शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

मुझे तो डॉ साहब भीष्म जैसे लगते हैं और सोनिया गाँधी ?

the accidental prime minister credit you tube 



मुझे तो डॉ साहब भीष्म जैसे लगते हैं यह एक नई फिल्म का संवाद है जिसे लेकर कांग्रेस परेशान और भाजपा खुश है। मेरा सवाल केवल इतना है कि एक निर्देशक को कैसा लगता होगा जब उसकी फिल्म दर्शकों की बजाय राजनीतिक की शरण में चली जाए। 

बड़ा ही दिलचस्प समय है।  एक फीचर फिल्म के ट्रेलर को एक राजनीतिक दल ने अपने ऑफिशिअल ट्विटर हैंडल पर शेयर किया है कि कैसे एक  राजनीतिक परिवार ने  दस साल तक प्रधानमंत्री की कुर्सी को बंधक बनाए रखा ताकि उसके  उत्तराधिकारी की ताजपोशी हो सके ।  दल ने अपने बयान  के साथ फिल्म का ट्रेलर लिंक भी साझा  किया है। ये राज-प्रतिनिधि थे पूर्व प्रधामंत्री  डॉ मनमोहन सिंह और उत्तराधिकारी राहुल गाँधी। फिल्म का नाम है द  एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर,निर्देशक विजय आर गुट्टे हैं। हम सब जानते हैं मनमोहन  सिंह की भूमिका में अनुपम खेर हैं और फिल्म में अच्छी खासी भूमिका सोनिया गाँधी की भी है जिसे जर्मन कलाकार सुज़ैन बर्नर्ट  ने निभाया है।  

राजनीति पर पहले भी कई फ़िल्में बन चुकी हैं लेकिन जिस फिल्म का नाम तुरंत  ध्यान आता है वह है आंधी जिसके बारे में कहा जाता है कि वह पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के जीवन से प्रेरित थी । फिल्म ज़बरदस्त चर्चा में रही ।  तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी ने फिल्म तो नहीं देखी  लेकिन दो सदस्यों  को स्क्रीनिंग के लिए भेजा। उन्होंने  आंधी को क्लीन चिट दी। निर्देशक गुलज़ार ने खुद कहा कि पीएम और आरती के किरदार में कोई साम्य नहीं है बीस हफ्ते के बाद जब गुजरात के विपक्ष ने धूम्रपान और नशे के दृष्यों के साथ यह प्रचारित किया कि ये इंदिरा गाँधी हैं। यह 1975  का दौर था। यह आज का समय है जब सोशल मीडिया की तरह सिनेमा भी वोटर्स को प्रभावित करने वाला होगा। इसलिए यह दिलचस्प समय है कि एक सत्ताधारी पार्टी यानी भाजपा ने इस फिल्म को एक तरह से गोद ले लिया है। ट्रेलर अपने आप में दिलचस्पी जगाता है ,सोनिया गाँधी को खल पात्र बताने की कोशिश के साथ जब  मालूम होता है कि एक पार्टी की इसमें विशेष दिलचस्पी है, यह कुछ-कुछ प्रायोजित की श्रेणी में आता हुआ भी लगता  है। फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि द  एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर  2004 से 2008 तक मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की इसी नाम से आई किताब पर आधारित है। पता नहीं निर्देशक को कैसा लगता होगा जब उसकी फिल्म जनता के बीच आने से पहले एक दल विशेष की अनुशंसा पा ले ,बशर्ते कि फिल्म भी किसी द्वेष से प्रेरित होकर न बनी हो।अब जब एक दल को  पसंद आई है तो दूजे को विरोध में आना ही था   फिल्म 11 जनवरी को रिलीज़ होने वाली है लेकिन लगता है उससे पहले इन राजनीतिक दलों के कई विवाद रिलीज़ होंगे।दो दलों की रस्साकशी के बीच हिंदी फिल्म का यूं  दुर्घटनाग्रस्त होना  वाकई रोचक होगा शायद यही उसे  हिट की नैया में भी सवार करा दे। 

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

जनरल आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी

वाकई हैरानी और दुःख है सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के बयान पर कि फिलहाल वे भारतीय सेना में महिलाओं को लड़ाई में आगे रखने के स्थिति में नहीं है। वे कहते हैं महिलाएं कहेंगी वे हमें देख रहें हैं और फिर हमें उनके लिए आवरण का इंतज़ाम करना पड़ेगा।
माफी चाहेंगे जनरल लेकिन आप उन झाँकने वालों का इंतज़ाम कीजिये , महिलाओं के एतराज़ का नहीं। हो सकता है कुछ व्यावहारिक  परेशानियों हो लड़ाई में लेकिन आप वे शख़्स नहीं होने चाहिए जो ये सब बातें बताएं,आपको यह बताना चाहिए की महिलाएं कैसे  इन चुनौतियों से मुकाबला करें । आपको नए और साहसी तरीकों पर बात करनी चाहिए। आप कैसे पुराने और बने -बनाए ढर्रों पर चलने की बात कर सकते हैं। कौन साठ  साल पहले यह यकीन कर सकता था कि बॉक्सर मैरी कोम ना केवल मर्दों की दुनिया में प्रचलित खेल को अपनाएंगी बल्कि वर्ल्ड चैंपियन भी होंगी। तीन बच्चों की माँ ने साबित किया है कि वह परिवार और प्रोफेशन दोनों मोर्चे बखूबी संभाल सकती हैं। बछिन्द्री पाल का  एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचना भी वैसा ही साहस है। कल्पना चावला का अंतरिक्ष में रहना भी उन लोगों को मुँह तोड़ जवाब है जो स्त्री को केवल बंधी-बंधाई भूमिका में देखना चाहते हैं। स्त्री हर खांचे को तोड़ रही है और यह भी सही है की पहली बार उन्हें यह मौका संजीदा और उन पर यकीन करने वाले ओहदेदार पुरुषों ने ही दिया होगा। जनरल आपसे भी यही उम्मीद थी कि आप नए प्रतिमान गढ़ेंगे। आपके नेतृत्व में स्त्री साहस की उस लकीर पर चलकर भारतीय सेना के फलक पर नई इबारत लिखेगी। लेकिन अफ़सोस।

यूं तो वह 1857 से आज तक अपनी वीरता और साहस के परचम लहरा रही हैं । झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से लेकर जयपुर निवासी पत्रकार  बणा जीतेन्द्र सिंह जी शेखावत की  पुत्री मेजर स्वाति शेखावत "खाचरियावास" तक।  मेजर स्वाति इस समय माइनस 25 डिग्री की सबसे ठंडी व बर्फीली सीमा पर देश की रक्षा में तैनात है। जनरल आप कैसे ऐसा कह सकते हैं ?

मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

my life is not your porn

दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में महिलाओं का सबसे बड़ा प्रदर्शन
photo getty image  

अगर कोई सवाल करे कि तेज़ रफ़्तार तकनीक ने  क्या तकलीफ पहुंचाई है तो क्या जवाब होंगे आपके ? सोच को थोड़ा और तकलीफ़ देते हुए स्त्री के सन्दर्भ में पूछा जाए तब ? वैसे यह इतना भयावह है कि आम कल्पना में  जवाब बनकर आ भी नहीं सकता। इस तकनीक के फरेब और जालसाजी ने स्त्री की निजी दुनिया का हरण  कर लिया है। वह चैजिंग रूम ,सार्वजनिक शौचालयों में  जाने से बचने लगी है। स्विमिंग पूल्स और होटलों के कमरे उसे और भी असुरक्षित लगते हैं। कहां, किधर, किस जासूसी कैमरा ने उसे फोकस कर रखा हो,मालूम नहीं लेकिन इस मालूमात के वजह से कि ऐसा हो रहा है ,वह हमेशा डरी हुई रहती है।  एक लड़की के जीवन को इन जासूसी कैमरा के डर ने ऑक्टोपस की भुजाओं सा जकड़ रखा है। ये कैमरा पेन ,जूतों की नोंक, सिगरेट के पैकेट ,पानी की बोतल ,आईने ,चश्मे, टॉयलेट पेपर किसी भी जगह हो सकते हैं। इस तेज तर्रार तकनीक के युग में अपराधी को बस इतना ही करना है  कि वह तस्वीर उतारे और इंटरनेट की दुनिया में उसे प्रसारित कर दे या फिर किसी गिरोह को बेच दे जो इस टुकड़े का इस्तेमाल मर्दों के कुंठित समाज से पैसे कमाने में करे। लड़की शायद जान ले या कभी जान ही ना पाए कि उसकी निजता किस  बाज़ार में कितनी कौड़ियों के दाम बिक रही है। दक्षिण कोरिया  में उस गर्म दोपहर को सिओल की स्त्रियां यूं ही नहीं सड़कों पर विरोध प्रदर्शन के लिए उतरीं थीं।वे अपनी तख्तियों के जरिये चीख रही थी कि हमारी ज़िन्दगी आपका पॉर्न नहीं है।

