार, 7 मार्च 2020

थप्पड़ में प्यार, हक़ ढूँढ़नेवालो



प्यार से समझाती है थप्पड़ उन लोगों को जिन्हें इसमें  खामखां का प्यार और हक़ नज़र आता है। थप्पड़ रिलीज़ हुए एक सप्ताह बीत चुका है और फ़िल्म  अपने चाहनवालों और क्रिटिक्स से  थपकियाँ और सिसकियाँ  भी पा चुकी है।  मुझे जो क़िरदार क़रीब लगा वह दीया मिर्ज़ा का है। वह ऐसी स्त्री है जो अपने प्रेम को खो चुकी है लेकिन  ख़ुश है अपनी बिटिया और अपने काम के साथ।  क्योंकि उसने जो पाया है वह इतना भरपूर है कि कोई तमन्ना अब  बाक़ी नहीं रही। वह कहती भी है उसके साथ सबकुछ एफर्टलेस था। लेकिन आम भारतीय स्त्रियां जानती हैं कि उनकी पूरी गृहस्थी  उन्हीं के एफर्ट्स पर टिकी हुई है जिसमें थप्पड़ ,जबरदस्ती, उनका कॅरिअर छोड़ना सब सामान्य  है।

अमृता एक ख़ुशहाल ज़िन्दगी जी रही है। होममेकर है। परिवार के लिए पूरी तरह समर्पित। एक पार्टी में उसके पति विक्रम का झगड़ा अपने सीनियर्स से होता है और अमृता इस झगड़े को रोकना चाहती है। इसी तना-तनी में वह अमृता को थप्पड़ मार देता है। उस समय लगता है जैसे वही उसके लिए सबसे सॉफ्ट टारगेट थी अपना ग़ुस्सा जताने के लिए। अमृता सकते में थी जो बाद में सदमे में बदल जाता है । पति को सॉरी बोलना भी ज़रूरी नहीं लगता । उसका ख़याल था कि जो नाइंसाफ़ी उसके कंपनी ने उसके साथ की है , उसमें यह सब हो गया। सासू माँ का भी मानना था जाने दे , औरतों को बर्दाश्त करना पड़ता है। लगभग ऐसी ही राय अमृता की माँ की थी। कहीं कुछ दरक गया था तो वह अमृता के पिता के भीतर से। वे बेटी के टूटे मन को समझ गए थे। उन्हीं से एक दृश्य में रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध कविता सुनना भी अच्छा लगता है। 

निर्देशक अनुभव सुशीला सिन्हा (यही नाम आता है उनका बतौर डायरेक्टर, सुशीला उनकी माँ का नाम है ) मुल्क़ा और  आर्टिकल 15 के बाद यह लगातार तीसरी अच्छी फिल्म है। अच्छी बात यह भी है कि अमृता अपना पूरा केस सिर्फ इस थप्पड़ के ख़िलाफ़ लड़ना चाहती है। न घरेलू हिंसा ना ही कोई और अपराध। यही बात इस थप्पड़ को और धार देती है क्योंकि केवल एक थप्पड़ तो हमारे समाज में कोई अलग होने का कारण  नहीं। वजूद को ठेस पहुंचानेवाली बात इसे कोई नहीं मानता।  ख़ुद वक़ील पूछती है कि बस एक थप्पड़ की वजह से तुम रिश्ता छोड़ना चाहती हो। सच तो यही है कि हमारे समाज में थप्पड़ हक़ की तरह ही हक़ जमा चुका है उलट कुछ को तो यह भी लगता है कि थप्पड़ नहीं मारा तो अपना नहीं समझा, प्यार नहीं किया। बापू के अहिंसक सिद्धांतों के बीच समाज में यह हिंसा सदैव बनी रही। यहाँ थप्पड़ मरनेवाला विक्रम कोई अपराधी नहीं है। बड़े बुज़ुर्गों के पैर छूता है रिश्ते में अलगाव होने जाने के बावजूद अपने ससुर के भी। 

