रविवार, 23 फ़रवरी 2020

नहीं परोसा खाने की थाली में भरोसा

वाक़ई सियासी दखल ने खाने की  थाली में विश्वास नहीं परोसने दिया है। कहा गया है कि प्राचीन हड़प्पन थाली से मांसाहर हटा दिया जाए 
फ़र्ज़ कीजिये कि आप किसी प्राचीन देश में किसी प्राचीन शहर को समझने की जुगत में हों  यानी  वहां की संस्कृति, खाना, पहनावा और हो ये कि आपके साथ कुछ फ़र्ज़ीवाड़ा हो जाए। घबराइए नहीं बस इतना कि जो भोजन इतिहास आपसे साझा किया गया है, उसमें कुछ घपला कर दिया जाए। तब आपको कैसा  लगेगा ? क्या आप ठगा सा महसूस करेंगे ?

मेरी अपेक्षा तो  होगी कि जो खाना उस काल खंड में, उस सभ्यता में प्रचलित था वही परोसा जाए । यह और बात है की जिस अनाज या शोरबे  को मैं ना खा पाऊं वह मैं ना चुनूं। बहरहाल यह सब हो रहा है उस हड़प्पन संस्कृति के साथ जिसे पुरातत्व के विद्वान पांच हज़ार साल प्राचीन बताते हैं। वह एक विकसित सभ्यता थी और तमाम अनाजों दालों के साथ मांसाहार भी उस सभ्यता के खान-पान में शामिल था। दिल्ली  नेशनल म्यूजियम भी इस सभ्यता के हवाले से उस दौर के खाने को हमारी प्लेट तक पहुंचाना चाहता था। आइडिया   ही कितना दिलचस्प है कि जो थाली हड़प्पन दौर में परोसी जाती थी,उसका स्वाद आज के दौर में भी लिया जा सकता है। हल्दी के स्ट्यू में मछली ,साल के पत्ते में पका चिकन, सूखी मछली के साथ बाटी , मीट सूप ,काबुली चना के साथ लैम्ब  लीवर, महुआ के तेल में बानी चटनीऔर खीरे का अचार । और भी बहुत  कुछ आपकी प्लेट में होता जो कुछ सांसदों  की निगाह इस फ़ेहरिस्त पर न पड़ती। उनके आख़िरी मिनट के फरमान ने इस सूची पर पानी फेर दिया है जो हड़प्पन काल के ज़ायके से रूबरू करने वाली थी। 
यह नेशनल म्यूजियम का इवेंट है जिसमें वन स्टेशन मिलियन स्टोरीज के तहत इस बार सिंधु घाटी की सभ्यता का स्वाद और सुगंध फ़ैलनी थी। इस स्वाद को गहरे रिसर्च और पुरा अध्ययन के  बाद तैयार किया गया था। ख़ासकर जो चीज़ें और पाकशास्त्र के उन दिनों में प्रचलित तरीक़े थे उसके आधार पर। जानवरों की मिली हड्डियोंके हिसाब से  देखा गया कि बीफ़, मटन, कछुए, घड़ियाल के साथ नदी और समुद्री मछलियां भी खाई जाती थीं। केवल शाकाहार का परोसा जाना उस दौर की सही छवि प्रस्तुत  नहीं करेगा। फर्मेन्टेड वाइन भी सिंधु सभ्यता का हिस्सा थी तो इससे नफ़रत करनेवाले इस तथ्य को ही नकार देंगे। अनाज और दालों में गेहूं ,चावल ,रागी ,मटर अरहर और मूंग दाल का होना सिंधु सभ्यता के विकसित होने की पुष्टि करता है। और हाँ ज्वार की उन्नत किस्म भी उस सभ्यता में पनपा ली गई थी। अलसी और तिल भी हमारे पूर्वज खाते थे। जाने क्यों तथ्य हमारी राजनीति को नामंज़ूर है। और कुछ नहीं तो खाने की विरासत  के साथ ही छेड़छाड़। 

आलू , टमाटर, चीज़ सब बाद में दूसरे मुल्कों से आए। ये उस खाने में आपको नहीं मिलेंगे। ज़ाहिर है ये हड़प्पन खाने की प्लेट में नहीं होंगे अब कोई नेता आलू टमाटर की सब्ज़ी खाने की ज़िद ही कर ले तब तो इतिहास और  संस्कृति का मक़सद ही ख़त्म हो जाए। नेशनल म्यूजियम दिल्ली की हिस्टोरिकल गैस्ट्रोनॉमिका से मीट को अलग करके इसी मक़सद का अंत किया गया है।  सियासत की लंबी नाक है जो कहीं भी घुस जाती है।
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बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

क्या हैं शाहीन बाग़ की औरतें मदर इंडिया ?

