शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

मुझे तो डॉ साहब भीष्म जैसे लगते हैं और सोनिया गाँधी ?

the accidental prime minister credit you tube 



मुझे तो डॉ साहब भीष्म जैसे लगते हैं यह एक नई फिल्म का संवाद है जिसे लेकर कांग्रेस परेशान और भाजपा खुश है। मेरा सवाल केवल इतना है कि एक निर्देशक को कैसा लगता होगा जब उसकी फिल्म दर्शकों की बजाय राजनीतिक की शरण में चली जाए। 

बड़ा ही दिलचस्प समय है।  एक फीचर फिल्म के ट्रेलर को एक राजनीतिक दल ने अपने ऑफिशिअल ट्विटर हैंडल पर शेयर किया है कि कैसे एक  राजनीतिक परिवार ने  दस साल तक प्रधानमंत्री की कुर्सी को बंधक बनाए रखा ताकि उसके  उत्तराधिकारी की ताजपोशी हो सके ।  दल ने अपने बयान  के साथ फिल्म का ट्रेलर लिंक भी साझा  किया है। ये राज-प्रतिनिधि थे पूर्व प्रधामंत्री  डॉ मनमोहन सिंह और उत्तराधिकारी राहुल गाँधी। फिल्म का नाम है द  एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर,निर्देशक विजय आर गुट्टे हैं। हम सब जानते हैं मनमोहन  सिंह की भूमिका में अनुपम खेर हैं और फिल्म में अच्छी खासी भूमिका सोनिया गाँधी की भी है जिसे जर्मन कलाकार सुज़ैन बर्नर्ट  ने निभाया है।  

राजनीति पर पहले भी कई फ़िल्में बन चुकी हैं लेकिन जिस फिल्म का नाम तुरंत  ध्यान आता है वह है आंधी जिसके बारे में कहा जाता है कि वह पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के जीवन से प्रेरित थी । फिल्म ज़बरदस्त चर्चा में रही ।  तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी ने फिल्म तो नहीं देखी  लेकिन दो सदस्यों  को स्क्रीनिंग के लिए भेजा। उन्होंने  आंधी को क्लीन चिट दी। निर्देशक गुलज़ार ने खुद कहा कि पीएम और आरती के किरदार में कोई साम्य नहीं है बीस हफ्ते के बाद जब गुजरात के विपक्ष ने धूम्रपान और नशे के दृष्यों के साथ यह प्रचारित किया कि ये इंदिरा गाँधी हैं। यह 1975  का दौर था। यह आज का समय है जब सोशल मीडिया की तरह सिनेमा भी वोटर्स को प्रभावित करने वाला होगा। इसलिए यह दिलचस्प समय है कि एक सत्ताधारी पार्टी यानी भाजपा ने इस फिल्म को एक तरह से गोद ले लिया है। ट्रेलर अपने आप में दिलचस्पी जगाता है ,सोनिया गाँधी को खल पात्र बताने की कोशिश के साथ जब  मालूम होता है कि एक पार्टी की इसमें विशेष दिलचस्पी है, यह कुछ-कुछ प्रायोजित की श्रेणी में आता हुआ भी लगता  है। फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि द  एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर  2004 से 2008 तक मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की इसी नाम से आई किताब पर आधारित है। पता नहीं निर्देशक को कैसा लगता होगा जब उसकी फिल्म जनता के बीच आने से पहले एक दल विशेष की अनुशंसा पा ले ,बशर्ते कि फिल्म भी किसी द्वेष से प्रेरित होकर न बनी हो।अब जब एक दल को  पसंद आई है तो दूजे को विरोध में आना ही था   फिल्म 11 जनवरी को रिलीज़ होने वाली है लेकिन लगता है उससे पहले इन राजनीतिक दलों के कई विवाद रिलीज़ होंगे।दो दलों की रस्साकशी के बीच हिंदी फिल्म का यूं  दुर्घटनाग्रस्त होना  वाकई रोचक होगा शायद यही उसे  हिट की नैया में भी सवार करा दे। 

