शुक्रवार, 23 मार्च 2018

आपके दिल में पूर्वोत्तर और सिंध दोनों के लिए खोट है

कुछ दिन पहले कांग्रेस के सांसद रिपुन बोरा ने राजयसभा में एक निजी प्रस्ताव देते हुए राष्ट्रगान में संशोधन की मांग की। इस प्रस्ताव में उन्होंने 'सिंध' शब्द हटाकर इसकी जगह 'पूर्वोत्तर' जोड़ने को कहा है। बोरा ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाते हुए कहा, 'सिंध' शब्द सिंध प्रांत का प्रतिनिधित्व करता है, जो अब भारत का नहीं बल्कि पाकिस्तान का हिस्सा है। इसे हटाना चाहिए और देश के एक महत्वपूर्ण हिस्से 'उत्तर पूर्व' क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले शब्द को जोड़ा जाए। 

आज़ादी के इतने बरसों बाद और इस बीच यही लगता रहा कि पाकिस्तान से कभी भी यह एतराज़ आ सकता है कि भारत के राष्ट्रगान में सिंध शब्द क्यों है, यह तो हमारे देश का हिस्सा है लेकिन ऐसा नहीं हुआ, बहुत अच्छा हुआ। तकलीफ़ की मरोड़ें हमारे अपने ही देश से  उठती रही हैं। इस बार ये तकलीफ़ कांग्रेस के सांसद रिपुन बोरा को हुई  है। बेशक पूर्वोत्तर जोड़ा  जाना चाहिए लेकिन सिंध हटाकर क्यों ? किसी को हटाकर किसी को जोड़ने को ही विस्थापन कहते हैं और  सिंधी इस पीड़ा को  भुगत चुके हैं।  इस भावुक और राष्ट्र-प्रेम से जुड़े मसले  पर कोई किसी का सब्स्टीट्यूट कैसे हो सकता है?  इस मांग के बाद भारत में रह रहे सिंधी ख़ुद को दोबारा  विस्थापित महसूस कर रहे  हैं।  तकलीफ़ ये कि हम अपने सूबे से तो अलग हुए ही हैं , राष्ट्रगान से भी हमारी पहचान मिटाई जा रही है। 1947 में विभाजन के बाद भारी क़दमों और भरी आँखों से जिस सिंध कौम ने आपने सूबे को अलविदा कहा था उनकी अपनी सशक्त पहचान थी। सिंध की स्त्री आज़ाद ख़याल की पैरवी करती थी। भाषा ,लिपि खान-पान ,पहनावा परम्पराएं ,गीत-संगीत जिस माटी ने उन्हें दिए थे, वह माटी उनसे छूट रही थी। माटी और इंसान का बंटवारा कर दिया गया था । अपने ज़ेहन और झोली में जितना ला सके उतना सिंध वे हिंदुस्तान ले आए । पूरे हिंदुस्तान में सिंध की ख़ुशबू बिखर गई। वाकई बिखर के भी ख़ुशबू बिखेरने का जज़्बा  सिंधवासी में देखा जा सकता है। अपनी पहचान के साथ जहाँ   रह रहे  हैं ,उस मिट्टी को भी आत्मसात करनेवाले सिंधी। इस मिटटी  के घनत्व को हर वो शख्स नाप सकता है जो उन दिनों के विस्थापित सिंधियों से रूबरू हुआ है। 

 देश को भले ही उस समय यह आबादी बोझ मालूम हुई होगी लेकिन उस पीढ़ी ने बहुत जल्दी यह बोझ  उनके दिल से उतार  दिया। अपनी सूझ-बूझ, मेहनत  और व्यवहार से वे देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत आधार देनेवाले बन गए। सिंध उनके दिल के कौने  में हमेशा ज़िंदा और महफूज़ रहा जिसे वे यदा -कदा  सुनहरी धूप दिखला दिया करते। सिंधु नदी के उस जल को छलकाते हुए हुए जो उनकी आँखों में था।  थदड़ी ,चेटीचंड और शादी-ब्याह में छोटा सिंध परिवारों में जाग्रत हो जाया करता है । आज भी सिंधी परिवारों में रिश्ते-नाते जोड़ते वक़्त पहला सवाल यही होता है कि आप सिंध में किस इलाके से। सक्खर ,लालकाणा ,जेकमाबादी, हैदराबादी, साहेती की पहचान अब भी सलामत है जिसे राष्ट्रगान में मौजूद सिंध या सिंधु शब्द ख़ूब हिंडोले देता है, और जब इसी सिंध को हटाने की बात उठती है तो इन दिलों में हूक उठती है। सिंध सूबे से ही सिंधियत की पहचान है जो ये नाम राष्ट्रगान में नहीं तो इनकी पहचान भी नहीं। 
सिंध से परहेज़ की कोई ख़ास वजह भी स्थापित नहीं होती। सच तो यह है कि जब ईरानी हिदुस्तान आये तो उन्होंने सिंध को ही हिन्द उच्चारित  किया और यही हिन्दुस्तान बना। इस शब्द से  परहेज़ कर पूर्वोत्तर को प्रेम करने का औचित्य समझ  से परे है सांसद रिपुन बोरा जी। पूर्वोत्तर से बेहद प्यार  होना चाहिए लेकिन सिंध को विस्थापित कर के  क्यों ? सिंधु सभ्यता के इन वंशजों का दिल दुखाकर  तो नहीं। मोहब्बत  दिल से होनी चाहिए आपकी तरह जोड़ -घटा कर नहीं । आपके दिल में पूर्वोत्तर और सिंध दोनों के लिए खोट है।

