बुधवार, 9 सितंबर 2020

रिया चक्रवर्ती केस:अशर्फी की लूट, कोयले पर छापा




अशर्फी की लूट,को
पर छापा यानी ज़रूरी तफ़्तीश पीछे छूट गई और आप मुँह छिपाने के नए-नए रास्ते ढूँढने लगे। रिया चक्रवर्ती के साथ यही हो रहा है। एक 28 साल की लड़की की गिरफ़्तारी इसलिए नहीं हुई है कि उसने 59 ग्राम ड्रग्स को अपने साथी सुशांत के लिए ख़रीदा बल्कि इसलिए कि वह एक लड़की है। वो लड़की जो अपने साथी के साथ बिना शादी के रह रही थी ,उस सड़ी -गली मानसिकता को हवा दे रही थी जिसके मुताबिक ये मुंबई की लड़कियां ऊंचे ख्वाब देखती हैं और सीधे-सादे अमीर लड़के को पटा लेती हैं ,फिर परिवार से दूर कर देती हैं और अपने खुद के परिवार का घर भरती हैं। इसी मानसिकता के साथ तो देखता है एक मध्यम और निम्नवर्गीय परिवार अपनी बहू को भी और फिर ये तो बहू भी नहीं थी। पंद्रह  करोड़ और हत्या की थ्योरी जब नहीं चली तो NCB 
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो को 59 ग्राम नशे का सहारा मिला जो रेव पार्टी में अमीरों के बच्चों के पास यूं ही मिल जाता है  और अगले दिन ही वे ज़मानत पर छूटकर घर आ जाते हैं। रिया को भी जमानत मिल सकती थी नहीं मिली । 


हाँ मुझे रिया की गिरफ्तारी से तकलीफ है,एतराज़ है  क्योंकि जांच की दिशा बदल दी गई । सुशांत सिंह राजपूत की हत्या और पैसों की लूट के साथ शुरू हुआ मामला ड्रग्स पर जाकर टिका दिया गया। आर्मी से रिटायर्ड डॉक्टर रिया के पिता लेफ्टिनेंट कर्नल इंद्रजीत चक्रवर्ती  ने तो पहले ही कह दिया था कि बेटे के बाद उनकी बेटी को पकड़ा जाएगा और इस तरह एक मध्यम वर्गीय परिवार को तबाह किया जाएगा। यही हुआ भी एक वाट्सएप चैट के आधार पर यह गिरफ्तारी हुई ,कानूनन ऐसा नहीं होता है। उस ड्रग्स लिए जो कि सुशांत के लिए खरीदी गई थी जो अब इस दुनिया में नहीं है। लुटेरी लड़की,लुटेरी दुल्हन, हनी ट्रैप जैसी शब्दावली गढ़ने वला मीडिया ऐसे केस में खूब चाट-मसाला लगाता है। समाज भी आनंद लेता है आखिर  यह वही तो समाज है जो बेटी को पैदा नहीं होने देना चाहता, पैदा हो गई तो  मनपसंद पढ़ाई नहीं करने देना चाहता ,पढ़ ली तो अपनी पसंद की शादी नहीं करने देना चाहता, जो कर ली तो ऑनर के नाम पर उसकी हत्या कर देता है। यह पाखंडी समाज खुद दहेज़ देकर निपटाना चाहता है लेकिन प्रॉपर्टी में हक़ नहीं देना चाहता और बहू बनते ही उससे फिर बेटा पैदा करने की उम्मीद पाल लेता है।  जो नहीं पैदा कर पाई तो ज़बरदस्ती इलाज के दलदल में भी धकेल देता है। 
  रिया ऐसी नहीं थी। उसकी ख्वाहिशें रही होंगी और फिर उसने सुशांत जैसे लड़के से प्रेम कर लिया था। शायद यहीउयही गलती थी। अवसाद और नशा जिसकी आदत थे, रिश्ते में एक मोड़ भी आया होगा जिसकी आहट हम महेश भट्ट के साथ रिया चक्रवर्ती की चैट में महसूस कर सकते हैं। वह सुशांत का घर छोड़ रही थी।  दरअसल रिया चक्रवर्ती को पकड़ने का काम लड़कियों की आज़ादी को पकड़ने की भीकोभी है कि सुनो लड़कियो अपनी हद में रहो ,तुम कहाँ उड़ रही हो? आओ हम तुम्हारे पर काटें। 

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

फेसबुक से जवाब मांगने का वक़्त

सरकारें नफ़रत भरी दंगाई भाषा को पसंद करती हैं और फेसबुक ऐसी सरकारों को। भले ही वह दूसरों को अपने कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स का हवाला देकर ब्लॉक कर देता है लेकिन खुद के लिए वह अपने ही बनाए  नियम-कायदे  तोड़ देता है। अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने फेसबुक के बारे में साफ़ लिखा है कि इसकी भारत समेत  दक्षिण एशिया की पब्लिक पॉलिसी हेड आंखी दास  ने फेसबुक का धंदा मंदा न हो उसके लिए फेसबुक नीति से समझौते किये और हेट स्पीचेस को बढ़ावा दिया। फेसबुक अधिकारी ने तेलंगाना के भाजपा नेता टी राजा सिंह की  नफ़रत भरी पोस्ट को नहीं हटाते हुए कहा था कि इससे भारत में हमारे बिसनेस पर असर पड़ सकता है। ये अधिकारी लाख नकारने की कोशिश करे लेकिन भारतीय पत्रकार अब लगातार इस नेक्सस की बखिया उधेड़ रहे हैं ट्वीटर पर डॉ रश्मि दास को आंखी दास की बहन बताया गया है जो जेएनयू में अभाविप की अध्यक्ष रही हैं। विस्तार से जानना हो आप वहां साकेत गोखले का ट्वीट देख सकते हैं। 
लेकिन क्या वाकई हमें फेसबुक के इस व्यवहार को समझने के लिए वॉल स्ट्रीट जर्नल की जरूरत है? हम नहीं जानते कि पिछले कुछ साल में हमारी अपनी पोस्ट पर ही लोगों ने कितनी  अभद्र  और निजी टिप्पणियां की हैं। ऐसी टिप्पणियां कूद-कूद कर की जाती हैं , नेक्सस बनाकर । हमारी भी कई लिखने वालों से असहमतियां हो सकती हैं लेकिन हमारी अभद्र टिप्पणयां कहीं दिखाई नहीं देंगी जबकि ये सुनियोजित षड़यंत्र  के साथ अभद्रता करते हैं। नतीजतन, लिखने वाला डरने लगता है और ये बेखौफ और निरंकुश। यह सब सोची-समझी नीतियों के साथ हो रहा है। भला हो अमेरिका का जहाँ आज भी नफ़रत करने वाली भाषा का संज्ञान लिया जाता है। हमें तो इसका दास  बनाने में कोई कोर -कसर बाकी नहीं रखी गई है। वहां सीनेट मेंबर्स उनसे मुश्किल सवाल करते हैं जिसके जवाब मार्क जकरबर्ग के पास नहीं होते या वे जानबूझ कर चुप लगा जाते हैं।  
भारत में फेसबुक से  पैंतीस  करोड़ से भी ज़्यादा लोग जुड़े हैं और यहाँ होना किसी नशे की तरह ही है। ख्यात पत्रकार विनोद दुआ बिल्कुल ठीक कहते हैं कि करोड़ों लोग फेसबुक पर भरोसा करते हैं और जब फेसबुक किसी दल विशेष से जुड़कर हेट स्पीचेस को  बढ़ावा देता है तो यह हमारे  साथ विश्वासघात हुआ। पहले करोड़ों लोगों  का विश्वास हासिल किया और फिर कारोबार बढ़ाने के लिए चुना जाता है कि हमें क्या दिया जाए और क्या ना दिया जाए। बात सही है हम फेसबुक पर हैं, किसी पार्टी के पोर्टल पर नहीं। जो माध्यम हमारा विश्वास जीतकर अब नफरत को बढ़ावा दे रहा है तो आवाज़ उठानी ही चाहिए। आज ये दल है कल कोई और दल होगा और हम इस अफीम के साथ इस गंदी भाषा को अपनी मानने लगेंगे, मानने लगे भी हैं  । इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना है। फेसबुक की दोहरी पॉलिसीज़ पर जवाब मांगने का यही समय है अन्यथा इस नशे से मुक्त होने का भी यही समय है।नए  डिटॉक्स सेंटर्स तलाशने का वक़्त। 