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

जनरल आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी

वाकई हैरानी और दुःख है सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के बयान पर कि फिलहाल वे भारतीय सेना में महिलाओं को लड़ाई में आगे रखने के स्थिति में नहीं है। वे कहते हैं महिलाएं कहेंगी वे हमें देख रहें हैं और फिर हमें उनके लिए आवरण का इंतज़ाम करना पड़ेगा।
माफी चाहेंगे जनरल लेकिन आप उन झाँकने वालों का इंतज़ाम कीजिये , महिलाओं के एतराज़ का नहीं। हो सकता है कुछ व्यावहारिक  परेशानियों हो लड़ाई में लेकिन आप वे शख़्स नहीं होने चाहिए जो ये सब बातें बताएं,आपको यह बताना चाहिए की महिलाएं कैसे  इन चुनौतियों से मुकाबला करें । आपको नए और साहसी तरीकों पर बात करनी चाहिए। आप कैसे पुराने और बने -बनाए ढर्रों पर चलने की बात कर सकते हैं। कौन साठ  साल पहले यह यकीन कर सकता था कि बॉक्सर मैरी कोम ना केवल मर्दों की दुनिया में प्रचलित खेल को अपनाएंगी बल्कि वर्ल्ड चैंपियन भी होंगी। तीन बच्चों की माँ ने साबित किया है कि वह परिवार और प्रोफेशन दोनों मोर्चे बखूबी संभाल सकती हैं। बछिन्द्री पाल का  एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचना भी वैसा ही साहस है। कल्पना चावला का अंतरिक्ष में रहना भी उन लोगों को मुँह तोड़ जवाब है जो स्त्री को केवल बंधी-बंधाई भूमिका में देखना चाहते हैं। स्त्री हर खांचे को तोड़ रही है और यह भी सही है की पहली बार उन्हें यह मौका संजीदा और उन पर यकीन करने वाले ओहदेदार पुरुषों ने ही दिया होगा। जनरल आपसे भी यही उम्मीद थी कि आप नए प्रतिमान गढ़ेंगे। आपके नेतृत्व में स्त्री साहस की उस लकीर पर चलकर भारतीय सेना के फलक पर नई इबारत लिखेगी। लेकिन अफ़सोस।

यूं तो वह 1857 से आज तक अपनी वीरता और साहस के परचम लहरा रही हैं । झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से लेकर जयपुर निवासी पत्रकार  बणा जीतेन्द्र सिंह जी शेखावत की  पुत्री मेजर स्वाति शेखावत "खाचरियावास" तक।  मेजर स्वाति इस समय माइनस 25 डिग्री की सबसे ठंडी व बर्फीली सीमा पर देश की रक्षा में तैनात है। जनरल आप कैसे ऐसा कह सकते हैं ?

मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

my life is not your porn

दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में महिलाओं का सबसे बड़ा प्रदर्शन
photo getty image  

अगर कोई सवाल करे कि तेज़ रफ़्तार तकनीक ने  क्या तकलीफ पहुंचाई है तो क्या जवाब होंगे आपके ? सोच को थोड़ा और तकलीफ़ देते हुए स्त्री के सन्दर्भ में पूछा जाए तब ? वैसे यह इतना भयावह है कि आम कल्पना में  जवाब बनकर आ भी नहीं सकता। इस तकनीक के फरेब और जालसाजी ने स्त्री की निजी दुनिया का हरण  कर लिया है। वह चैजिंग रूम ,सार्वजनिक शौचालयों में  जाने से बचने लगी है। स्विमिंग पूल्स और होटलों के कमरे उसे और भी असुरक्षित लगते हैं। कहां, किधर, किस जासूसी कैमरा ने उसे फोकस कर रखा हो,मालूम नहीं लेकिन इस मालूमात के वजह से कि ऐसा हो रहा है ,वह हमेशा डरी हुई रहती है।  एक लड़की के जीवन को इन जासूसी कैमरा के डर ने ऑक्टोपस की भुजाओं सा जकड़ रखा है। ये कैमरा पेन ,जूतों की नोंक, सिगरेट के पैकेट ,पानी की बोतल ,आईने ,चश्मे, टॉयलेट पेपर किसी भी जगह हो सकते हैं। इस तेज तर्रार तकनीक के युग में अपराधी को बस इतना ही करना है  कि वह तस्वीर उतारे और इंटरनेट की दुनिया में उसे प्रसारित कर दे या फिर किसी गिरोह को बेच दे जो इस टुकड़े का इस्तेमाल मर्दों के कुंठित समाज से पैसे कमाने में करे। लड़की शायद जान ले या कभी जान ही ना पाए कि उसकी निजता किस  बाज़ार में कितनी कौड़ियों के दाम बिक रही है। दक्षिण कोरिया  में उस गर्म दोपहर को सिओल की स्त्रियां यूं ही नहीं सड़कों पर विरोध प्रदर्शन के लिए उतरीं थीं।वे अपनी तख्तियों के जरिये चीख रही थी कि हमारी ज़िन्दगी आपका पॉर्न नहीं है।

