रविवार, 24 फ़रवरी 2019

गाली गलौज और बलात्कार जैसी घृणित टिप्पणियों का सोशल मीडिया


जिस तरह से महिला पत्रकारों , सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिज्ञों को गालियां दी जा रही है ,लिंग की तस्वीरें भेजी जा रही हैं और उनकी देह की नापतौल की जा रही है वह भीतर तक घृणा और जुगुप्सा से भर देता है। मुद्दों पर बोलने में तो इनकी  ज़ुबां तालू में धंस जाती है लेकिन सोशल मीडिया पर अपशब्द लिखने ,फोटोशॉप से उनकी नग्न तस्वीर बनाकर भेजने, उनके नामों को कॉल गर्ल की लिस्ट में जोड़ने की क़वायद में वे एक दूसरे को जबरदस्त टक्कर दे रहे हैं।  क्या ये लोग एक बार भी नहीं सोच पाते होंगे कि हम उनके दिमाग से की गयी बातों का जवाब उनकी देह पर टीका टिप्पणी से दे रहे हैं। पत्रकार राना अय्यूब  का चेहरा एक पोर्न एक्ट्रेस से रिप्लेस कर चलाया जाता है। पत्रकार सागरिका घोष भी ऐसे ही ट्रोल होती हैं। बरखा दत्त ज़रूर ऐसे लोगों को एक्सपोज़ करने में लगी हैं।

बहुत संभव है कि आप पत्रकार बरखा दत्त की कश्मीरियों के प्रति उदारता से इत्तेफ़ाक़ ना रखते हों, कुछ और मसलों  पर भी आपकी नाराज़गी हो लेकिन बदले में तर्क रखने की बजाय आप तो जैसे बदले पर उतर आते हैं। यही तो कहा था उन्होंने कि इस संकटकाल में कश्मीरियों के लिए मेरे दरवाज़े खुले हैं। जवाब में उन्हें गोली मारने और बलात्कार  की धमकी दी गई। उन्हें अश्लील तस्वीरें भेजी गईं और जब बरखा दत्त ने इन आपराधिक किस्म  के सन्देश भेजने वालों के नाम और नंबर ट्विटर  पर साझा किये तो उलटे उन्हीं का अकॉउंट 12 घंटे के लिए बंद कर दिया गया। पत्रकार अभिसार (उन्होंने पुलिस में शिकायत भी की) रवीश कुमार सबके साथ यह हो रहा है लेकिन महिलाओं की सेक्सुलिटी पर हमला होता है तो सीधे उनके  वजूद को ठेस पहुँचती है। इसे बर्दाश्त कर पाना बहुत ही मुश्किल होता है।  यह बात ट्विटर को समझा पाना मुश्किल है जिसकी नीतियां यूं तो जेंडर के प्रति उदासीन होकर चलने की वकालत करती हैं और वे इस संवेदनशीलता को समझ ही नहीं पाते । पत्रकार बरखा  ने ट्विटर सीईओ जैक डोरसी को सम्बोधित करते  हुए लिखा है  कि आपके लिए पुरुषों की निजता ज़्यादा ज़रूरी है एक महिला कि नहीं जिसे बलात्कार और हत्या की धमकी दी जा रही है और कहीं यह श्वेत महिला की तकलीफ होती तब भी आप ऐसा ही रवैया रखते।


 प्रियंका गांधी को जब देहयष्टि के दलदल में खींचा जाता है तो वह सिर्फ और सिर्फ़ ग़लीज़ मानसिकता को ही नग्न करता है। जिसका भाव होता है कि 56 इंच के सीने के आगे उनके स्त्री प्रतीक कोई मायने नहीं रखते। ज़ाहिर  है ऐसे गिरे हुए वक्तव्यों  के  कोई प्रतिउत्तर आपके पास नहीं हो सकते हैं ।  इसीलिए देह लगातार  निशाना बन रही है। राजस्थान की विधायक रही हैं  कमला। तत्कालीन सिंचाई मंत्री  ने उनके सवाल का जवाब भद्दे इशारे के साथ दिया था। मंत्री ने जंघा की ओर इशारा किया था कि यहाँ आकर बैठ जाओ। अब जब मंत्री ही इस सोच से मुक्त नहीं तो सोशल मीडिया पर तो  यूं भी राजनीतिक दलों के पिट्ठू तैनात हैं। यहाँ तो हमले सुनियोजित भी हैं। भंवरी देवी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता थीं। उच्च समाज का एक बालविवाह रुकवाया था उन्होंने ।https://likhdala.blogspot.com/2009/11/blog-post_18.html  
 उनके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ।  जज का सवाल था कि ऊंची जाती के लोग निम्न जाती से बलात्कार कैसे कर सकते हैं। आज भी क्या बदला   है। स्त्री को अपमानित करने के लिए यही हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
क्या वक़्त नहीं आ गया है कि महिला स्वयं अपने शरीर को इस अपमान से मुक्त कर ले। यानी इसे तवज्जो ही न दी जाए। ऐसी घृणित हरकत  वही कर सकता है जो स्त्री की मौजूदगी इन्हीं अर्थों में देखता है। जब देह से जुड़ी टीका टिप्पणी को ही गंभीरता से नहीं लिया जाएगा तो वह खुद  बेअसर साबित होगी। एक बार फिर बड़ा और मज़बूत बन के स्त्री को ही आना होगा। अपनी देहयष्टि से परे एक दुनिया में । समानता की दुनिया में । ये दुष्ट और उनके समर्थक तब ही परास्त होंगे क्योंकि द्रोपदी की तरह प्रतिज्ञा लेने के लिए भी कृष्ण का होना ज़रूरी है जो द्वापर युग में संभव था। इस कलियुग में नए फैसले अपने दम पर ही लेने होंगे बिना कृष्ण का इंतज़ार किये।