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

वो जो अयोध्या नहीं जा रहे होते

वो जो अयोध्या नहीं जा रहे होते
हम अपना वजूद खो चुके होते
हमारी लड़कियां उनके चूल्हे जला रही 
होतीं 
उनके ढेर-ढेर बच्चे होते
फिर वे बच्चे घेरकर मारे जा रहे होते
घर-घर में जानवर कटते 
गौमाता का क्या हाल होता पूछो मत
और प्राचीन संस्कृति का तो समूल नाश हो गया होता

वो जो अयोध्या नहीं जा रहे होते
गुरुकुल मदरसा-मदरसा चीख़ रहे होते
पड़ोस का पला हुआ दुशमन
छुट्टा शेर हो जाता
जिसे  नहीं पाल सके वो देश में घुस आता।
बीमारी बला बनके फूटती
पंक्चर पकाने वाले महलों में आ जाते
और दाढ़ी वाले हुकूमत कर रहे होते

वो जो अयोध्या नहीं जा रहे होते
हमारा तो रुतबा ही ख़त्म हो गया होता
हम अपने ही देश में देशद्रोही करार  दिए जाते 
 
 मेहनतक़श सड़कों पर होते
सर पे गठरी, बगल में बच्चे
फटी बिवाइयां ,थकी ज़िंदगियां
लगातार सरक रही होतीं 

वो जो अयोध्या जा रहे हैं
अच्छा कर रहे हैं
लुटे गौरव को कायम कर रहे हैं
अस्पताल-अस्पताल क्या चिल्लाते हो
महामारी आई है चली जाएगी
इंसान को नहीं अहंकार को ज़िंदा रहना चाहिए
हमारे देश में हमारा अहंकार
हम वादे की ठसक में हैं
तुम हटो अलग।

कबीर कह गए हैं
भला हुआ मोरी गगरी फूटी
मैं पनिया भरन से छूटी
मोरे सर से टली बला....
अच्छा है जो वो अयोध्या जा रहे हैं 








शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

सावन चोर नेता




एक पखवाड़े से लग रहा है जैसे राजस्थान को किसी ने जकड़ रखा है। यूं सावन का महीना है, बूंदें भी मेहरबान हैं  लेकिन लगता है हमारे हिस्से सूखा आ रहा है। हमारे  झूले की रस्सी कोई काट रहा है। बणी--ठणी निराश है । घूमर का आनंद कोई और ले रहा है और लहरिया के रंग भी कोई  फ़ीके करते जा रहा है। मोर के नाच में भी रोड़े अटका रहा है। कोरोना के बीच नेताओं ने कोढ़ में खाज का काम कर दिया है। ये सब किसकी ग़लती  से हो रहा है, कौन कर रहा है लेकिन प्रदेश असर में है।  उसे लग रहा है कि उसके मत  को किसी तोड़ा -मरोड़ा है । जो कह रहे हैं हम तो तमाशबीन है ,उनकी आँखों में शरारत  है। 

इनका घूमर जो होटलों , कचहरियों और क़ानून निर्माण की देहरियों के बीच जारी है उसमें लय-ताल की कमी है। इनके झूलों की पींगें डरावनी हैं। कभी-कभी जो लहरिया किन्ही ख़ास मौकों पर अपने शीष पर सजाते हैं ,वह किसी को मोह नहीं पा रहा है। इस धरा  के जीवट रंगों  को कोई कोई गहरी ऊब में तब्दील कर चुका  है। जनमानस का लाखों का सावन किन्ही की बोलियों से तबाह होने की कगार पर है। किसकी कितनी बोली लगी जनता जानना तो  चाहती है लेकिन पता नहीं चलेगा यह भी जानती है। महामारी के बीच प्रदेश लगातार बेहतर चलने की कोशिश में था लेकिन अब दो पाटन  बीच जैसे कोई भी साबुत नहीं बचने के हालात में आ पहुँचा है ।  जनता के  प्रतिनिधियों  को इस कठिन दौर में जनता  के बीच होना चाहिए  या फिर  विधानसभा में लेकिन ये  होटलों में छिपे बैठे हैं। ठीक है चुन लो जिस पाले को तुम्हें चुनना हो लेकिन नैतिक साहस भी रखो यह कहने का कि यहां जनता के साथ न्याय नहीं हो रहा था । वोटर की इतना शर्मिंदा मत करो कि अगली बार वह किसी को भी चुनने से इंकार कर दे और तुम सिर्फ बोली लगाकर ही वहां पहुँचने के लिए मजबूर हो जाओ। 

शनिवार, 4 जुलाई 2020

तुम पानी


तुम पानी 
अपने आकार  की 
कोई पहल नहीं 
अपनी गहराई की कोई थाह नहीं 
 सरहद का कोई इल्म नहीं 
 दौड़ की कोई राह नहीं 
 भेद में कोई निष्ठा नहीं

बस वर्षा में ही तेरी आस्था रही।  
image:varsha

बरस जाता है 
बह जाता है 
अलौकिक रफ़्तार में 
उलझी जड़ों तक के रेशों में 
जो घोल ले ठोस से ठोस अहंकार को 
फिर भी आतुर और पी लेने को। 

और मैं 
अचंभित तुम्हें यूं 
बहते-चलते देखते हुए
शायद तुम इस पानी को कभी 
मेरी आँखों में देख सकते हो 
और हाँ यह सब मैंने
 पानी पर ही लिखा है 
मिटा देने के लिए। 
यही तो पानी भी चाहता है। 

बुधवार, 1 जुलाई 2020

कोरोना काल में कलाकार तकलीफ़ में हैं चाहिए नरेगा जैसी योजना 

 "ऐसे भी मामले हैं जब कलाकार पैसों की कमी से ख़ुदकुशी कर लेते हैं। इस महामारी में  नरेगा जैसी योजना उनके लिए भी संबल हो सकती हैं "-टी एम कृष्णा  
कर्नाटक संगीत  शैली के बेहद प्रयोगधर्मी गायक कलाकार  टी एम कृष्णा  का यह कहना सही  इसलिए भी मालूम होता है क्योंकि इस संवेदनशील कौम  के पास केवल अपनी कला होती है जिसे वे जुनून की हद तक जीते हैं। तथ्य यह भी है कि इसे अभिव्यक्त करने के लिए हमेशा उन्हें एक प्लेटफॉर्म की ज़रूरत होती है। सामान्य भाषा में हम जिसे काम मिलना कहते हैं। अमिताभ बच्चन काम मिलते रहने के अच्छे हालात पर अक्सर शुक्रिया जताते  नज़र आते हैं तो  कभी कभार इसी काम को पाने के लिए नीना गुप्ता जैसी अच्छी कलाकार को भी इल्तजा करनी पड़ती है। काम का मिलना हर हाल में ज़रूरी है और अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि यह अवसर कोई दूसरा ही मुहैया  करता है। इस व्यवस्था की चाबी अक्सर पूंजीपति के हाथ ही होती है।आत्मनिर्भर होकर भी आत्मनिर्भर नहीं होते हैं आप  । यही हिसाब मूर्तिकार , शिल्पकार, चित्रकार और   भारत की  तमाम पारम्परिक कलाकारों पर भी लागू होता है। भारत तो  कलाओं का ही देश है । चप्पे-चप्पे पर कला का असर है लेकिन आर्थिक अवसर नहीं। बिहार में मधुबनी ,पंजाब से फुलकारी, मध्यप्रदेश से कोसा चंदेरी की साड़िया राजस्थान से मूर्ती कला ,फर्नीचर,बांधनी ,आसाम से कलात्मक बांस,दक्षिण से शंख से बनी कलाकृतियां उड़ीसा से  धातु की आकर्षक मूर्तियां यह अंतहीन सिलसिला कभी ख़त्म नहीं होता और नहीं ख़त्म होती है कलाकारों की तकलीफ़। कोरोना  महामारी ने  तो सब कुछ और ठप कर दिया  है। कलाकारों के लिए यह संकट का समय है। 
इन्हीं के लिए टी एम कृष्णा कहते  हैं कि कलाकारों के पास भी शर्तिया काम देने वाली कोई योजना होनी चाहिए। बड़े कलाकारों को दिक्कत नहीं है लेकिन काम का न होना साधनहीन कलाकारों को तोड़ रहा है। यह ख़ामख़याली है कि सोशल मीडिया इस परेशानी को दूर करने में सफल है। सब मुफ़्त में ही सुनना पसंद करते हैं। नामचीन कलाकार ज़रूर बेहतर स्थिति में होते हैं जो डिजिटल शोज़ के ज़रिये धन जुटा पा रहे हैं। 

