बुधवार, 25 दिसंबर 2019

क्या यह निज़ाम शांतिपूर्ण विरोध की ज़ुबां समझता है ?

निर्दोष लोगों को जब यूं पिटते ,जेल जाते और मरते देख रही हूँ तो सोचती हूँ कि क्या वाक़ई यह निज़ाम शांतिपूर्ण विरोध की ज़ुबां समझता है ? गमला भी वही अच्छा माना जाता है जिसमें पानी की निकासी का छेद ज्यादा बड़ा न हो वरना सारा पानी बह जाएगा और पौधा जीवित नहीं रहेगा। कहीं पढ़ा था कि बापू की अहिंसा और सत्याग्रह को समझने का जो माद्दा ही अगर अंग्रेज़ सरकार में ना होता तो शायद आज़ादी मुमकिन नहीं थी। फिर भी निजी तौर पर मुझे लगता है कि वह बापू का क़द था जो इस गौरी सरकार को झुकाने में क़ामयाब हुआ। उनकी पारदर्शिता, परमार्थ और नैतिक बल ने उनके दुश्मनों को भी उन्हीं के सामने पिघलने पर मजबूर किया। हमारे देश के राज्यों के गमलों  के छेद बहुत बड़े हैं।  उत्तरप्रदेश,कर्नाटक और दिल्ली  के गमलों के छेद ना केवल बड़े हैं बल्कि ये गमले ही जड़ों को कस रहे हैं, काट रहे हैं। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन वहां  के लिए मायने रखता है जहाँ उसकी इज़्ज़त हो ,उसे समझ पाने का मानस हो।  हम उनसे वफ़ा की उम्मीद कर रहे हैं जो ये जानते ही नहीं कि यह है क्या। 
कोई अपने बंधुओं को ढूंढ़ने गया तो पीट दिया गयाऔर गिरफ़्तार कर लिया गया, किसी माता-पिता को एक साल के बच्चे से अलग कर जेल में ठूंस दिया गया ,शादी ब्याह में छुट्टी मज़दूरी करनेवाले ग़रीब के तो पेट में ही गोली दाग़ दी गई। एक पिता चौराहे से अपने स्कूल से लौटे बच्चे को  लेने आया था, पुलिस की गोली उसे ही चीर गई। ये किनका ख़ून बहा रहे हैं हम। हमारी चुनी हुई सरकारें इतनी क्रूर कैसे हो गईं। इस क़दर पत्थर सरकारें ? माफ़ कीजिये लेकिन ये निज़ाम शांति की भाषा नहीं समझ रहा। यह जनभावना उन्हें अपना निरादर लग रही है। वे नहीं समझ पा रहे हैं कि जनता आख़िर उन्हीं से उम्मीद भी करती है , जो वह हताश होगी तो कहाँ जाएगी ? इन दुःखद घटनाओं को देख यही लग रहा है कि अगर आप उत्तरप्रदेश में हैं तो प्रदर्शन में भाग ना लें।  बड़े प्रधान से क्या उम्मीद की जाए वे तो यही नहीं मान पा रहे हैं  कि नागरिकों में नागरिकता क़ानून का विरोध है।  वे तो पूरे मुद्दे को इस तरह सम्बधित कर रही हैं जैसे सड़कों पर उतरी यह जनता किसी अन्य राजनीतिक दल के बहकावे में आ गई  है। 

इन दुःखद घटनाओं को देख यही लग रहा है कि अगर आप उत्तरप्रदेश में हैं तो प्रदर्शन में भाग ना लें। बड़े प्रधान तो यही नहीं मान पा रहे हैं कि नागरिकों में नागरिकता क़ानून का विरोध है। वे तो पूरे मुद्दे को इस तरह सम्बोधित कर रहे हैं जैसे सड़कों पर उतरी यह जनता किसी अन्य राजनीतिक दल के बहकावे में आ गई अपराधी हो । उतरप्रदेश में इनकी तस्वीरें लगवाई जा रही हैं, इनाम घोषित किये जा रहे हैं। दूसरा कार्यकाल आख़िर अपने ही लोगों के प्रति इतना सख्त क्यों? 



P S: जो हक़ीक़त में जनता के मनोभावों की क़द्र होती तो यूं बिना कोई वक्त लिए NRC की जगह NPR नहीं आ जाता।



गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

आओ नागरिक यहाँ आकर पकौड़े तलो !

वे बुनियादी काम भी करते हैं तो कुछ इस अंदाज़ में कि सांप्रदायिकता का ज़हर खौलते  रहना चाहिए। फ़िलहाल वह जगह लोकतंत्र का मंदिर है। जो यह अंगीठी पर खौलता रहेगा तो नथुनों में जाएगा। शाम को टीवी चैनलों को बहस का नया मुद्दा मिलेगा। ऐसा नहीं है कि वे काम नहीं करते, करते हैं लेकिन इस मुद्दे के अलाव को बुझने नहीं देना चाहते। जो आपने इसे बूझ लिया तो सब समझ जाओगे। डर जाता रहेगा किसी से उम्मीद नहीं करोगे। अपने देश को ख़ुद बनाओगे जैसा चाहोगे।