दक्षिण कोरिया से पहले आपको भारतीय शहरों के अपराध से रूबरू कराते हैं। इन शहरों में पीपिंग टोम्स तो हैं ही जासूसी कैमरा बॉयफ्रेंड की शक्ल लेकर भी सामने आता है। जयपुर शहर में एक महिला अपने कथित पति के साथ कभी मध्यम और कभी-कभार उच्च मध्य वर्गीय सोसाइटी में फ्लैट किराए पर लेती थी।  विश्ववस्नीयता  में कोई संदेह पैदा ना हो उनके साथ एक बच्चा भी होता। ये परिवार सोसाइटी के अन्य परिवारों से इस कदर घुलता-मिलता ,पार्टियां आयोजित करता कि सबको लगता कि ज़िन्दगी तो इनकी ठाठ से चल रही है और ऐसी ही हमारी भी होनी चाहिए। ये कथित परिवार नज़दीकिया जताकर महिलाओं और युवतियों को घर बुलाता, उनसे कपड़ों की बातचीत ऐसे छेड़ता जैसे वे अपने लिए लाए गए थे लेकिन फिट नहीं आ रहे तो वे ट्राय कर के देख लें। ऐसा जब कई लड़कियों और महिलाओं के साथ उन्होंने किया तो सोसायटी की ही एक युवती को शक हुआ। खोजबीन कर  उसने महिला के पटाने और कथित पति के दुसरे कमरे में मॉनिटरिंग के खेल को समझ लिया। भांडा फूटते ही रातोंरात यह शातिर अपराधी परिवार सोसाइटी छोड़कर भाग गया। कुछ दिनों बाद राजफाश हुआ कि इस परिवार के कई अपराधी काम थे जिसमें लोगों को टोपी पहनाकर पैसा बनाना भी था। जयपुर पुलिस रिकॉर्ड में यह अपराध दर्ज़ है। यह अपराधी परिवार अभी भी किसी न किसी शहर में सीधे-सादे लोगों को अपने जाल में फांसने पर लगा हुआ है।
दरअसल इन दिनों हुआ यह भी है कि हम अपनी निजता को सर्वोपरि मानते हैं। पड़ोस से हमें कोई लेनादेना नहीं है। एक -दुसरे को नज़रअंदाज करने के इस दौर में अपराधी किस्म के लोगों का काम आसान हो जाता है। कोई उनकी हरकतों पर सवाल नहीं करता। हुए इन दिनों हम ऐसे ही नए अपराधों का शिकार हो रहे हैं जो हमारी ही निजताओं की धज्जियाँ बिखेर रहे हैं।  लड़कियां छोटे कस्बों से झोला उठाकर बड़े शहरों का रुख कर रही हैं लेकिन ये शहर उन्हें सुरक्षा देने में नाकाम हैं। सपनों की ज़मीन पर कई अपराध पनप रहे हैं क्योंकि गिरोहों की  निगाह भी उसी जमीन पर  है। यह धोखाधड़ी बॉयफ्रेंड बनकर भी हो रही है।
         रीमा ने एक विज्ञापन अख़बार में देखा था। उसे डांस का ज़बरदस्त शौक था। अपने इस शौक को उसने पढ़ाई के नाम पर शहर में आकर पूरा किया। विज्ञापन एक रियलिटी डांस शो को लेकर था। रीमा ने वहां जाकर परफॉर्म किया। लौटकर जब आई तो तय कर चुकी थी कि दोबारा वहां नहीं जाएगी। शाम को वहां से कॉल आया कि आप कल फिर आइये नहीं तो आपकी क्लिपिंग्स सर्कुलेट कर दी जाएंगी। अपने शौक को आगे बढ़ाने की इतनी बड़ी कीमत देनी होगी, उसने सोचा भी नहीं था। बस इतना ध्यान आया कि उसने परफॉरमेंस के दौरान वहां कपड़े बदले थे। रीमा समझदार थी लेकिन पुलिस के पचड़े में पड़ने से बचना चाहती थी घर में किसी को बताया नहीं था इसलिए वहां से भी कोई उम्मीद नहीं कर सकती थी। संयोग से उसकी अच्छी मित्र के मामाजी पुलिस में थे, मामला बढ़ने से बच गया लेकिन रीमा भय से पीली पड़ चुकी थी और उसे महसूस हुआ कि इच्छाओं को मारने का सुनियोजित इंतजाम हर कहीं है।घर के भीतर भी ,घर के बाहर भी।  रेवा की कहानी तो उलट दौड़ की कहानी है।
हम तो यूं भी वीमेन फ्रेंडली समाज नहीं। हज़ार बंदिशे यूं भी हैं और अब ये स्मार्ट फ़ोन के कैमरों का डर। रेवा की बातों से ज़ाहिर है कि एक लड़की से हम कितने नपे-तुले व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं। उस दिन रेवा का घर जाने का बिलकुल मन नहीं था। ऑफिस से तेज बाइक चलाकर वह नई  फिल्म देखना चाहती थी। कैफे में कैपेचिनो का स्वाद लेते हुए नए बने चौराहे  की रोशनी में नहाते हुए चौड़े रास्ते  से गुजरते हुए बेवजह एक  चक्कर काटना चाहती थी, फिर उसने अपना हुलिया चैक किया। स्लीवलैस और कैप्री! नहीं...आज नहीं। उसने सिर को झटका दिया और वक्त से घर पहुंच गई। कई बार रेवा का मन करता है कि वह  शहर को जिए। कभी नुक्कड़वाली पान की दुकान पर ही खड़ी हो जाए, तो कभी मुड्ढों पर चाय की चुस्कियां ले और कभी रैन बसेरे के बाहर खड़ी हो वहां की रात पर भरपूर निगाह डाले। एक बार पहुंच भी गई। एक पुलिस वाला जो उसे कुछ देर से देख रहा था, बोला- मैडम घर जाओ...यहां अच्छे लोग नहीं आते। कुछ हो गया तो हम परेशानी में पड़ जाएंगे। रेवा चुपचाप वहां से चल पड़ी। सर्दी की रात, साढ़े दस बजे उसने सुलभ शौचालय का इस्तेमाल करना चाहा, तो वह भी बंद मिला, अलबत्ता पुरुष सुविधाएं यथावत थीं।
तो क्या एक लड़की या स्त्री की आज़ादी  पर अघोषित प्रतिबंध है? उसका शहर एक समय सीमा के बाद उसे स्वीकारने से मना कर देता है? क्यों सांझ ढलने के बाद पार्क की दूब उसके कदमों को स्वीकार नहीं कर पाती? दूब स्वीकार कर भी ले पार्क के स्वनिर्वाचित ठेकेदार ही डंडे फटकारने लगते  है जैसे वह अकेली वहां है ही क्यों ज़रूर किसी लड़के का इंतज़ार कर रही होगी। और क्यों  तेज बाइक चलाने के लिए उसका आधा लड़कों जैसे दिखना जरूरी है? इस शहर की जिम्मेदार नागरिक होने के बावजूद वहां की पब्लिक प्रॉपर्टी  पर उसका आधा-अधूरा  हक ही क्यों  है? इन तमाम सवालों के जवाब देने की कोशिश  शिल्पा फड़के, शिल्पा रानाड़े और समीरा खान ने अपनी किताब में दने की कोशिश की है। सवालों को उन्होंने किसी कस्बे या शहर की रोशनी में नहीं देखा  और न ही दिल्ली में, जो एक 'जेन्डर बायस्ड राजधानी है, बल्कि ये सवाल वीमन फ्रेंडली मुंबई के तरकश पर कसे गए थे ... आपको हैरानी होगी कि मुंबई भी महिला की इस कथित आवारगी का बोझ  नहीं सह सकी। समंदर का साहस रखने वाले मुंबइकर भी स्त्री को जॉब, शॉपिंग, बच्चों को स्कूल छोडऩे के अलावा कहीं और देखने के आदी नहीं हैं। इनकी लिखी किताब  का शीर्षक है 'वाय लॉइटर? वीमन एंड रिस्क ऑन  मुबई स्ट्रीट्स।  पेंग्विन ने इसे प्रकाशित किया था और यह इनकी तीन साल की रिसर्च का नतीजा था । नतीजे कहते हैं कि मुंबई की स्त्री जो काम से आते-जाते घड़ी की सुइयों की मोहताज नहीं, उसे भी हर वक्त यह डर लगा रहता है कि कोई उसे टोक न दे। वह इस कथित हमले के लिए तैयार और चौकन्नी रहती है।
   अब जब पब्लिक स्पेस में जब हम मुंबई में ही महिलाओं को देखने के आदी नहीं तो भारत के अन्य शहरों की कल्पना सहज की जा सकती है। लड़कियां तो कभी लड़कों के अधिकार क्षेत्र में अनाधिकार प्रवेश नहीं करती यह घुसपैंठ फिर उनकी ज़िन्दगी में क्यों ? उसकी निजता में बड़ा दखल स्मार्ट फ़ोन का कैमरा भी है। कब कौन कहाँ उनका वीडियो  शूट कर रहा है वे नहीं जानती। यूं तो एक कामकाजी स्त्री से उसके सहयोगी यह अपेक्षा नहीं रखते कि वह बच्चे, बीमारी, सुरक्षा या शारीरिक उत्पीडऩ को लेकर कोई सुविधा मांगे। वह घर और बाहर के बीच परफेक्ट बैलेंस रखते हुए गरिमा से जीती हुई महिला होनी चाहिए। अंग्रेजी-हिंदी की तमाम महिला पत्रिकाएं भी उसे सुपर वीमन बनाने का कोई मौका नहीं चूकतीं। स्त्री को हवा में उड़ाते हुए तमाम आलेख उसे मैजिक वुमन बना देना चाहते हैं, लेकिन यही मैजिक वुमन चांदनी रात में समंदर किनारे या फिर रेत के धोरों के बीच टहले, तो सबकी आंख का रोड़ा बन जाती है। किताब सवाल करती है कि क्यों एक स्त्री का उसके शहर,वहां की सार्वजनिक संपत्ति पर पूरा हक नहीं है, उसने क्या पहना है, किसके साथ हैं, इसका भय क्यों सताता है? क्या वे आधी नागरिक हैं?

आधी नागरिक होने का दर्द दक्षिण कोरिया के शहर सियोल में भी फूट पड़ा जब सत्तर हज़ार से ज़्यादा महिलाओं ने इस साल अगस्त में सड़क पर प्रदर्शन किया। यह दक्षिण कोरियाई इतिहास में अब तक क सबसे बड़ा प्रदर्शन था। इन्होने जासूसी कैमरा और यौन शोषण के खिलाफ जैसे युद्ध छेड़ दिया था । उनके पोस्टर्स कह रहे थे मेरी ज़िन्दगी आपका पोर्न नहीं है ,अगर मैं इस तकलीफ में झुलस रही हूँ तो आप क्यों नहीं। जायज़ सवाल कि हमारे वजूद पर आपकी इस कदर निगाह और दखल क्यों है। यहाँ 2011 में ऐसे अपराधों की संख्या एक हज़ार 354 थी जो बढ़कर 2017 में पांच हज़ार 363 हो गई। अपराधियों में 95 फीसदी पुरुष हैं। अच्छी बात  यह है कि  सिओल पुलिस  ने अपना बजट बढ़ाया है और वह भारतीय और पुलिस की तरह यह भी नहीं मानती कि महिलाओं को पूरे कपड़े पहनने चाहिए और घर से बाहर बेवक्त बिलकुल नहीं निकलना चाहिए। पुलिस  टीम बनाकर सार्वजनिक जगहों पर जासूसी कैमरा की टोह लेती है। जानकारी बढ़ाने के लिए स्कूल जैसी  जगहों पर बताया जाता है कि कैसे टाई, जूते की नोंक ,चाबियों में ये कैमरा लगे रहते हैं। सैमसंग के शहर और तेज इंटरनेट की इस दुनिया में महिलाओं को हर वक्त यह आशंका बनी रहती है कि कोई उनका पीछा कर रहा है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जाए ने भी कहा है कि इन जासूसी कैमेरा का दखल रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में बढ़ गया है और अपराधी के पकड़े  जाने पर उसे  सख्त सजा होनी चाहिए।    
           कल्पना कीजिये की कोई कोई महिला दिन भर के काम के बाद घर पहुंची हो और पुलिस दरवाज़े पर दस्तक देकर एक वीडियो दिखाए जिसमें वह नग्न पहचानी जा रही हो तो उसका क्या हाल  होगा। उसकी गरिमा उसे तार -तार होती हुई लगती है। उसकी निजता पर जब इस तरह हमला होता है तो शेष सारी  ज़िन्दगी के लिए वह अपमानित और असुरक्षित महसूस करती है। वह कोसने लगती है उस पल को जब प्रेमी के रूप में आए एक अपराधी पर उसने भरोसा किया। दक्षिण कोरिया में ऐसी ही घटनाएं इस बड़े  प्रदर्शन कारण बनी है। कभी एक्स बॉयफ्रेंड के बदले की भावना तो कभी ब्लैकमेल की मंशा इन शूटिंग्स की वजह रही है। यहां तक की सीढ़ियों पर छोटी स्कर्ट्स पहनी लड़कियों को भी फिल्माया गया है। ये पीपिंग टॉम्स किसी भी लड़की का जीवन असहज कर देते हैं। ये वे लोग हैं जो बलात  किसी लड़की की  निजी ज़िन्दगी में दाखिल होना चाहते हैं। यह वाकई मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला  है। कई बार इन घटनाओं की परिणति आत्महत्या भी होती है। तकनीक का यह दौर भारत में भी भयावह दृश्य पैदा कर रहा है। हमारे यहाँ स्त्रियों की परवाह करने का रिवाज़ ज़रा कम है। राजनीतिक चेतना में तो  यह शामिल ही नहीं है । युवा लड़कियों की आत्महया, उनसे जुड़े अपराध किसी की प्राथमिकता में नहीं। जिस दिन वे वोटबैंक बनकर दलों को चुनौती देंगी उसी दिन शायद उनके अस्तित्व को  भी महसूस किया  जाए । अभी तो वे सामान्य  म्यूजिकल इवेंट्स में जाने पर ही दुर्व्यवहार की शिकार हो जाती हैं। कपड़े अगर छोटे हुए तो सबके स्मार्ट फ़ोन भी उस और घूम जाते हैं।

(18 दिसम्बर 2018 को इंदौर से प्रकाशित प्रजातंत्र में मेरा लेख)









मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

डर से आगे प्रेम है

दुनिया में केवल दो ही तरह के भाव हैं पहला डर और दूसरा प्रेम। डर आपको दर्दनाक, नफ़रत , विषैले और जीवन को तबाह करनेवाले मोड़ पर छोड़कर आ सकता है जबकि प्रेम ख़ुशी, ख़ूबसूरती और नए क्षितिज की और ले जाने वाली उड़ान का रास्ता दिखाता है।

कुछ नहीं यह नन्हीं  तितली यूं ही दरवाज़े पर आ बैठी मुझे अनायास प्रेम और ख़ुशी देने के लिए।
ऐसा अक्सर होता है जब मैं अपने ही ख़यालो में गुम होकर उदास या दुखी होती हूँ ऐसे मंज़र मुझे भयमुक्त कर देते हैं। बेशक ये मुझ पर असर करते हैं लेकिन बालकनी में इठलाता कबुतरों का जोड़ा शाम को निश्चित समय पर क़रीब से गुजरने वाले तोतों का झुंड और मुंडेर पर पैनी निगाह लिए बैठा शिकरा। सच कहूँ तो ये मेरा इंतज़ार हैं। कोई कह सकता है कि वक़्त त से पहले बुढ़ाना इसी को कहते हैं लेकिन मुझे लगता है कि जीवन से निग़ाह मिल रही है फिर मेरी। फिर प्रेम हो रहा है। डर छूट रहा है। यही सब तो हुआ था जब तुम मिले थे। सच डर से आगे प्रेम है।




गुरुवार, 29 नवंबर 2018

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के नाम पर ....