कृष्णा ने इन्हीं ऑनलाइन शोज़ के जरिये पैसा जमा कर कलाकारों को धन उपलब्ध कराया है। उन्होंने इक्यावन लाख ग्यारह हज़ार रूपए मई महीने तक जमा किए और और लगभग डेढ़ हज़ार कलाकार परिवारों को मदद पहुंचाई  लेकिन यह उन्हें नाकाफ़ी लगती है। वे कहते हैं सरकार को मनरेगा जैसी योजना जल्दी लागू करना चाहिए जो इन कलाकारों को सम्मान और कला को नया जीवन दे सके। नरेगा एक बेस मॉडल हो सकता है। कला समाज को उम्मीद ,कल्पना को उड़ान के साथ सवाल करने का साहस देती है और यह तब होता है जब कला से दर्शक जुड़ता है। बिना कला के समाज में  विघटन का  ख़तरा तो है ही संवेदनहीन होने की आशंका भी है। 

ps :सच पूछिए तो इस कठिन समय में पत्रकारों की भी नौकरियां जा रही हैं। बिना किसी पूर्व सूचना के बड़े-बड़े संस्थान एक चिट्ठी देकर उन्हें निकाल रहे हैं। रोज़गार की गारंटी तो उन्हें भी मिलनी ही चाहिए, चाहे काम छोटी तनख़्वाह वाला  ही हो। 

बुधवार, 17 जून 2020

गुलाबो सिताबो -अचार तो है लेकिन चटखारे नहीं



 
फत्तो 95, माफ़ कीजियेगा गुलाबो सिताबो का ये नाम ज़्यादा मुफ़ीद होता। क्लाइमेक्स में केक पर लिखे यही शब्द होठों पर मुस्कान ला देते हैं। कहना मुश्किल है कि इस कठिन कोरोना काल में इतने बड़े सितारों की इस फ़िल्म को छोटी-छोटी स्क्रीन पर डिजिटल रिलीज़ करना डायरेक्टर और कलाकारों को कैसा लगा होगा। बतौर दर्शक हम अपनी बात करें तो सिनेमा हॉल में देखने के बाद छोटे पर्दे पर फ़िल्म दोबारा देखने में तो आनंद आता है लेकिन गुलाबो 
सिताबो  को देखने के बाद थिएटर में दोबारा जाएंगे या नहीं तो इसका जवाब ना ही होगा। अमिताभ बच्चन ने शूजित सरकार की गुलाबो  सिताबो में झंडे गाड़ दिए हैं। मिर्ज़ा के  इस लालची क़िरदार में वे इस क़दर लालची पाए गए हैं कि कोई भी मिसाल कम होगी। जनाब अपनी ही हवेली का क़ीमती सामान कौड़ियों के दाम में बेचते जाते हैं। 

फ़ातिमा महल लखनऊ की बड़ी-सी हवेली का नाम है जिसमें कई किराएदार मामूली से किराए के एवज़ में रहते हैं। हवेली मिर्ज़ा की ही तरह जर्ज़र होते हुए भी दमख़म से खड़ी है। यदा-कदा उसकी भी दीवारें ढहती रहती हैं ज्यों मिर्ज़ा भी गिरने से पहले अक्सर संभल जाते  हैं। बांके (आयुष्मान खुराना) आटा चक्की चलाता है और अपने माता-पिता भाई बहनों के साथ इसी हवेली में रहता है महज़ 30 रुपए महीने पर। मिर्ज़ा हवेली ख़ाली कराना चाहते हैं और बांके उनके इस ख़्वाब को हर वक़्त कुतरने की फ़िराक में। इन सब के बीच बेग़म साहिबा हैं जो मिर्ज़ा की बीवी हैं और उम्र में उनसे सत्रह साल बड़ी। मिर्ज़ा इंतज़ार कर रहे हैं कि  कब बेग़म का जनाज़ा उठे और वे इस हवेली के मालिक बन बैठें । बेग़म मिर्ज़ा की हरकतों से वाक़िफ़ हैं और उन्हें तवज्जो नहीं देती।  इस उम्र में भी वे ज़िंदगी के क़रीब हैं और बालों का रंग-रोगन और सज्जा बरक़रार रखे हुए हैं।  मिर्ज़ा ज़रूर हवेली की क़ीमत सुन सुन कर किसी लीचड़ की नाईं  ग़श खाते रहते हैं और उम्मीद  करते हैं कि बेग़म जल्द अल्लाह को प्यारी हो जाएं। 

 मज़ेदार दृश्य है जब बेग़म पूछती  हैं कि  हम किसके साथ भागे थे तब  मिर्ज़ा कहते हैं आप भागीं तो अब्दुल रहमान के साथ थीं, निक़ाह हमसे हो गया । किस्सा कुछ यूं था कि बेग़म ख़ुद इस फ़ातिमा हवेली के मोह में रही हैं जिसे छोड़कर वे कहीं नहीं जाना चाहती थीं। मिर्ज़ा उम्र में उनसे बहुत छोटे हैं लेकिन घरजमाई बनने को तैयार।   लालची मिर्ज़ा को कागज़ात पर बेग़म के दस्तख़त चाहिए। बेग़म कहाँ कम हैं  सारी अंगुलियों पर पट्टी बांध लेती हैं। लखनवी अंदाज़ में यह  डाल-डाल और  पात-पात का खेल चलता रहता है। डॉक्टर बेग़म की हालत को जब कुछ कह नहीं सकते जुम्ले से जोड़ता है तो मिर्ज़ा भी आश्वस्त हो जाते हैं कि अब तो बेग़म रुख़सती के क़रीब हैं। वे कफ़न ख़रीदने भी पहुँच जाते हैं। आदतन  वे वहां भी मौल-भाव से  बाज़ नहीं आते।  हवेली पर निगाह बिल्डरों  की भी हैं जो वकील और पुरातत्त्व के हवाले से उस पर कब्ज़ा करना चाहते हैं।    
     
  
एक दिन मिर्ज़ा को ख़बर मिलती  है कि बेग़म तो गईं। पूरी हवेली को लगता हैं कि  बेग़म दूसरी दुनिया में कूच कर गई हैं लेकिन  एक चिट्ठी मिर्ज़ा और उनके किराएदारों के  चेहरे का रंग उड़ा देती है पर दर्शक को खिलखिलाने पर मजबूर ।  गुलाबो सिताबो के तमाम स्त्री पात्र ज़्यादा आत्मविश्वास और बुद्धि से भरे हैं फिर चाहे वह बेग़म हो या बांके की बहन और प्रेयसी।  गुलाबो सिताबो  गति को पा सकती थी अगर हास्य-विनोद  का पुट कुछ और गहरा होता। सामग्री अचार की है लेकिन चटखारे थोड़े कम । शूजित सरकार ऐसा विक्की डोनर और पीकू में कर चुके हैं यहाँ थोड़ी चूक हुई है लेकिन मिर्ज़ा और बेग़म (फ़र्रूख़ ज़फ़ र ) क़िरदार में डूबे नज़र आते हैं। फटी अचकन के धागों में लटके बुढऊ बढ़िया है। 
जूही चतुर्वेदी  की पटकथा वाली  गुलाबो सिताबो मज़ेदार है। वे खुद लखनऊ की हैं और शहर यहाँ ज़िंदा है  अचार तो है लेकिन चटखारे नहीं 

मंगलवार, 16 जून 2020

कोई नेता है देश में

लोग महामारी में 
सांस वेंटीलेटर में 
लोकतंत्र बाड़ों में 
अर्थतंत्र गर्त में 
समाज दर्द में 
चीन सरहद में  
नेपाल नक़्शे में ..