दक्षिण कोरिया से पहले आपको भारतीय शहरों के अपराध से रूबरू कराते हैं। इन शहरों में पीपिंग टोम्स तो हैं ही जासूसी कैमरा बॉयफ्रेंड की शक्ल लेकर भी सामने आता है। जयपुर शहर में एक महिला अपने कथित पति के साथ कभी मध्यम और कभी-कभार उच्च मध्य वर्गीय सोसाइटी में फ्लैट किराए पर लेती थी।  विश्ववस्नीयता  में कोई संदेह पैदा ना हो उनके साथ एक बच्चा भी होता। ये परिवार सोसाइटी के अन्य परिवारों से इस कदर घुलता-मिलता ,पार्टियां आयोजित करता कि सबको लगता कि ज़िन्दगी तो इनकी ठाठ से चल रही है और ऐसी ही हमारी भी होनी चाहिए। ये कथित परिवार नज़दीकिया जताकर महिलाओं और युवतियों को घर बुलाता, उनसे कपड़ों की बातचीत ऐसे छेड़ता जैसे वे अपने लिए लाए गए थे लेकिन फिट नहीं आ रहे तो वे ट्राय कर के देख लें। ऐसा जब कई लड़कियों और महिलाओं के साथ उन्होंने किया तो सोसायटी की ही एक युवती को शक हुआ। खोजबीन कर  उसने महिला के पटाने और कथित पति के दुसरे कमरे में मॉनिटरिंग के खेल को समझ लिया। भांडा फूटते ही रातोंरात यह शातिर अपराधी परिवार सोसाइटी छोड़कर भाग गया। कुछ दिनों बाद राजफाश हुआ कि इस परिवार के कई अपराधी काम थे जिसमें लोगों को टोपी पहनाकर पैसा बनाना भी था। जयपुर पुलिस रिकॉर्ड में यह अपराध दर्ज़ है। यह अपराधी परिवार अभी भी किसी न किसी शहर में सीधे-सादे लोगों को अपने जाल में फांसने पर लगा हुआ है।
दरअसल इन दिनों हुआ यह भी है कि हम अपनी निजता को सर्वोपरि मानते हैं। पड़ोस से हमें कोई लेनादेना नहीं है। एक -दुसरे को नज़रअंदाज करने के इस दौर में अपराधी किस्म के लोगों का काम आसान हो जाता है। कोई उनकी हरकतों पर सवाल नहीं करता। हुए इन दिनों हम ऐसे ही नए अपराधों का शिकार हो रहे हैं जो हमारी ही निजताओं की धज्जियाँ बिखेर रहे हैं।  लड़कियां छोटे कस्बों से झोला उठाकर बड़े शहरों का रुख कर रही हैं लेकिन ये शहर उन्हें सुरक्षा देने में नाकाम हैं। सपनों की ज़मीन पर कई अपराध पनप रहे हैं क्योंकि गिरोहों की  निगाह भी उसी जमीन पर  है। यह धोखाधड़ी बॉयफ्रेंड बनकर भी हो रही है।
         रीमा ने एक विज्ञापन अख़बार में देखा था। उसे डांस का ज़बरदस्त शौक था। अपने इस शौक को उसने पढ़ाई के नाम पर शहर में आकर पूरा किया। विज्ञापन एक रियलिटी डांस शो को लेकर था। रीमा ने वहां जाकर परफॉर्म किया। लौटकर जब आई तो तय कर चुकी थी कि दोबारा वहां नहीं जाएगी। शाम को वहां से कॉल आया कि आप कल फिर आइये नहीं तो आपकी क्लिपिंग्स सर्कुलेट कर दी जाएंगी। अपने शौक को आगे बढ़ाने की इतनी बड़ी कीमत देनी होगी, उसने सोचा भी नहीं था। बस इतना ध्यान आया कि उसने परफॉरमेंस के दौरान वहां कपड़े बदले थे। रीमा समझदार थी लेकिन पुलिस के पचड़े में पड़ने से बचना चाहती थी घर में किसी को बताया नहीं था इसलिए वहां से भी कोई उम्मीद नहीं कर सकती थी। संयोग से उसकी अच्छी मित्र के मामाजी पुलिस में थे, मामला बढ़ने से बच गया लेकिन रीमा भय से पीली पड़ चुकी थी और उसे महसूस हुआ कि इच्छाओं को मारने का सुनियोजित इंतजाम हर कहीं है।घर के भीतर भी ,घर के बाहर भी।  रेवा की कहानी तो उलट दौड़ की कहानी है।