twitter ceo jack dorsey with women journalists and activists 
 brahmanical patriarchy शब्द चर्चा में है। क्यों और क्या सन्दर्भ हैं इसके और कैसे किसी भी किस्म की पितृसत्ता समाज को कमज़ोर करती है। सबरीमाला के मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का विरोध और तीन तलाक का समर्थन क्या महिला महिला में फर्क की बयानी  करते है  ?  ट्वीटर सीईओ से क्या वाकई गलती हो गई ? ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के नाम पर समाज की चिंता है या मकसद राजनीतिक रिश्ता जोड़ना है क्योंकि उन्होंने तो  तख्ती हाथ में ली है हमारे नेता तो रोज़ ही जातिवादी बयान दे रहे हैं। 

स्मैश ब्राह्मणीकल पेट्रिआर्की यानी  ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को तोड़ दो।  इस प्लेकार्ड  को ट्वीटर सीईओ जैक डोर्सी  ने क्या थामा भारत में आलोचना का तूफान आ  गया और जवाब देने से बचने के लिए उन्हें विपश्यना शिविर जाना पड़ा। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के बारे में हम भारतवासी आपस में बात कर लेते लेकिन ट्वीटर सीईओ जो खुद एक अमरीकी हैं, को इसमें कूदने की शायद ज़रुरत नहीं थी। वे खुद भले हे परिदृश्य से गायब  गए हों लेकिन भारतीय कूद-कूद कर इस परिदृश्य में दाखिल हो रहे हैं। कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी को लगता है कि ब्राह्मण इस दौर के नए यहूदी हैं। दलित चिंतक कांचा इलैया  कहते हैं कि पितृसत्ता समाज की हकीकत है लेकिन आप तालिबानी पितृसत्ता को गलत और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को सही नहीं ठहरा सकते। दूसरा पक्ष कह  रहा है कि ट्वीटर पर इस तूफ़ान की कोई ज़रुरत नहीं थी   ब्राह्मणीकल पेट्रिआर्की एक शब्द है जिसका इस्तेमाल वर्चस्व या आधिपत्य जमाने वाले के लिए किया जाता है।

दरअसल , ट्वीटर सीईओ जैक डॉर्सी  बीते  पाखवाड़े  भारत की यात्रा पर थे। वे प्रधानमंत्री मोदी,राहुल गाँधी शाहरुख़ खान सभी से मिले लेकिन विवाद से उनकी मुलाकात भारतीय महिला पत्रकारों,लेखिकाओं  और कार्यकर्ताओं से बंद कमरे में हुई बैठक के बाद हुई।  एक दलित एक्टिविस्ट संघपाली अरुणा ने उन्हें यह प्लेकार्ड दिया और फिर  इसे पोस्ट कर दिया गया । ट्वीटर  पर घमासान मचना ही था। कहा गया कि हिन्दुओं की भावनाओं को आहत किया गया है और यह ब्राह्मणों  प्रति नफरत और पूर्वाग्रह से ग्रस्त  है।  ब्राह्मण संगठन ने उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा भी दायर किया है । आखिर क्या है ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के मायने ? मशहूर फ़ेमिनिस्ट लेखिका उमा चक्रवर्ती ढाई दशक पहले लिखे अपने लेख' में ऊंची जातियों में मौजूद तमाम मान्यताओं और परंपराओं के ज़रिए महिलाओं पर काबू करने की प्रथा को 'ब्राह्मणवादी पितृसत्ता' बताती हैं। लड़की को संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है और उसे पहले पिता और फिर पति की छत्रछाया में रहना होता है। यहां तक की प्राचीन भारतीय साहित्य में भी जाति की शुद्धता को जारी रखने के लिए महिलाओं को हर तरह से नियंत्रित किया गया। यही व्यवस्था हर जाती की स्त्रियों के लिए गुथी हुई है। 


  दलित चिंतक और राजनीतिक विचारक कांचा इलैया इस घटनाक्रम को सबरीमाला से जोड़ते हुए कहते हैं कि दुनिया देख रही है कि कैसे भाजपा और आरएसएस दस से पचास साल की महिलाओं के  मंदिर में प्रवेश के खिलाफ ब्राह्मण महिलाओं को प्रेरित कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद ऐसा किया जा रहा है। जबकि यही समूह तीन तलाक के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं के साथ खड़ा है। क्या नज़रिये के इस फर्क को दुनिया नहीं समझ रही ? यही तालिबानी पितृसत्ता भी करती आई है कि महिलाओं की देह को नज़र ही ना आने दो। महिलाओं को मंदिर में इसलिए न जाने देना क्योंकि वे रजस्वला हैं तो क्या  पुरुष अपने भीतर किसी भी किस्म के द्रव को ना रख पाने का दावा कर सकता है ? लेकिन महिलाओं के प्रवेश के अधिकार  छीन लिए जाते हैं । दुनिया इस भेदभाव को देख रही है और हैरत में है।  क्या डोर्सी का प्लेकार्ड थामना इस नज़रिये से सही नहीं हो सकता ? इसमें गलत क्या है, क्या हम सबरीमाला पर इस दोहरे नज़रिये को दुनिया से छिपा सकते हैं।


ख्यात पत्रकार चित्रा सुब्रमणियम चकित हैं कि कैसे एक सौ तीस करोड़ के देश में आकर डोर्सी इस प्लेकार्ड को उठा लेते हैं, बिना इसके बारे में जाने और एक भी लफ्ज़ कहे। क्या वे चीन में जाकर राष्ट्रपति जिनपिंग से यह कह सकते हैं कि आप वहां निष्पक्ष चुनाव कराएं या लंदन में जाकर पोस्टर उठाकर  थेरेसा मे से  यह कहें  कि ब्रेक्सिट के कारण पूरा देश आप पर हंस रहा है। क्या आप अपने देश अमरीका में ही यह कह सकते हैं कि दुनिया के उन देशों से व्यापार पूरी तरह बंद किया जाए जहाँ मानव अधिकारों को कोई तवज्जो नहीं है और आप ही के यहां  लोग बरसों से जेलों में सड़ रहे हैं और बच्चे कपड़ों के कारखानों में लम्बे समय तक काम करते हैं ताकि अमरीकी चैन की ज़िंदगी जी सकें। वैसे जैक डोर्सी हर देश के पास अपनी कोइ ना कोई समस्या है , किसी का भी खात्मा करने से पहले आपने खुद के पास बहुत कम जानकारियां रखी हैं।


      पत्रकार ने बड़े ही तरीके से तंज़ करते हुए यह कह दिया है कि ये हमारे ज़ख्म  हैं और हम ही इनकी मरहम-पट्टी भी करेंगे। क्या वाकई मरहम-पट्टी होती है जब कांग्रेस के नेता-प्रवक्ता  मनीष तिवारी कह देते हैं कि ब्राह्मणवाद का विरोध भारतीय राजनीति की हकीकत है। हम भारत के नए यहूदी हैं और हमें इसके साथ ही जीना सीखना होगा। इंफोसिस के पूर्व सीईओ टीवी मोहनदास पाई भी इस प्लेकार्ड से निराश हुए हैं। पटकथा लेखक अद्वैता काला ने भी इसे 'हेट स्पीच' करार दिया है। बहरहाल खुद को यहूदी करार देते हुए असुरक्षित बताना यह बताता है कि इन दिनों हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां सशक्त भी खुद को कमज़ोर मान डरा हुआ है। हरेक के भीतर यह भाव घर कर रहा है। कोई है जो हमारे सुरक्षा के किलों और उसके इत्मीनान को भेदने में कामयाब हो गया है। बिलकुल एक-सा असुरक्षा भाव । खुद को यहूदी बताकर इसे नाज़ियों की बर्बरता से जोड़ लेना इसी बात की ओर इशारा करता है।

कुछ देर के लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता से ब्राह्मणवादी  शब्द हटा दीजिये। पितृसत्ता अपने आप में ही स्त्रियों का सच उजागर करने के लिए काफी है। बीते 2 नवंबर को राजकोट में एक महिला कुंए पर पानी भरने  गई तो ऊंची जाति के एक शख्स ने उसे पीट दिया। वह अपनी जीप धोना चाहता था और महिला ने उसे अपनी बारी का इंतज़ार करने के लिए कहा था। यहां  कोई फर्क नहीं कि जीप धोनेवाला  किस बिरादरी का था लेकिन जो भी  था उसे खुद के उच्च वर्ण के होने का बोध था और महिला को पीटना उसके पितृसत्तात्मक व्यवहार का नतीजा था। तीन  दशक पहले भटेरी की भंवरी देवी  (जिला जयपुर)  के साथ दुष्कर्म हुआ था। उन्होंने ऊंची जाति का एक बालविवाह रुकवाया था। वह साथिन थीं और सरकारी दायित्व पूरा कर रही थी। उन्हें सबक सिखाने के लिए सामूहिक बलात्कार किया गया। उन्हें आज तक न्याय नहीं मिला है। नेता से न्यायालय तक सबने उन्हें ही दोषी माना। न्यायलय कि तो टिपण्णी थी कि कोई ऊंची जातवाला नीची जातवाली के साथ बलात्कार कैसे कर सकता है ?  अक्सर हम खबरों के शीर्षक पढ़ते हैं दलित महिला की दुष्कर्म के बाद हत्या। इस शीर्षक से ऐसा क्यों लगता है जैसे कोई अपनी नियति को प्राप्त हुआ हो। यह दंभ क्योंकर नहीं टूटना चाहिए। पितृसत्ता दुनिया का सच है।पाकिस्तान की शायरा सारा शगुफ्ता की नज़्म औरत और नमक की चंद पंक्तियाँ देखिये

इज़्ज़त की बहुत-सी किस्में हैं 

घूंघट, थप्पड़, गंदुम 
इज़्ज़त के ताबूत में कैद की मेखें ठोकी गई हैं 
घर से लेकर फुटपाथ तक हमारा नहीं 
इज़्ज़त हमारे गुज़ारे की बात है 
इज़्ज़त के नेज़े से हमें दागा जाता है 
इज़्ज़त की कनी हमारी ज़ुबान से शुरू होती है 
कोई रात हमारा नमक चख ले 
तो एक ज़िन्दगी  हमें बेजायका रोटी कहा जाता है 

 बाबा साहब अंबेडकर ने भी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता शब्द का इस्तेमाल किया था। अपनी किताबअगेंस्ट  द मैडनेस ऑफ़ मनु  में  इसका ज़िक्र  भी किया है। उन्होंने इसका तोड़ भी दिया था। अंतर्जातीय विवाह। जब यह होने लगेगा तो सगोत्रीय  जाती व्यवस्था टूटेगी। जातियों को बनाए रखने के लिए यही ज़रूरी होता है। आज के दौर में जब युवा जोड़े इस व्यवस्था को चुनौती देते हैं तो सबसे बड़े अपराधी करार दिए जाते हैं। ऑनर के नाम पर उनकी हत्या होती है या फिर लड़के को जेल में डाल दिया जाता है। जाती के नाम पर बच्चों को कुर्बान करने से भी परिवार नहीं हिचकते। रेडिकल इन अंबेडकर के लेखक आनंद तेलतुंबड़े कहते हैं ब्राह्मणीकल शब्द का इस्तेमाल प्रभुत्व,वर्चस्व को बताने के लिए किया जाता है। यह शब्द न ब्राह्मण विरोधी है और न हिन्दू। रहा सवाल पितृसत्ता का तो यह पूरी दुनिया में है। भारत में इसकी जड़ें गहरी हैं। बाबा साहब दिल की गहराइयों से लोकतान्त्रिक थे। वे चाहते थे कि लोग अपने फैसले अपने हिसाब से करें। वर्तमान सत्ता उनके करीब होने का दावा ज़रूर करती है लेकिन अगर वे आज ज़िन्दा होते  तो उनके कई विचारों के कारण यह निज़ाम उन पर देशद्रोही होने  का इलज़ाम लगा देता। 

      डोर्सी के तख्ती थमने की एक और वजह भी हो सकती है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पांच राज्यों के चुनाव में जब बड़े बड़े नेता खुद को जाति गोत्र के दायरे से बाहर नहीं निकाल पा रहे हैं फिर यह तो ट्विटर है। विवाद इसकी गोद में फड़फड़ाते हैं ,यह चहचहाने वाला ट्विटर नहीं रह गया है। राजस्थान की ही बात करें तो यहाँ दिल्ली और आस-पास से आने वाले बड़े नेता राजस्थान का र भी नहीं जानते। प्रधानमंत्री अलवर में खुद को छोटी जाति का बताकर सहानुभूति अर्जित करना चाहते हैं क्योंकि भाजपा के बारे में आम धारणा  है कि यह वोट उसकी पहुँच से बाहर है। मोदी कहते हैं मेरी जाति मेरे माँ-बाप कांग्रेस का चुनावी मुद्दा है। इससे पहले सी पी जोशी जाति यह  सवाल उठा चुके हैं। राहुल गांधी पुष्कर में अपने जाति-गोत्र का खुलासा कर जाते हैं, वे मंच से नहीं कहते तो उनके नेता ट्वीट कर डालते हैं। यह भी धारणा है कि अगड़ों के वोट कांग्रेस की बजाय भाजपा की झोली में पड़ते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री इंसानों से ऊपर उठकर अंजनी पुत्र हनुमान तक पहुँच जाते हैं। .वे अलवर ज़िले के मालाखेड़ा  में कहते हैं बजरंगबली ऐसे लोक देवता है जो स्वयं वनवासी हैं, गिरवासी हैं ,दलित हैं, वंचित हैं। वहां मौजूद सुननेवालों के लिए पवन-पुत्र हनुमान का नया परिचय था। जाति मज़हब के शिकंजे में कसे यह नेता जब खुद मुक्त नहीं हैं तो हम केवल ट्विटर को कटघरे में लाकर कैसे बरी हो सकते हैं ?
  
