Saturday, April 13, 2019

उधर सौ साल और इधर ?

अँगरेज़ हुकूमत ने ख़ून से नहला दी थी वह बैसाखी 
आज बैसाखी है। उल्लास और उमंग का त्योहार लेकिन 100 साल पहले अंग्रेजों ने इसे ख़ूनी बैसाखी बना दिया था। निहत्थे और मासूम लोगों पर अमृतसर में ब्रिगेडियर जनरल (अस्थाई) रेजिनाल्ड डायर ने गोलियां बरसाकर बता दिया था कि वे दरअसल एक ख़ूनी फ़ौज हैं। गैर सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1600 निर्दोष इस हत्याकांड में मार दिए गए थे जबकि सरकार ने 379 मौतों की पुष्टि की थी।  इस दरिंदगी के 100 साल बाद  गोरों ने अफ़सोस जताया है लेकिन माफ़ी नहीं मांगी है। बीते बुधवार को ब्रितानी प्रधामंत्री  थेरेसा मे ने संसद में इस कुकृत्य पर अफ़सोस  प्रकट किया लेकिन माफ़ी नहीं मांगी।  इससे पहले प्रधानमंत्री डेविड कैमरून भी खेद जाता चुके हैं। हम भारतीय बरसों से माफ़ी की प्रतीक्षा में हैं। उन्होंने कहा कि जलियांवाला बाग़ हत्यकांड भारत और इंग्लैंड के इतिहास पर लगा शर्मनाक धब्बा है। यह अफ़सोस भी पूरे सौ साल बाद ज़ाहिर हो सका है, बेशक थेरेसा मे उस वक़्त पैदा भी नहीं हुईं थीं लेकिन ऐसा माना जाता है कि सरकार एक लगातार चलनेवाला सिलसिला है।

  ख़ून तो हमारे अपनों ने भी अपनों का बहाया है लेकिन अफ़सोस आज तक नहीं जताया है। क्या इसके लिए भी  100 साल का इंतज़ार करना पड़ेगा?  क्या 2102 में कोई माफी आएगी ?  कहा जाता है इन्साफ में देरी होना इन्साफ न होने के बराबर है तो इन सामूहिक नरसंहारों के लिए चेतनाशून्य बने रहना क्या  है? इसका स्वीकार लिया जाना ? हां, गुजरात नरसंहार के लिए किसी ने अब तक कोई ज़िम्मेदारी नहीं ली है। शायद बाद के बरसों में किसी नुमाइंदे की कभी कोई संवेदना जागे। ऐसा ही बदनुमा दाग़ तत्कालीन कॉंग्रेस सरकार पर भी है जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में सिखों का क़त्ल ए आम हुआ था।  माफ़ी की अपेक्षा यहाँ भी रही। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने 12 अगस्त 2005 को ना केवल सिख समूदाय से बल्कि पूरे देश से क्षमा मांगी । ऐसा करके एक तरह से उन्होंने 1984 के दंगों में मारे गए सिखों के प्रति संवेदना के साथ उत्तरदायित्व लेना भी स्वीकार किया था। उन्होंने कहा था कि जो कुछ 1984  में हुआ था वह हमारे संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाता है। गुजरात नरसंहार के समय आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां के मुंख्यमंत्री थे। सरकारी तंत्र के साए तले हुए नरसंहार के घाव भरना लगभग नामुमकिन होता है क्योंकि पीड़ित रक्षा के लिए आखिर किस से उम्मीद करेगा। यह वैसा ही जलियांवाला बाग़ होता है जिसके भीतर जाने के लिए बस एक संकरी गली होती है और भगदड़ के वक़्त वह भी नज़रों से ओझल हो जाती है। 


PS: लकवे का शिकार डायर अंतिम
समय में यही बुदबुदाते हुए मर
गया - 'कुछ लोग कहते हैं मैंने
ठीक किया और कुछ कहते हैं
गलत किया। अब मैं मर जाना
चाहता हूं और गॉड से पूछना
चाहता हूं कि मैं सही था या
गलत। वैसे इस अन्याय की कोई सज़ा ब्रिटिश सरकार ने डायर को नहीं दी। 

3 comments:

शिवम् मिश्रा said...

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 13/04/2019 की बुलेटिन, " १०० वीं बरसी पर जलियाँवाला बाग़ कांड के शहीदों को नमन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

सुशील कुमार जोशी said...

शहीदों का दर्जा देने के बारे में भी सोचें सरकारें।

varsha said...

Dhanywad shiwam ji..
Sushil ji sarkar Ko manna hi chahiye ve Shaheed hi hain.