हम तो यूं भी वीमेन फ्रेंडली समाज नहीं। हज़ार बंदिशे यूं भी हैं और अब ये स्मार्ट फ़ोन के कैमरों का डर। रेवा की बातों से ज़ाहिर है कि एक लड़की से हम कितने नपे-तुले व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं। उस दिन रेवा का घर जाने का बिलकुल मन नहीं था। ऑफिस से तेज बाइक चलाकर वह नई  फिल्म देखना चाहती थी। कैफे में कैपेचिनो का स्वाद लेते हुए नए बने चौराहे  की रोशनी में नहाते हुए चौड़े रास्ते  से गुजरते हुए बेवजह एक  चक्कर काटना चाहती थी, फिर उसने अपना हुलिया चैक किया। स्लीवलैस और कैप्री! नहीं...आज नहीं। उसने सिर को झटका दिया और वक्त से घर पहुंच गई। कई बार रेवा का मन करता है कि वह  शहर को जिए। कभी नुक्कड़वाली पान की दुकान पर ही खड़ी हो जाए, तो कभी मुड्ढों पर चाय की चुस्कियां ले और कभी रैन बसेरे के बाहर खड़ी हो वहां की रात पर भरपूर निगाह डाले। एक बार पहुंच भी गई। एक पुलिस वाला जो उसे कुछ देर से देख रहा था, बोला- मैडम घर जाओ...यहां अच्छे लोग नहीं आते। कुछ हो गया तो हम परेशानी में पड़ जाएंगे। रेवा चुपचाप वहां से चल पड़ी। सर्दी की रात, साढ़े दस बजे उसने सुलभ शौचालय का इस्तेमाल करना चाहा, तो वह भी बंद मिला, अलबत्ता पुरुष सुविधाएं यथावत थीं।
तो क्या एक लड़की या स्त्री की आज़ादी  पर अघोषित प्रतिबंध है? उसका शहर एक समय सीमा के बाद उसे स्वीकारने से मना कर देता है? क्यों सांझ ढलने के बाद पार्क की दूब उसके कदमों को स्वीकार नहीं कर पाती? दूब स्वीकार कर भी ले पार्क के स्वनिर्वाचित ठेकेदार ही डंडे फटकारने लगते  है जैसे वह अकेली वहां है ही क्यों ज़रूर किसी लड़के का इंतज़ार कर रही होगी। और क्यों  तेज बाइक चलाने के लिए उसका आधा लड़कों जैसे दिखना जरूरी है? इस शहर की जिम्मेदार नागरिक होने के बावजूद वहां की पब्लिक प्रॉपर्टी  पर उसका आधा-अधूरा  हक ही क्यों  है? इन तमाम सवालों के जवाब देने की कोशिश  शिल्पा फड़के, शिल्पा रानाड़े और समीरा खान ने अपनी किताब में दने की कोशिश की है। सवालों को उन्होंने किसी कस्बे या शहर की रोशनी में नहीं देखा  और न ही दिल्ली में, जो एक 'जेन्डर बायस्ड राजधानी है, बल्कि ये सवाल वीमन फ्रेंडली मुंबई के तरकश पर कसे गए थे ... आपको हैरानी होगी कि मुंबई भी महिला की इस कथित आवारगी का बोझ  नहीं सह सकी। समंदर का साहस रखने वाले मुंबइकर भी स्त्री को जॉब, शॉपिंग, बच्चों को स्कूल छोडऩे के अलावा कहीं और देखने के आदी नहीं हैं। इनकी लिखी किताब  का शीर्षक है 'वाय लॉइटर? वीमन एंड रिस्क ऑन  मुबई स्ट्रीट्स।  पेंग्विन ने इसे प्रकाशित किया था और यह इनकी तीन साल की रिसर्च का नतीजा था । नतीजे कहते हैं कि मुंबई की स्त्री जो काम से आते-जाते घड़ी की सुइयों की मोहताज नहीं, उसे भी हर वक्त यह डर लगा रहता है कि कोई उसे टोक न दे। वह इस कथित हमले के लिए तैयार और चौकन्नी रहती है।
   अब जब पब्लिक स्पेस में जब हम मुंबई में ही महिलाओं को देखने के आदी नहीं तो भारत के अन्य शहरों की कल्पना सहज की जा सकती है। लड़कियां तो कभी लड़कों के अधिकार क्षेत्र में अनाधिकार प्रवेश नहीं करती यह घुसपैंठ फिर उनकी ज़िन्दगी में क्यों ? उसकी निजता में बड़ा दखल स्मार्ट फ़ोन का कैमरा भी है। कब कौन कहाँ उनका वीडियो  शूट कर रहा है वे नहीं जानती। यूं तो एक कामकाजी स्त्री से उसके सहयोगी यह अपेक्षा नहीं रखते कि वह बच्चे, बीमारी, सुरक्षा या शारीरिक उत्पीडऩ को लेकर कोई सुविधा मांगे। वह घर और बाहर के बीच परफेक्ट बैलेंस रखते हुए गरिमा से जीती हुई महिला होनी चाहिए। अंग्रेजी-हिंदी की तमाम महिला पत्रिकाएं भी उसे सुपर वीमन बनाने का कोई मौका नहीं चूकतीं। स्त्री को हवा में उड़ाते हुए तमाम आलेख उसे मैजिक वुमन बना देना चाहते हैं, लेकिन यही मैजिक वुमन चांदनी रात में समंदर किनारे या फिर रेत के धोरों के बीच टहले, तो सबकी आंख का रोड़ा बन जाती है। किताब सवाल करती है कि क्यों एक स्त्री का उसके शहर,वहां की सार्वजनिक संपत्ति पर पूरा हक नहीं है, उसने क्या पहना है, किसके साथ हैं, इसका भय क्यों सताता है? क्या वे आधी नागरिक हैं?