हालाँकि ट्वीटर ने इस पूरे मामले पर माफी की मुद्रा ही रखी है लेकिन यह भी सामने आ रहा है कि डोर्सी ऐसे मोर्चों का हिस्सा बनते हैं जहाँ सामाजिक बदलाव की गुंजाईश हो। जैसे रंग  भेद और अरब में महिलाओं की आज़ादी की जो नई बयार चली है उसमें वे दिलचस्पी लेते हैं और ट्वविटर की कोशिश होती है कि दुनिया में सकारात्मक बदलाव का हिस्सा बने लेकिन यह किसी भी तबके का दिल दुखाकर नहीं हो सकता  है। स्त्री पीड़ित है तो वह हर समुदाय की कहानी है। किसी भी जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल से तूफान ही पैदा होगा सकारात्मक बदलाव नहीं आएगा।  विचार इस बात पर भी ज़रूर होना चाहिए कि कुछ बरसों में ऐसा क्या हुआ है कि हर कोई एक-दूजे से डरा हुआ है।  वजूद छोटी-छोटी बातों से खतरे में आ जाता है जबकि कमज़ोर को उसके हक़ की याद दिलानेवाला भी हमेशा  सशक्त ही रहा है। उन्हीं की अगुआई में आंदोलन आकार लेते रहे हैं लेकिन आज वह भरोसा गायब है ,तभी तो एक शब्द भर नफरत और ज़हर उगलने का बायस बन जाता है
। 
(इंदौर से प्रकाशित दैनिक प्रजातंत्र में मेरा लेख) 

गुरुवार, 15 नवंबर 2018

घूंघट की आड़ में प्रत्याशी

यहाँ जो घूंघट की आड़ में नज़र आ रही हैं वे भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी पूनम कँवर हैं जिन्होंने कल बुधवार को राजस्थान के बीकानेर की कोलायत सीट से पर्चा दाख़िल किया। मुझे निजी तौर पर लगता है कि उनके मतदाताओं को दस बार सोचना चाहिए क्योंकि जो विधायक आँख में आँख डालकर  बात नहीं कर पाएगा वह जनता के हित कैसे साध पाएगा ? प्रत्याशी जब प्रेस वार्ता को सम्बोधित कर रहीं थींतब भी केवल वही घूंघट में  थीं। अच्छी बात यह थी कि उनके साथ स्त्रियों  का हुजूम था। पूनम कोलायत से सात बार विधायक रह चुके कद्दावर भाजपा नेता देवी  सिंह भाटी की पुत्रवधु  हैं। उम्मीद की जानी चाहिए की यह परिवार एक क़दम और आगे बढ़ाते हुए इस परदा प्रथा को भी ख़त्म करेगा।

एक सवाल मुझसे भी  पूछा जा सकता है  कि क्या किसी बुर्कानशीं के लिए भी आप यही राय दोहराएंगी ? बेशक पर्देदारी  की ज़रुरत ही क्या है।आँख पर किसी भी  किस्म का  परदा क्योंकर होना चाहिए।  लोकतंत्र  का आधार ही संवाद है और परदा , घूंघट संवाद में बाधा। परदा  नहीं जब कोई ख़ुदा से बन्दों से परदा  करना क्या ......
तस्वीर भास्कर से साभार है 

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2018

मैं अपना यह हक़ छोड़ती हूँ।






जब सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने की इजाज़त दे दी है तो ये कौन ताकतें हैं जो ख़ुद को संविधान से ऊपर मानने लगी हैं। तकलीफ़  तो कुछ लोगों को तब भी हुई  होगी  जब    सती प्रथा के ख़िलाफ़ क़ानून बना होगा। कुछ देर के लिए मंदिर में स्त्री के प्रवेश को निषेध मानने वालों को सही भी मान लिया जाए तो क्या ये भी मान लिया जाए कि पूजा स्थल भी स्त्री को देह रूप में ही देखते हैं। देह भी वह जो दस से पचास के बीच होती है। पवित्र स्थल के  संचालकों को इनसे  डर लगता है। चलिए आप एक देह हैं आपको भय लग  सकता है लेकिन भगवान अयप्पा को भी आपने उसी श्रेणी में रख दिया? वे ईश्वर हैं। देह उम्र के भेद से परे लेकिन भक्तों ने उन्हें अपने भय से मिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सृष्टि के चक्र को चलाने वाले मासिक चक्र से भय। आख़िर क्यों डरना चाहिए रजस्वला स्त्री से किसी को भी? वे डरते हैं ,उन्हें दूर रखते हैं ,ये भी मान लेते हैं कि इश्वर को भी वे मंज़ूर नहीं होंगी लेकिन जीवन के धरातल पर इसी उम्र की स्त्री देह ही सर्वाधिक शोषण की भी शिकार है। यौन शोषण की भी। यहां दूरी,परहेज़,अस्पृश्यता सब विलीन हो जाती है।  मंदिर में बतौर देवदासी उसका स्वागत है लेकिन दर्शन के लिए नहीं। ये दोहरे मानदंड नहीं  हैं क्या ? 
     एेसा ही एक प्रतिबंध मुंबई की हाजी अली दरगाह पर भी चस्पा था।  वहां भी मजार के एक हिस्से में महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी। मामला मुंबई हाई कोर्ट में सुना गया । यहाँ भी तर्क यही कि स्त्रियां पुरुष पीर हाजी अली शाह बुखारी की मजार के करीब नहीं हो सकती। प्रवेश की यह जंग भी महिलाओं ने जीती। सुविधा के  लिए यह ज़रूर किया गया  है कि भीतर जाने के लिए उनके प्रवेश का रास्ता अलग है। हर तबके हर उम्र और मज़हब की महिलाएं यहाँ अब अपनी उम्मीद का धागा भी बांध रही हैं और चादर भी चढ़ा रही हैं। शायद यही भेद का अंत होना भी है। 
          
नए साल की उस ठंडी सांझ में चंडीगढ़ की सड़क पर जब एक गुरुद्वारा दिखा तो हम सब सर ढककर भीतर हो लिए। गुरुग्रंथ  साहब को प्रणाम कर जब पैसे निकाल कर दानपेटी ढूंढऩी चाही तो एक सेवादारनी ने धीमे लेकिन साफ शब्दों में कहा कि यहां पैसे नहीं चढ़ते। हमने चुपचाप पैसे अंदर रख लिए। यह निषेध था लेकिन मन को बहुत अच्छा लगा। अगर इन्होंने गुरुद्वारे के बाहर ही यह कहकर रोक लिया होता कि आप स्त्री हैं और भीतर नहीं जा सकती तब जाहिर है यह रोक या बैन हमें भीतर तक आहत कर जाता। 

    केरल स्थित विश्व के बड़े तीर्थस्थल सबरीमाला अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के लिए  सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने महिलाओं के हक़ में फैसला दिया जबकि जस्टिस इंदु मल्होत्रा का कहना था कि धार्मिक मामलों को तय करना कोर्ट  का काम नहीं है जब तक कि यह सति प्रथा जैसी सामाजिक बुराई न हो। वे मानती हैं कि सबरीमाला मंदिर को अपना निज़ाम कायम रखने की व्यवस्था भारत का संविधान (आर्टिकल 25 ) देता है और इसे आर्टिकल 14 की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। उनका यह भी मानना था कि इसके दूरगामी परिणाम होंगे। 

    जो हालात सबरीमाला में  बने हैं क्या वे भी इसी मतभेद का नतीजा हैं ? राजनीतिक दलों ने भावनाओं को भुनाने के लिए कमर कस ली है और इसमें महिलाओं को भी अपने साथ कर लिया है। इतने प्राचीन मंदिर के आस-पास ऐसी परिस्थितियों का निर्माण सही नहीं कहा जा सकता। प्रवेश की इच्छुक महिलाओं को खुद ही पीछे हट जाना चाहिए। यह उनकी हार नहीं है। बल्कि राजनीतिक रोटियां सेंक रहे दलों की आग पर ठंडा पानी है। संविधान आपके हक़ में है। समाज भी होगा लेकिन इन दलों को यह हक़ नहीं होना चाहिए कि वे मंदिर और देश की फ़िज़ा बिगाड़ें । मैं अपना यह निजी हक़ छोड़ती हूँ। 13 नवंबर को खुली अदालत में रिव्यु पिटीशंस का फ़ैसला जो भी हो। 







मंगलवार, 9 अक्तूबर 2018

सबसे ज़्यादा अनरिपोर्टेड समय

पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा साहब को याद करते हुए विनोद विट्ठल जी सा आपने जो कविता पुस्तक मुझे भेजी है उसके लिए आपका दिल की गहराइयों से आभार। आभार इसलिए भी कि आपने हमारे समय की बीमार नब्ज़ पर हाथ रख दिया है और उसके बाद इन हाथों ने जो लिखा है वह किसी वैद्य का कलात्मक ब्यौरा ही है। चाहो तो वक़्त रहते इलाज कर लो। कविता से पहले आपने सही लिखा है बाबाओं का बाज़ार है ,धार्मिक उन्माद है, मॉब लिंचिंग है, खाप  पंचायतें हैं, फ्री डाटा है ,व्हाट्सऍप -फेसबुक है ,टीवी के रियलिटी शो हैं ,खबरिया चैनल हैं,खूब सारा प्रकाशन- प्रसारण है लेकिन सबसे ज़्यादा  ज़्यादा अनरिपोर्टेड समय है। एक कवि की वाजिब चिंता कि कागज़ों में दुनिया भर की चिंता की जा रही है लेकिन लुप्त होते जा रहे इंसान की कोई बात नहीं कर रहा। वाकई ये कविताएं इस  अनरिपोर्टेड  समय की चिट्ठियां हैं जिसे हमें संभालना ही चाहिए। 
कविता लेटर बॉक्स में विनोद विट्ठल लिखते हैं
दर्ज़ करो इसे
कि अलीबाबा को बचा लेंगे जेकमा और माइक्रोसॉफ्ट को बिल गेट्स 
राम को अमित शाह और बाबर को असदुद्दीन ओवैसी 
किलों को राजपूत  और खेतों को जाट 
टीम कुक बचा लेने एप्पल को जाइए जुकरबर्ग फेसबुक को
तुम खुद उगो जंगली घांस की तरह इटेलियन टाइलें तोड़ कर 
और लहराओ जेठ की लू में लहराती है लाल ओढ़नी जैसे। 

इसके अलावा लाइक,अड़तालीस साल का आदमी, माँ की अलमारी और वित्तमंत्रीजी ,ढब्बू मियां, पिता का चश्मा,और स्टेटस के लिए भी मेरा लाइक स्वीकार कीजिये। अपनी बिटिया पाती के लिए जो कविता आपने लिखी है वह वाकई नई उम्मीद का राग है क्योंकि हवाओं ने बिलकुल तब ही कहा होगा मुझे नई बांसुरी दो।
कविता मिठाइयों का स्वाद जो  हमने चखा था , ज़ायका अब तक कायम है, यह कविता भी यहाँ है। शुक्रिया एक बार फिर अनरिपोर्टेड की  रिपोर्ट लिखने के लिए और हम जैसों को पढ़ाने के लिए। तरुण चौहान का आवरण चित्र कच्ची बस्ती के घर को जिस नीली आभा में पेश करता है वह भी उम्मीद पैदा करता है। 

शनिवार, 6 अक्तूबर 2018

संकल्प और गौरव के झंडाबरदारों में से एक को चुनेगा राजस्थान


सचिन पायलट कोटा संभाग में जनता के बीच 
जयपुर में मुख्यमंत्री राजे पुनर्जीवित द्रव्यवती नदी जनता को सौपतीं हुईं 


-सत्ताधारी भाजपा गौरव यात्रा निकाली  तो कांग्रेस संकल्प रैली के साथ मैदान में
-वसुंधरा राजे सिंधिया के सामने हैं अशोक गेहलोत और सचिन पायलट
-अमित शाह एक पखवाड़े में पांच बार तो राहुल गाँधी तीन बारआ चुके हैं राजस्थान
-यहाँ एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा  के जीतने का है चलन
-कांग्रेस को एंटी इंकम्बेंसी से है जबरदस्त उम्मीद भाजपा संगठन भरोसे
-भाजपा के विज्ञापनों से लदे है अख़बार के  तो कांग्रेस मांग रही जनता से पैसा 
-ग्रामीण इलाकों में राफेल या मंदिर कोई मुद्दा नहीं ,शहरों में हो रही इन पर बात 
-रोडवेज कर्मचारियों की लंबी हड़ताल से सरकार के खिलाफ है गुस्सा 
-आप, बहुजन, समाजवादी और कम्युनिस्ट मिलकर भी बड़ी ताकत नहीं 


राजस्थान की 200 विधानसभा सीटों पर चुनाव के लिए तारीख की  घोषणा हो चुकी है। यहां 7 दिसंबर को चुनाव हैं। तारीख़ के साथ जो  ज़ाहिर हो रहा  है वह है बड़े राजनीतिक दलों का जनता को ना समझ पाना । वे अब भी चुनाव लड़ने के पारम्परिक और जातीय गणित में उलझे हैं,  जबकि जनता उनसे वयस्क होने की उम्मीद लगाए बैठी है। ये नेता चुनावी उत्सव के दौरान जात -पात का नाटक रचने में पूरी तरह जुट जाते हैं ,टिकट का चक्रव्यूह भी ऐसे ही रचा जाता है। मीडिया उन्हें छाप देता है या फिर दिखा देता है और कथित तौर पर माहौल तैयार हो जाता है। फिर भी सच यही है कि प्रत्याशी से ज़्यादा दलों को तरजीह है।  दल में जाति-धर्म के नाम पर वैमनस्य फैलाने का  समर्थक  राजस्थान का वोटर नहीं है। वह शांतिप्रिय है ,तोड़-फोड़ और विभाजन नहीं चाहता। उसे अब भी सरकारों से बुनियादी सुविधाओं की ही आस है।
मेवात में मॉब लिंचिंग 
भाजपा और वसुंधरा राजे ने यहाँ पहले भी राज किया है लेकिन इस बार के उनके कार्यकाल में नए दाग लगे हैं। हिस्ट्री शीटर आनंद पाल सिंह की पुलिस मुठभेड़ में मौत  फिर कई दिनों तक उसके शव का अंतिम संस्कार ना हो पाना भाजपा से बड़े असंतोष का कारण रहा है। इस मुठभेड़  ने प्रदेश की फ़िज़ा को कई दिनों तक बिगाड़े रखा। सवाल उठाए गए कि शिक्षक बनने की चाहत रखने वाला युवा गैंगस्टर कैसे बना और व्यवस्था को उससे बरी नहीं किया जा सकता। फिर मेवात यानी अलवर के शांत इलाके में पहलू खान की मॉब लिंचिंग भी  सवालों में है। प्रतापगढ़ में एक एक्टिविस्ट की मौत को भले ही दिल का दौरा बताकर सामान्य मौत बताने की कोशिश की गई लेकिन उस समय खेतों में शौच को जा रही उसके परिवार की महिलाओं की  निगम कर्मचारियों  द्वारा  तस्वीरें  लेना  गलत था । यह भयावह तस्वीर थी कि स्वच्छता अभियान के दबाव में   ऐसे  घिनौने तरीके अपनाए गए  हों और किसी की जान चली जाए । मॉर्निंग फॉलोअप के नाम पर यह ज़्यादती थी यह । अकबर  खान की भी हत्या हुई। वह हरियाणा  से  अलवर आया था ,अपने  डेरी व्यवसाय को बढ़ाने के लिए। अपने साथी के साथ दो गाय खरीदकर जा रहा था कि भीड़ में यह सूचना फ़ैल गई कि वो गाय चुराकर भाग रहे हैं। भीड़ ने घेरकर अकबर की हत्या कर दी। गौ तस्करी के ऐसे इलज़ाम में भीड़ का मारना पिछली वसुंधरा सरकार में कभी नहीं था।

पद्मावती फिल्म और लाचार सरकार 
 
 फिल्म पद्मावती को लेकर भी जो राजस्थान में हुआ उससे भी इस वीरों की धरती को नाम नहीं मिला । जयपुर में संजय लीला भंसाली को शूटिंग के दौरान थप्पड़ मारने से शुरू हुआ हुड़दंग  बाद में राज्यव्यापी हिंसा में तब्दील हो गया। करणी सेना ने पद्मावती फिल्म को राजपूती आन के खिलाफ़ मानते हुए खूब माहौल बनाया जो फिल्म के रिलीज़ होते ही फ़ुस्स हो गया क्योंकि फिल्म  महारानी पद्मावत और चित्तौड़ के राजा रतन सेन की स्तुति से ओत-प्रोत थी। फिल्म राजस्थान में रिलीज़ तो नहीं करने दी गई लेकिन प्रदेश का माहौल बिगाड़ा जा चुका था। प्रदेश की लोक गायिका और अभिनेत्री इला अरुण ने एक इंटरव्यू  में मुझसे कहा था कि यह राजस्थान का संस्कार नहीं है। यह थप्पड़ भंसाली के नहीं मेरे चेहरे पर पड़ा है। हम पधारो म्हारे देस की संस्कृति के वाहक हैं। लैला मैं लैला गीत को फिर लोकप्रिय बनाने  वाली गायिका पावनी पांडे भी जयपुर की हैं। उनका कहना है कि मैं बहुत अच्छे से जानती हूँ कि ना केवल जयपुर बल्कि पूरे प्रदेश में बहुत प्यार है और जब ऐसी घटनाएं होती है तो लगता है कि हर कलाकार और उसकी कला को थप्पड़ मारा गया है और यह आसानी से भुलाया जाने वाला वाकया नहीं है।

उपचुनाव में कांग्रेस का पलड़ा रहा भारी 


ऐसे मामले वसुंधरा सरकार के पिछले कार्यकाल (2003  -2008  ) में नहीं थे लेकिन कांग्रेस को भी बरी नहीं किया जा सकता। बतौर विपक्ष वे  बेहद कमज़ोर साबित हुए। विधायकों की  कम संख्या (200 में से केवल 21 ) और  कमज़ोर आवाज़ ने कमज़ोर वर्ग  को अनसुना ही किया। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के महासचिव अशोक गेहलोत, युवा प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट के साथ संकल्प रैली  ज़रूर निकाल रहे हैं लेकिन जनता में पार्टी ने कोई साफ संदेश नहीं दिया है कि मुख्यमंत्री का चेहरा कौन  होगा। दोनों ने एक मोटरसाइकिल पर बैठकर रैली निकाली तो ज़रूर एक सन्देश भी गया कि इनके बीच कोई मनमुटाव नहीं है। कांग्रेस की रैलियों में भीड़ तो जुटती है लेकिन पार्टी गुटबाज़ी की चपेट में है । हाल ही में सचिन पायलट ने कोटा के सांगोद में एक रैली की  जहाँ उन्होंने कहा कि सबसे ज़्यादा किसानों की आत्महत्याएं कोटा संभाग में हुईं हैं। आखिर जो किसान की  समस्याओं को समझेगा वही उनकी मदद भी करेगा। 80 हज़ार के क़र्ज़ के लिए किसान ख़ुदकुशी करने पर मजबूर हैं। सचिन कहते हैं पिछले उपचुनावों में 22 विधानसभा क्षेत्रों में वोट  पड़े हैं जिनमें से 20  में  कांग्रेस जीती है। वे आगे कहते हैं वसुंधरा जी की सरकार ने अजमेर उपचुनाव में 17 दिन अजमेर में डेरा डाला था लेकिन वे चुनाव हार गई । तब उन्होंने मुझसे कहा था कि मुझे अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है ,सही है बहुत कुछ सीखना बाकी है लेकिन राजनीति  की कबड्डी में ऐसी पटखनी दूंगा कि बरसों तक याद रखी जाएगी। वे रैली में इलज़ाम लगाते हैं कि महारानी और अमित  शाह के बीच सब-कुछ ठीक नहीं चल रहा है। अमित शाह जाएं  मेवाड़ में तो वसुंधरा हाड़ौती में। अमित शाह जाएं धौलपुर  में तो वसुंधरा जी जैसलमेर में। सचिन पायलट भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष  चुनने  में लगे 45 दिनों पर भी तंज़ करते हैं कि कोई भी यह नौकरी क्यों करना चाहेगा जब दो महीने बाद के चुनाव हारने ही हैं तो। गौरतलब है कि नए प्रदेशाध्यक्ष मदन लाल सैनी के चुने जाने से डेढ़ माह पहले ही निवर्तमान अध्यक्ष अशोक परनामी का इस्तीफा ले लिया गया था। पायलट के लिए भाजपा अध्यक्ष मदन लाल सैनी का बयान आ चुका है।  वे कहते हैं -"सचिन पायलट पटखनी तो अपनी पार्टी में ही दे रहे हैं ,उनकी खुद की पार्ट में ही गुटबाज़ी चल रही है और जिस बड़े नेता को उन्होंने पटखनी दी है उनका नाम सब जानते हैं। "वैसे कोटा युवा छात्रों की आत्महत्या का भी केंद्र बना हुआ है। कोचिंग सिटी कोटा में पढ़ाई के दबाव के चलते  इस साल अब तक तेरह छात्र अपनी जान दे चुके  हैं।


  बातें कर लो पानी मत मांगो 

आज भी गांव -ढाणी का जीवन सदियों पहले जैसा ही कठिन बना हुआ है। यहाँ पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी ज़रूरतें जस की तस हैं। ऐसे में  राफेल और राम मंदिर जैसे मुद्दों की बातें खामखां की बात मालूम होती है। उनके लिए पशुओं का चारा ,खुद के लिए अनाज और पशुधन सुरक्षित रहे यह ज़्यादा ज़रूरी है। पश्चिमी राजस्थान में पानी की क़िल्लत है। उसके लिए दूर जाना पड़ता है  लेकिन जिओ का टॉवर पास ही है। शहरों को आज भी पानी पहुंचाने की घर तक सुविधा कम दाम में हैं जबकि ग्रामीण राजस्थान पीने योग्य पानी के लिए मीलों चलता है। वह यह भी मान रहा है कि 70 साल की मुश्किलें पांच साल में हल नहीं होंगी। नारा सुनाई देता है मोदी तुझसे बैर नहीं वसुंधरा तेरी ख़ैर नहीं।  इस बीच तीन अक्टूबर को वसुंधरा राजे ने मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन योजना की शुरुआत की जिसके तहत चार हज़ार गांवों को पानी पहुंचाया जाएगा। चुनावी साल को योजना साल भी कहा जा सकता है। कहने को कोटा में चम्बल नदी है वहीं का किसान भी पानी की  दिक्कत झेल रहा है। नहरें जर्जर हैं और बड़ी समस्या पानी के रिसाव की भी है। 

जब नदी ज़िंदा हुई जयपुर में 

जयपुर शहर ने मुख्यमंत्री वसुंधरा के चेहरे को उस समय चमकीली आभा दे दी जब बीते सप्ताह  द्रव्यवती नदी जो एक नाले का अकार ले चुकी थी पुनर्जीवित की गई।अमानी शाह नामक नाले को नदी में तब्दील होते देखना शहरवासियों के लिए भी नया अनुभव है।  अभी 16 किलोमीटर तक का काम पूरा हुआ है। शेष 45 किमी  का काम दिसंबर तक पूरा होने का दावा किया गया है। यह अहमदाबाद की कांकरिया लेक की तर्ज़ पर बनी योजना है, जिसमें  बोटिंग के साथ-साथ, टॉय ट्रैन , चिड़ियाघर , मनोरंजन और खान -पान की  तमाम सुविधाएं  मौजूद होंगी। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को कांकरिया झील ने खूब सराहना दिलवाई थी और अब यही खूबसूरती जयपुर को भी मिलने जा रही है। गौरतलब है कि पिछले विधानसभा चुनाव  से ठीक पहले जयपुर के एक हिस्से को  मेट्रो की सौगात दी गई थी जो अभी भी पूरी नहीं हुई है। उम्मीद की जानी चाहिए की द्रव्यवती  नदी परियोजना (कुल लागत 1676 करोड़ ) समय पर पूरी होगी। जयपुरवासी रणबीर सिंह कहते हैं  अमानी शाह सूफी संत थे जिनकी मज़ार वहां थी । जयपुर रियासत काल में अमानी शाह नाले के नाम से जानी जाने वाली इस जगह मिलिट्री मुख्यालय का दफ़्तर था   और यह एक बरसाती नदी थी जो बाद में सूख गई। यह जगह बहुत खूबसूरत हुआ करती थी। आगे चुनौती यह होगी की इसमें साफ पानी कहाँ से आएगा।

कांग्रेस मांग रही धन  

एक रोचक बात  इन चुनावों में देखी जा रही है कि एक दिन भाजपा मंत्री अरुण चतुर्वेदी घोषणा करते हैं कि जयपुर कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ता  भाजपा में शामिल हो गए हैं वहीं  अगले दिन एक अन्य विधानसभा क्षेत्र सांगानेर में कांग्रेस दावा करती है कि भाजपा के 700 कायकर्ता कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। फिर दोनों ही पार्टियां एक दूसरे पर ऐसा नहीं होने का आरोप लगाते हुए पार्टी के कार्यकर्ताओं के पार्टी में ही होने की बात  दोहराती है। उधर कांग्रेस के प्रवक्ता और जयपुर जिला अध्यक्ष प्रताप सिंह खाचरियावास ने कहा है कि पार्टी ने 100 ,500 और 1000 के कूपन छपवाएं हैं और गाँधी जयंती के दिन दो लाख पैंतीस हज़ार रुपए जमा हुए हैं। पार्टी  घर- घर जाकर लोगों से सहायता और समर्थन मांगेगी।

मायावती से गठबंधन का ना होना 


हालाँकि साल 2008 में कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी के सहयोग से ही सरकार बना पाई थी लेकिन इस बार  चुनाव पूर्व  गठबंधन ना होने से पार्टी में ख़ुशी की लहर दौड़ गई है। 2008 में पार्टी के छह विधायक चुनकर आए थे जो 2013 में घटकर तीन हो गए। कांग्रेस को अपनी सीटें बचाने की ख़ुशी है जबकि मायावती का मानना है कि हमारा वोटबैंक पूरी 200 सीटों पर कांग्रेस -भाजपा का गणित बिगाड़ सकता है। 2008 के चुनावों में  बसपा को साढ़े सात फीसदी वोट हासिल हुए थे। 2013 में वोट शेयर भी घटकर साढ़े तीन फीसदी रह गया।  पूर्वी राजस्थान में खासकर खेतड़ी धौलपुर नवलगढ़ ,सार्दुलपुर ,गंगापुर, उदयपुरवाटी, सपोटरा, दौसा ,बांदीकुई, करोली, बानसूर में बसपा अच्छा प्रदर्शन करती आई है। वैसे बसपा अगर किसी के वोट काटती है तो वह कांग्रेस है। चुनावी अध्ययन के मुताबिक 2013 में यदि कांग्रेस बसपा मिलकर चुनाव लड़तीं तो भाजपा को नौ सीटों का नुक्सान हो सकता था। 


एक टॉर्च  भी मैदान में 
 दावे-प्रतिदावों के बीच दोनों पार्टियां तो कमर कस चुकी है लेकिन एक और पार्टी मैदान में उतरी है जिसका चुनाव चिन्ह टॉर्च है। अभिनव राजस्थान पार्टी  कहती है हम भारत के चुनावी इतिहास में पहली पार्टी  हैं जो स्टाम्प पर लिख कर देंगे कि कौनसा काम कितन समय में कितने खर्च पर किया जाएगा। पार्टी दावा करती है कि जो हम ऐसा नहीं कर पाए तो हमें जिम्मेदारी से बेदखल कर दिया  जाए।  इनके घोषणा-पत्र में किसान, व्यापारी, महिलाओं, पुलिस कर्मचारी के लिए बाकायदा योजनाओं का ब्लू -प्रिंट भी है। राजस्थान में मूल मुकाबले के बीच ऐसे  कई छोटे-मोटे रण  लड़े  जाएंगे।  रोडवेज के कर्मचारियों की हड़ताल बीस दिन तक खिंच गई है। शिक्षक भी धरने पर हैं। हाउसिंग बोर्ड के कर्मचारी भी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। बारह हज़ार से अधिक जेईएन और अस्थाई कम्प्यूटर ऑपरेटरों ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कर्मचारी सड़क पर हैं और जनता परेशान है। फिर भी हम तो इलेक्शन मोड में आ चुके है साहब।  कोई हारे कोई जीतेगा कहा यही जाता है  आन-बान और शान तो मतदाता की ही रहेगी वह इस समय राजा है और राजा प्रजा।

( इंदौर के अख़बार प्रजातंत्र में प्रकाशित )



















गुरुवार, 20 सितंबर 2018

एक जवां सुबह के आंगन में

रोज़ सुबह मेरे आसपास एक तेज़ आवाज़ गूंजा करती है .. सफाई करा लो ओ ~ sss ... काँपता शरीर हाथ में फावड़ा ,बगल में पॉलिथीन  की एक थैली। बिला नागा यह आवाज़ कुछ बरसों से सुनाई दे रही है। फावड़ा जो उल्टा पकड़ने पर लाठी का भी काम करता है।
सोचती रह जाती हूँ कौन सफाई कराता होगा इनसे ? कोई तो होगा जिनके यहाँ काम करने के लिए रोज़ आती हैं ? बूढ़ा शरीर जो कभी तबीयत बिगड़ गई तो ?  इस कर्मठता को देख हैरान रह जाती हूँ और अपने निकम्मेपन पर शर्मिंदा भी। सुबह में जीवटता घोलती यह आवाज़ कोयल के मधुर गान से कम नहीं मालूम होती । कितने सीधे -सरल और मेहनती भारतीय जीवन का दर्शन यूं ही चलते -फिरते दे जाते हैं लेकिन हम और हमारे हुक्मरान इनकी तकलीफ़ों से बेख़बर झूठ -मूठ के बड़े-बड़े मुद्दों पर अड़े रहते हैं।
तुमको सलाम है माँ..


 

बुधवार, 12 सितंबर 2018

गली गुलैयां तो नहीं मिली उलझे स्त्री की भूल भुलैया में

गली गुलैयाँ में मनोज बाजपेई 
सोमवार की शाम एक बच्चे और बड़े की जटिल दुनिया में झाँकने का मन था सो मैं बेटे के साथ जयपुर के थिएटर के बाहर खड़ी थी। वेबसाइट पर समय तो दे रखा था लेकिन टिकट बुक न हो सकी।  पहुंचे तो पता लगा गली गुलैयां तो नहीं है, 'स्त्री चलेगी'? उन्होंने पूछा। उनका कहना था कि " गली गुलैयाँ तो चली नहीं ,परफॉर्म ही नहीं कर सकी ,कल संडे के शो में ही पांच लोग आए थे। हम तो स्त्री ही चला रहे  हैं बढ़िया चल रही है।" पहले टिकट खिड़की पर  फिर  आईनॉक्स मैनेजर ने भी यही बात दोहराई। मन कुछ खास तत्पर नहीं था स्त्री के लिए लेकिन सोचा राजकुमार राव की न्यूटन अच्छी लगी थी, स्त्री भी ठीक ही होगी। किशोर बेटे की भी यही राय थी।  फिर तो स्त्री की भूल भुलैया में ऐसे उलझे कि समझ ही नहीं पाए कि डायरेक्टर तंत्र -मंत्र, भूत -प्रेत की इज़्ज़त बढ़ा रहे हैं या स्त्री की। कहीं गहरे झाँकने पर यह भी लगा निर्देशक शान तो स्त्री की ही बढ़ाना चाहते थे लेकिन  'चुड़ैलगिरि' कुछ ज़्यादा हावी हो गई। हमारे समाज में जहाँ अब भी तंत्र-मन्त्र मनुष्य के अवचेतन में डेरा जमाए हुए हैं, वहां से स्त्री के हक़ में छिपे गूढ़ सन्देश को साफ़-साफ़ समझ  पाना  नामुमकिन ही मालूम होता है । फिर जब स्क्रिप्ट की ताकत के बीच में आइटम सांग और द्वीअर्थी संवाद सेंध मारते हैं तो फिल्म की दीवार भी कमज़ोर होती जाती है।

स्त्री में श्रद्धा कपूर और राजकुमार राव 
दरअसल ये चुड़ैल इतनी आज्ञाकारी है कि उस घर के मर्दों को नहीं उठाती है जहाँ दीवार पर लिख दिया जाता है ,ओ स्त्री कल आना। चंदेरी की हर दीवार पर लाल रंग से यह ऐसे ही लिखा है जैसे घर पर हथेलियों के निशान बना देने से किसी अनर्थ से बचने की अफवाह कुछ अरसा पहले चरम पर थी। उससे पहले पत्तियों पर लोगों ने सांप भी देखे थे और गणेशजी ने दूध भी पिया था। बरहाल इन तथ्यों के साथ हास्य-व्यंग्य का ज़बरदस्त स्कोप पटकथा में हो सकता था लेकिन वह रुक-रुक कर मिलता है और कहानी भूत-प्रेत की गिरफ्त में आती मालूम होती है। अँधेरी सड़कें ,सुनसान रातें ,  भूतनी के उलटे पैर और भुतहा किले की  पृष्ठभूमि यूं भी ग्रामीण भारत जो बादके बरसों में शहरों  में बसा ,उन सब के मानस  में पैबस्त  है और लोग कनेक्ट भी  होते हैं।  स्त्री उसे ही भुनाने की कोशिश है। मध्यप्रदेश का चंदेरी  अपने सूत के लिए ख्यात है ,चंदेरी साड़ियां स्त्री की गरिमा और सौंदर्य का पर्याय हैं लेकिन निर्देशक अमर कौशिक  के दृष्टिकोण में चुड़ैल का ही साया हावी रहा।

फिल्म 'ओ स्त्री कल आना' और 'ओ स्त्री रक्षा करना ' के बीच बेहद मनोरंजक और व्यंग्यात्मक  बन सकती थी जो कि नहीं बन पाई है। राजकुमार राव आँखों से नाप ले लेनेवाले युवा दर्ज़ी विकी के किरदार में बेहतर हैं ,उनके दोस्त अपारशक्ति खुराना ( भाई आयुष्मान खुराना की धुंधली कार्बन कॉपी ) और अभिषेक बैनर्जी भी जमे हैं लेकिन श्रद्धा कपूर सामान्य ही लगी हैं। पंकज त्रिपाठी (रूद्र भैया )चंदेरी पुराण को थामे हैं यानी उनके पास वो किताब है जिसमें चंदेरी का इतिहास है जिसके कुछ पन्ने फटे हुए हैं। आम कस्बों में जो रहस्य और कुंठाएं स्त्री को लेकर रहती हैं उसकी बानगी भी कुछ हद तक स्त्री में है। रूद्र जैसा किरदार हर कस्बे  में होता है जो जानता भले ही कम है लेकिन उस पर क़स्बे का भरोसा ज़्यादा होता है। वह यह भी बताता है कि जब भूतनी प्यार से आवाज़ दे तो  पलटना मत वह ले जाएगी। और हाँ फिल्म की शुरुआत और मध्यांतर में राजस्थान सरकार  ढेरों विज्ञापन दिखाकर बताती है कि योजनाओं  ने ग्रामीण जनता की सूरत बदल दी है। काश ये 2014 -15 में भी दिखाए गए होते की ये-ये योजनाएं हैं। विपक्ष का एक भी विज्ञापन न अख़बार में है न रुपहले परदे पर। 

बहरहाल , यहाँ मकसद स्त्री की समीक्षा करना नहीं है बल्कि यह बताना है कि दिमाग की तहों और मानव मन के अकेलेपाने में झाँकने की कवायद वाली फिल्म गली गुलैयाँ को दर्शक नहीं मिलते और स्त्री उसे 'खो' कर देती है। इस सिनेमा पर आधा-अधूरा हॉरर और कमज़ोर कॉमेडी हावी  हो गई। स्त्री को दर्शक मिल रहे हैं गली गुलैया को नहीं मिले। सिनेमा में अब  आइटम गीत और लाल किताब टाइप मसाले कम काम करते हैं यह ख़ामख़याली भी दूर हुई।





