बुधवार, 25 दिसंबर 2019

क्या यह निज़ाम शांतिपूर्ण विरोध की ज़ुबां समझता है ?

निर्दोष लोगों को जब यूं पिटते ,जेल जाते और मरते देख रही हूँ तो सोचती हूँ कि क्या वाक़ई यह निज़ाम शांतिपूर्ण विरोध की ज़ुबां समझता है ? गमला भी वही अच्छा माना जाता है जिसमें पानी की निकासी का छेद ज्यादा बड़ा न हो वरना सारा पानी बह जाएगा और पौधा जीवित नहीं रहेगा। कहीं पढ़ा था कि बापू की अहिंसा और सत्याग्रह को समझने का जो माद्दा ही अगर अंग्रेज़ सरकार में ना होता तो शायद आज़ादी मुमकिन नहीं थी। फिर भी निजी तौर पर मुझे लगता है कि वह बापू का क़द था जो इस गौरी सरकार को झुकाने में क़ामयाब हुआ। उनकी पारदर्शिता, परमार्थ और नैतिक बल ने उनके दुश्मनों को भी उन्हीं के सामने पिघलने पर मजबूर किया। हमारे देश के राज्यों के गमलों  के छेद बहुत बड़े हैं।  उत्तरप्रदेश,कर्नाटक और दिल्ली  के गमलों के छेद ना केवल बड़े हैं बल्कि ये गमले ही जड़ों को कस रहे हैं, काट रहे हैं। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन वहां  के लिए मायने रखता है जहाँ उसकी इज़्ज़त हो ,उसे समझ पाने का मानस हो।  हम उनसे वफ़ा की उम्मीद कर रहे हैं जो ये जानते ही नहीं कि यह है क्या। 
कोई अपने बंधुओं को ढूंढ़ने गया तो पीट दिया गयाऔर गिरफ़्तार कर लिया गया, किसी माता-पिता को एक साल के बच्चे से अलग कर जेल में ठूंस दिया गया ,शादी ब्याह में छुट्टी मज़दूरी करनेवाले ग़रीब के तो पेट में ही गोली दाग़ दी गई। एक पिता चौराहे से अपने स्कूल से लौटे बच्चे को  लेने आया था, पुलिस की गोली उसे ही चीर गई। ये किनका ख़ून बहा रहे हैं हम। हमारी चुनी हुई सरकारें इतनी क्रूर कैसे हो गईं। इस क़दर पत्थर सरकारें ? माफ़ कीजिये लेकिन ये निज़ाम शांति की भाषा नहीं समझ रहा। यह जनभावना उन्हें अपना निरादर लग रही है। वे नहीं समझ पा रहे हैं कि जनता आख़िर उन्हीं से उम्मीद भी करती है , जो वह हताश होगी तो कहाँ जाएगी ? इन दुःखद घटनाओं को देख यही लग रहा है कि अगर आप उत्तरप्रदेश में हैं तो प्रदर्शन में भाग ना लें।  बड़े प्रधान से क्या उम्मीद की जाए वे तो यही नहीं मान पा रहे हैं  कि नागरिकों में नागरिकता क़ानून का विरोध है।  वे तो पूरे मुद्दे को इस तरह सम्बधित कर रही हैं जैसे सड़कों पर उतरी यह जनता किसी अन्य राजनीतिक दल के बहकावे में आ गई  है। 

इन दुःखद घटनाओं को देख यही लग रहा है कि अगर आप उत्तरप्रदेश में हैं तो प्रदर्शन में भाग ना लें। बड़े प्रधान तो यही नहीं मान पा रहे हैं कि नागरिकों में नागरिकता क़ानून का विरोध है। वे तो पूरे मुद्दे को इस तरह सम्बोधित कर रहे हैं जैसे सड़कों पर उतरी यह जनता किसी अन्य राजनीतिक दल के बहकावे में आ गई अपराधी हो । उतरप्रदेश में इनकी तस्वीरें लगवाई जा रही हैं, इनाम घोषित किये जा रहे हैं। दूसरा कार्यकाल आख़िर अपने ही लोगों के प्रति इतना सख्त क्यों? 



P S: जो हक़ीक़त में जनता के मनोभावों की क़द्र होती तो यूं बिना कोई वक्त लिए NRC की जगह NPR नहीं आ जाता।



गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

आओ नागरिक यहाँ आकर पकौड़े तलो !

वे बुनियादी काम भी करते हैं तो कुछ इस अंदाज़ में कि सांप्रदायिकता का ज़हर खौलते  रहना चाहिए। फ़िलहाल वह जगह लोकतंत्र का मंदिर है। जो यह अंगीठी पर खौलता रहेगा तो नथुनों में जाएगा। शाम को टीवी चैनलों को बहस का नया मुद्दा मिलेगा। ऐसा नहीं है कि वे काम नहीं करते, करते हैं लेकिन इस मुद्दे के अलाव को बुझने नहीं देना चाहते। जो आपने इसे बूझ लिया तो सब समझ जाओगे। डर जाता रहेगा किसी से उम्मीद नहीं करोगे। अपने देश को ख़ुद बनाओगे जैसा चाहोगे।

बात नागरिकता संशोधन अधिनियम CAB की ही है। कुल जमा दो लोगों को यह तय करने का फ़ितूर सवार है कि वे अब नागरिकता भी बाटेंगे न केवल देशवासियों को बल्कि पड़ोसी देश के निवासियों को भी। क्यों भई क्यों दोगे हमारा हक़ किसी और मुल्क को और सच तो यह है कि आप तो हमें  हमारा ही हक़ नहीं दे पा रहे। किसान परेशान है, युवा बेरोज़गार है, महिला पीड़ित है और अर्थव्यवस्था गर्त में है और आपको पड़ोस से नागरिक बुलाकर  क़ानून बनाने की फिक्र हो रही है। न लिखो आप मुसलमान का  नाम इस बिल में आप औरों को भी  ख़ैरात क्यों बाँट रहे हो  ? ये दूसरे देश के अल्पसंख्यकों की फ़िक्र भी झूठी है क्योंकि आप उस देश में उनका जीना भी मुश्किल कर रहे हैं। क्या कीजियेगा आप उन्हें बुलाकर ? पकौड़े  तलवाइयेगा ? रोज़गार तो यूं भी नहीं था जिनके पास था वे भी अब  पकौड़े  ही तल रहे हैं। काम की उम्र बेगारी ले रहे हैं। 

बिल पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान के गैर मुस्लिमों को शरण देने की बात करता है क्योंकि सरकार का मानना है कि वे वहां प्रताड़ित है। चलिए मान लिया। शरण मांगने वाला ज़ाहिर है कोई आसुदा हाल तो होगा नहीं। विभीषण ने भी भगवान राम से शरण मांगी थी। वे रावण के लतियाए हुए थे। राम के सहयोगी विभीषण  की शरण के पक्ष में नहीं थे लेकिन राम ने उन्हें शरण दी। दुश्मन के भाई को पनाह दी क्योंकि वह सताया हुआ था। मापदंड केवल एक था सताया जाना। भगवान राम का जाप करनेवाली सरकार का भी क्या यही मापदंड है ? लेकिन उन्होंने तो यहूदी, मुसलमानों और नास्तिकों को इससे बाहर रखा है। स्वामी विवेकानंद ने ख़ुद शिकागो में कहा था कि मुझे गर्व है कि  मैं उस भारत से आता हूँ जहाँ हर धर्म हर क्षेत्र के लोगों को शरण और आश्रय मिला जो सताए गए थे।  दरअसल हैरानी तो इस बात है कि जिन नामों का इस्तेमाल भाजपा अपना नैतिक बल बढ़ाने में करती है ,वही भाव  कैब (सिटिजनशिप अमेंडमेंट बिल) से गायब है।

आज उत्तर-पूर्व जल रहा है। खासकर आसाम  क्योंकि यहाँ NRC ने कहर बरपाया है जिसे सुधारने का जतन भाजपा कैब से करने जा रही है। उत्तरपूर्व के राज्य जिस विरोध को प्रदर्शित कर रहे हैं वह बता रहा है कि सरकार परिस्थितयों को समझने में नाकाम रही है। कश्मीर के बाद अब आसाम नई चुनौती बनने जा रहा है। यहाँ पुलिस फायरिंग में दो लोग मारे गए हैं। इंटरनेट बंद कर दिया गया है। भारत की विविधता को समझने की इच्छाशक्ति और इरादे के बिना कोई सरकार पांच साल  तो निकाल सकती है लेकिन लोकप्रिय नहीं हो सकती।  NRC में जब कई नागरिक छूट गए तो CAB का सहारा लिया गया जो गले का फंदा बनने जा रहा है।

