सोमवार, 4 मार्च 2019

शिव की चली बारात

शिव-शक्ति,  पेंटिंग -उदय चंद गोस्वामी 

 मुझे औघड़ बाबा का यह जीवन दृश्य बहुत प्रिय लगता है। वही थोड़ी ऊट -पटांग सी बारात वाला। कभी कोई पूछे तो इसी दृश्य को साक्षात् देखना चाहूंगी। बचपन में एक बार मंच पर शिवशंभू का  तांडव  देखा था और उसके बाद इंदौर में हेमा मालिनी की नृत्य  नाटिका दुर्गा । भोले बाबा का शिव तांडव। वाकई व्यक्तित्व का कितना गहरा विस्तार है नीलकंठ । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिव-शंकर  को वैरागी से गृहस्थ बनाने के लिए देवी शक्ति ने तपस्या की थी। विवाह में उनको दूल्हा बनकर आना था। अब जटाधारी ठहरे पूरे वैरागी। दूल्हा कैसे बना जाता है उन्हें कुछ मालूम नहीं। वे घोड़ी  के बजाय बैल पर चढ़कर आ गए। हार की बजाय नाग को गले में लपेट लिया। शरीर पर चंदन नहीं, भस्म मल ली। वस्त्र के नाम पर हिरण की छाल लपेट ली। अब महादेव के बाराती कौन होते।  उनमें कोई देवगण  नहीं बल्कि भूत पिशाच और राक्षस साथ आये। कैलाशवासी अमृत के बजाय विष पीते ही विवाह मंडप में पहुंच गए। यह सब हुआ महाशिवरात्रि की रात को। इसी दिन त्रिदेव  ने देवी की आराधना सुनकर वैरागी रूप तजकर सांसारिक जीवन चुन लिया। शिव -शक्ति यानी सृष्टि की बुनियाद।

कंटेंट क्रेडिट-देवदत्त पटनायक