P S : पुलवामा में सैनिकों की शहादत के बाद अगर जो ऐसा उन्माद पनपा है तो माफ़ कीजिए इसका देशभक्ति से कोई ताल्लुक नहीं हो सकता।





शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

यह कैसी डेट


अगर किसी जोड़े को डेट के लिए जेल का परिसर केवल इसलिए  मिलता है क्योंकि उनमें से एक  सरकार के ख़िलाफ़ टिप्पणी कर देता है तो यह कोई उदार सरकार का चेहरा तो नहीं कहा जा सकता 

अपनी एक फैसबुक पोस्ट में वह लिखती है, आज वह डेट पर है। उम्र कोई हो, धड़कने इस मोड़ पर एक पाठक की भी थोड़ी व्याकुल हो ही जाती हैं लेकिन वहां पर न तो कोई रूमानी माहौल था और ना कोई वैसा उत्साह जो कभी बीस साल पहले इम्फाल में रहते हुए उसने  महसूस किया था। वह जेल का परिदृश्य था। वह अपने पति से मिलने आई थी। पति किशोरचंद्र वांगकेम पत्रकार हैं और उत्तर पूर्व के राज्य मणिपुर में सलाखों के पीछे डाल दिए गए हैं। अपराध था मणिपुर सरकार की आलोचना का । मुख्यमंत्री बिरेन सिंह मणिपुर में भारतीय जनता पार्टी के पहले मुख्यमंत्री हैं और पत्रकार का गुनाह ये  कि उन्होंने राज्य में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जन्मोत्सव को मनाए जाने के खिलाफ अपनी पोस्ट में विवादस्पद वीडिओ का उपयोग किया था।  पत्रकार ने मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को केंद्र सरकार की कठपुतली कहते हुए लिखा था, विश्वासघात न करें, मणिपुर के स्वतंत्रता सेनानी का अपमान न करें। मणिपुर के वर्तमान स्वतंत्रता संग्राम का अपमान मत कीजिए। मणिपुर के लोगों का अपमान मत करो।  इसलिए, मैं यह फिर से कह रहा हूं, आप मुख्यमंत्री हैं आइए और मुझे दोबारा गिरफ्तार करें, लेकिन मैं अभी भी आपको कहूंगा, हिंदुत्व की कठपुतली हैं आप।  वहीं इस मामले में पत्रकार की पत्नी इलेंगबम रंजीता ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि 26 नवंबर 2018 को उसके पति को 70 हजार के मुचलके पर बेल दे दी गई थी लेकिन अगले  ही दिन उनके घर पर कुछ पुलिस वाले आए और उन्हें जबरन उठा ले गए। 
उसके बाद से पत्रकार देशद्रोह के आरोप में जेल में हैं। इलेंगबम कहती हैं कि मैं मानती हूँ की उन्होंने सख्त शब्दों का प्रयोग किया लेकिन यह देशद्रोह कैसे हो गया। 

सवाल यही है कि क्या हमारे देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी केवल इतनी ही है कि आप सरकार कीआलोचना नहीं कर सकते और करते ही देशद्रोही हो जाते हैं। अगर किसी प्रदेश का नागरिक अपनी अपेक्षाएं सरकार को बताए तो इसमें गलत क्या है। अगर आज मेरे प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत के लिए मैं कहूं कि गुर्जर आंदोलन को समय रहते ही देख लिए जाना चाहिए था या कि यह उनकी भूल है जो फिर पटरियां उखड़ने के नौबत आई तो क्या मैं देशद्रोही करार दी जा सकती हूँ और जो मेरे मुख्य्मंत्री कोई ऐसा भव्य कार्यक्रम राज्य में करें जिससे राज्य की जनता कम इत्तेफ़ाक़ रखती हो और मैं इस बाबत कुछ लिख दूँ तो राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत गिरफ़्तार की जा सकती हूँ ? यानी बेहतर हो कि मैं मौन रहूंमुझे कोई हक़ नहीं अपनी राय ज़ाहिर करने का? मणिपुर के ये पत्रकार 27 नवंबर से जेल में हैं पत्नी दो नन्हीं बेटियों के साथ कई मोर्चों पर जूझ रही हैं। पांच साल की मासूम पूछती है कि पापा जेल में हैं, क्या जेल अच्छी जगह है? माँ के पास कोई जवाब नहीं होता सिवाय इसके कि वे जल्द आएंगे और ढेर सारे खिलौने लाएंगे। बहरहाल 22 फरवरी इस परिवार के लिए सुखद तारीख हो सकती है जब पत्रकार की अपील सुनी जाएगी। अलग आवाज़ों को सुनने का हुनर सर्वशक्तिशाली सरकारों में नहीं  होगा तो अकेली इलेंगबम रंजीता किससे उम्मीद रखेंगी । यक़ीनन उनकी ऐसी डेट ख़त्म होनी चाहिए वरना हम सब एक ही सुर में विलाप कर रहे होंगे जबकि हमारा गीत है मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा।