शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

कहां है भारतीयता ?

image : savita pareek

 

  गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर बस एक ही ख्याल मन में विचरता दिख रहा है कि आख़िर यह भारतीयता है क्या कहाँ बस्ती है ये? किसी को दर्शन करना हो तो कहाँ जाए? क्या वह भारतीयता थी जब कबीर अपनी वाणी से ऐसा महीन दोहा रचते थे जो मानवता को पहली पंक्ति में ला खड़ा करता था।  झीणी चदरिया बुनते-बुनते कबीर मानवीय गरिमा को जो ऊंचाई दे गए वह हम जैसों पर  आज भी किसी छत्र-छाया सी सजी हुई है। 
पाथर पूजे हरी मिले तो मैं पूजूँ पहाड़ 
घर की चाकी कोई ना पूजे जाको पीस खाए संसार

या फिर भारतीयता  कबीर नाम के उस  बालक में है जो मिशनरी स्कूल के समारोह में फ़ादर के पैर छू लेता है और ऐसा वहां कोई दूसरा नहीं करता। कबीर की बुनी चदरिया की छाया से आगे जो चलें तो देखिये बापू क्या कहते हैं-"मुझे सब जगह चरखा ही चरखा दिखाई देता है क्योंकि मुझे सब जगह ग़रीबी ही दिखाई देती है। मैंने चरखा चलाना सांप्रदायिक  धर्मों से कहीं श्रेष्ठ  माना है। यदि मुझे माला और चरखा में से किसी एक को चुनना हो तो जब तक देश ग़रीबी और फ़ाकाकशी से पीड़ित है तब तक मैं चरखा रूपी माला फेरना ही पसंद करूँगा। 

भारतीयता फिर क्या वहां है जब  बनारस के समीप पहुंचकर चचा  ग़ालिब  कहते हैं- सोचता था इस्लाम का खोल उतार फेंकू, माथे पर तिलक लगा, हाथ में जपमाला लेकर गंगा किनारे बैठकर पूरी जिंदगी बिता दूं, जिससे मेरा अस्तित्व बिलकुल मिट जाए। गंगा नदी की बहती धारा में एक बूंद पानी की तरह खो जा सकूं। बांग्ला लेखक रविशंकर बल जब दोज़ख़नामा में मिर्ज़ा ग़ालिब और मंटो को मिलवाते हैं तो भारतीयता वहीं झंडा थामे दिखती है। या फिर बिस्मिल्लाह खां साहब की शहनाई में जिसके सुर इसी बनारस के घाट की प्रतिध्वनि बन गूंजते हैं।  शायद भारतीयता  किसी भी खास धर्म जाति या नस्ल में नहीं है । ना ही किसी खान-पान, वेशभूषा, बोली के दायरे में बंधी है। शायद भारतीयता एक विशाल समुद्र में है जो कई सदियों की गहराई और मनवीयता खुद में समेटे हुए है।  भारतीयता हमारी नैतिकता में है ,सबके काम आने में है ,सबके दुःख-दर्द में शामिल होने में है, विरोधियों को जीने में है। बुद्ध और महावीर के ज्ञान और त्याग में है। सावित्री के प्रेम में है ,सीता की गरिमा में है ,द्रोपदी के साहस में है। 

यहाँ सदियों से लोग आते-जाते रहे हैं। इस धरा पर उनका आवागमन फिर अन्ततः  एक भारतीयता में ही बदलकर रह जाता है। हवाओं में भीनी ख़ुशबू की तरह। अविभाज्य। हमारी ख़ुशकिस्मती की यही अविभाज्य एक संविधान बनाकर हमारे पुरखों ने हमें दे दिया है। इसके मूल में यही भारतीयता है। जो हम आज इस अविभाज्य को समझ रहे हैं तो हम भारतीय गर्व के साथ सबसे ऊंचे खड़े हैं और जो संविधान को शक की निगाह से देख रहे हैं तो हम खुद की  ही  ज़मीन खींच रहे हैं। 

गणतंत्र दिवस मुबारक दोस्तो। यह बहुत बड़ा दिन है।  

बुधवार, 23 जनवरी 2019

बार डांसर की रोज़ी से सरकार को क्या ?