कोई नेता है देश में ??

शनिवार, 13 जून 2020

फ़त्तो के मिर्ज़ा में न ग़ुलाब हैं न सितारे



 
फत्तो 95, माफ़ कीजियेगा गुलाबो सिताबो का ये नाम ज़्यादा मुफ़ीद होता। क्लाइमेक्स में केक पर लिखे यही शब्द होठों पर मुस्कान ला देते हैं। कहना मुश्किल है कि इस कठिन कोरोना काल में इतने बड़े सितारों की इस फ़िल्म को छोटी-छोटी स्क्रीन पर डिजिटल रिलीज़ करना डायरेक्टर और कलाकारों को कैसा लगा होगा। बतौर दर्शक हम अपनी बात करें तो सिनेमा हॉल में देखने के बाद छोटे पर्दे पर फ़िल्म दोबारा देखने में तो आनंद आता है लेकिन गुलाबो 
सिताबो  को देखने के बाद थिएटर में दोबारा जाएंगे या नहीं तो इसका जवाब ना ही होगा। अमिताभ बच्चन ने शूजित सरकार की गुलाबो  सिताबो में झंडे गाड़ दिए हैं। मिर्ज़ा के  इस लालची क़िरदार में वे इस क़दर लालची पाए गए हैं कि कोई भी मिसाल कम होगी। जनाब अपनी ही हवेली का क़ीमती सामान कौड़ियों के दाम में बेचते जाते हैं। 

फ़ातिमा महल लखनऊ की बड़ी-सी हवेली का नाम है जिसमें कई किराएदार मामूली से किराए के एवज़ में रहते हैं। हवेली मिर्ज़ा की ही तरह जर्ज़र होते हुए भी दमख़म से खड़ी है। यदा-कदा उसकी भी दीवारें ढहती रहती हैं ज्यों मिर्ज़ा भी गिरने से पहले अक्सर संभल जाते  हैं। बांके (आयुष्मान खुराना) आटा चक्की चलाता है और अपने माता-पिता भाई बहनों के साथ इसी हवेली में रहता है महज़ 30 रुपए महीने पर। मिर्ज़ा हवेली ख़ाली कराना चाहते हैं और बांके उनके इस ख़्वाब को हर वक़्त कुतरने की फ़िराक में। इन सब के बीच बेग़म साहिबा हैं जो मिर्ज़ा की बीवी हैं और उम्र में उनसे सत्रह साल बड़ी। मिर्ज़ा इंतज़ार कर रहे हैं कि  कब बेग़म का जनाज़ा उठे और वे इस हवेली के मालिक बन बैठें । बेग़म मिर्ज़ा की हरकतों से वाक़िफ़ हैं और उन्हें तवज्जो नहीं देती।  इस उम्र में भी वे ज़िंदगी के क़रीब हैं और बालों का रंग-रोगन और सज्जा बरक़रार रखे हुए हैं।  मिर्ज़ा ज़रूर हवेली की क़ीमत सुन सुन कर किसी लीचड़ की नाईं  ग़श खाते रहते हैं और उम्मीद  करते हैं कि बेग़म जल्द अल्लाह को प्यारी हो जाएं। 

 मज़ेदार दृश्य है जब बेग़म पूछती  हैं कि  हम किसके साथ भागे थे तब  मिर्ज़ा कहते हैं आप भागीं तो अब्दुल रहमान के साथ थीं, निक़ाह हमसे हो गया । किस्सा कुछ यूं था कि बेग़म ख़ुद इस फ़ातिमा हवेली के मोह में रही हैं जिसे छोड़कर वे कहीं नहीं जाना चाहती थीं। मिर्ज़ा उम्र में उनसे बहुत छोटे हैं लेकिन घरजमाई बनने को तैयार।   लालची मिर्ज़ा को कागज़ात पर बेग़म के दस्तख़त चाहिए। बेग़म कहाँ कम हैं  सारी अंगुलियों पर पट्टी बांध लेती हैं। लखनवी अंदाज़ में यह  डाल-डाल और  पात-पात का खेल चलता रहता है। डॉक्टर बेग़म की हालत को जब कुछ कह नहीं सकते जुम्ले से जोड़ता है तो मिर्ज़ा भी आश्वस्त हो जाते हैं कि अब तो बेग़म रुख़सती के क़रीब हैं। वे कफ़न ख़रीदने भी पहुँच जाते हैं। आदतन  वे वहां भी मौल-भाव से  बाज़ नहीं आते।  हवेली पर निगाह बिल्डरों  की भी हैं जो वकील और पुरातत्त्व के हवाले से उस पर कब्ज़ा करना चाहते हैं।    
     
  
एक दिन मिर्ज़ा को ख़बर मिलती  है कि बेग़म तो गईं। पूरी हवेली को लगता हैं कि  बेग़म दूसरी दुनिया में कूच कर गई हैं लेकिन  एक चिट्ठी मिर्ज़ा और उनके किराएदारों के  चेहरे का रंग उड़ा देती है पर दर्शक को खिलखिलाने पर मजबूर ।  गुलाबो सिताबो के तमाम स्त्री पात्र ज़्यादा आत्मविश्वास और बुद्धि से भरे हैं फिर चाहे वह बेग़म हो या बांके की बहन और प्रेयसी।  गुलाबो सिताबो  गति को पा सकती थी अगर हास्य-विनोद  का पुट कुछ और गहरा होता। सामग्री अचार की है लेकिन चटखारे थोड़े कम । शूजित सरकार ऐसा विक्की डोनर और पीकू में कर चुके हैं यहाँ थोड़ी चूक हुई है लेकिन मिर्ज़ा और बेग़म (फ़र्रूख़ ज़फ़ र ) क़िरदार में डूबे नज़र आते हैं। फटी अचकन के धागों में लटके बुढऊ बढ़िया है। 
जूही चतुर्वेदी  की पटकथा वाली  गुलाबो सिताबो मज़ेदार है। वे खुद लखनऊ की हैं और शहर यहाँ ज़िंदा है  