आधी नागरिक होने का दर्द दक्षिण कोरिया के शहर सियोल में भी फूट पड़ा जब सत्तर हज़ार से ज़्यादा महिलाओं ने इस साल अगस्त में सड़क पर प्रदर्शन किया। यह दक्षिण कोरियाई इतिहास में अब तक क सबसे बड़ा प्रदर्शन था। इन्होने जासूसी कैमरा और यौन शोषण के खिलाफ जैसे युद्ध छेड़ दिया था । उनके पोस्टर्स कह रहे थे मेरी ज़िन्दगी आपका पोर्न नहीं है ,अगर मैं इस तकलीफ में झुलस रही हूँ तो आप क्यों नहीं। जायज़ सवाल कि हमारे वजूद पर आपकी इस कदर निगाह और दखल क्यों है। यहाँ 2011 में ऐसे अपराधों की संख्या एक हज़ार 354 थी जो बढ़कर 2017 में पांच हज़ार 363 हो गई। अपराधियों में 95 फीसदी पुरुष हैं। अच्छी बात  यह है कि  सिओल पुलिस  ने अपना बजट बढ़ाया है और वह भारतीय और पुलिस की तरह यह भी नहीं मानती कि महिलाओं को पूरे कपड़े पहनने चाहिए और घर से बाहर बेवक्त बिलकुल नहीं निकलना चाहिए। पुलिस  टीम बनाकर सार्वजनिक जगहों पर जासूसी कैमरा की टोह लेती है। जानकारी बढ़ाने के लिए स्कूल जैसी  जगहों पर बताया जाता है कि कैसे टाई, जूते की नोंक ,चाबियों में ये कैमरा लगे रहते हैं। सैमसंग के शहर और तेज इंटरनेट की इस दुनिया में महिलाओं को हर वक्त यह आशंका बनी रहती है कि कोई उनका पीछा कर रहा है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जाए ने भी कहा है कि इन जासूसी कैमेरा का दखल रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में बढ़ गया है और अपराधी के पकड़े  जाने पर उसे  सख्त सजा होनी चाहिए।    
           कल्पना कीजिये की कोई कोई महिला दिन भर के काम के बाद घर पहुंची हो और पुलिस दरवाज़े पर दस्तक देकर एक वीडियो दिखाए जिसमें वह नग्न पहचानी जा रही हो तो उसका क्या हाल  होगा। उसकी गरिमा उसे तार -तार होती हुई लगती है। उसकी निजता पर जब इस तरह हमला होता है तो शेष सारी  ज़िन्दगी के लिए वह अपमानित और असुरक्षित महसूस करती है। वह कोसने लगती है उस पल को जब प्रेमी के रूप में आए एक अपराधी पर उसने भरोसा किया। दक्षिण कोरिया में ऐसी ही घटनाएं इस बड़े  प्रदर्शन कारण बनी है। कभी एक्स बॉयफ्रेंड के बदले की भावना तो कभी ब्लैकमेल की मंशा इन शूटिंग्स की वजह रही है। यहां तक की सीढ़ियों पर छोटी स्कर्ट्स पहनी लड़कियों को भी फिल्माया गया है। ये पीपिंग टॉम्स किसी भी लड़की का जीवन असहज कर देते हैं। ये वे लोग हैं जो बलात  किसी लड़की की  निजी ज़िन्दगी में दाखिल होना चाहते हैं। यह वाकई मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला  है। कई बार इन घटनाओं की परिणति आत्महत्या भी होती है। तकनीक का यह दौर भारत में भी भयावह दृश्य पैदा कर रहा है। हमारे यहाँ स्त्रियों की परवाह करने का रिवाज़ ज़रा कम है। राजनीतिक चेतना में तो  यह शामिल ही नहीं है । युवा लड़कियों की आत्महया, उनसे जुड़े अपराध किसी की प्राथमिकता में नहीं। जिस दिन वे वोटबैंक बनकर दलों को चुनौती देंगी उसी दिन शायद उनके अस्तित्व को  भी महसूस किया  जाए । अभी तो वे सामान्य  म्यूजिकल इवेंट्स में जाने पर ही दुर्व्यवहार की शिकार हो जाती हैं। कपड़े अगर छोटे हुए तो सबके स्मार्ट फ़ोन भी उस और घूम जाते हैं।