रोजी सबका हक है  फिर चाहे वह नाचकर ही क्यों न कमाई जा रही हो….   बुरा लगता  है  तो इस अनपढ़,बेबस,लाचार आबादी को काम दीजिये उसके बाद इस पेशे को  जी भरकर कोसिये …मेरी  राय में तो यदि पुरुषों  के नाच में महिलाओं को आनंद आता है तो उन पुरुषों को भी  पूरा हक़ है कि वे अपने पेशे को जारी रखें





फ़र्ज़ कीजिये कुछ महिलाएं एक डांस बार में पुरुषों के नाच का आनंद ले रही हों और उन्हें टिप भी देती हों और उनके ठुमकों पर खुश भी हो रही हों। पुरुष युवा हैं और उन्हें इस पेशे से अच्छी आय हो रही है। यूं भी नौकरी कहां आसानी से नसीब होने होती है। ऐसे में क्या पुरुष डांसर्स से केवल इसलिए उनका काम छीन लिया जाना चाहिए क्योंकि यह कुछ को अनैतिक लगता है। क्या यह एक पर्याप्त कारण है किसी से उसका रोज़गार ले लेने का जो वह दिन भर के दूसरे काम के बाद बतौर पार्ट टाइम अपनी शाम की पाली में करता है। यह काम उसे अतिरिक्त आय मुहैया करता है और शायद नाचने के उसके शौक को एक मंच भी।  इस काम से वह अपने परिवार को बेहतर जीवन शैली देता है। और जो यहाँ पुरुष की जगह महिलाएं हो तो क्या हमारी नैतिकता को कुछ ज़्यादा ठेस लगती है ? क्यों लगनी चाहिए जब कोई अपनी मर्ज़ी से अपना काम चुनता है और बदले में कुछ धन अर्जित करता है? स्त्री हो या पुरुष देखने का यह नज़रिया इतना अलग क्यों ? काम की ज़रुरत दोनों को सामान है फिर लिंगभेद क्यों ?