आखिर में बात उस मुसलमान शब्द की जिसे CAB में शामिल नहीं किया गया है यानी उस कढ़ाव को उबलता रखा गया है जिससे सांप्रदायिकता की सियासत को खाद-पानी मिलता रहे । गृहमंत्री  कहते हैं देश  के मुसलमानों  को डरने की ज़रुरत नहीं है। सवाल यह है कि ऐसा कहना ही  क्यों पड़ता है ? किसी भी नागरिक को यूं संबोधित करने की नौबत क्यों आती है ? सिखों को डरने की ज़रुरत नहीं ,बौद्धों , जैनियों को डरने की ज़रुरत नहीं। यह भेद एक सरकार के स्तर पर किस कदर हेय मालूम होता है। सत्तर सालों में देश जैसे जिन्ना के द्वि-राष्ट्रवाद सिद्धांत के क़रीब पहुंच गया हो।  बेशक़ वह  एक नाकाम थ्योरी साबित हुई है। हम भला क्यों उस कीचड़ को मल रहे हैं समझना उतना मुश्किल भी नहीं  है। CAB के पारित होने से हर तरफ़ निराशा है। मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचेगा लेकिन हम भारत के लोग हर हाल में अपनी विरासत से देश गढ़ेंगे कोई एक दल और उसके दुविधाग्रस्त सहयोगी इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते । 

P S: बांग्लादेश के मंत्रियों ने अपनी भारत यात्रा रद्द कर दी है। उधर USCIRF यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ़्रीडम ने इस बिल के पास होने पर अफ़सोस जताते हुए कहा है कि बदले में अमेरिकी सरकार भारत के गृहमंत्री के प्रतिबंध पर विचार कर सकते है।



गुरुवार, 14 नवंबर 2019

मेरा बेटा पाकिस्तानी नहीं है-तवलीन सिंह

आतिश तासीर  तस्वीर साभार इंडिया टुडे 

तवलीन सिंह, पत्रकार 

वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह का इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में प्रकाशित लेख पढ़ते हुए हैरानी भी होती है और दुःख भी । हैरानी इसलिये  कि एक अख़बारनवीस को इतना डरा हुआ क्यों होना चाहिए और दुःख इस बात का कि पत्रकार की क़लम से माँ का आहत हृदय बोल रहा था। उनके बेटे आतिश तासीर ने चुनाव से ठीक पहले एक लेख क्या लिखा सरकार ने उन्हें भारतीय मानने से ही इनकार कर दिया। सरकार से असहमत आवाज़ को चुनौती देने  का यह मामला अंतरराष्ट्रीय इसलिए बन भी बन गया है  क्योंकि आतिश का जन्म लंदन में हुआ, पिता सलमान तासीर पाकिस्तानी थे तो माँ हिंदुस्तानी। .. और  इंडियाज़ डिवाइडर इन चीफ शीर्षक से उनकी एक कवर स्टोरी  अमेरिका की टाइम मैगज़ीन में  प्रकाशित हुई थी और शायद इसी के बाद भारत सरकार का उनके प्रति देखने का नज़रिया भी  बदल गया। यह स्टोरी  ठीक आम चुनाव से पहले प्रकाशित हुई थी, इसलिए  ऐसा मानने में किसी को शुबहा नहीं है कि यह द्वेषभाव के चलते ही हुआ हो । 
                  सरकार का कहना है कि आतिश ने यह तथ्य छिपाया है कि उनके पिता पाकिस्तानी हैं और नागरिकता अधिनियम (1955) के तहत उन्हें OCI कार्ड इशू नहीं किया जा सकता । जिनके माता-पिता पाकिस्तानी हों  उन्हें OCI यानी ओवरसीज सिटिजनशिप  ऑफ़ इंडिया नहीं मिल सकती । आतिश का मानना है कि उन्हें जवाब देने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया। माँ तवलीन सिंह की तकलीफ़ यह है कि उन्होंने अकेले ही बेटे की परवरिश की है और उनकी बहन और दोस्तों ने आतिश को कपड़े और अन्य ज़रुरत की चीज़ें मुहैया न  कराई होती तो ज़िन्दगी बहुत मुश्किल होती । वह बहुत कठिन  समय था जब वे सलमान तासीर  से सारे सम्बन्ध तोड़ भारत आ गईं थीं । सलमान पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के गवर्नर रहे हैं।  अपने  लेख में तवलीन सिंह एम जे अकबर का  भी ज़िक्र करती हैं जिन्होंने उन्हें  उस मुश्किल दौर में टेलीग्राफ अख़बार में नौकरी दी। अपनी बहन और सोनिया गांधी  का भी जो उनके बेटे को अच्छे कपड़े तोहफ़े में देतीं थीं। यह सब दोस्ती में था लेकिन तवलीन सिंह ने अफ़सोस के साथ  लिखा है कि पिछले पांच बरसों से मैंने  सरकार का खुला समर्थन किया और बदले में सरकार ने मेरे बेटे को ही देश निकाला दे दिया। 

        सवाल उठता है कि क्या वे अपेक्षा कर रहीं थीं की उनके इस बेहिसाब समर्थन के एवज़ में  बेटे की बख्शीश हो जाती ? वे समर्थन कर रहीं थीं बावजूद इसके कि वे असहमत थीं ? अब वे असहमत हो रहीं हैं क्योंकि बात उनके बेटे पर आई है ? जवाब उनके 39 साल के बेटे की बातों में मिलता है कि पहले मेरी माँ सरकार पर मेरे रवैय्ये पर मुझसे इत्तेफाक नहीं  रखती  थीं पर अब वे मेरे समर्थन में हैं।  काश यह उन्होंने पहले समझा होता। तवलीन ने यह भी  लिखा है कि इस मामले में मैंने कई बार प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के दफ़्तर  बात करने की कोशिश की लेकिन मुझसे बात नहीं की गई, मैं समझ गई की ऐसा उच्च पदों पर बैठे लोग ही नहीं चाह रहे हैं। मुझे तो सब ट्विटर से मालूम हुआ। मैं कोर्ट भी  जा  सकती  हूँ लेकिन वहां मसले  बरसों बरस लेते हैं। मैं दस साल तक शक्तिशाली  भारत सरकार से नहीं लड़ सकती। और जब मैं यह लिख रही हूँ  दिल उन लोगों  के लिए बैठा जाता है जिन्हे गृहमंत्री  दीमक कहते हैं जो भारत  के नागरिक हैं  जो अपनी  बाकी ज़िन्दगी डिटेंशन सेंटर्स में काटने को मजबूर हैं। जब मैं ही क़ानूनी लड़ाई लड़ने का साहस नहीं जुटा पा  रही तो वे कैसे कर पाएंगे ? मेरे बेटे के साथ गलत नहीं बल्कि  बुरा हुआ है और ऐसा ही उन गरीबों के साथ जो अपनी नागरिकता साबित करने में नाक़ाम होते  हैं। उन्हें बेहद तकलीफ़ है कि सरकार उनके बेटे को पाकिस्तानी कह रही हैं क्योंकि भारत में यह गाली से कम नहीं है और यह  बात भी कोई मायने नहीं रखती  कि आतिश के पिता  आज़ादी से पहले के भारत में जन्में थे तभी तो अपने ट्वीट में भी लिखती हैं- मेरा बेटा पाकिस्तानी नहीं है। 
ज़ाहिर है तवलीन सिंह  दुःखी हैं और उसकी जायज़ वजह भी उनके पास है। अपने दुःख में वे यहाँ तक कह  जाती हैं कि कोई भी सिंगल मदर होकर बच्चों  को पलने का जोखिम न ले। बहरहाल आतिश के पिता का इंतकाल 2011  में हो चुका है। एक पत्रकार और माँ होने के नाते मेरा इतना कहना ज़रूर है कि हालात आपको डरा सकते हैं ,आपकी क़लम को  बोथरा कर सकते हैं लेकिन अंध समर्थन के लिए बाध्य नहीं कर सकते तभी आपको  लिखना पड़ता है कि मुझे यह लिखते हुए यकीन नहीं हो रहा है की जिस प्रधानमंत्री का मैं खुला समर्थन करती आई  उन्होंने ही मेरे बेटे को देश निकाला दे दिया है। तवलीन को यही करना पड़ा है। प्रेम,शादी, तलाक़ या अकेले बच्चे को पालना इन सब के लिए किसी को अफ़सोस नहीं बल्कि फ़ख़्र करना चाहिए लेकिन तकलीफ़ और दर्द को समझने के लिए हमेशा अपने पैरों में बिवाई फटने का इंतज़ार तो कम अज़  कम नहीं करना चाहिए। पीर तो देखकर भी महसूस की जा सकती है । आतिश के पास यह तासीर है लेकिन पत्रकार महोदया ने अब समझा है। 