बात नागरिकता संशोधन अधिनियम CAB की ही है। कुल जमा दो लोगों को यह तय करने का फ़ितूर सवार है कि वे अब नागरिकता भी बाटेंगे न केवल देशवासियों को बल्कि पड़ोसी देश के निवासियों को भी। क्यों भई क्यों दोगे हमारा हक़ किसी और मुल्क को और सच तो यह है कि आप तो हमें  हमारा ही हक़ नहीं दे पा रहे। किसान परेशान है, युवा बेरोज़गार है, महिला पीड़ित है और अर्थव्यवस्था गर्त में है और आपको पड़ोस से नागरिक बुलाकर  क़ानून बनाने की फिक्र हो रही है। न लिखो आप मुसलमान का  नाम इस बिल में आप औरों को भी  ख़ैरात क्यों बाँट रहे हो  ? ये दूसरे देश के अल्पसंख्यकों की फ़िक्र भी झूठी है क्योंकि आप उस देश में उनका जीना भी मुश्किल कर रहे हैं। क्या कीजियेगा आप उन्हें बुलाकर ? पकौड़े  तलवाइयेगा ? रोज़गार तो यूं भी नहीं था जिनके पास था वे भी अब  पकौड़े  ही तल रहे हैं। काम की उम्र बेगारी ले रहे हैं। 

बिल पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान के गैर मुस्लिमों को शरण देने की बात करता है क्योंकि सरकार का मानना है कि वे वहां प्रताड़ित है। चलिए मान लिया। शरण मांगने वाला ज़ाहिर है कोई आसुदा हाल तो होगा नहीं। विभीषण ने भी भगवान राम से शरण मांगी थी। वे रावण के लतियाए हुए थे। राम के सहयोगी विभीषण  की शरण के पक्ष में नहीं थे लेकिन राम ने उन्हें शरण दी। दुश्मन के भाई को पनाह दी क्योंकि वह सताया हुआ था। मापदंड केवल एक था सताया जाना। भगवान राम का जाप करनेवाली सरकार का भी क्या यही मापदंड है ? लेकिन उन्होंने तो यहूदी, मुसलमानों और नास्तिकों को इससे बाहर रखा है। स्वामी विवेकानंद ने ख़ुद शिकागो में कहा था कि मुझे गर्व है कि  मैं उस भारत से आता हूँ जहाँ हर धर्म हर क्षेत्र के लोगों को शरण और आश्रय मिला जो सताए गए थे।  दरअसल हैरानी तो इस बात है कि जिन नामों का इस्तेमाल भाजपा अपना नैतिक बल बढ़ाने में करती है ,वही भाव  कैब (सिटिजनशिप अमेंडमेंट बिल) से गायब है।

आज उत्तर-पूर्व जल रहा है। खासकर आसाम  क्योंकि यहाँ NRC ने कहर बरपाया है जिसे सुधारने का जतन भाजपा कैब से करने जा रही है। उत्तरपूर्व के राज्य जिस विरोध को प्रदर्शित कर रहे हैं वह बता रहा है कि सरकार परिस्थितयों को समझने में नाकाम रही है। कश्मीर के बाद अब आसाम नई चुनौती बनने जा रहा है। यहाँ पुलिस फायरिंग में दो लोग मारे गए हैं। इंटरनेट बंद कर दिया गया है। भारत की विविधता को समझने की इच्छाशक्ति और इरादे के बिना कोई सरकार पांच साल  तो निकाल सकती है लेकिन लोकप्रिय नहीं हो सकती।  NRC में जब कई नागरिक छूट गए तो CAB का सहारा लिया गया जो गले का फंदा बनने जा रहा है।

आखिर में बात उस मुसलमान शब्द की जिसे CAB में शामिल नहीं किया गया है यानी उस कढ़ाव को उबलता रखा गया है जिससे सांप्रदायिकता की सियासत को खाद-पानी मिलता रहे । गृहमंत्री  कहते हैं देश  के मुसलमानों  को डरने की ज़रुरत नहीं है। सवाल यह है कि ऐसा कहना ही  क्यों पड़ता है ? किसी भी नागरिक को यूं संबोधित करने की नौबत क्यों आती है ? सिखों को डरने की ज़रुरत नहीं ,बौद्धों , जैनियों को डरने की ज़रुरत नहीं। यह भेद एक सरकार के स्तर पर किस कदर हेय मालूम होता है। सत्तर सालों में देश जैसे जिन्ना के द्वि-राष्ट्रवाद सिद्धांत के क़रीब पहुंच गया हो।  बेशक़ वह  एक नाकाम थ्योरी साबित हुई है। हम भला क्यों उस कीचड़ को मल रहे हैं समझना उतना मुश्किल भी नहीं  है। CAB के पारित होने से हर तरफ़ निराशा है। मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचेगा लेकिन हम भारत के लोग हर हाल में अपनी विरासत से देश गढ़ेंगे कोई एक दल और उसके दुविधाग्रस्त सहयोगी इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते । 

P S: बांग्लादेश के मंत्रियों ने अपनी भारत यात्रा रद्द कर दी है। उधर USCIRF यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ़्रीडम ने इस बिल के पास होने पर अफ़सोस जताते हुए कहा है कि बदले में अमेरिकी सरकार भारत के गृहमंत्री के प्रतिबंध पर विचार कर सकते है।