केस के सिलसिले में गवाही देने के लिए  विक्रम अपनी पड़ोसन दीया के पास भी जाता है लेकिन वह सख़्त लफ़्ज़ों  में इंकार कर देती है। इस थप्पड़ को पार्टी में दिया की किशोर बेटी ने भी देखा था। वह अपने दिवंगत पिता के लिए माँ से पूछती है कि क्या पापा ने कभी आपको मारा था। जवाब होता है कभी नहीं। दरअसल एक स्त्री ऐसे ही एफर्टलेस रिश्ते की प्रतीक्षा में होती है जिसका मिलना आसान नहीं है। ब्याह में अब भी सर्वाधिक योगदान स्त्रियों को ही देना पड़ता है। बहरहाल तापसी पन्नू बतौर अमृता बहुत प्रभावी हैं। एक थप्पड़ उसके प्यार को ख़त्म कर चुका  है यह  वह बताती है , ढोती नहीं। अमृता का प्रतिकार वकील को भी हिम्मत देता है वह खुद भी अपने बिना प्रेमवाले रिश्ते को अलविदा कह देती है। कई रंग हैं थप्पड़ में ज़रूर देखी जानी चाहिए। हमारी आपकी कहानी है लेकिन स्त्री के आर्थिक अधिकार अब भी अधूरे हैं। अपनी मर्ज़ी की फ़िल्म वह कम ही देख पाती है। मैंने अपने किशोर बेटे  के साथ देखी। उसे अमृता सही लगी  लेकिन अपने डांसर बनने के सपने को छोड़ एक अच्छी बहू बनने को चुनने का फ़ैसला कम समझ आया। 
एक संवाद
"तुम एक कंपनी में इतने इमोशनली इन्वेस्टेड थे। यू कुड नॉट मूव ऑन। मैंने तो पूरी लाइफ इन्वेस्ट करी है तुम्हारे साथ। कैसे मूव् ऑन करूं।आय डोंट लव यू। "

गुरुवार, 5 मार्च 2020

इस लोकतन्त्र को संसद की ज़रुरत नहीं है

इस लोकतन्त्र को संसद की ज़रुरत नहीं है जो होती तो दिल्ली की क्रूर हिंसा के बाद इसके दरवाज़े यूं बंद न होते। कोई कैसे इस ख़ूनी खेल के बाद यूं चुप्पी ओढ़ सकता है ?  होली के बाद बात करने का दुस्साहस कर सकता है ? क्या जनप्रतिनिधियों को एक बार भी यह ख़याल नहीं आया होगा कि हम इस कठिन समय में तकलीफ़ से गुज़र रही दिल्ली के जख्मों पर मरहम रख सकें। एक ऐसा भाव दुखी अवाम के सामने आए जो बता सके कि हमें उनकी चिंता है, परवाह है। यह लापरवाही आख़िर क्यों की जा रही है? यह उदासीन रवैया क्यों कि  आपके आंसू होली के बाद पोछेंगे। उनकी आँखों के सामने उनके अपनों को गोली लगी है ,ज़िंदा जलाया गया है। संसद इतने ज़रूरी समय में गैरहाज़िर कैसे हो सकती है ? संसद की देहरी पर माथा लगाने वाले ऐसा कैसे कर सकते हैं। यह ईंट-गारे से बनी इमारत भर नहीं बल्कि हमारे पूर्वजों की उस आस्था की बुलंद इमारत है जो हर हाल में तंत्र को लोकसहमति से चलाना चाहते थे। आज जो दल चुनकर आया है क्या उसे अपने ही सांसदों पर भरोसा नहीं या वह विपक्ष की आवाज़ दबाना चाहता है जो यूं भी अब बहुत कम संख्या में और दबी हुई है। 