साल 2005 में जब महाराष्ट्र के एनसीपी सरकार के गृहमंत्री ने मुंबई और महाराष्ट्र के इन डांस बार्स को बंद करने का फरमान जारी किया तो लगभग एक लाख से ज़्यादा लोग और अस्सी हज़ार से ज़्यादा बार गर्ल्सबेरोज़गार हो गईं।  बार गर्ल्स पर तो जैसे आफत ही टूट पड़ी। ये वो लड़कियां थीं जो छोटे-छोटे शहरों से छोटे-बड़े काम करते हुए कई बार शोषण का शिकार हुईं थीं। आर्थिक, दैहिक, मानसिक शोषण से टूट चुकीं लड़कियों को जब डांस बार ने एक ठहराव की नौकरी दी तो हमारा झूठा नैतिक पैमाना गतिमान हो गया। उन्हें फिर उसी दलदल में  फेंकने पर उतारू हो गया। काम का दूसरा कोई विकल्प  ना देकर  डांस बार्स को बंद करने का आदेश जारी कर दिया गया। ऐसे हालत पैदा कर दिए जहाँ वे फिर किसी देह-व्यापर के  कुचक्र में  उलझ जाएं या फिर ऐसे असंगठित क्षेत्र के  काम को मजबूरी में चुन ले जहाँ न वेतन सही है और न काम के घंटे। 
    चांदनी बार नमक फिल्म बनाने वाले निर्देशक मधुर भंडारकर ने एक बार कहा था कि  मुझे यह बार सबसे ज़्यादा पवित्र जगह लगे। बार में डांस करनेवाली लड़कियां मंच पर जाने से पहले पूजा करती हैं नमाज़ पढ़ती हैं। कुछ शादीशुदा हैं और बच्चों को घर छोड़कर आती हैं। किसी भी दूसरी माँ की तरह वे बच्चों से उनके होमवर्क के बारे में पूछती हैं। कुछ ऐसी भी हैं जो दोहरी ज़िन्दगी जी रही हैं नाम बदल लेती हैं और अपनी पिछली ज़िन्दगी से मुक्त होकर नई शुरुआत करना चाहती हैं। शगुफ्ता रफीक को  सब लम्हे , राज -3 मर्डर -3 , आशिकी -2 जैसी फिल्मों की लेखिका के बतौर जानते हैं   लेकिन कभी उनकी ज़िन्दगी भी डांसबार्स की गलियों से गुज़री थी। ग्यारह साल की उम्र से उनकी ज़िंदगी कभी वैश्यालयों तो कभी वक़्त की कड़ी ठोकरों के बीच बीती। पिता का पता नहीं था। 2005 में जब डांस बार्स पर महाराष्ट सरकार ने प्रतिबन्ध लगाया तो वे पूरी तरह से निराशा हो चुकीं थीं। इसी अँधेरे समय ने शगुफ्ता रफीक को वह अवसर दिया जहाँ से उनकी ज़िन्दगी बदल गई। वे डांस बार्स पर रोक के हक में बिलकुल नहीं  और मानती हैं कि ये उन गरीब और शोषित लड़कियों को बेहतर जीविका मुहैया करते हैं। शगुफ्ता की ज़िंदगी इस बात की तस्दीक करती है कि जब जीवन को मज़बूत आर्थिक आधार मिलता है तब पसंद का काम भी पाया जा सकता है जो उन्हें बार गर्ल की जॉब के बाद पटकथा लेखक बतौर मिला। ज़िन्दगी के अनुभव की आंच ने उनसे ये पटकथाएं लिखवाईं। 
शायद इन्हीं कारणों से  अगस्त 2005 के सरकारी आदेश के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट को लगा कि डांस बारों को बंद करने का महाराष्ट्र सरकार का फैसला गैर-कानूनी था और महाराष्ट्र सरकार को ऐसा भरोसा क्यों था जो वह मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गई?  दरअसल, मुंबई, पुणे और अन्य शहरों में साल 2005  तक अस्सी हजार से भी ज्यादा बार डांसर्स थीं। अस्सी से नब्बे फीसदी स्त्रियां वहां रोज़गार के लिए हैं। किसी का पति बीमार है, किसी ने प्रेम में धोखा खाया है, किसी के पास बूढे़ माता-पिता के साथ छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी है, तो कोई इतनी फुर्ती से अब नहीं नाच सकती जितनी कि फिल्मों की एक्स्ट्रा को नाचना पड़ता है। ये पेशा उन्हें  रोटी देता है। यह काम है उनका, वैसे ही जैसे आप समय पर दफ्तर जाते हैं। बहुत अधिक अवसर थे कि ये सभी किसी चकलाघर में धकेल दी जातीं जहां देह बेचकर उन्हें रोजी कमानी पड़ती। लेकिन बार डांसर्स यहां नाचकर उस जिल्लत से बची हुई थीं। 
   सवाल किया जा सकता है कि यही काम क्यों जरूरी है? दूसरी मेहनतकश महिलाओं की तरह वे भी घरों में काम कर सकती हैं, मजदूरी कर सकती हैं। जैनब और मोनिका के बयानों पर गौर कीजिए- 'आपको लगता है कि हम सीधे इस जगह पर आ गए। हम भी काम मांगने ही निकले थे। ज्यादा नहीं पांच- हजार रुपया महीना कमाने की ख्वाहिश थी लेकिन काम ढूंढ़ते-ढूंढ़ते ही हमें यहां तक पहुंचा दिया गया। हमारी गलती यह रही कि हम गरीब, कम पढ़ी-लिखी और जरूरतमंद थीं। यहां कोई परेशानी नहीं। कोई टच भी नहीं करता हम लोग को। बस, इन पुलिसवालों का ही डर सवार रहता है। '  शायद हमारे देश में किसी भी तरह की रोक या प्रतिबंध से पहले प्रति व्यक्ति आय यानी आम देशवासी की माली हालत पर गौर करना बहुत जरूरी है। एक बड़ी आबादी आज भी कुपोषण, अशिक्षा और खराब स्वास्थ्य के साथ जीने को मजबूर है। रोजगार के अवसर ऐसी आबादी के लिए ना के बराबर हैं। घरों में सफाई का काम करने वाली महिलाओं का काम तब तक ही सलामत है जब तक वे काम कर पाने लायक  हैं। भविष्य तो असुरक्षित है ही वर्तमान भी महंगाई की मार से धुंधला गया है। अंधेरे में चल रहे रोजगारों की तरफ मुडऩा मजबूरी है। हमारे मानदंड दोहरे हैं। हम बड़ी महफिलों में ठुमके लगाने वाली फिल्मी अदाकारों का तो मान करते हैं लेकिन रोजी के लिए नाच रहीं इन स्त्रियों का नहीं। वरना क्या कारण है कि  थ्री स्टार्स, फाइव स्टार्स में तो डांस बार चलते रहे लेकिन बाकी जगह इन्हें प्रतिबंधित कर दिया गया। 