मंगलवार, 15 अक्तूबर 2019

अभिजीत के नोबेल के साथ कुछ और भी आया है



अभिजीत बनर्जी और उनकी पत्नी एस्थर डफ्लो को अर्थशास्त्र का नोबेल मिलना बेशक़ भारतवासियों के लिए बड़ी ख़ुशख़बर है और यह ऐसे समय आई है जब एक पक्ष पूरी तरह से यह स्थापित करने में क़ामयाब हो रहा था कि एक अच्छा इवेंट कर लेना ही  दुनिया में  भारत  का  डंका बजने का प्रमाण है । लोगों की भीड़ अगर किसी की हर अदा पर  जो फ़िदा हो तो वही सही है, वही सिद्ध है। टीवी चैनलों की बहस में रात को चार-छः लोगों को बैठाकर जो मुद्दा चीख़ चीख़ कर बना दिया जाए, वही मुद्दा है बाक़ी सब ज़रूरतें बेकार हैं ,खामखां हैं। ऐसे में जब कोई सर खुजाते हुए कहीं अफ़सोस या तकलीफ़ भी ज़ाहिर करना चाह रहा होता तो उसे कोई तवज्जो नहीं, महत्व  नहीं । आजू-बाजू के लोग भी उसे गरिया देते तो वह  तकलीफ़ से और घुटने लगता।  उसके  मन की बात के लिए कोई मंच नहीं था । उसे यह भी अहसास होने लगा था कि एक वही इस तरह से क्यों सोच रहा है। लोग तो नोटेबंदी से भी ख़ुश हैं, पकोड़े तलने की बात से भी और प्रतिष्ठित JNU को टुकड़े-टुकड़े गैंग बता कर भी। मॉब लिंचिंग ,दुष्कर्म , NRC जो कि नागरिकता का राष्ट्रिय रजिस्टर है उस पर गंभीर चिंतन की बजाय  दो फाड़ कर देने के मक़सद पर भी।  
        ऐसे में अभिजीत बनर्जी के नोबेल ने हर उस शख़्स को ताक़त दी है जिसे लगता है कि अध्ययन-चिंतन-मनन के मूल में ही मानव मात्र का कल्याण है। सीमाओं से परे मानव मात्र  का कल्याण। यही तो हिंदुस्तान की सोच रही, प्राणी मात्र पर दया। फिर हम कब और कैसे इस मूल भाव से भटक कर दिखावे की दुनिया में रमने लगे, यकीन करने लगे  ? बुद्ध, महावीर और बापू के देश में सादगी से इस क़दर परहेज़। शुक्र है इस नोबेल ने जैसे श्लथ काया  को ऑक्सीजन मुहैया कराई है। बताया है कि ग़रीब के बारे में सोचना ही हर विकसित समाज और देश का पहला कर्त्तव्य  है। जब तक आख़िरी व्यक्ति तक सुविधा के साथ जीने का हक़ नहीं पहुँचता किसी को भी  चैन से नहीं बैठना चाहिए। सुखद है कि इस नोबेल ने वक्त के पहिये को सही दिशा में मोड़ा है। आज कई मुल्क अभिजीत बनर्जी के आर्थिक सिद्धांतों पर चलकर ग़रीबी कम करने में सफ़ल रहे हैं। हम ही हैं जो  ग़रीब और हाशिये पर खड़े व्यक्ति की  ओर देखने की बजाय आँख मूंदे पड़े हैं।  कभी तो यूं भी लगता है कि हम ख़ुद ग़रीब को  लगातार कमज़ोर कर रहे हैं ताकि विपदा आए तो सबसे पहले वही ख़त्म हो । लेकिन इस पुरस्कार ने हमारा खोया भरोसा लौटाया है। यूं अमर्त्य सेन भी 1998 में यह सम्मान हासिल कर चुके हैं लेकिन इस वक़्त हमें कुछ और भी मिला है। अभिजीत के नोबेल के साथ कुछ और भी आया है। हाँ हम भारतीय ख़ुश हैं कि हमारा असली डंका दुनिया में बज रहा है। 


फोटो क्रेडिट - https://www.ndtv.com/india-news/abhijeet-banerjee-economics-nobel-prize-2019-winner-went-to-bed-after-he-won-nobel-2019-for-economic-2116749

सोमवार, 7 अक्तूबर 2019

जोकर के पंच हंसाते नहीं दिल पर लगते हैं



joker movie : a still from the film

फ़िल्म जोकर देखी । हॉलीवुड सिनेमा के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं इसलिए सीधे जो देखा उसी पर बात  करूंगी। जोकर के क़िरदार में वॉकीन फीनिक्स की अभिनय कला काफ़ी ऊंचे पायदान पर जाती दिखाई देती है। आँख, नाक, होंठ के साथ  जोकर का समूचा शरीर अभिनय में दक्ष है। यह काबीलियत जोकर को नई लयताल में पेश करती  है। बेशक वह अपने दुखी पलों में सबसे ज़्यादा हंसना और हँसाना चाहता है।  इस कलाकार का नाच भी दर्शक को मुग्ध रखता है। ख़ासकर जो सीढ़ियों पर है , उन्हीं सीढ़ियों पर जिन पर कभी वह थक कर चढ़ता था। ऑर्थर फ्लेक यही नाम है उस ग़रीब नौजवान का जो अपनी बुज़ुर्ग माँ के साथ रहता है। माँ का ध्यान रखता है,वक़्त पर दवा देता है ,खाना खिलाता है और नहलाता भी है। ऑर्थर को कुछ मानसिक बीमारियां है जिसका इलाज सामाजिक संस्था और अस्पताल मिलकर करते हैं। वह मसखरा है और छोटा-मोटा काम भी उसे मिला हुआ। वह साधन संपन्न नहीं फिर भी सदा मुस्कुराते हुए जीवन के महासमर को पार करने का माद्दा रखता है।

एक दृश्य में ऑर्थर बस में सवार है ,एक नन्हीं बच्ची उसकी ओर उदास निगाहों से देख रही है। आदतन वह मुस्कुराता है और अजीब चेहरे बना कर उसे हँसाना चाहता है। बच्ची की माँ आर्थर पर बरसते हुए कहती है तुम क्यों उसे परेशान कर रहे हो। ऑर्थर अचानक ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगता है जो थोड़ा रोने का आभास भी देता है। फिर वह जेब से एक डॉक्टरी पर्ची निकालता है। पर्ची में  लिखा है कि उसे एक बीमारी है जिसकी वजह से  वह ख़ास परिस्थिति में हंसने लगता है। ऑर्थर को अपनी वह नौकरी बहुत पसंद थी  जिसमें वह बच्चों के अस्पताल  जाकर उनका मन बहलाता  है। ऑर्थर के संगी-साथी हैं उनमें से बहुत कम उसे समझते हैं और शेष कोई तवज्जो नहीं देते। लगातार रौंदे जाने पर वह कई बार ख़ुद से पूछता है कि मैं हूँ या नहीं। एक बार जब वह जोकर के भेष में एक तख़्ती  लेकर सड़क पर खड़ा है, कुछ शरारती लड़के उसकी तख्ती छीनकर  दौड़ पड़ते हैं.  वह भी  पीछे दौड़ता है कि तख़्ती बचा सके वर्ना पैसा उसकी तनख़्वाह में से काट लिया जाएगा, बदले में लड़के उसे पीट देते हैं। घायल ऑर्थर को उसका एक साथी बचाव के लिए गन देता है। वह उसे रख लेता है लेकिन एक दिन यही गन उन बीमार बच्चों के सामने गिर जाती है। उसकी कोई सफाई काम नहीं आती। नौकरी चली जाती है। वह लाख कहता है कि यह काम मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है। मेट्रो के सफर में तीन लड़के एक लड़की को छेड़ रहे हैं। ऑर्थर को बर्दाश्त नहीं होता वह उन्हें उसी गन से  मार देता है। बात इस रूप में बहस का मुद्दा बन जाती है कि ये ग़रीब  जो जीवन में कुछ नहीं कर पाते वे अमीरों  को मार देना चाहते हैं।
ऑर्थर की हेल्थ काउंसलर उसे बताती है कि उसकी संस्था की फंडिंग बंद हो रही है और  सिस्टम को शायद हम दोनों ही नहीं चाहिए। सात मानसिक रोगों के साथ  किसी तरह इस क्रूर समाज में अपनी बूढ़ी माँ के साथ ज़िन्दगी  को ज़िंदादिली के साथ जीने की कोशिश करने वाला ऑर्थर बचपन में स्कूल नहीं जाना चाहता। माँ समझाती है जो स्कूल नहीं गए तो काम कैसे करोगे ,वह कहता  है मैं स्टैंडप कॉमेडियन बनना चाहता  हूँ। बहरहाल उसके अपने जोक्स हैं जो प्रचलित पंच लाइन के फंडे में फ़िट नहीं बैठते। वह  हर रोज़  उन जोक्स को इस उम्मीद में अपनी  डायरी में लिखाता है  कि कभी उसे भी कोई मंच मिलेगा। मिलता भी है उसका पसंदीदा एंकर उसे बुलाता है जो उसके जवाबों से निराश होकर शो को ख़त्म करना चाहता है लेकिन ऑर्थर उस लाइव शो में एंकर की ही हत्या कर देता है। माँ से जुड़ा रहस्य बीमार ऑर्थर  को और आक्रामक बना देता है।दरअसल  व्यवस्था अपनी रोबोटिक फैक्ट्री में उस शख़्स की ना देखभाल कर पाती है और ना ही बर्दाश्त। हमने ऐसी ही दुनिया बना दी है। क्यों हममें से हरेक काम के उस खांचे में फ़िट बैठे जिसे चंद लोगों ने मिलकर शेष सभी के लिए सही ठहरा दिया है ? हर बच्चा हर शख़्स अलहदा है लेकिन व्यवस्था उसके अलग को स्वीकारने की बजाय उसे बदलना चाहती है। उसे तोड़ देती है। उसे विध्वंसक बनाती है। जोकर इसी व्यवस्था पर  गहरा तंज़ है। इस जोकर के जोक्स के पंच हंसाते नहीं दिल पर लगते हैं। 

ps :वैसे जोकर एक ऐसा पात्र  है जो किसी को दया तो किसी को घृणा के क़ाबिल लग सकता है। मुझे तो हमदर्दी के लायक लगा। जोकर के सीक्वल-प्रीक्वल का कोई अंदाज़ा नहीं। आप बता सकते हैं। 