(18 दिसम्बर 2018 को इंदौर से प्रकाशित प्रजातंत्र में मेरा लेख)









मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

डर से आगे प्रेम है

दुनिया में केवल दो ही तरह के भाव हैं पहला डर और दूसरा प्रेम। डर आपको दर्दनाक, नफ़रत , विषैले और जीवन को तबाह करनेवाले मोड़ पर छोड़कर आ सकता है जबकि प्रेम ख़ुशी, ख़ूबसूरती और नए क्षितिज की और ले जाने वाली उड़ान का रास्ता दिखाता है।

कुछ नहीं यह नन्हीं  तितली यूं ही दरवाज़े पर आ बैठी मुझे अनायास प्रेम और ख़ुशी देने के लिए।
ऐसा अक्सर होता है जब मैं अपने ही ख़यालो में गुम होकर उदास या दुखी होती हूँ ऐसे मंज़र मुझे भयमुक्त कर देते हैं। बेशक ये मुझ पर असर करते हैं लेकिन बालकनी में इठलाता कबुतरों का जोड़ा शाम को निश्चित समय पर क़रीब से गुजरने वाले तोतों का झुंड और मुंडेर पर पैनी निगाह लिए बैठा शिकरा। सच कहूँ तो ये मेरा इंतज़ार हैं। कोई कह सकता है कि वक़्त त से पहले बुढ़ाना इसी को कहते हैं लेकिन मुझे लगता है कि जीवन से निग़ाह मिल रही है फिर मेरी। फिर प्रेम हो रहा है। डर छूट रहा है। यही सब तो हुआ था जब तुम मिले थे। सच डर से आगे प्रेम है।