शुक्रवार, 29 मई 2020

तीन शहर तीन मरीज़ और कोरोना

कोविड-19 वायरस से जूझते हुए भारत को लगभग चार महीने बीत चुके हैं। हममें से कई जो अब तक न्यूज़ सुनकर ही परेशान और दुखी हो रहे थे अब उन्हें भी अपने परिचितों यां परिजनों के लिए कोरोना से टकराना पड़ रहा है। वे सब हालात से परेशान और दुखी हैं। आज आपसे  साझा हैं तीन शहरों के  तीन परिजनों से जुड़े अपने अनुभव।
शहर अहमदाबाद
मरीज़ अपनी बहूरानी को ऑफिस ड्रॉप करते  और लौट आते यानी उनकी जीवनचर्या केवल घर तक सीमित नहीं थी। बिलकुल स्वस्थ। उम्र अट्ठावन-साठ के आसपास। एक दिन खांसी और बुख़ार के लक्षण सामने आए ,फिर सांस लेने में तकलीफ़ हुई। सब मान के चल रहे थे कि यह  कोरोना का ही संक्रमण है लेकिन रिपोर्ट नेगेटिव। फिर एक दिन सब ख़त्म। अस्पताल से देह भी ऐसी सील मिली जैसे खोली गई तो कोरोना देकर ही रुख़सत होगी। 
शहर जयपुर
 मरीज़ को हार्ट, शुगर की तकलीफ़ पहले ही थी। तबियत बिगड़ने पर अजमेर के अस्पताल ने जयपुर रैफ़र कर दिया। जयपुर के निजी अस्पताल ने मरीज़ को बाहर से ही सरकारी अस्पताल SMS  सवाई मानसिंह चिकित्सालय रैफ़र कर दिया जहाँ पहुँचते ही उनकी मृत्यु हो गई। कहा गया बॉडी तो कोरोना टेस्ट के बाद ही मिलेगी। नमूना लिया गया और रात भर के लिए शव मुर्दाघर में रखवा दिया गया। सुबह सूचना दी गई कि जो नमूना लिया था वह ग़ुम हो चुका है। स्वैब दोबारा लिया जाएगा। लम्बे इंतज़ार के बाद नमूना लिया गया और पता नहीं क्यों शव का पोस्टमार्टम भी किया गया। पूरे दिन जूझने के बाद अस्पताल ने शाम को  शव सौंपा। दुखी परिजन ऐसे उलझते गए  कि आंसू भी दग़ा दे गए । 
शहर इंदौर 
तीसरा शहर  इंदौर भी रेड जोन का शहर  है। मरीज़ की  हिप जॉइंट रिप्लेस्मेंट सर्जरी हुई थी। डिस्चार्ज मिल चुका था। उस दिन टांके कटने थे तो उसी  निजी अस्पताल की एम्बुलेंस घर से मरीज़ को लेने आई थी। एम्बुलेंस में दो डॉक्टर थे। हेल्पर भी।  ऑक्सीजन सप्लायर के साथ सभी लाइफ सेविंग इंस्ट्रूमेंट्स से सुसज्जित।   एम्बुलेंस मरीज़ को हॉस्पिटल ले आई। बिल का भुगतान हो चुका था।  मरीज़ के टांके कटते ही स्टाफ ने शोर  मचाना शुरू कर दिया कि आपको येलो ज़ोन के अस्पताल में शिफ़्ट होना पड़ेगा। इन्हें सांस की तकलीफ़ है। क्यों, हम क्यों जाएं येलो जोन में वहां कोरोना संक्रमित मरीज़ होंगे । इनका इलाज ग्रीन जोन के अस्पताल में ही होना चाहिए। कोरोना के कोई लक्षण हमारे मरीज़ में नहीं हैं। नहीं, आपको जाना ही होगा। आप पेशेंट को यहाँ से ले जाइये। हद हो गई आप ही ने बुलाया और आप ही रवाना  कर रे हैं । परिजनों को नहीं समझ आ रहा था कहाँ ले जाएं। अस्पतालों की लिस्ट थमा दी गई। एम्बुलेंस मांगी गई तो स्टाफ ने कहा कि केवल आने के लिए मिलती  है। बाहर प्राइवेट एम्बुलेंस खड़ी है आप जल्दी मरीज़ को यहाँ से ले जाइये। प्राइवेट एम्बुलेंस जिसके पास ढंग का स्ट्रेचर भी नहीं था दो हज़ार रुपए में छह किलोमीटर दूर स्थित एक अस्पताल में ले जाने के लिए तैयार हुई । एम्बुलेंस का एयर कंडीशनर पूरी तरह  ध्वस्त । कोई डॉक्टर हेल्पर भी नहीं।

ड्राइवर एक लड़का है और बताता है कि ये एम्बुलेंस एक डॉक्टर की है । इस  प्राइवेट एम्बुलेंस पर नंबर प्लेट भी हरियाणा की थी  । ख़ैर अस्पताल पहुंचे। वहां एक भले डॉक्टर ने कहा कि यहाँ हालात अच्छे नहीं है।  इन्हे यहाँ मत लाइये। दूसरे अस्पताल ले जाइये।  एम्बुलेंस के ड्राइवर ने कहा मैं नहीं जाऊंगा। आप मरीज़ उतार लीजिये। हाथ जोड़े तो कहा चार हज़ार लूंगा वहां छोड़ने के। मजबूर तीमारदार के पास क्या रास्ता बचा था । तीन दिन उस अस्पताल के ICU  में सांस लेने के बाद साँसे थम गईं। दो बार कोरोना टेस्ट हुआ। दोनों नेगेटिव लेकिन मरीज़ को बॉडी में तब्दील कर दिया गया था। जाने कैसी गाइडलाइन थी ये जिसमें न कोई गाइडेंस था न लाइन थी । कोरोना का यह रोना अनंत है जिसे हमारी व्यवस्था ने और करुण कर दिया है। अस्पतालों को वाकई कोरोना हो रखा है। 

शनिवार, 7 मार्च 2020

थप्पड़ में प्यार, हक़ ढूँढ़नेवालो



प्यार से समझाती है थप्पड़ उन लोगों को जिन्हें इसमें  खामखां का प्यार और हक़ नज़र आता है। थप्पड़ रिलीज़ हुए एक सप्ताह बीत चुका है और फ़िल्म  अपने चाहनवालों और क्रिटिक्स से  थपकियाँ और सिसकियाँ  भी पा चुकी है।  मुझे जो क़िरदार क़रीब लगा वह दीया मिर्ज़ा का है। वह ऐसी स्त्री है जो अपने प्रेम को खो चुकी है लेकिन  ख़ुश है अपनी बिटिया और अपने काम के साथ।  क्योंकि उसने जो पाया है वह इतना भरपूर है कि कोई तमन्ना अब  बाक़ी नहीं रही। वह कहती भी है उसके साथ सबकुछ एफर्टलेस था। लेकिन आम भारतीय स्त्रियां जानती हैं कि उनकी पूरी गृहस्थी  उन्हीं के एफर्ट्स पर टिकी हुई है जिसमें थप्पड़ ,जबरदस्ती, उनका कॅरिअर छोड़ना सब सामान्य  है।

अमृता एक ख़ुशहाल ज़िन्दगी जी रही है। होममेकर है। परिवार के लिए पूरी तरह समर्पित। एक पार्टी में उसके पति विक्रम का झगड़ा अपने सीनियर्स से होता है और अमृता इस झगड़े को रोकना चाहती है। इसी तना-तनी में वह अमृता को थप्पड़ मार देता है। उस समय लगता है जैसे वही उसके लिए सबसे सॉफ्ट टारगेट थी अपना ग़ुस्सा जताने के लिए। अमृता सकते में थी जो बाद में सदमे में बदल जाता है । पति को सॉरी बोलना भी ज़रूरी नहीं लगता । उसका ख़याल था कि जो नाइंसाफ़ी उसके कंपनी ने उसके साथ की है , उसमें यह सब हो गया। सासू माँ का भी मानना था जाने दे , औरतों को बर्दाश्त करना पड़ता है। लगभग ऐसी ही राय अमृता की माँ की थी। कहीं कुछ दरक गया था तो वह अमृता के पिता के भीतर से। वे बेटी के टूटे मन को समझ गए थे। उन्हीं से एक दृश्य में रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध कविता सुनना भी अच्छा लगता है। 

निर्देशक अनुभव सुशीला सिन्हा (यही नाम आता है उनका बतौर डायरेक्टर, सुशीला उनकी माँ का नाम है ) मुल्क़ा और  आर्टिकल 15 के बाद यह लगातार तीसरी अच्छी फिल्म है। अच्छी बात यह भी है कि अमृता अपना पूरा केस सिर्फ इस थप्पड़ के ख़िलाफ़ लड़ना चाहती है। न घरेलू हिंसा ना ही कोई और अपराध। यही बात इस थप्पड़ को और धार देती है क्योंकि केवल एक थप्पड़ तो हमारे समाज में कोई अलग होने का कारण  नहीं। वजूद को ठेस पहुंचानेवाली बात इसे कोई नहीं मानता।  ख़ुद वक़ील पूछती है कि बस एक थप्पड़ की वजह से तुम रिश्ता छोड़ना चाहती हो। सच तो यही है कि हमारे समाज में थप्पड़ हक़ की तरह ही हक़ जमा चुका है उलट कुछ को तो यह भी लगता है कि थप्पड़ नहीं मारा तो अपना नहीं समझा, प्यार नहीं किया। बापू के अहिंसक सिद्धांतों के बीच समाज में यह हिंसा सदैव बनी रही। यहाँ थप्पड़ मरनेवाला विक्रम कोई अपराधी नहीं है। बड़े बुज़ुर्गों के पैर छूता है रिश्ते में अलगाव होने जाने के बावजूद अपने ससुर के भी। 