साल 2016 में महाराष्ट्र सरकार ने कड़े नियम बनाकर डांस बार्स को चलने की इजाज़त दे दी। बार्स में कैमरा ज़रूरी था, मंच को ग्राहक से काफी ऊंचाई पर होना था और वहीँ परिवार के बैठने की व्यवस्था भी हो जहाँ से मंच नज़र न आता हो। मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में आया जहाँ फैसले को सुरक्षित रख लिया गया। बीते सप्ताह जब उच्च न्यायलय ने फैसला सुनाया तो वह इन्हें राहत देने वाला था। कोर्ट ने कहा कि डांसर्स पर पैसे नहीं उछाले जाएंगे। कैमरा ज़रूरी नहीं है, यह निजता का हनन है । रात साढ़े ग्यारह बजे बाद इन्हे नहीं चलाया जाए। यहाँ प्रतिबन्ध नहीं है बस इन्हें नियमित करने की अनुशंसा है। यूं भी रोज़गार के मौलिक हक़ को समाज से कोई ख़ारिज नहीं कर सकता। दरअसल यह क्षमताओं के अनुसार आजीविका चुनने के हक़ का भी सम्मान है। मोरल पुलिसिंग यानी नैतिकता की दुहाई की यहाँ कोई दरकार नहीं है। दरकार है तो इस बात पर विचार करने कि आखिर कौन से आर्थिक और सामाजिक कारण है जो कई बार मजबूरी में उन्हें यहाँ ले आते हैं ?
        समीना दलवई जिन्होंने बारगर्ल्स पर गहरा अध्ययन किया है कहती हैं आखिर क्या वजह है कि इस प्रतिबन्ध पर  तमाम पोलिटिकल पार्टियां सहमत होती हैं।  जाति और लिंग यहाँ बड़ी भूमिका अदा करते हैं। डांस बार्स की बाढ़ आना और फिर  इस पर प्रतिबंध का ताल्लुक वैश्वीकरण से है। उच्च जाती के मर्दों का मनोरंजन है जो समाज के वंचित तबके से आनेवाली ये स्त्रियां पूरा करती हैं। ये बारगर्ल उत्तर भारत के पारंपरिक नाचनेवाले समुदायों  से हैं। इन्हें काम की ज़रुरत है और नए वैश्विक बाजार से पैसा कमाने वाले धनाड्य समुदाय को मनोरंजन की। यहाँ डिमांड और सप्लाय का रिश्ता शुरू होता है। अपने रसूख से पैसा बनानेवाला यह वर्ग इस तरह के मनोरंजन से बड़ी तेजी से जुड़ने लगता है। बार गर्ल्स निम्न  तबके से आती हैं जहाँ आर्थिक सहूलियतें न के बराबर हैं। 80 के दशक में  यह जोड़ खूब काम करता है और डांस बार का नया बाजार जन्म लेता है। 
       समीना का  रिसर्च कहता है कि ये डांसबार्स बॉलिवुड के गानों पर ऐसा समां बांधते जिससे नवधनाड्य वर्ग की वे सामंती इच्छाएं पूरी होती जहाँ वे तवायफों को इर्द-गिर्द नाचते हुए खुद को राजसी ठाठ-बाट वाला महसूस करते। नाच और प्रतिस्पर्धा से भरा यह लाभकारी व्यवसाय कोई खुले में तो होता नहीं था। आराम से चलता रहा। रिश्ते भी आगे बढ़े जो सभ्य समाज को चुनौती मालूम हुए। नाच से होने वाली आय इस तबके को मध्यवर्ग में दाखिल कर रही थी,उनकी जाति और वर्ग से उनकी पहचान टूट रही थी।  और उधर उच्च वर्ग  को अपनी स्थापित पितृसत्ता की चूलें हिलती नजर आईं। परिवार की इकाई को भी चुनौती मिलने लगी। संस्कृति और अच्छी पत्नी वाले महाष्ट्रियन संस्कार परिवारों को जब बारगर्ल्स से  चुनौती मिली तो जैसे सब सोते से जागे। संस्कारी पुरुष का बुरी औरतों पर पैसे लुटाने का यह अंदाज ,राजनीति गलियारों में खलबली मचाने लगा।  बार गर्ल्स अनैतिक लगने लगीं  जो उन्हें अपनी अदाओं में उलझा रही थी। उनका पेशा गरिमाहीन  हो गया और सत्ता के गलियारे इसे बंद करने पर तुल गए। बहरहाल न्याय की सोच न सामंती होती है न भेदभाव वाली। वह रोज़गार के सामान अवसरों की पैरोकार होती है।  नतीजतन फैसला बार गर्ल्स के हक़ में गया। न बार बंद होंगे न नाच पर प्रतिबन्ध होगा। सरकार का हाल यह है कि उसे वैश्यावृत्ति का चलना मंज़ूर है लेकिन डांस बार्स नहीं। देखना यही होगा कि फिर कोई ऐसा प्रतबंध सर न उठा ले जबकि सरकार का दायित्व  महिलाओं को सुरक्षा और व्यवसाय को नियमानुसार चलने देने का है।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