सोमवार, 23 सितंबर 2019

सच का सूत

दिल कहता है 
तुम लिखो 
फूल, पत्तों, परिंदों, प्रेम की बात 
दिमाग़ कहता है 
लिखो तकलीफ़ 
लिखो भीड़ में घिरने की बात 
लिखो 'एनआरसी' 
के पन्नों में छिपे नश्तरों को 
लिखो इंसान को इंसान से 
मिलने पर रोक की दास्तान  को 
लिखो संवाद के विवाद में 
बदलने के मंज़र को 
लिखो उस नाम को 
जिसे बताने में उसे डर लगता है 
लिखो बच्चे को मोहल्ले से बाहर भेजती हुई 
माँ के कांपते कलेजे को और बाप की दुविधा को 
लिखो  कि वह बच्चे को ऐसा मंतर पढ़ाना चाह रहे
जो मुसीबत में काम आए। 


क्या कहा 

नहीं लिखोगी 
तो मत लिखो 
तुम किसी क़ाबिल नहीं 
दिलो दिमाग़ कुंद हैं तुम्हारे 
तुम सो जाओ 
जो ज़िंदा रही 
तो ख़्वाब में ढूंढ लेना 
परिंदो की परवाज़ 
और ओस की बूंदों से 
पवित्र इरादों को। 

शायद न मिलें वहां भी 
स्वप्न को सवार होने के लिए 
भी सच का एक सूत तो चाहिए ही। 






मंगलवार, 17 सितंबर 2019

ये सुबह फ़ीकी है निस्तेज है

बहुत इंतज़ार के बाद आख़िर सुबह सवा आठ बजे फ़ोन किया।  यह आशंका में घिरा फ़ोन था। मैंने पूछा- "नमस्कार, सब ठीक ?" उधर से डूबी हुई आवाज़ आई -"माँ expire हो गई हैं आज नहीं आ पाऊंगा। "मेरी आवाज़ भी जैसे बैठ गई फिर भी बोली -ओह माँ को हमारे भी श्रद्धा सुमन ,मैंने  डरते हुए ही कॉल किया था क्योंकि आप ख़ुद इतने नियमित और समर्पित हो कि ... इससे आगे कुछ कह नहीं पाई। कहना चाहती थी कि आप जब तक ना चाहो, ना आना। ये पैसे भी महीने  के बिल में जोड़ लेना। आप कहाँ रहते हो ? पूछना चाहती थी कि माँ को क्या हुआ ,कोई बीमारी थी लेकिन न कुछ पूछा ना कहा। सुबह जैसे अँधेरा दे गई।
photo credit : udaipur times.com

ये हमारे न्यूज़पपेर हॉकर हनुमान सैनी जी हैं जो बरसों से हमें अख़बार दे रहे हैं। मुंह अँधेरे अख़बार दे जाने की आदत में पता नहीं कितना हिस्सा क़ायदे का है। सामने के मकानों की बालकनी में अख़बार इतने सटीक ढंग से उछालते हैं कि कभी  नहीं चूकते। ये अख़बार बंद करना है और दूसरा शुरू करना है, इस काम में  भी नहीं। भुगतान लेते समय भी  ये अनुमान लगा के चलते हैं कि कितनी रेज़गारी उन्हें देनी पड़ सकती है। थोड़े अकड़ के चलते हैं, ठसक भी है लेकिन हनुमानजी को यह तेवर सूट करता है। उनका ना आना चाय को फ़ीकी तो पहले ही कर चुका था, कारण उदास कर गया है। माँ के बिना क्या बचता है यार। मेरा उनकी माँ को प्रणाम और उनके काम को सलाम कि हनुमान जी जैसे लोग अपने व्यहवार से ही काम में पूजा भाव का आभास करा जाते हैं। 
ps : वह रोज़ बिला नागा मेरी देहरी पर अख़बार डालते हैं और मुझे उनके घर का पता नहीं। 

बुधवार, 4 सितंबर 2019

आधा विकास पूरे मुद्दे

भंवर के छोटे भाई की नौकरी जा चुकी है,नई मिल नहीं रही। नया निवेश नहीं ,नई कंपनी नहीं, नई पीढ़ी को भी रोज़गार नहीं। नतीजतन हर तरफ़ निराशा। शांत ... निराशा नहीं। किस बात की निराशा। भंवर को भी निराशा थी लेकिन दिमाग़ के किसी हिस्से में सुकून भी था। उसे शायद यह अहसास करा दिया गया था। असम की NRC से घुसपैठियों से हमेशा के लिए मुक्ति के साथ ही  कश्मीर की एकमात्र मुसीबत धारा 370 अब धाराशाई है।  कश्मीर अपने क़रीब आ गया है लेकिन  कश्मीरियों के बारे में अभी मत पूछना। असम जैसा कढ़ाव अभी और राज्यों में भी तो सुलगाना है। सब को साबित करने में लगा दो कि वे यहीं के हैं। अयोध्या में अपना भव्य मंदिर भी तो बनेगा। मत पूछना कि मंदिर मुद्दे से तहज़ीब का  कितना  ध्रुवीकरण हुआ । जो भी हो आधी रोटी खाएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे। आधी रोटी खाएंगे धारा 370 हटाएंगे।
 GDP भी आधी हो गई। होने दो। नाहक़  ही नौकरी-नौकरी का राग अलाप रहे हो।  पूरा ध्रुवीकरण भी तो कभी नहीं हुआ था। हम सब काम करंगे। जो भी कहा था सब। तुम आधे पेट के साथ तैयार रहना। घटने दो सब। स्वाभिमान नहीं घटना चाहिए। भंवर ख़ुश था कि अब किसी से डरना नहीं है ,वह सोने की कोशिश कर रहा था। उधर उसका पड़ोसी पहले से ही ख़ौफ़ज़दा था। वह और उसकी पुश्तें जो खेती-किसानी, पशु पालन करते आए थे, अब उसी पर शुबहा था। वह कल सुबह उठकर पशु मेला नहीं जाना चाह रहा था। सब डरे हुए थे। केवल हुक्मरां चैन की नींद सो रहे थे। उसे  कल एक लकदक भवन का फ़ीता काटने जाना था। 

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

क्या मुंशी प्रेमचंद की कल्पना में होंगे उन्नाव के ऐसे रसूख़दार

महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद का जन्म जिला उन्नाव। उन्नाव मेरे भीतर इसी रूप में अंकित है लेकिन मैं पूरे यकीन से  कह सकती हूँ कि इस ज़िले की बेटी  के साथ जो भयावह अपराध हुआ है, रसूख़दारों के ऐसे जघन्यतम व्यवहार की कल्पना ख़ुद प्रेमचंद ने  भी नहीं होगी। कैसे समाज में तब्दील हो रहे हैं हम ? निर्भया बलात्कार के बाद मर जाती है और उन्नाव की यह बेटी सामूहिक बलात्कार के बाद किसी तरह बच जाती है तो सत्ता और तंत्र उसे अपने पहियों तले रौंद डालने  में  कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ते । यह लड़ाई एक ग़रीब परिवार और ताकतवर की लड़ाई है जिससे हारना मानवता की मौत होगा। तुम ज़िंदा रहना उन्नाव की बेटी। 
अफ़सोस बस गहरे तक अफ़सोस। कुछ ना कर पाने का अफ़सोस।

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

उधर सौ साल और इधर ?

अँगरेज़ हुकूमत ने ख़ून से नहला दी थी वह बैसाखी 
आज बैसाखी है। उल्लास और उमंग का त्योहार लेकिन 100 साल पहले अंग्रेजों ने इसे ख़ूनी बैसाखी बना दिया था। निहत्थे और मासूम लोगों पर अमृतसर में ब्रिगेडियर जनरल (अस्थाई) रेजिनाल्ड डायर ने गोलियां बरसाकर बता दिया था कि वे दरअसल एक ख़ूनी फ़ौज हैं। गैर सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1600 निर्दोष इस हत्याकांड में मार दिए गए थे जबकि सरकार ने 379 मौतों की पुष्टि की थी।  इस दरिंदगी के 100 साल बाद  गोरों ने अफ़सोस जताया है लेकिन माफ़ी नहीं मांगी है। बीते बुधवार को ब्रितानी प्रधामंत्री  थेरेसा मे ने संसद में इस कुकृत्य पर अफ़सोस  प्रकट किया लेकिन माफ़ी नहीं मांगी।  इससे पहले प्रधानमंत्री डेविड कैमरून भी खेद जाता चुके हैं। हम भारतीय बरसों से माफ़ी की प्रतीक्षा में हैं। उन्होंने कहा कि जलियांवाला बाग़ हत्यकांड भारत और इंग्लैंड के इतिहास पर लगा शर्मनाक धब्बा है। यह अफ़सोस भी पूरे सौ साल बाद ज़ाहिर हो सका है, बेशक थेरेसा मे उस वक़्त पैदा भी नहीं हुईं थीं लेकिन ऐसा माना जाता है कि सरकार एक लगातार चलनेवाला सिलसिला है।