शनिवार, 8 सितंबर 2018

दल दुविधा में हैं देश का दिल नहीं


       इन दिनों दो मुद्द्दे ऐसे हैं जिन पर राजनीतिक दल खुलकर सामने नहीं आ पा रहे हैं। न कहते बनता है न ज़ब्त करते। पहला है sc /st अत्याचार निरोधक अधिनियम और दूसरा  LGBTQ से जुड़ी धारा 377 का ग़ैरक़ानूनी हो जाना। ऐसा क्यों है कि इन दोनों ही मुद्द्दों पर जब अवाम सड़कों पर हैं तो राजनीतिक दल घरों में  कैद। जनता बोल रही है लेकिन इनके मुँह में दही जमा है। गर जो वोटों का डर  स्टैंड लेने से  रोक रहा है तो फिर यह कूनीति तो हो सकती  है, राजनीति नहीं। मार्च में दलित सड़कों पर थे और हाल ही ख़ुद को उनसे बेहतर मानने वाले।  दोनों के बीच जो रार   ठनी है वह किसी भी देशभक्त को निराश कर सकती है और यह दुविधा किसकी फैलाई हुई है यह समझना भी कोई मुश्किल नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने की जल्दबाज़ी  में पूरी संसद (और इसे नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता क्योंकि वहां हमारे ही चुने हुए प्रतिनिधि हैं ) थी। कोर्ट ने कहा था कि सरकारी कर्मचारी की गिरफ़्तारी बिना सक्षम अथॉरिटी  की जांच के नहीं हो सकेगी , तुरंत मुकदमा भी दर्ज़ नहीं किया जा सकेगा। इससे संदेश यह गया कि सरकार इस कानून को अब कमज़ोर करने का मन बना चुकी है।  नया संदेश देने के लिए सरकार ने तुरंत इस फैसले को पलटा और अपना मत ज़ाहिर किया। इस मत से दूसरा पक्ष नाराज़ हो गया और सड़कों पर उतरा। अब इसे कौन समर्थन दे रहा है कौन नहीं, यह बात दलों की समझ में अब तक नहीं आयी है। यानी वे ख़ुद ही कंफ्यूज हैं और वही उन्होंने अवाम के साथ भी किया है। 

बात LGBTQ के अधिकारों की। फ़ैसले  के बारे में जस्टिस इंदू मल्होत्रा की टिप्पणी किस क़दर  संजीदा मालूम होती है जब वे कहती हैं कि इतिहास को इनसे और इनके परिवार से माफ़ी मांगनी चाहिए क्योंकि जो कलंक और निष्कासन इन्होंने सदियों  से  भुगता है उसकी कोई भरपाई नहीं है।  आज के इंडियन एक्सप्रेस  में प्रकाशित यह कार्टून देखिये जिसमें LGBTQ बिरादरी का सदस्य सुप्रीम कोर्ट की ओर देख कह रहा है    वह निवास है लेकिन आज यहाँ  मुझे  घर -जैसा  लग रहा  है।





       वाकई बड़े गहरे और व्यापक अर्थ हैं 377 को हटाने के। इस धारा की विदाई  इंसान के बुनियादी हक़ को तो बहाल  कर ही  रही है  साथ ही उसकी आज़ादी और सबकी बराबरी भी सुनिश्चित कर रही है । प्रेम और निजता को सर्वोच्च माना है सर्वोच्च न्यायलय ने। यह मनुष्य का बुनियादी हक़ है कि वह कैसे  ज़ाहिर हो अपने निजी पलों में। कोई क़ानून महज़ इसलिए उसे सलाखों के पीछे कैसे डाल सकता है? और जो बात हमारी सभ्यता और संस्कृति की करें तो उसने कभी भी यौन रुझान के कारण किसी को दंड का भागीदार नहीं माना था। दरअसल हम खुद अपनी असलियत से परे इस विक्टोरियन कानून को 128 साल से गले लगाए हुए थे । आपको जानकर हैरानी होगी कि ख़ुद अंग्रेज़ी हुकूमत को अपने देश के कानून से भारत में इसे उदार बनाना  पड़ा था। 
जहाँ तक बात वर्तमान सरकार की है, वह यहाँ भी दुविधा में ही दिखाई देती है। उनके कई बयान हैं जो धारा 377 का समर्थन करते हैं  लेकिन समय की आहट को  समझते हुए उन्हें यह कहना पड़ा कि जो सुप्रीम कोर्ट कहेगा, हमें मान्य होगा।  उम्मीद है कि यहाँ पलटने की कोई मंशा सरकार की नहीं है। 
            दरअसल  दोनों ही मसलों पर अब समाज को ही संवेदनशील होना होगा। दमन की शिकार जातियां भी यही अपेक्षा करती हैं और LGBTQ (Q यानी क्वीर का ताल्लुक अजीब,अनूठे, विचित्र रिश्तों से हैं ) समुदाय भी।  प्रेम और सद्भावना  से ही दोनों को देखे जाने की ज़रुरत है। तमाम जातियों को भी और जातिगत रिश्तों को भी। आक्रामक हो जाने से हम समाज का अहित ही करेंगे और सच कहूं तो आक्रामक हो जाने जैसी कोई आशंका भी नहीं है। दल दुविधा में हो सकते हैं ,देश का दिल नहीं।  
the rainbow nation                                   photo credit  -ndtv 




शनिवार, 1 सितंबर 2018

कर बिस्मिल्लाह खोल दी मैंने चालीस गांठें

सारा शगुफ़्ता 1954 -1984 


अमृता प्रीतम 1919 -2005 

सारा शगुफ़्ता अमृता प्रीतम को पढ़ते हुए कौन होगा जो घूँट चांदनी के ज़ायके से बच सकेगा। ऐसे लेखक का होना ही सादगी का होना है ,सच का होना है। हाल ही जब उनकी लिखी एक थी सारा पढ़ी तो सर ख़ुद ब ख़ुद सजदे में हो आया। एक थी सारा दो स्त्रियों से मुकम्मल होती है ।  पाकिस्तान की अज़ीम मगर बैचैन शायरा सारा शगुफ़्ता और हिन्दुस्तान की अदीब अमृता प्रीतम जिन्होंने अपनी आत्मकथा को रसीदी टिकट का नाम देकर  विनम्रता की नई परिभाषा ही गढ़ दी थी । सारा अमृता दोनों ही इस फ़ानी दुनिया  में नहीं है लेकिन दोनों की दोस्ती समझ का वह सेतु  बनाती है कि सरहद की परिकल्पना ही बेमायने लगने लगती है।  तमाम फ़ासलों के बावजूद,अदब क़ायदे की दुनिया के ये दो बड़े दस्तख़त  इस सूबे में स्त्री के हालात पर जो ख़त लिखते हैं, वह दस्तावेज़ हो जाते हैं दर्द और दवा की असरदार जुगलबंदी का ।

सारा की शायरी और ज़िन्दगी की दर्दभरी दास्तां 'एक थी सारा' में उन्हीं के ख़तों और नज़्मों के ज़रिये बयां हुई है जो सारा ने अमृता को लिखे हैं। अमृता लिखती हैं -एक वक़्त था जब पंजाब में सांदलबार के इलाके में एक रवायत होती थी-गांठें। जब  किसी की शादी तय होती तो इलाक़े का मौलवी दो रस्सियां लेकर मुक़र्ररा दिन में जितने दिन बाक़ी होते उतनी गांठें डाल देता।  एक रस्सी लड़की के कबीले को दे दी जाती और एक लड़के को।  दोनों क़बीले रोज़ सुबह उस रस्सी से गांठें खोल देते ,और आख़िरी गाँठ जिस रोज़ खोली जाती उस रोज़ शादी की शहनाइयां बज उठती ।

इस रवायत को बाद में पंजाब के सूफ़ी शायर बुल्लेशाह ने अपनी नज़्म में कहा ,रूहानी रंग में कि वह  रोज़  सुबह ज़िंदगी की रस्सी से एक गांठ खोलता है और देखता है कि ख़ुदा के वस्ल में कितने दिन रह गए ....

बुल्लेशाह का ही शेर है -कर बिस्मिल्लाह खोल दी मैंने चालीस गांठें। हो सकता है वह शेर उन्होंने अपने चालीसवें जन्मदिन पर लिखा हो।

आगे अमृता लिखती हैं ... और जब 1984 में 7 जून के दिन कराची से फ़ोन आया कि सारा शगुफ्ता ने 4 और 5 जून की रात रेलवे लाइन पर ख़ुदकुशी कर ली, तो तड़पकर मेरे मुँह से निकला --दोस्त ज़िंदगी की गांठ  को ऐसे खोलते हैं ? सारा अभी पूरे तीस बरस की भी नहीं थी। कमबख़्त ने खुद ही लिखा था -"क़दम दरवाज़े से ऊंचा नहीं,, दिन कायनात से छोटा नहीं" ..फिर भी ज़िंदगी भर दरवाज़े को आज़माती रही...  
और दुनिया के ये दरवाज़े निकाह लफ्ज़  को इस्तेमाल करते और सारा के क़दम को ख़ुशआमदीद कहते -लेकिन यह किसी दरवाज़े के बस की बात नहीं थी कि वह सारा के कायनात जितने बड़े दिल को ख़ुशआमदीद कह सकता। सारा के कदम जिस भी दरवाज़े अंदर दाखिल होते वह दरवाज़ा परेशान हो उठता और सारा के क़दम भी... और  फिर वही क़दम तलाक लफ्ज़ के ठोकर खाकर तड़पते हुए दरवाज़े से बाहर  निकल आते।
यह सब था-लेकिन मैं नहीं जानती थी कि इस नामुराद ज़िंदगी का दरवाज़ा भी इतना छोटा होगा कि सारा के कायनात जैसे बड़े दिल को वह अपनी बाँहों में नहीं ले सकेगा और सारा को ज़िंदगी की दहलीज़ पर क़दम रखते ही  हवा पानी और आकाश जैसी शक्तियों में लौट जाना पड़ेगा  ....


ps :यह सारा शगुफ़्ता और अमृता प्रीतम की दोस्ती का केवल एक सफ़ा  है लेकिन इनकी दोस्ती की गहराई को जो  समझना है तो एक थी सारा को पूरा पढ़ना होगा। पढ़ना होगा कि देह से गैर मौजूद होकर भी कोई कैसे बचा रहता है हमेशा अपने दर्द के साथ ।







 ..




गुरुवार, 16 अगस्त 2018

वे क़द्दावर नेता और मैं शिशु पत्रकार

रार  नई ठानूंगा atal bihari vajpayee:1924-2018
वे  कद्दावर नेता और मैं शिशु पत्रकार। अटलजी से मई 1996 में गांधीनगर गुजरात में हुई मुलाक़ात का यही सार है। तब मैं दैनिक भास्कर इंदौर में रिपोर्टर थी। अख़बार ने अपने चुनिंदा रिपोर्टर्स को 1996 के लोकसभा चुनाव कवरेज  के लिए देश के कौने-कौने में भेजा था। मुझे गुजरात की ज़िम्मेदारी दी  गई । चूंकि मेरा ननिहाल गुजरात  में था और छुट्टियों का बड़ा हिस्सा बिलिमोरा ,गणदेवी में बीतने से गुजराती भाषा पढ़नी और कुछ हद तक बोलनी भी आ गई थी।  संयोग ऐसा बना कि इस यात्रा में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुरेशभाई मेहता ,केशु भाई पटेल , बाग़ी नेता शंकर सिंह वाघेला, गुजरात प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष  सब से  मुलाकात होती चली गई। सुरेशभाई मेहता तो बिलिमोरा ही आए हुए थे। अटलजी से मुलाक़ात तो जैसे एक रिपोर्टर का ख़्वाब पूरा होने  जैसी थी और वहीं  देश के वर्तमान प्रधानमंत्री से भी मिलना हुआ था।