नमो रागा के एक से राग





राहुल गाँधी ने रक्षा मंत्री में पहले जेंडर देखा और फिर उसे भी कमतर देखा वर्ना वे ये नहीं कहते कि " चौकीदार लोकसभा में पैर नहीं रख पाया।  और एक महिला से कहता है कि निर्मला सीतारमण जी आप मेरी रक्षा कीजिए, मैं अपनी रक्षा नहीं कर पाऊंगा।  आपने देखा कि ढाई घंटे महिला रक्षा नहीं कर पाई। '' यह बयान हमारे ही शहर जयपुर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने किसान रैली को सम्बोधित करते हुए दिया। इसके बाद  राष्ट्रीय महिला आयोग ने नोटिस जारी कर राहुल गाँधी से जवाब माँगा है।  उन्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए था लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह कहना चाहिए था कि वह कांग्रेस की कौनसी विधवा (सोनिया गाँधी ) थी जो रूपए लेती थी ,या फिर यह कि क्या किसी ने 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड (शशि थरूर की पत्नी सुनन्दा पुष्कर के लिए तब उनकी शादी नहीं हुई थी ) देखी है या फिर रेणुका चौधरी के लिए यह कहना कि आज बहुत दिनों बाद रामायण सीरियल के बाद ऐसी हंसी सुनने का मौका मिला है। 
ज़ाहिर है ये कोई सद्वचन नहीं हैं जो मोदी जी ने कहे थे। आशय रावण की बहन शूर्पणखा की और था। यही राहुलजी भी कर गए। महिला आयोग के पास दो अलग-अलग निगाहें नहीं होनी चाहिए। वाकई हैरानी होती है कि धुर विरोधी विचारधराओं वाली दृष्टि भी महिलाओं के सन्दर्भ में किस कदर एक सी होती है। क्योंकि यह हमारे भीतर तक पैंठी हुई है। हमने उन्हें सम्मान  देना सीखा ही नहीं और ना ही उन्हें स्वीकारना सीखा है। बड़े पदों पर तो बिलकुल ही नहीं। राहुल गाँधी ने अगले दिन फिर एक ट्वीट कर  कहा कि  कहा, ''हमारी सभ्यता में महिलाओं का सम्मान घर से शुरू होता है. डरना बंद कीजिए. मर्दों की तरह बात कीजिए. और मेरे सवाल का जवाब दीजिए. क्या वायुसेना और रक्षा मंत्रालय ने असली रफ़ाल डील को ख़त्म किए जाने का विरोध किया था?'' लगा था कि वे वाक्य विन्यास कुछ बेहतर करेंगे लेकिन फिर वही बात मर्दों की तरह बात कीजिये यानी महिला की तरह बात करना तो कमज़ोर होना है। जाने क्यों इनकी बातों से ये समझ आता है कि दहाड़ना ही सच्चाई का प्रतीक है,शालीनता सादगी और सहज संवाद के कोई मायने नहीं है। ये थिएट्रिकल अंदाज़ राजनीति के मंच पर वो सम्मोहन पैदा नहीं करते। बुरा लगता है जब कोई बड़ा नेता भी उसी आम सोच की नुमाइंदगी करने लगता है जिसे बदले जाने की उम्मीद उससे थी। सार्वजनिक जीवन में हम महिलाएं उनसे इस बुनियादी शिष्टाचार की अपेक्षा करती  हैं तो कुछ ज़्यादा तो नहीं करती। इन्हें समझना होगा कि इनकी ऐसी सोच जब भी ज़ाहिर होती है,लिंगभेद की दिशा में चल रही सुधार प्रक्रिया बहुत पीछे चली जाती है। 

ps : 9 जनवरी को राहुल गाँधी का जयपुर में दिया शेष सम्बोधन वाकई बेहतरीन था लेकिन हमारे नेताओं को संवेदनशील होना ही होगा खासकर जब वे संसद या सार्वजनिक सभाओं में बोल रहे हों और ये सभी बयान इन्हीं महत्वपूर्ण जगहों से दिए गए हैं। सार्वजानिक सभाओं से ही ये संसद की पवित्र देहरी चढ़ते हैं।