  ख़ून तो हमारे अपनों ने भी अपनों का बहाया है लेकिन अफ़सोस आज तक नहीं जताया है। क्या इसके लिए भी  100 साल का इंतज़ार करना पड़ेगा?  क्या 2102 में कोई माफी आएगी ?  कहा जाता है इन्साफ में देरी होना इन्साफ न होने के बराबर है तो इन सामूहिक नरसंहारों के लिए चेतनाशून्य बने रहना क्या  है? इसका स्वीकार लिया जाना ? हां, गुजरात नरसंहार के लिए किसी ने अब तक कोई ज़िम्मेदारी नहीं ली है। शायद बाद के बरसों में किसी नुमाइंदे की कभी कोई संवेदना जागे। ऐसा ही बदनुमा दाग़ तत्कालीन कॉंग्रेस सरकार पर भी है जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में सिखों का क़त्ल ए आम हुआ था।  माफ़ी की अपेक्षा यहाँ भी रही। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने 12 अगस्त 2005 को ना केवल सिख समूदाय से बल्कि पूरे देश से क्षमा मांगी । ऐसा करके एक तरह से उन्होंने 1984 के दंगों में मारे गए सिखों के प्रति संवेदना के साथ उत्तरदायित्व लेना भी स्वीकार किया था। उन्होंने कहा था कि जो कुछ 1984  में हुआ था वह हमारे संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाता है। गुजरात नरसंहार के समय आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां के मुंख्यमंत्री थे। सरकारी तंत्र के साए तले हुए नरसंहार के घाव भरना लगभग नामुमकिन होता है क्योंकि पीड़ित रक्षा के लिए आखिर किस से उम्मीद करेगा। यह वैसा ही जलियांवाला बाग़ होता है जिसके भीतर जाने के लिए बस एक संकरी गली होती है और भगदड़ के वक़्त वह भी नज़रों से ओझल हो जाती है। 


PS: लकवे का शिकार डायर अंतिम
समय में यही बुदबुदाते हुए मर
गया - 'कुछ लोग कहते हैं मैंने
ठीक किया और कुछ कहते हैं
गलत किया। अब मैं मर जाना
चाहता हूं और गॉड से पूछना
चाहता हूं कि मैं सही था या
गलत। वैसे इस अन्याय की कोई सज़ा ब्रिटिश सरकार ने डायर को नहीं दी। 

सोमवार, 4 मार्च 2019

शिव की चली बारात

शिव-शक्ति,  पेंटिंग -उदय चंद गोस्वामी 

 मुझे औघड़ बाबा का यह जीवन दृश्य बहुत प्रिय लगता है। वही थोड़ी ऊट -पटांग सी बारात वाला। कभी कोई पूछे तो इसी दृश्य को साक्षात् देखना चाहूंगी। बचपन में एक बार मंच पर शिवशंभू का  तांडव  देखा था और उसके बाद इंदौर में हेमा मालिनी की नृत्य  नाटिका दुर्गा । भोले बाबा का शिव तांडव। वाकई व्यक्तित्व का कितना गहरा विस्तार है नीलकंठ । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिव-शंकर  को वैरागी से गृहस्थ बनाने के लिए देवी शक्ति ने तपस्या की थी। विवाह में उनको दूल्हा बनकर आना था। अब जटाधारी ठहरे पूरे वैरागी। दूल्हा कैसे बना जाता है उन्हें कुछ मालूम नहीं। वे घोड़ी  के बजाय बैल पर चढ़कर आ गए। हार की बजाय नाग को गले में लपेट लिया। शरीर पर चंदन नहीं, भस्म मल ली। वस्त्र के नाम पर हिरण की छाल लपेट ली। अब महादेव के बाराती कौन होते।  उनमें कोई देवगण  नहीं बल्कि भूत पिशाच और राक्षस साथ आये। कैलाशवासी अमृत के बजाय विष पीते ही विवाह मंडप में पहुंच गए। यह सब हुआ महाशिवरात्रि की रात को। इसी दिन त्रिदेव  ने देवी की आराधना सुनकर वैरागी रूप तजकर सांसारिक जीवन चुन लिया। शिव -शक्ति यानी सृष्टि की बुनियाद।

कंटेंट क्रेडिट-देवदत्त पटनायक


रविवार, 24 फ़रवरी 2019

गाली गलौज और बलात्कार जैसी घृणित टिप्पणियों का सोशल मीडिया


जिस तरह से महिला पत्रकारों , सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिज्ञों को गालियां दी जा रही है ,लिंग की तस्वीरें भेजी जा रही हैं और उनकी देह की नापतौल की जा रही है वह भीतर तक घृणा और जुगुप्सा से भर देता है। मुद्दों पर बोलने में तो इनकी  ज़ुबां तालू में धंस जाती है लेकिन सोशल मीडिया पर अपशब्द लिखने ,फोटोशॉप से उनकी नग्न तस्वीर बनाकर भेजने, उनके नामों को कॉल गर्ल की लिस्ट में जोड़ने की क़वायद में वे एक दूसरे को जबरदस्त टक्कर दे रहे हैं।  क्या ये लोग एक बार भी नहीं सोच पाते होंगे कि हम उनके दिमाग से की गयी बातों का जवाब उनकी देह पर टीका टिप्पणी से दे रहे हैं। पत्रकार राना अय्यूब  का चेहरा एक पोर्न एक्ट्रेस से रिप्लेस कर चलाया जाता है। पत्रकार सागरिका घोष भी ऐसे ही ट्रोल होती हैं। बरखा दत्त ज़रूर ऐसे लोगों को एक्सपोज़ करने में लगी हैं।

बहुत संभव है कि आप पत्रकार बरखा दत्त की कश्मीरियों के प्रति उदारता से इत्तेफ़ाक़ ना रखते हों, कुछ और मसलों  पर भी आपकी नाराज़गी हो लेकिन बदले में तर्क रखने की बजाय आप तो जैसे बदले पर उतर आते हैं। यही तो कहा था उन्होंने कि इस संकटकाल में कश्मीरियों के लिए मेरे दरवाज़े खुले हैं। जवाब में उन्हें गोली मारने और बलात्कार  की धमकी दी गई। उन्हें अश्लील तस्वीरें भेजी गईं और जब बरखा दत्त ने इन आपराधिक किस्म  के सन्देश भेजने वालों के नाम और नंबर ट्विटर  पर साझा किये तो उलटे उन्हीं का अकॉउंट 12 घंटे के लिए बंद कर दिया गया। पत्रकार अभिसार (उन्होंने पुलिस में शिकायत भी की) रवीश कुमार सबके साथ यह हो रहा है लेकिन महिलाओं की सेक्सुलिटी पर हमला होता है तो सीधे उनके  वजूद को ठेस पहुँचती है। इसे बर्दाश्त कर पाना बहुत ही मुश्किल होता है।  यह बात ट्विटर को समझा पाना मुश्किल है जिसकी नीतियां यूं तो जेंडर के प्रति उदासीन होकर चलने की वकालत करती हैं और वे इस संवेदनशीलता को समझ ही नहीं पाते । पत्रकार बरखा  ने ट्विटर सीईओ जैक डोरसी को सम्बोधित करते  हुए लिखा है  कि आपके लिए पुरुषों की निजता ज़्यादा ज़रूरी है एक महिला कि नहीं जिसे बलात्कार और हत्या की धमकी दी जा रही है और कहीं यह श्वेत महिला की तकलीफ होती तब भी आप ऐसा ही रवैया रखते।


 प्रियंका गांधी को जब देहयष्टि के दलदल में खींचा जाता है तो वह सिर्फ और सिर्फ़ ग़लीज़ मानसिकता को ही नग्न करता है। जिसका भाव होता है कि 56 इंच के सीने के आगे उनके स्त्री प्रतीक कोई मायने नहीं रखते। ज़ाहिर  है ऐसे गिरे हुए वक्तव्यों  के  कोई प्रतिउत्तर आपके पास नहीं हो सकते हैं ।  इसीलिए देह लगातार  निशाना बन रही है। राजस्थान की विधायक रही हैं  कमला। तत्कालीन सिंचाई मंत्री  ने उनके सवाल का जवाब भद्दे इशारे के साथ दिया था। मंत्री ने जंघा की ओर इशारा किया था कि यहाँ आकर बैठ जाओ। अब जब मंत्री ही इस सोच से मुक्त नहीं तो सोशल मीडिया पर तो  यूं भी राजनीतिक दलों के पिट्ठू तैनात हैं। यहाँ तो हमले सुनियोजित भी हैं। भंवरी देवी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता थीं। उच्च समाज का एक बालविवाह रुकवाया था उन्होंने ।https://likhdala.blogspot.com/2009/11/blog-post_18.html  
 उनके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ।  जज का सवाल था कि ऊंची जाती के लोग निम्न जाती से बलात्कार कैसे कर सकते हैं। आज भी क्या बदला   है। स्त्री को अपमानित करने के लिए यही हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
क्या वक़्त नहीं आ गया है कि महिला स्वयं अपने शरीर को इस अपमान से मुक्त कर ले। यानी इसे तवज्जो ही न दी जाए। ऐसी घृणित हरकत  वही कर सकता है जो स्त्री की मौजूदगी इन्हीं अर्थों में देखता है। जब देह से जुड़ी टीका टिप्पणी को ही गंभीरता से नहीं लिया जाएगा तो वह खुद  बेअसर साबित होगी। एक बार फिर बड़ा और मज़बूत बन के स्त्री को ही आना होगा। अपनी देहयष्टि से परे एक दुनिया में । समानता की दुनिया में । ये दुष्ट और उनके समर्थक तब ही परास्त होंगे क्योंकि द्रोपदी की तरह प्रतिज्ञा लेने के लिए भी कृष्ण का होना ज़रूरी है जो द्वापर युग में संभव था। इस कलियुग में नए फैसले अपने दम पर ही लेने होंगे बिना कृष्ण का इंतज़ार किये।