अब तक 47 निर्दोष दिल्ली की हिंसा में मारे जा चुके हैं। चार सौ से ज़्यादा घायल हैं। 79 घर पूरी तरह जल गए हैं 327 दुकाने ख़ाक हुईं हैंऔर ख़ाक हुआ है जनता का विश्वास जिसे संसद लौटा सकती थी लेकिन जलते घावों पर रूई का फोहा रखने में हमारे नेता नाक़ाम रहे। क्या वाक़ई इस लोकतन्त्र को संसद की ज़रुरत नहीं है। यह बिना जनप्रतिनिधियों की बात सुने आगे बढ़ सकता है। संकट के समय देश को किसी सामूहिक आवाज़ की अपेक्षा  नहीं है। पहले शांति हो फिर बातचीत करेंगे यही रवैया संवैधानिक संस्थाओं का रहा तो जनता का यकीन इस व्यवस्था में कैसे बना रहेगा। लोकतंत्र में आस्था का सीधा ताल्लुक अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से  है। कठिन समय में उनकी आवाज़ एक तरफ़ कर पुलिस के हवाले कर दी जाए तो यह तो अंग्रेज़ों वाला शासन ही होगा। फिर तो राजा भी क्या बुरे थे। हम किस दौर में लौट रहे हैं ? हमारे चुने लोगों की आवाज़ कहाँ ग़ुम है? क्यों नहीं मुखर होनी चाहिए लोकसभा राज्यसभा और हर  विधानसभा की आवाज़ ? ये चुने जाने के बाद होली मानाने के लिए हैं क्या ? इस आग में यूं ठंडे पड़े रहना मुर्दा हो जाना ही होगा। इस संकटकाल में तो आपातकालीन सत्र बुलाए जाने की आवश्यकता थी लेकिन  चिल मारो यार होली के बाद मिलेंगे। नए मौसमों का पता खोजो रे नेताओं इस आग में कोई थ्रिल नहीं है। बक़ौल पाश


मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती 

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती 
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती 
बैठे-बिठाए पकड़े  जाना  बुरा तो है 
सहमी-सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है 
सबसे ख़तरनाक नहीं होता 
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है 
जुगनुओं की लौ में पढ़ना 
मुट्ठियां भींच कर वक़्त निकल लेना बुरा तो है 
सबसे ख़तरनाक नहीं होता 

सबसे ख़तरनाक  होता है 
मुर्दा शांति से भर जाना 
तड़प का न होना 
सब कुछ सहन कर जाना 
घर से निकलना काम पर और 
काम से लौटकर घर आना 
सबसे ख़तरनाक  होता है 
हमारे सपनों का मर जाना 

हाँ सबसे ख़तरनाक  होता है मुर्दा शांति से भर जाना और हमारे चुने हुए नेता उसी से भर गए हैं। 


    

मंगलवार, 3 मार्च 2020

मेरा घाव तेरे घाव से गहरा है



painting : yvette swan

धरती बाँट दी 

बाँट दिए इंसान 
और फिर 
इंसानियत पर लगे 
घाव भी बाँट लिए 
वाह 
घाव बाँट लिए 
ग़म बाँट लिए 
शायद बचा था आँख का पानी 
काश 
बचा  होता 
ख़ून के दाग़ धोए जाते 
ज़ख्म भरे जाते 
गले मिल आते 
अफ़सोस 
इस बार तो  घाव 
इम्तेहान में बैठे थे 
अव्वल आना था उन्हें 
जिसके ज़्यादा गहरे थे 
सीना उतना ही तना हुआ था 
बखान में ज़ुबां भी 
सरपट दौड़ी जाती थी 
कैंप 
लग गया था 
इसे बनाने का बड़ा तजुर्बा है भाई 
अपनों को बेघर
हम पुश्तों से करते आ रहे थे 
मातम 
अभ्यस्त था 
ग़रीबी से पस्त था 
रसद और छत 
दोनों के इंतज़ार में था  
मिट्टी और आग 
में झोंक देने का चलन नया नहीं है 
नया है उसे भुनाने  का चलन 
उस पर इतराने का चलन 
कभी मिट्टी देना 
अग्नि देना 
सद्भावियों की पहचान थी 
सत्ता 
सियासत 
इन मौतों का 
मातम नहीं मनाती 
ये तमगे हैं जो गद्दारों को 
गोली मरने के बाद उसे 
हासिल हुए हैं।