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शुक्रवार, 16 मार्च 2018

चंदा कानून

सवाल -जवाब 

इस समय देश में विपक्ष की भूमिका में कौन है ?

सर्वोच्च न्यायालय ,एक दो एंकर ,कुछ-एक वेबसाइट्स,कुछ सोशल मीडिया लेखक और स्टैंड-अप कॉमेडियंस !!
अगर जो ये सच नहीं तो क्यों 14 मार्च को बजट बिल बिना बहस के पास हो गया  और 42 साल पुराना वह  कानून  भी संशोधित होकर पारित जिसके तहत अब किसी भी राजनीतिक दल से यह नहीं पूछा जाएगा कि उसने  विदेश से कितना चंदा, कब और किनसे लिया है। न जांच हो सकती  है न अदालत जाया जा सकता है। है न पक्ष विपक्ष सब एक ?

सोमवार, 5 मार्च 2018

दूध पिलाती मॉडल की तस्वीर अश्लील नहीं गैर ज़रूरी है



यह तस्वीर  अश्लील भले ही नहीं है लेकिन ग़ैर ज़रूरी है और जो इरादा वाकई  सार्वजनिक स्थलों पर स्तनपान कराने की झिझक को मिटाने का है  तो माँ-बच्चे की असली तस्वीर होनी  चाहिए थी। यह  बच्चे के साथ फ़रेब है। 



यह तस्वीरअश्लील भले ही नहीं है लेकिन ग़ैर ज़रूरी है क्योंकि इसमें माँ नहीं एक मॉडल (गिलू जोसेफ़) शिशु  को दूध पिला रही है। यह उस मासूम के साथ धोखा है जो गोद  में है।  गोद असली है लेकिन माँ नकली है। इस माँ ने इसे भ्रम दिया है कि वह इसे दूध पिलाएगी। यह बच्चे के साथ नाइंसाफ़ी है। आप ख़ूबसूरत हैं ,तस्वीर ख़ूबसूरत है आपका इरादा भी नेक हो सकता है लेकिन बच्चे के साथ यह व्यवहार बदसूरत है। बर्दाश्त करने के काबिल नहीं है। 

फिल्म ताम तेरी गंगा मैली के नायिका मन्दाकिनी और उसके निर्देशक राज कपूर का भी यही अपराध था। उस बच्चे के बारे में कोई सचेत नहीं जो गोद में दिया गया है ,वह मॉडल नहीं है। क्या होता जो मलयाली पत्रिका गृहलक्ष्मी की माँ और संतान असली होते या फिर माँ धाय माँ ही होती। इनका अभियान वास्तव में सार्वजनिक स्थलों पर स्तनपान कराने में झिझकती माँ और उसे देखती निगाहों को सहज बनाना है तो जैविक माँ और बच्चे  का चयन ही बेहतर था लेकिन हम तो बच्चों के अधिकार विरोधी समाज से आते हैं। दूधमुँहे बच्चे पर भी अपनी मनमानी और क्रूरता  करने से बाज़ नहीं आते। मेरे भी दो बच्चे हैं लेकिन मैं इस काम के लिए कभी उन्हें किसी मॉडल के हाथ नहीं दूँगी। जहाँ तक पब्लिक प्लेसेस पर दूध पिलाने की बात है इसमें सहज रहिये। इस रिश्ते को देख सद्धभावना ही जागती है देखनेवाले की निगाह में।