P S : पुलवामा में सैनिकों की शहादत के बाद अगर जो ऐसा उन्माद पनपा है तो माफ़ कीजिए इसका देशभक्ति से कोई ताल्लुक नहीं हो सकता।





शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

यह कैसी डेट


अगर किसी जोड़े को डेट के लिए जेल का परिसर केवल इसलिए  मिलता है क्योंकि उनमें से एक  सरकार के ख़िलाफ़ टिप्पणी कर देता है तो यह कोई उदार सरकार का चेहरा तो नहीं कहा जा सकता 

अपनी एक फैसबुक पोस्ट में वह लिखती है, आज वह डेट पर है। उम्र कोई हो, धड़कने इस मोड़ पर एक पाठक की भी थोड़ी व्याकुल हो ही जाती हैं लेकिन वहां पर न तो कोई रूमानी माहौल था और ना कोई वैसा उत्साह जो कभी बीस साल पहले इम्फाल में रहते हुए उसने  महसूस किया था। वह जेल का परिदृश्य था। वह अपने पति से मिलने आई थी। पति किशोरचंद्र वांगकेम पत्रकार हैं और उत्तर पूर्व के राज्य मणिपुर में सलाखों के पीछे डाल दिए गए हैं। अपराध था मणिपुर सरकार की आलोचना का । मुख्यमंत्री बिरेन सिंह मणिपुर में भारतीय जनता पार्टी के पहले मुख्यमंत्री हैं और पत्रकार का गुनाह ये  कि उन्होंने राज्य में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जन्मोत्सव को मनाए जाने के खिलाफ अपनी पोस्ट में विवादस्पद वीडिओ का उपयोग किया था।  पत्रकार ने मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को केंद्र सरकार की कठपुतली कहते हुए लिखा था, विश्वासघात न करें, मणिपुर के स्वतंत्रता सेनानी का अपमान न करें। मणिपुर के वर्तमान स्वतंत्रता संग्राम का अपमान मत कीजिए। मणिपुर के लोगों का अपमान मत करो।  इसलिए, मैं यह फिर से कह रहा हूं, आप मुख्यमंत्री हैं आइए और मुझे दोबारा गिरफ्तार करें, लेकिन मैं अभी भी आपको कहूंगा, हिंदुत्व की कठपुतली हैं आप।  वहीं इस मामले में पत्रकार की पत्नी इलेंगबम रंजीता ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि 26 नवंबर 2018 को उसके पति को 70 हजार के मुचलके पर बेल दे दी गई थी लेकिन अगले  ही दिन उनके घर पर कुछ पुलिस वाले आए और उन्हें जबरन उठा ले गए। 
उसके बाद से पत्रकार देशद्रोह के आरोप में जेल में हैं। इलेंगबम कहती हैं कि मैं मानती हूँ की उन्होंने सख्त शब्दों का प्रयोग किया लेकिन यह देशद्रोह कैसे हो गया। 

सवाल यही है कि क्या हमारे देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी केवल इतनी ही है कि आप सरकार कीआलोचना नहीं कर सकते और करते ही देशद्रोही हो जाते हैं। अगर किसी प्रदेश का नागरिक अपनी अपेक्षाएं सरकार को बताए तो इसमें गलत क्या है। अगर आज मेरे प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत के लिए मैं कहूं कि गुर्जर आंदोलन को समय रहते ही देख लिए जाना चाहिए था या कि यह उनकी भूल है जो फिर पटरियां उखड़ने के नौबत आई तो क्या मैं देशद्रोही करार दी जा सकती हूँ और जो मेरे मुख्य्मंत्री कोई ऐसा भव्य कार्यक्रम राज्य में करें जिससे राज्य की जनता कम इत्तेफ़ाक़ रखती हो और मैं इस बाबत कुछ लिख दूँ तो राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत गिरफ़्तार की जा सकती हूँ ? यानी बेहतर हो कि मैं मौन रहूंमुझे कोई हक़ नहीं अपनी राय ज़ाहिर करने का? मणिपुर के ये पत्रकार 27 नवंबर से जेल में हैं पत्नी दो नन्हीं बेटियों के साथ कई मोर्चों पर जूझ रही हैं। पांच साल की मासूम पूछती है कि पापा जेल में हैं, क्या जेल अच्छी जगह है? माँ के पास कोई जवाब नहीं होता सिवाय इसके कि वे जल्द आएंगे और ढेर सारे खिलौने लाएंगे। बहरहाल 22 फरवरी इस परिवार के लिए सुखद तारीख हो सकती है जब पत्रकार की अपील सुनी जाएगी। अलग आवाज़ों को सुनने का हुनर सर्वशक्तिशाली सरकारों में नहीं  होगा तो अकेली इलेंगबम रंजीता किससे उम्मीद रखेंगी । यक़ीनन उनकी ऐसी डेट ख़त्म होनी चाहिए वरना हम सब एक ही सुर में विलाप कर रहे होंगे जबकि हमारा गीत है मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा। 






शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

कहां है भारतीयता ?

image : savita pareek

 

  गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर बस एक ही ख्याल मन में विचरता दिख रहा है कि आख़िर यह भारतीयता है क्या कहाँ बस्ती है ये? किसी को दर्शन करना हो तो कहाँ जाए? क्या वह भारतीयता थी जब कबीर अपनी वाणी से ऐसा महीन दोहा रचते थे जो मानवता को पहली पंक्ति में ला खड़ा करता था।  झीणी चदरिया बुनते-बुनते कबीर मानवीय गरिमा को जो ऊंचाई दे गए वह हम जैसों पर  आज भी किसी छत्र-छाया सी सजी हुई है। 
पाथर पूजे हरी मिले तो मैं पूजूँ पहाड़ 
घर की चाकी कोई ना पूजे जाको पीस खाए संसार

या फिर भारतीयता  कबीर नाम के उस  बालक में है जो मिशनरी स्कूल के समारोह में फ़ादर के पैर छू लेता है और ऐसा वहां कोई दूसरा नहीं करता। कबीर की बुनी चदरिया की छाया से आगे जो चलें तो देखिये बापू क्या कहते हैं-"मुझे सब जगह चरखा ही चरखा दिखाई देता है क्योंकि मुझे सब जगह ग़रीबी ही दिखाई देती है। मैंने चरखा चलाना सांप्रदायिक  धर्मों से कहीं श्रेष्ठ  माना है। यदि मुझे माला और चरखा में से किसी एक को चुनना हो तो जब तक देश ग़रीबी और फ़ाकाकशी से पीड़ित है तब तक मैं चरखा रूपी माला फेरना ही पसंद करूँगा। 

भारतीयता फिर क्या वहां है जब  बनारस के समीप पहुंचकर चचा  ग़ालिब  कहते हैं- सोचता था इस्लाम का खोल उतार फेंकू, माथे पर तिलक लगा, हाथ में जपमाला लेकर गंगा किनारे बैठकर पूरी जिंदगी बिता दूं, जिससे मेरा अस्तित्व बिलकुल मिट जाए। गंगा नदी की बहती धारा में एक बूंद पानी की तरह खो जा सकूं। बांग्ला लेखक रविशंकर बल जब दोज़ख़नामा में मिर्ज़ा ग़ालिब और मंटो को मिलवाते हैं तो भारतीयता वहीं झंडा थामे दिखती है। या फिर बिस्मिल्लाह खां साहब की शहनाई में जिसके सुर इसी बनारस के घाट की प्रतिध्वनि बन गूंजते हैं।  शायद भारतीयता  किसी भी खास धर्म जाति या नस्ल में नहीं है । ना ही किसी खान-पान, वेशभूषा, बोली के दायरे में बंधी है। शायद भारतीयता एक विशाल समुद्र में है जो कई सदियों की गहराई और मनवीयता खुद में समेटे हुए है।  भारतीयता हमारी नैतिकता में है ,सबके काम आने में है ,सबके दुःख-दर्द में शामिल होने में है, विरोधियों को जीने में है। बुद्ध और महावीर के ज्ञान और त्याग में है। सावित्री के प्रेम में है ,सीता की गरिमा में है ,द्रोपदी के साहस में है। 

यहाँ सदियों से लोग आते-जाते रहे हैं। इस धरा पर उनका आवागमन फिर अन्ततः  एक भारतीयता में ही बदलकर रह जाता है। हवाओं में भीनी ख़ुशबू की तरह। अविभाज्य। हमारी ख़ुशकिस्मती की यही अविभाज्य एक संविधान बनाकर हमारे पुरखों ने हमें दे दिया है। इसके मूल में यही भारतीयता है। जो हम आज इस अविभाज्य को समझ रहे हैं तो हम भारतीय गर्व के साथ सबसे ऊंचे खड़े हैं और जो संविधान को शक की निगाह से देख रहे हैं तो हम खुद की  ही  ज़मीन खींच रहे हैं। 

गणतंत्र दिवस मुबारक दोस्तो। यह बहुत बड़ा दिन है।  

बुधवार, 23 जनवरी 2019

बार डांसर की रोज़ी से सरकार को क्या ?