शाहीन बाग़ न संयोग है न प्रयोग। ये प्रतिक्रियाएं हैं जो CAA और NRC के ख़िलाफ़ निकलकर घर से बाहर आ गई हैं। ये उनकी अपनी मिट्टी से मोहब्बत है जो उन्हें घर की देहरी लांघने  पर  मजबूर कर रही है। उन्हें डर है कि कोई उन्हें अपने वतन से दूर न कर दे इसलिए वे दम साध कर पैर जमा कर बैठीं हैं। कौन हैं ये ,क्या उम्र है इनकी,क्या लिबास हैं यह सवाल इस जज़्बे के आगे बहुत ही गैरमामूली हो जाते हैं।  आप इनसे परेशान होते हैं लेकिन इनकी आशंकाओं के निवारण के लिए क़रीब नहीं जाते। दअसल ये मदर इंडियाएं हैं जो अपने बच्चों को लेकर शाहीन बाग़ आ रही हैं। माएं बच्चों को टहलाने और बहलाने के लिए बाग़ में लाती हैं लेकिन यहाँ मंज़र कुछ और है। एक चार महीने के बच्चे की ठंड से मौत हो गई लेकिन माँ पीछे नहीं हटी फिर लौट आई। वाकई ये मदर इंडिया है।
मेरे पिता ने बचपन में हम भाई-बहनों को महबूब ख़ान की  फ़िल्म मदर इंडिया किसी धर्म ग्रंथ की तरह  दिखाई। वो मदर इंडिया जो एक लाचार इंसान की पत्नी ,एक धन्ना सेठ सूखी लाला की नज़रों की शिकार और खेती में लगातार नुक़सान सहने के बावजूद  अपना साहस नहीं खोती, स्वाभिमान नहीं तजती। वह अपने बच्चों के सर कोई तकलीफ़ नहीं आने देती। भयावह बाढ़ और सूखे में  बच्चों की ढाल बनती माँ। ख़ुद की जान और भूख की क़ीमत पर बच्चों को अपनी जीवटता से ज़िंदा रखती  हुई  मदर इंडिया लेकिन उनके बड़े होने पर जब गांव की इज़्ज़त पर बात आती है तो अपने सबसे प्रिय बेटे को गाँव पर क़ुर्बान कर देती है यह मदर इंडिया। इस माँ को पूरा गांव अपनी माँ मानता है। कुर्बानी का यह जज़्बा संयोग से नहीं आता और न ही प्रयोग से।  यह आता है अपने ही देश में अपना वजूद खो देने के डर से। वे साबित करना चाहती हैं कि  कोई लाख भेद करना चाहे , हम अलग नहीं हैं। वक़्त आने पर हम इम्तेहान दे सकते हैं। शाहीन बाग़ ऐसी ही आबो हवा का शाहिद है इन दिनों। यही हौसले आज़ादी के परवानों के भी रहे होंगे। जलिया वाला बाग़ के भी रहे होंगे और आज शाहीन बाग़ के भी हैं। शुक्र है कि कोई जनरल डायर आज नहीं है लेकिन फायरिंग की घटनाएं हैरान करने वाली हैं डराने वाली भी । इस सर्दी में जो कोई अपने चुने हुए हुक्मरां से बातचीत के इंतज़ार में है तो यह कोई बहुत दुर्लभ मांग तो नहीं है जो पूरी न की जा सके। 

बात फ़िल्म मदर इंडिया की जिसे मेरे पिता ने हमें दिखाया औरअब हमारे बच्चों को भी । मदर इंडिया ग्रामीण भारतीय स्त्री के त्याग और समर्पण का ऐसा दस्तावेज़ है जो सेलुलॉइड के जरिये अमर हो गया है। फ़िल्म में नर्गिस हैं जो हूबहू भारत माता ही मालूम होती हैं जब गाँव में नहर का उद्घाटन के लिए उन्हें बुलाया जाता है। उन्हें उस नहर में अपने ही बेटे का ख़ून दिखाई देता है। भारतीय स्त्री की इस जीवटता को सौ-सौ सलाम। उसकी क्षमताएं अपार हैं। शाहीन बाग़ में बैठीं औरते भी इस कसौटी पर खरी मालूम होती हैं।
सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा के शायर अल्लामा इक़बाल का एक शेर इन जीवट स्त्रियों के लिए 
तू शाहीन है परवाज़ काम तेरा 
तेरे सामने आसमां और भी हैं