केस के सिलसिले में गवाही देने के लिए  विक्रम अपनी पड़ोसन दीया के पास भी जाता है लेकिन वह सख़्त लफ़्ज़ों  में इंकार कर देती है। इस थप्पड़ को पार्टी में दिया की किशोर बेटी ने भी देखा था। वह अपने दिवंगत पिता के लिए माँ से पूछती है कि क्या पापा ने कभी आपको मारा था। जवाब होता है कभी नहीं। दरअसल एक स्त्री ऐसे ही एफर्टलेस रिश्ते की प्रतीक्षा में होती है जिसका मिलना आसान नहीं है। ब्याह में अब भी सर्वाधिक योगदान स्त्रियों को ही देना पड़ता है। बहरहाल तापसी पन्नू बतौर अमृता बहुत प्रभावी हैं। एक थप्पड़ उसके प्यार को ख़त्म कर चुका  है यह  वह बताती है , ढोती नहीं। अमृता का प्रतिकार वकील को भी हिम्मत देता है वह खुद भी अपने बिना प्रेमवाले रिश्ते को अलविदा कह देती है। कई रंग हैं थप्पड़ में ज़रूर देखी जानी चाहिए। हमारी आपकी कहानी है लेकिन स्त्री के आर्थिक अधिकार अब भी अधूरे हैं। अपनी मर्ज़ी की फ़िल्म वह कम ही देख पाती है। मैंने अपने किशोर बेटे  के साथ देखी। उसे अमृता सही लगी  लेकिन अपने डांसर बनने के सपने को छोड़ एक अच्छी बहू बनने को चुनने का फ़ैसला कम समझ आया। 
एक संवाद
"तुम एक कंपनी में इतने इमोशनली इन्वेस्टेड थे। यू कुड नॉट मूव ऑन। मैंने तो पूरी लाइफ इन्वेस्ट करी है तुम्हारे साथ। कैसे मूव् ऑन करूं।आय डोंट लव यू। "

गुरुवार, 5 मार्च 2020

इस लोकतन्त्र को संसद की ज़रुरत नहीं है

इस लोकतन्त्र को संसद की ज़रुरत नहीं है जो होती तो दिल्ली की क्रूर हिंसा के बाद इसके दरवाज़े यूं बंद न होते। कोई कैसे इस ख़ूनी खेल के बाद यूं चुप्पी ओढ़ सकता है ?  होली के बाद बात करने का दुस्साहस कर सकता है ? क्या जनप्रतिनिधियों को एक बार भी यह ख़याल नहीं आया होगा कि हम इस कठिन समय में तकलीफ़ से गुज़र रही दिल्ली के जख्मों पर मरहम रख सकें। एक ऐसा भाव दुखी अवाम के सामने आए जो बता सके कि हमें उनकी चिंता है, परवाह है। यह लापरवाही आख़िर क्यों की जा रही है? यह उदासीन रवैया क्यों कि  आपके आंसू होली के बाद पोछेंगे। उनकी आँखों के सामने उनके अपनों को गोली लगी है ,ज़िंदा जलाया गया है। संसद इतने ज़रूरी समय में गैरहाज़िर कैसे हो सकती है ? संसद की देहरी पर माथा लगाने वाले ऐसा कैसे कर सकते हैं। यह ईंट-गारे से बनी इमारत भर नहीं बल्कि हमारे पूर्वजों की उस आस्था की बुलंद इमारत है जो हर हाल में तंत्र को लोकसहमति से चलाना चाहते थे। आज जो दल चुनकर आया है क्या उसे अपने ही सांसदों पर भरोसा नहीं या वह विपक्ष की आवाज़ दबाना चाहता है जो यूं भी अब बहुत कम संख्या में और दबी हुई है। 

अब तक 47 निर्दोष दिल्ली की हिंसा में मारे जा चुके हैं। चार सौ से ज़्यादा घायल हैं। 79 घर पूरी तरह जल गए हैं 327 दुकाने ख़ाक हुईं हैंऔर ख़ाक हुआ है जनता का विश्वास जिसे संसद लौटा सकती थी लेकिन जलते घावों पर रूई का फोहा रखने में हमारे नेता नाक़ाम रहे। क्या वाक़ई इस लोकतन्त्र को संसद की ज़रुरत नहीं है। यह बिना जनप्रतिनिधियों की बात सुने आगे बढ़ सकता है। संकट के समय देश को किसी सामूहिक आवाज़ की अपेक्षा  नहीं है। पहले शांति हो फिर बातचीत करेंगे यही रवैया संवैधानिक संस्थाओं का रहा तो जनता का यकीन इस व्यवस्था में कैसे बना रहेगा। लोकतंत्र में आस्था का सीधा ताल्लुक अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से  है। कठिन समय में उनकी आवाज़ एक तरफ़ कर पुलिस के हवाले कर दी जाए तो यह तो अंग्रेज़ों वाला शासन ही होगा। फिर तो राजा भी क्या बुरे थे। हम किस दौर में लौट रहे हैं ? हमारे चुने लोगों की आवाज़ कहाँ ग़ुम है? क्यों नहीं मुखर होनी चाहिए लोकसभा राज्यसभा और हर  विधानसभा की आवाज़ ? ये चुने जाने के बाद होली मानाने के लिए हैं क्या ? इस आग में यूं ठंडे पड़े रहना मुर्दा हो जाना ही होगा। इस संकटकाल में तो आपातकालीन सत्र बुलाए जाने की आवश्यकता थी लेकिन  चिल मारो यार होली के बाद मिलेंगे। नए मौसमों का पता खोजो रे नेताओं इस आग में कोई थ्रिल नहीं है। बक़ौल पाश


मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती 

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती 
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती 
बैठे-बिठाए पकड़े  जाना  बुरा तो है 
सहमी-सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है 
सबसे ख़तरनाक नहीं होता 
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है 
जुगनुओं की लौ में पढ़ना 
मुट्ठियां भींच कर वक़्त निकल लेना बुरा तो है 
सबसे ख़तरनाक नहीं होता 

सबसे ख़तरनाक  होता है 
मुर्दा शांति से भर जाना 
तड़प का न होना 
सब कुछ सहन कर जाना 
घर से निकलना काम पर और 
काम से लौटकर घर आना 
सबसे ख़तरनाक  होता है 
हमारे सपनों का मर जाना 

हाँ सबसे ख़तरनाक  होता है मुर्दा शांति से भर जाना और हमारे चुने हुए नेता उसी से भर गए हैं। 


    

मंगलवार, 3 मार्च 2020

मेरा घाव तेरे घाव से गहरा है



painting : yvette swan

धरती बाँट दी 

बाँट दिए इंसान 
और फिर 
इंसानियत पर लगे 
घाव भी बाँट लिए 
वाह 
घाव बाँट लिए 
ग़म बाँट लिए 
शायद बचा था आँख का पानी 
काश 
बचा  होता 
ख़ून के दाग़ धोए जाते 
ज़ख्म भरे जाते 
गले मिल आते 
अफ़सोस 
इस बार तो  घाव 
इम्तेहान में बैठे थे 
अव्वल आना था उन्हें 
जिसके ज़्यादा गहरे थे 
सीना उतना ही तना हुआ था 
बखान में ज़ुबां भी 
सरपट दौड़ी जाती थी 
कैंप 
लग गया था 
इसे बनाने का बड़ा तजुर्बा है भाई 
अपनों को बेघर
हम पुश्तों से करते आ रहे थे 
मातम 
अभ्यस्त था 
ग़रीबी से पस्त था 
रसद और छत 
दोनों के इंतज़ार में था  
मिट्टी और आग 
में झोंक देने का चलन नया नहीं है 
नया है उसे भुनाने  का चलन 
उस पर इतराने का चलन 
कभी मिट्टी देना 
अग्नि देना 
सद्भावियों की पहचान थी 
सत्ता 
सियासत 
इन मौतों का 
मातम नहीं मनाती 
ये तमगे हैं जो गद्दारों को 
गोली मरने के बाद उसे 
हासिल हुए हैं। 

















रविवार, 23 फ़रवरी 2020

नहीं परोसा खाने की थाली में भरोसा

वाक़ई सियासी दखल ने खाने की  थाली में विश्वास नहीं परोसने दिया है। कहा गया है कि प्राचीन हड़प्पन थाली से मांसाहर हटा दिया जाए 
फ़र्ज़ कीजिये कि आप किसी प्राचीन देश में किसी प्राचीन शहर को समझने की जुगत में हों  यानी  वहां की संस्कृति, खाना, पहनावा और हो ये कि आपके साथ कुछ फ़र्ज़ीवाड़ा हो जाए। घबराइए नहीं बस इतना कि जो भोजन इतिहास आपसे साझा किया गया है, उसमें कुछ घपला कर दिया जाए। तब आपको कैसा  लगेगा ? क्या आप ठगा सा महसूस करेंगे ?