रोजी सबका हक है  फिर चाहे वह नाचकर ही क्यों न कमाई जा रही हो….   बुरा लगता  है  तो इस अनपढ़,बेबस,लाचार आबादी को काम दीजिये उसके बाद इस पेशे को  जी भरकर कोसिये …मेरी  राय में तो यदि पुरुषों  के नाच में महिलाओं को आनंद आता है तो उन पुरुषों को भी  पूरा हक़ है कि वे अपने पेशे को जारी रखें





फ़र्ज़ कीजिये कुछ महिलाएं एक डांस बार में पुरुषों के नाच का आनंद ले रही हों और उन्हें टिप भी देती हों और उनके ठुमकों पर खुश भी हो रही हों। पुरुष युवा हैं और उन्हें इस पेशे से अच्छी आय हो रही है। यूं भी नौकरी कहां आसानी से नसीब होने होती है। ऐसे में क्या पुरुष डांसर्स से केवल इसलिए उनका काम छीन लिया जाना चाहिए क्योंकि यह कुछ को अनैतिक लगता है। क्या यह एक पर्याप्त कारण है किसी से उसका रोज़गार ले लेने का जो वह दिन भर के दूसरे काम के बाद बतौर पार्ट टाइम अपनी शाम की पाली में करता है। यह काम उसे अतिरिक्त आय मुहैया करता है और शायद नाचने के उसके शौक को एक मंच भी।  इस काम से वह अपने परिवार को बेहतर जीवन शैली देता है। और जो यहाँ पुरुष की जगह महिलाएं हो तो क्या हमारी नैतिकता को कुछ ज़्यादा ठेस लगती है ? क्यों लगनी चाहिए जब कोई अपनी मर्ज़ी से अपना काम चुनता है और बदले में कुछ धन अर्जित करता है? स्त्री हो या पुरुष देखने का यह नज़रिया इतना अलग क्यों ? काम की ज़रुरत दोनों को सामान है फिर लिंगभेद क्यों ?

साल 2005 में जब महाराष्ट्र के एनसीपी सरकार के गृहमंत्री ने मुंबई और महाराष्ट्र के इन डांस बार्स को बंद करने का फरमान जारी किया तो लगभग एक लाख से ज़्यादा लोग और अस्सी हज़ार से ज़्यादा बार गर्ल्सबेरोज़गार हो गईं।  बार गर्ल्स पर तो जैसे आफत ही टूट पड़ी। ये वो लड़कियां थीं जो छोटे-छोटे शहरों से छोटे-बड़े काम करते हुए कई बार शोषण का शिकार हुईं थीं। आर्थिक, दैहिक, मानसिक शोषण से टूट चुकीं लड़कियों को जब डांस बार ने एक ठहराव की नौकरी दी तो हमारा झूठा नैतिक पैमाना गतिमान हो गया। उन्हें फिर उसी दलदल में  फेंकने पर उतारू हो गया। काम का दूसरा कोई विकल्प  ना देकर  डांस बार्स को बंद करने का आदेश जारी कर दिया गया। ऐसे हालत पैदा कर दिए जहाँ वे फिर किसी देह-व्यापर के  कुचक्र में  उलझ जाएं या फिर ऐसे असंगठित क्षेत्र के  काम को मजबूरी में चुन ले जहाँ न वेतन सही है और न काम के घंटे। 
    चांदनी बार नमक फिल्म बनाने वाले निर्देशक मधुर भंडारकर ने एक बार कहा था कि  मुझे यह बार सबसे ज़्यादा पवित्र जगह लगे। बार में डांस करनेवाली लड़कियां मंच पर जाने से पहले पूजा करती हैं नमाज़ पढ़ती हैं। कुछ शादीशुदा हैं और बच्चों को घर छोड़कर आती हैं। किसी भी दूसरी माँ की तरह वे बच्चों से उनके होमवर्क के बारे में पूछती हैं। कुछ ऐसी भी हैं जो दोहरी ज़िन्दगी जी रही हैं नाम बदल लेती हैं और अपनी पिछली ज़िन्दगी से मुक्त होकर नई शुरुआत करना चाहती हैं। शगुफ्ता रफीक को  सब लम्हे , राज -3 मर्डर -3 , आशिकी -2 जैसी फिल्मों की लेखिका के बतौर जानते हैं   लेकिन कभी उनकी ज़िन्दगी भी डांसबार्स की गलियों से गुज़री थी। ग्यारह साल की उम्र से उनकी ज़िंदगी कभी वैश्यालयों तो कभी वक़्त की कड़ी ठोकरों के बीच बीती। पिता का पता नहीं था। 2005 में जब डांस बार्स पर महाराष्ट सरकार ने प्रतिबन्ध लगाया तो वे पूरी तरह से निराशा हो चुकीं थीं। इसी अँधेरे समय ने शगुफ्ता रफीक को वह अवसर दिया जहाँ से उनकी ज़िन्दगी बदल गई। वे डांस बार्स पर रोक के हक में बिलकुल नहीं  और मानती हैं कि ये उन गरीब और शोषित लड़कियों को बेहतर जीविका मुहैया करते हैं। शगुफ्ता की ज़िंदगी इस बात की तस्दीक करती है कि जब जीवन को मज़बूत आर्थिक आधार मिलता है तब पसंद का काम भी पाया जा सकता है जो उन्हें बार गर्ल की जॉब के बाद पटकथा लेखक बतौर मिला। ज़िन्दगी के अनुभव की आंच ने उनसे ये पटकथाएं लिखवाईं। 
शायद इन्हीं कारणों से  अगस्त 2005 के सरकारी आदेश के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट को लगा कि डांस बारों को बंद करने का महाराष्ट्र सरकार का फैसला गैर-कानूनी था और महाराष्ट्र सरकार को ऐसा भरोसा क्यों था जो वह मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गई?  दरअसल, मुंबई, पुणे और अन्य शहरों में साल 2005  तक अस्सी हजार से भी ज्यादा बार डांसर्स थीं। अस्सी से नब्बे फीसदी स्त्रियां वहां रोज़गार के लिए हैं। किसी का पति बीमार है, किसी ने प्रेम में धोखा खाया है, किसी के पास बूढे़ माता-पिता के साथ छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी है, तो कोई इतनी फुर्ती से अब नहीं नाच सकती जितनी कि फिल्मों की एक्स्ट्रा को नाचना पड़ता है। ये पेशा उन्हें  रोटी देता है। यह काम है उनका, वैसे ही जैसे आप समय पर दफ्तर जाते हैं। बहुत अधिक अवसर थे कि ये सभी किसी चकलाघर में धकेल दी जातीं जहां देह बेचकर उन्हें रोजी कमानी पड़ती। लेकिन बार डांसर्स यहां नाचकर उस जिल्लत से बची हुई थीं। 
   सवाल किया जा सकता है कि यही काम क्यों जरूरी है? दूसरी मेहनतकश महिलाओं की तरह वे भी घरों में काम कर सकती हैं, मजदूरी कर सकती हैं। जैनब और मोनिका के बयानों पर गौर कीजिए- 'आपको लगता है कि हम सीधे इस जगह पर आ गए। हम भी काम मांगने ही निकले थे। ज्यादा नहीं पांच- हजार रुपया महीना कमाने की ख्वाहिश थी लेकिन काम ढूंढ़ते-ढूंढ़ते ही हमें यहां तक पहुंचा दिया गया। हमारी गलती यह रही कि हम गरीब, कम पढ़ी-लिखी और जरूरतमंद थीं। यहां कोई परेशानी नहीं। कोई टच भी नहीं करता हम लोग को। बस, इन पुलिसवालों का ही डर सवार रहता है। '  शायद हमारे देश में किसी भी तरह की रोक या प्रतिबंध से पहले प्रति व्यक्ति आय यानी आम देशवासी की माली हालत पर गौर करना बहुत जरूरी है। एक बड़ी आबादी आज भी कुपोषण, अशिक्षा और खराब स्वास्थ्य के साथ जीने को मजबूर है। रोजगार के अवसर ऐसी आबादी के लिए ना के बराबर हैं। घरों में सफाई का काम करने वाली महिलाओं का काम तब तक ही सलामत है जब तक वे काम कर पाने लायक  हैं। भविष्य तो असुरक्षित है ही वर्तमान भी महंगाई की मार से धुंधला गया है। अंधेरे में चल रहे रोजगारों की तरफ मुडऩा मजबूरी है। हमारे मानदंड दोहरे हैं। हम बड़ी महफिलों में ठुमके लगाने वाली फिल्मी अदाकारों का तो मान करते हैं लेकिन रोजी के लिए नाच रहीं इन स्त्रियों का नहीं। वरना क्या कारण है कि  थ्री स्टार्स, फाइव स्टार्स में तो डांस बार चलते रहे लेकिन बाकी जगह इन्हें प्रतिबंधित कर दिया गया। 

साल 2016 में महाराष्ट्र सरकार ने कड़े नियम बनाकर डांस बार्स को चलने की इजाज़त दे दी। बार्स में कैमरा ज़रूरी था, मंच को ग्राहक से काफी ऊंचाई पर होना था और वहीँ परिवार के बैठने की व्यवस्था भी हो जहाँ से मंच नज़र न आता हो। मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में आया जहाँ फैसले को सुरक्षित रख लिया गया। बीते सप्ताह जब उच्च न्यायलय ने फैसला सुनाया तो वह इन्हें राहत देने वाला था। कोर्ट ने कहा कि डांसर्स पर पैसे नहीं उछाले जाएंगे। कैमरा ज़रूरी नहीं है, यह निजता का हनन है । रात साढ़े ग्यारह बजे बाद इन्हे नहीं चलाया जाए। यहाँ प्रतिबन्ध नहीं है बस इन्हें नियमित करने की अनुशंसा है। यूं भी रोज़गार के मौलिक हक़ को समाज से कोई ख़ारिज नहीं कर सकता। दरअसल यह क्षमताओं के अनुसार आजीविका चुनने के हक़ का भी सम्मान है। मोरल पुलिसिंग यानी नैतिकता की दुहाई की यहाँ कोई दरकार नहीं है। दरकार है तो इस बात पर विचार करने कि आखिर कौन से आर्थिक और सामाजिक कारण है जो कई बार मजबूरी में उन्हें यहाँ ले आते हैं ?
        समीना दलवई जिन्होंने बारगर्ल्स पर गहरा अध्ययन किया है कहती हैं आखिर क्या वजह है कि इस प्रतिबन्ध पर  तमाम पोलिटिकल पार्टियां सहमत होती हैं।  जाति और लिंग यहाँ बड़ी भूमिका अदा करते हैं। डांस बार्स की बाढ़ आना और फिर  इस पर प्रतिबंध का ताल्लुक वैश्वीकरण से है। उच्च जाती के मर्दों का मनोरंजन है जो समाज के वंचित तबके से आनेवाली ये स्त्रियां पूरा करती हैं। ये बारगर्ल उत्तर भारत के पारंपरिक नाचनेवाले समुदायों  से हैं। इन्हें काम की ज़रुरत है और नए वैश्विक बाजार से पैसा कमाने वाले धनाड्य समुदाय को मनोरंजन की। यहाँ डिमांड और सप्लाय का रिश्ता शुरू होता है। अपने रसूख से पैसा बनानेवाला यह वर्ग इस तरह के मनोरंजन से बड़ी तेजी से जुड़ने लगता है। बार गर्ल्स निम्न  तबके से आती हैं जहाँ आर्थिक सहूलियतें न के बराबर हैं। 80 के दशक में  यह जोड़ खूब काम करता है और डांस बार का नया बाजार जन्म लेता है। 
       समीना का  रिसर्च कहता है कि ये डांसबार्स बॉलिवुड के गानों पर ऐसा समां बांधते जिससे नवधनाड्य वर्ग की वे सामंती इच्छाएं पूरी होती जहाँ वे तवायफों को इर्द-गिर्द नाचते हुए खुद को राजसी ठाठ-बाट वाला महसूस करते। नाच और प्रतिस्पर्धा से भरा यह लाभकारी व्यवसाय कोई खुले में तो होता नहीं था। आराम से चलता रहा। रिश्ते भी आगे बढ़े जो सभ्य समाज को चुनौती मालूम हुए। नाच से होने वाली आय इस तबके को मध्यवर्ग में दाखिल कर रही थी,उनकी जाति और वर्ग से उनकी पहचान टूट रही थी।  और उधर उच्च वर्ग  को अपनी स्थापित पितृसत्ता की चूलें हिलती नजर आईं। परिवार की इकाई को भी चुनौती मिलने लगी। संस्कृति और अच्छी पत्नी वाले महाष्ट्रियन संस्कार परिवारों को जब बारगर्ल्स से  चुनौती मिली तो जैसे सब सोते से जागे। संस्कारी पुरुष का बुरी औरतों पर पैसे लुटाने का यह अंदाज ,राजनीति गलियारों में खलबली मचाने लगा।  बार गर्ल्स अनैतिक लगने लगीं  जो उन्हें अपनी अदाओं में उलझा रही थी। उनका पेशा गरिमाहीन  हो गया और सत्ता के गलियारे इसे बंद करने पर तुल गए। बहरहाल न्याय की सोच न सामंती होती है न भेदभाव वाली। वह रोज़गार के सामान अवसरों की पैरोकार होती है।  नतीजतन फैसला बार गर्ल्स के हक़ में गया। न बार बंद होंगे न नाच पर प्रतिबन्ध होगा। सरकार का हाल यह है कि उसे वैश्यावृत्ति का चलना मंज़ूर है लेकिन डांस बार्स नहीं। देखना यही होगा कि फिर कोई ऐसा प्रतबंध सर न उठा ले जबकि सरकार का दायित्व  महिलाओं को सुरक्षा और व्यवसाय को नियमानुसार चलने देने का है।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

नमो रागा के एक से राग





राहुल गाँधी ने रक्षा मंत्री में पहले जेंडर देखा और फिर उसे भी कमतर देखा वर्ना वे ये नहीं कहते कि " चौकीदार लोकसभा में पैर नहीं रख पाया।  और एक महिला से कहता है कि निर्मला सीतारमण जी आप मेरी रक्षा कीजिए, मैं अपनी रक्षा नहीं कर पाऊंगा।  आपने देखा कि ढाई घंटे महिला रक्षा नहीं कर पाई। '' यह बयान हमारे ही शहर जयपुर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने किसान रैली को सम्बोधित करते हुए दिया। इसके बाद  राष्ट्रीय महिला आयोग ने नोटिस जारी कर राहुल गाँधी से जवाब माँगा है।  उन्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए था लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह कहना चाहिए था कि वह कांग्रेस की कौनसी विधवा (सोनिया गाँधी ) थी जो रूपए लेती थी ,या फिर यह कि क्या किसी ने 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड (शशि थरूर की पत्नी सुनन्दा पुष्कर के लिए तब उनकी शादी नहीं हुई थी ) देखी है या फिर रेणुका चौधरी के लिए यह कहना कि आज बहुत दिनों बाद रामायण सीरियल के बाद ऐसी हंसी सुनने का मौका मिला है। 
ज़ाहिर है ये कोई सद्वचन नहीं हैं जो मोदी जी ने कहे थे। आशय रावण की बहन शूर्पणखा की और था। यही राहुलजी भी कर गए। महिला आयोग के पास दो अलग-अलग निगाहें नहीं होनी चाहिए। वाकई हैरानी होती है कि धुर विरोधी विचारधराओं वाली दृष्टि भी महिलाओं के सन्दर्भ में किस कदर एक सी होती है। क्योंकि यह हमारे भीतर तक पैंठी हुई है। हमने उन्हें सम्मान  देना सीखा ही नहीं और ना ही उन्हें स्वीकारना सीखा है। बड़े पदों पर तो बिलकुल ही नहीं। राहुल गाँधी ने अगले दिन फिर एक ट्वीट कर  कहा कि  कहा, ''हमारी सभ्यता में महिलाओं का सम्मान घर से शुरू होता है. डरना बंद कीजिए. मर्दों की तरह बात कीजिए. और मेरे सवाल का जवाब दीजिए. क्या वायुसेना और रक्षा मंत्रालय ने असली रफ़ाल डील को ख़त्म किए जाने का विरोध किया था?'' लगा था कि वे वाक्य विन्यास कुछ बेहतर करेंगे लेकिन फिर वही बात मर्दों की तरह बात कीजिये यानी महिला की तरह बात करना तो कमज़ोर होना है। जाने क्यों इनकी बातों से ये समझ आता है कि दहाड़ना ही सच्चाई का प्रतीक है,शालीनता सादगी और सहज संवाद के कोई मायने नहीं है। ये थिएट्रिकल अंदाज़ राजनीति के मंच पर वो सम्मोहन पैदा नहीं करते। बुरा लगता है जब कोई बड़ा नेता भी उसी आम सोच की नुमाइंदगी करने लगता है जिसे बदले जाने की उम्मीद उससे थी। सार्वजनिक जीवन में हम महिलाएं उनसे इस बुनियादी शिष्टाचार की अपेक्षा करती  हैं तो कुछ ज़्यादा तो नहीं करती। इन्हें समझना होगा कि इनकी ऐसी सोच जब भी ज़ाहिर होती है,लिंगभेद की दिशा में चल रही सुधार प्रक्रिया बहुत पीछे चली जाती है। 

ps : 9 जनवरी को राहुल गाँधी का जयपुर में दिया शेष सम्बोधन वाकई बेहतरीन था लेकिन हमारे नेताओं को संवेदनशील होना ही होगा खासकर जब वे संसद या सार्वजनिक सभाओं में बोल रहे हों और ये सभी बयान इन्हीं महत्वपूर्ण जगहों से दिए गए हैं। सार्वजानिक सभाओं से ही ये संसद की पवित्र देहरी चढ़ते हैं।