मेरी अपेक्षा तो  होगी कि जो खाना उस काल खंड में, उस सभ्यता में प्रचलित था वही परोसा जाए । यह और बात है की जिस अनाज या शोरबे  को मैं ना खा पाऊं वह मैं ना चुनूं। बहरहाल यह सब हो रहा है उस हड़प्पन संस्कृति के साथ जिसे पुरातत्व के विद्वान पांच हज़ार साल प्राचीन बताते हैं। वह एक विकसित सभ्यता थी और तमाम अनाजों दालों के साथ मांसाहार भी उस सभ्यता के खान-पान में शामिल था। दिल्ली  नेशनल म्यूजियम भी इस सभ्यता के हवाले से उस दौर के खाने को हमारी प्लेट तक पहुंचाना चाहता था। आइडिया   ही कितना दिलचस्प है कि जो थाली हड़प्पन दौर में परोसी जाती थी,उसका स्वाद आज के दौर में भी लिया जा सकता है। हल्दी के स्ट्यू में मछली ,साल के पत्ते में पका चिकन, सूखी मछली के साथ बाटी , मीट सूप ,काबुली चना के साथ लैम्ब  लीवर, महुआ के तेल में बानी चटनीऔर खीरे का अचार । और भी बहुत  कुछ आपकी प्लेट में होता जो कुछ सांसदों  की निगाह इस फ़ेहरिस्त पर न पड़ती। उनके आख़िरी मिनट के फरमान ने इस सूची पर पानी फेर दिया है जो हड़प्पन काल के ज़ायके से रूबरू करने वाली थी। 
यह नेशनल म्यूजियम का इवेंट है जिसमें वन स्टेशन मिलियन स्टोरीज के तहत इस बार सिंधु घाटी की सभ्यता का स्वाद और सुगंध फ़ैलनी थी। इस स्वाद को गहरे रिसर्च और पुरा अध्ययन के  बाद तैयार किया गया था। ख़ासकर जो चीज़ें और पाकशास्त्र के उन दिनों में प्रचलित तरीक़े थे उसके आधार पर। जानवरों की मिली हड्डियोंके हिसाब से  देखा गया कि बीफ़, मटन, कछुए, घड़ियाल के साथ नदी और समुद्री मछलियां भी खाई जाती थीं। केवल शाकाहार का परोसा जाना उस दौर की सही छवि प्रस्तुत  नहीं करेगा। फर्मेन्टेड वाइन भी सिंधु सभ्यता का हिस्सा थी तो इससे नफ़रत करनेवाले इस तथ्य को ही नकार देंगे। अनाज और दालों में गेहूं ,चावल ,रागी ,मटर अरहर और मूंग दाल का होना सिंधु सभ्यता के विकसित होने की पुष्टि करता है। और हाँ ज्वार की उन्नत किस्म भी उस सभ्यता में पनपा ली गई थी। अलसी और तिल भी हमारे पूर्वज खाते थे। जाने क्यों तथ्य हमारी राजनीति को नामंज़ूर है। और कुछ नहीं तो खाने की विरासत  के साथ ही छेड़छाड़। 

आलू , टमाटर, चीज़ सब बाद में दूसरे मुल्कों से आए। ये उस खाने में आपको नहीं मिलेंगे। ज़ाहिर है ये हड़प्पन खाने की प्लेट में नहीं होंगे अब कोई नेता आलू टमाटर की सब्ज़ी खाने की ज़िद ही कर ले तब तो इतिहास और  संस्कृति का मक़सद ही ख़त्म हो जाए। नेशनल म्यूजियम दिल्ली की हिस्टोरिकल गैस्ट्रोनॉमिका से मीट को अलग करके इसी मक़सद का अंत किया गया है।  सियासत की लंबी नाक है जो कहीं भी घुस जाती है।
https://likhdala.blogspot.com/search/label/mohen%20jo%20dado

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

क्या हैं शाहीन बाग़ की औरतें मदर इंडिया ?

शाहीन बाग़ न संयोग है न प्रयोग। ये प्रतिक्रियाएं हैं जो CAA और NRC के ख़िलाफ़ निकलकर घर से बाहर आ गई हैं। ये उनकी अपनी मिट्टी से मोहब्बत है जो उन्हें घर की देहरी लांघने  पर  मजबूर कर रही है। उन्हें डर है कि कोई उन्हें अपने वतन से दूर न कर दे इसलिए वे दम साध कर पैर जमा कर बैठीं हैं। कौन हैं ये ,क्या उम्र है इनकी,क्या लिबास हैं यह सवाल इस जज़्बे के आगे बहुत ही गैरमामूली हो जाते हैं।  आप इनसे परेशान होते हैं लेकिन इनकी आशंकाओं के निवारण के लिए क़रीब नहीं जाते। दअसल ये मदर इंडियाएं हैं जो अपने बच्चों को लेकर शाहीन बाग़ आ रही हैं। माएं बच्चों को टहलाने और बहलाने के लिए बाग़ में लाती हैं लेकिन यहाँ मंज़र कुछ और है। एक चार महीने के बच्चे की ठंड से मौत हो गई लेकिन माँ पीछे नहीं हटी फिर लौट आई। वाकई ये मदर इंडिया है।
मेरे पिता ने बचपन में हम भाई-बहनों को महबूब ख़ान की  फ़िल्म मदर इंडिया किसी धर्म ग्रंथ की तरह  दिखाई। वो मदर इंडिया जो एक लाचार इंसान की पत्नी ,एक धन्ना सेठ सूखी लाला की नज़रों की शिकार और खेती में लगातार नुक़सान सहने के बावजूद  अपना साहस नहीं खोती, स्वाभिमान नहीं तजती। वह अपने बच्चों के सर कोई तकलीफ़ नहीं आने देती। भयावह बाढ़ और सूखे में  बच्चों की ढाल बनती माँ। ख़ुद की जान और भूख की क़ीमत पर बच्चों को अपनी जीवटता से ज़िंदा रखती  हुई  मदर इंडिया लेकिन उनके बड़े होने पर जब गांव की इज़्ज़त पर बात आती है तो अपने सबसे प्रिय बेटे को गाँव पर क़ुर्बान कर देती है यह मदर इंडिया। इस माँ को पूरा गांव अपनी माँ मानता है। कुर्बानी का यह जज़्बा संयोग से नहीं आता और न ही प्रयोग से।  यह आता है अपने ही देश में अपना वजूद खो देने के डर से। वे साबित करना चाहती हैं कि  कोई लाख भेद करना चाहे , हम अलग नहीं हैं। वक़्त आने पर हम इम्तेहान दे सकते हैं। शाहीन बाग़ ऐसी ही आबो हवा का शाहिद है इन दिनों। यही हौसले आज़ादी के परवानों के भी रहे होंगे। जलिया वाला बाग़ के भी रहे होंगे और आज शाहीन बाग़ के भी हैं। शुक्र है कि कोई जनरल डायर आज नहीं है लेकिन फायरिंग की घटनाएं हैरान करने वाली हैं डराने वाली भी । इस सर्दी में जो कोई अपने चुने हुए हुक्मरां से बातचीत के इंतज़ार में है तो यह कोई बहुत दुर्लभ मांग तो नहीं है जो पूरी न की जा सके। 

बात फ़िल्म मदर इंडिया की जिसे मेरे पिता ने हमें दिखाया औरअब हमारे बच्चों को भी । मदर इंडिया ग्रामीण भारतीय स्त्री के त्याग और समर्पण का ऐसा दस्तावेज़ है जो सेलुलॉइड के जरिये अमर हो गया है। फ़िल्म में नर्गिस हैं जो हूबहू भारत माता ही मालूम होती हैं जब गाँव में नहर का उद्घाटन के लिए उन्हें बुलाया जाता है। उन्हें उस नहर में अपने ही बेटे का ख़ून दिखाई देता है। भारतीय स्त्री की इस जीवटता को सौ-सौ सलाम। उसकी क्षमताएं अपार हैं। शाहीन बाग़ में बैठीं औरते भी इस कसौटी पर खरी मालूम होती हैं।
सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा के शायर अल्लामा इक़बाल का एक शेर इन जीवट स्त्रियों के लिए 
तू शाहीन है परवाज़ काम तेरा 
तेरे सामने आसमां और भी हैं 

बुधवार, 8 जनवरी 2020

deepika's chaapaak from cleavage to jnu

क़द-काठी में तो दीपिका पादुकोण पसंद थी ही लेकिन अब उनके भीतरी सौंदर्य ने भी मोह लिया है। यूं अपने अवसाद का ज़िक्र करके और क्लीवेज की तस्वीर छापने के दौरान टाइम्स ऑफ़ इंडिया से लोहा लेकर वे ख़ुद को अलग तो बहुत पहले ही साबित कर चुकी हैं। ठीक है कि उनकी फिल्म छपाक 10 जनवरी को थिएटर्स में आ रही है लेकिन JNU आकर अपना स्टैंड रखना उनकी हिम्मत और समझ की दाद मांगता है। उनकी फ़िल्म पद्मावत का ज़िक्र भी लाज़मी होगा क्योंकि उस समय भी गुंडा तत्वों ने तोड़ -फोड़ और आगज़नी की थी। तब भी इस बिरादरी की कोई मुखर आवाज़ सामने नहीं आई थी। जोधा अक़बर, पद्मावत ,पानीपत जैसी कई फ़िल्मों को यूं रोका जाता है जैसे  क़ानून नहीं गुंडों का राज हो। इस दौर में जब कई बिलों में जा घुसे हैं दीपिका का यूं प्रकट होना उनके अलग होने की पहचान ज़ाहिर करता है। 

कहा  जा  सकता है  कि उनकी छपाक को जो एक एसिड अटैक  सर्वाइवर  लड़की की जिजीविषा की कहानी है, उसके प्रचार में यह मंच मददगार साबित हो सकता है। ऐसा है तब भी कोई दिक़्क़त नहीं होनी चाहिए। फिल्म तो अजय काजोल की भी उसी दिन आ रही है। छपाक मेघना गुलज़ार की  है और गुलज़ार साहब की भी है। ज़ुल्म के ख़िलाफ़ इस जंग को देखना बेशक़ युवाओं के लिए प्रेरक होगा । इसके पहले जब दीपिका का क्लीवेज टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने दिखाया था तब भी दीपिका ने बताया  था कि उसके पास ऊंची रीढ़ भी है। तब दीपिका ने कहा था  "वह एक स्त्री है उसके पास स्तन भी है और क्लीवेज भी आपको कोई समस्या है।"  TOI ने दीपिका को पाखंडी कहा था कि दीपिका ख़ुद कई अवसरों पर अपने क्लीवेज को प्रदर्शित करते हुए देखी  जा सकती हैं ,मैगज़ीन्स कवर पर डांस फ्लौर पर तो वहां वे ऐसा क्यों करती हैं। शीर्षक पर गौर कीजिये दीपिका पादुकोण क्लीवेज शो। दीपिका ने चुप्पी तोड़ कर ज़ाहिर कर दिया था कि अख़बार को रील दीपिका और रियल दीपिका में फर्क करना होगा। आज पादुकोण  ने वही किया है इस फ़र्क को बता दिया है कि रियल दीपिका कैसी हैं। स्टैंड लेना आपके ज़िंदा होने का सबूत है तटस्थ रहकर देश नहीं बनते। 

गुरुवार, 2 जनवरी 2020

और रा ज करेगी ख़ल्क़ ए ख़ुदा

शायर या कवि की क़द्र कीजिये , उन्हें प्रेम कीजिये। फ़ैज़ अहमद  'फ़ैज़' बड़े शायर हैं इसलिए नहीं कि उनका लिखा मक़बूल हुआ बल्कि इसलिए कि उन्होंने जो लिखा वह इंसानियत का गीत बन गया। ऐसा कोई चाहकर भी नहीं कर सकता जो कर सकता होता तो आज तंगदिल हुक्मरानों के गीत हरेक की ज़ुबां पर होते। ये शायर अपने वतन से बाहर नहीं फैंके  जाते या वतन के भीतर उनका दूसरा घर हर वक़्त जेल नहीं होता।  

मनोहर श्याम जोशी का धारावाहिक हमलोग देखकर जो पीढ़ी बड़ी हुई यह उस शीर्षक गीत को कैसे भूल सकती  है। ये फ़ैज़ की ही नज़्म है। 

आइये हाथ उठाएं हम भी
हम जिन्हें रस्मे-दुआ याद नहीं 


हम जिन्हें सोज़ ए मोहब्बत के सिवा 
कोई  बुत  कोई  ख़ुदा  याद नहीं 

एक शायर जो सिर्फ़ मोहब्बत का पैग़ाम देता है वह किसी व्यवस्था में यूं अपमानित किया जाए यह किसी भी संस्थान के लिए फ़ख़्र की बात कैसे हो सकती है। फ़ैज़ साहब के इस शेर को देखिये

थे कितने अच्छे लोग कि जिनको अपने ग़म से फुर्सत थी 

सब पूछे थे अहवाल जो कोई दर्द का मारा गुज़रे था  

तीन  शेर उस बेहतरीन ग़ज़ल से जो उन्होंने मांटगोमरी जेल में लिखी 

कब याद में तेरा साथ नहीं ,कब हाथ में तेरा हाथ नहीं
सद शुक्र के अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं

मुश्किल है अगर हालात वहां दिल बेच आएं जां दे आएं 

दिलवालों  कूच ए जानां  में क्या ऐसे भी हालात नहीं

जिस धज से कोई मक़तल में गया वो शान सलामत रहती है 

ये जान तो आनी जानी है ,इस जां की तो कोई बात नहीं

हैरानी और दुःख होता है जब एक उदार समाज गीतों-ग़ज़लों की ज़ुबां समझना बंद कर दे। यह अनूठापन केवल इंसान को नसीब है, ये कौन हैवान है जो प्रेम और इंसानियत के जज़्बे को नए चश्में पहन देख रहा है। यक़ीनन यह उस सभ्यता का हिस्सा तो नहीं जिसने दुनिया को दो नायाब ग्रंथ दिए हैं। वैज्ञानिक दृष्टि वाली भाषा दी है। ये शायर भी उसी विरासत का हिस्सा हैं।  हमारी ही ज़मीन का शायर ।

गुलों में रंग भरे बादे नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास ये यारों सबा से कुछ तो कहो 

कहीं तो बहरे-ख़ुदा आज ज़िक्रे-यार चले 



फ़ैज़ अहमद  फ़ैज़ के  बारे में कहने लिखने से पहले लेखक कहा करते थे शायरी की दुनिया में फ़ैज़ के मुक़ाम उनकी शख़्सियत और उनके फ़न की बुलंदियों को लेकर कुछ भी कहना हमारे लिए आसान नहीं है फिर ये कौन है जो इतनी आसानी से इतने उम्दा शायर को ज़लील किये जा रहे हैं?