बहरहाल वह गांधीनगर का सर्किट हाउस था जहाँ अटल बिहारी वाजपेई साहब से मिलना था। सुबह का वक़्त   था। धड़कने हाथ से ज़ाहिर हो रही थीं। क़लम और क़ाग़ज़ जुड़ नहीं रहे थे। सर्किट हाउस साफ़ -सुथरा और भव्य था । अटलजी के कमरे के सामने पहुंचे तो एक शख़्स जिनके आधी आस्तीन के कुर्ते के सीने में हीरे जड़ित कमल चमचमा रहा था, उन्होंने विनम्रता से पूछा आप कौन और कहाँ से  आईं हैं। परिचय के बाद उनका यह भी आग्रह था यूं इन्तज़ार में बैठे मत रहिये अपना मकसद बताइये और भीतर जाइये। दस्तक देने पर मुझ से पूछा गया कि आप इंटरव्यू के लिए आईं हैं तो सवालों की सूची दीजिये। सवाल जो भी ज़ेहन में थे जल्दी-जल्दी काग़ज़ पर उतारे और भेज दिए। तब तक हीरे जड़ित कुर्ते वाले शख़्स वहीं थे और उनका भाव मदद का ही था। तब दैनिक भास्कर को बहुत काम लोग जानते थे।  इंदौर से जिस अख़बार का नाम बुलंद था वह नईदुनिया था लेकिन बड़ी बात यह थी भास्कर ने अपने नए और छोटे पत्रकार  पर बड़ा भरोसा किया था।  थोड़ी देर बाद भीतर से जवाब आया कि वक़्त कम है आप अटलजी से चलते-चलते सवाल कर सकती हैं। मैंने राजनीतिक हालत पर अपनी समझ के मुताबिक चार-पांच सवाल किये जो भास्कर में प्रमुखता से प्रकाशित हुए। कन्फेस करना चाहूंगी कि एक दो बचकाने सवाल भी थे। उन्हें मैंने नहीं लिखा। बातचीत में उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई सवाल बाकी हो तो शाम को अहमदाबाद की प्रेस कांफ्रेंस में किया जा सकता है।

अटलजी का विराट व्यक्तित्व दिल पर असर कर गया। उन्होंने कहीं भी यह असर नहीं लेने दिया कि मैं नई पत्रकार हूँ और वे कद्दावर नेता। उनकी आवाज़ की गहराई का  असर अब भी गहरे तक है। शब्दों का चयन ही तो उन्हें कवि भी बनाता है। मुझे फ़ख्र है कि भारतीय राजनीति की इस बड़ी शख्सियत से मेरी भी एक मुलाक़ात है। विपक्ष में होने के बावजूद जिन्हे पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने सराहा और खुद अटलजी जिन्होंने बांग्लादेश के निर्माण के बाद इंदिरा गांधी को दुर्गा कहा। पक्ष के बीच ऐसा विपक्ष आज रुख़सत हो गया। एक बेहतर युग का अवसान है ये। अलविदा अटलजी। अटल कवि मन वाले वाजपेयी जी को शत-शत नमन।






सोमवार, 6 अगस्त 2018

बेहतरीन है मुल्क

वाकई बेहतरीन है मुल्क। उतनी ही जितना अपना मुल्क। कुछ महीनों से लग रहा था जैसे मुल्क में कुछ अच्छा नहीं हो रहा है। जैसे कोई बुरी नज़र ,कोई बुरा साया ,कोई नर पिशाच धीरे-धीरे किसी ज़िंदगी को लीलता है , मुल्क पर भी कोई ऐसा ही संकट मालूम होता। कौन मानता है इस दौर  में बुरी नज़र या काले साए  को ,मैं भी नहीं लेकिन जब इलाज नामालूम  हो तो मर्ज़ को ऐसे ही नाम दे दिए जाते हैं। बेचैनी यूं ही हावी होती रही  कि ऐसा क्या  फ़र्ज़ अदा हो कि मर्ज़  क़ाबू  किया जा सके। जब मुल्क देखी तो  लगा जैसे बेहतर सोचने वाले सृजनशील लोग भी हैं जो अपने सृजन से  दिलों पर जमीं गर्द मिटा रहे  हैं। खुद पर शर्म भी आई कि ऐसे कही जाती है बात। चुप पड़े रहना तो लकवा मार जाना  है।  

   अनुभव सिन्हा ने इस फिल्म के ज़रिये गहरा अनुभव सिद्ध किया है हालाँकि उनकी तुम बिन, रा-वन ,दस नहीं देखीं हैं। मुल्क दरअसल एक आवाज़ है जो देशभक्ति को परिभाषित करने की  राह में देशगान करती हुई लगती है और आज के कटीले हालात की जड़ों पर प्रहार भी करती है । मसलन एक मुसलमान अफसर को लगता है कि मुसलमान आतंकवादी को एनकाउंटर में ख़त्म करके ही कौम को सबक दिया जा सकता है ताकि फिर कोई दूसरा ऐसा ना हो। शेष समाज को लगता है कि इनके यहाँ चार-चार शादियां होती हैं इसलिए बच्चे ज़्यादा  होते हैं और फिर ये भी कि एक-दो जेहाद  के नाम पर क़ुर्बान कर दो। लगता यह भी है कि इन्हें तो आज़ादी के बाद ही पाकिस्तान चले जाना चाहिए था और लगता है कि बिन लादेन और सामान्य मुसलमान की दाढ़ी भी एक सी है। ऐसी तमाम लगने वालीं कपोल कल्पनाओं  को जब वकील मुराद अली की बहू आरती मोहम्मद चुनौती देती हैं तो सरकारी वकील निरुत्तर होते चले जाते हैं और मुल्क की सच्चाई बयान होती चली जाती है।

       फिल्म की कहानी वकील मुराद अली मोहम्मद के परिवार की कहानी है जो बनारस के एक मोहल्ले में मिल-जुलकर ज़िंदगी बसर कर रहा  है।  बहू आरती अचानक लंदन से लौटकर यह कहती है कि वह और अशरफ़ एक-दो महीने अलग रहेंगे क्योंकि भविष्य में पैदा होने वाले बच्चों के धर्म को लेकर दोनों में  कुछ अनबन है।  अभी परिवार में इस बात पर कोई बात होती इससे पहले ही आरती का  देवर शाहिद  एक बम ब्लास्ट में पकड़ा जाता है और अफ़सर जावेद के हाथों एनकाउंटर में मारा जाता है। मोहल्ला जो दावतों और दुःख में शरीक़ रहा करता था, इस घटना के बाद पूरे परिवार पर संदेह करने लगता है। देशद्रोही मानने लगता है। आतंकी के पिता बिलाल को भी गिरफ्तार कर लिया जाता है जो पहले ही इस गिरफ्त में है कि वह बड़े भाई मुराद अली पर आश्रित है और  परिवार चलाने में कोई आर्थिक हिस्सेदारी नहीं निभा पाया। 
  अदालत में यही साबित करने की कोशिश की जाती है कि पूरा का पूरा परिवार आतंकवादी है और घर में अड्डा चलता है। जबकि परिवार इस बात से बेखबर था कि उनके घर  का एक बच्चा मुसलमानों की जहालत के लिए यहाँ के निज़ाम को दोषी मानता  है और कौम के लिए कुछ करने की दिशा में इस्तेमाल हो गया है।  उसमें ऐसी सोच पैदा करने वाला शेख आलम है जो ऐसे बच्चों को अपना टारगेट बनाते हैं। पोस्टमार्टम के बाद शाहिद  की लाश को लेने से उसकी माँ साफ़ इंकार कर देती है। वह कहती है यह मेरा बेटा नहीं हो सकता। 

आरती मोहम्मद वकील है और वह अपने ससुर बिलाल का का केस लेती है। कचहरी में वकील यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि बिलाल भी आतंकवादी है जिसकी दुकान से सिम भी अवैध तरीके से दिए जाए हैं। और बदले में आतंकवादी संगठन उसे मोटी  रकम देते हैं। बिलाल को रिमांड पर लिया जाता है और कस्टडी में ही उसकी मौत हो जाती है। जनाज़े में सिवाय मित्र पांडे के कोई नहीं आता। मोहल्ले के शरारती उनके घर के आगे लिख देते हैं go to pak . गिरफ्तारी की नौबत वकील मुराद अली मोहम्मद की भी आ जाती हैं जहाँ वकील आरती कहती है कि वे सम्मानित वकील हैं और पेशी पर मौजूद रहने की अहमियत जानते हैं। देशद्रोही का आरोप लिए वकील बेचैनी की  रात में टहलते हैं जहाँ बहू आरती आकर पूछती हैं क्यों अब्बू नींद नहीं आ रही है। मुराद कहते हैं जब तबस्सुम शादी के बाद इस घर में आई थी तो पूछा करती थी क्या तुम मुझसे प्यार करते हो। मैं कहता हां तो कहती साबित करो। अब तू ही बता मैं कैसे साबित करता। अब देश के लोग भी मुझसे सवाल कर रहे हैं कि साबित करो कि मैं अपने वतन, अपनी मिटटी से प्यार करता हूँ। बता मैं कैसे साबित करूँ यह। अब यह तेरी ज़िम्मेदारी है मेरी मिटटी से मेरी  मोहब्बत को साबित कर । 
दरअसल यह सारी तकलीफ़ जन्म ही तब लेती है जब इसे इनके और  में बांटकर देखा जाता है  हम मान कर नहीं। फिल्म में  एक संवाद है मेरे घर में मेरा स्वागत करने का हक़ उन्हें किसने दिया ? ये मेरा भी उतना है   जितना की आपका। अगर आप मेरी दाढ़ी और ओसामा की दाढ़ी में फर्क नहीं कर पा  रहे तो भी मुझे उतना ही हक़ है अपनी सुन्नत  निभाने का। एक अन्य संवाद में  वकील  आरती से  आपको बधाई कि आज फिर धर्म के आगे न्याय की जीत हुई है।
मुराद की भूमिका में ऋषि कपूर उससे भी  ज़्यादा कमाल करते हैं जो उन्होंने कपूर एंड संस में पैदा किया था। तापसी पन्नू पिंक में कटघरे में भी असरदार रहीं  तो मुल्क में कटघरे के बाहर बातौर वकील भी। बिलाल की भूमिका में मनोज पाहवा जो सांस उखड़ते  हुए पलों को जीते हैं ,वह उन्हें एक्टिंग के नए मुकाम पर पहुंचाता है। प्रतिपक्ष के वक़ील आशुतोष राणा को देखना बहुत सुखद है। नीना गुप्ता की छोटी भूमिका बड़ी हो गई है उनके अभिनय कौशल से। वे मुराद की बीवी हैं। आतंकी  की भूमिका में प्रतीक से बब्बर भी बेहतर हैं। एटीएस अफ़सर जावेद की भूमका में रजत कपूर शानदार हैं। फिल्म में असर पैदा होता है जब वे आतंकवाद की परिभाषा बताते हैं। जज का फैसला आप मुल्क देखकर ही जानिए। एक बात दोहरा देती हूँ जो  जज ने कही कि बच्चों से इतने बेखबर मत रहिये ,उन्हें देखिये वे क्या करते हैं। मुल्क के लिए सैलूट पेश  करने  का मन करता है अनुभव सिन्हा की पूरी टीम के लिए। सुनिधी चौहान ,स्वानंद किरकिरे की आवाज़ वाला गीत-संगीत भी हमारे मुल्क जैसा ही है। 

ps : मुल्क देखकर लगता है जैसे current affairs का एक चैप्टर पढ़कर बाहर आ  रहे हैं और दुःख भी होता है कि आख़िर कब तक बच्चों जैसे हमें यही बात समझानी पड़ेगी। 















मंगलवार, 10 जुलाई 2018

धारा 377 से बचते-बचाते हम लोग

धारा 377 बाबा आदम के ज़माने  यानी 1860 का वह क़ानून है जिसमें  अप्राकृतिक  यौन सम्बन्धियों को जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता है। जिन अंग्रज़ों के ज़माने का यह कानून है वे खुद भी अपने देश में इस आपराधिक क़ानून को कब का ख़त्म  कर चुके हैं  और 2014 से  सेम सेक्स में शादी को भी जायज़ मान रहे हैं।1967 से ही वहां समलैंगिकता अपराध के दायरे से बाहर  है।  
      हमारे यहाँ LGBT यानी लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर्स के हक़ में पहली बार पूरी संवेदनशीलता के साथ 2009 में सोचा गया था जब दिल्ली हाई कोर्ट ने इन संबंधों को आपराधिक नहीं  माना था। सर्वोच्च न्यायालय को यह ठीक नहीं लगा  और  दिसंबर 2013  में  इसे पलट दिया गया। साथ ही यह भी कहा कि इसे संसद के ज़रिये ही हटाया जा सकता है। संसद इस मुद्दे पर खुली बहस से बचती आई है जबकि भारतीय संस्कृति में वात्स्यायन के शब्दों के साथ ही खजुराहो के मूर्ति शिल्प में भी इसके खुले  दर्शन होते हैं। सभी धर्मों के हिसाब से देखा जाए तो वहां यह कृत्य मान्य नहीं है बल्कि  पाप है। बावजूद इसके दुनिया के कई देश जिनमें बेल्जियम नीदरलैंड्स ,कनाडा,पुर्तगाल, स्पेन, न्यूज़ीलैण्ड,डेनमार्क अर्जेंटीना स्वीडन शामिल हैं ,यहाँ भी समलैंगिकता क्राइम नहीं है। यह संयोग ही है कि इन देशों की  फुटबॉल टीमें भी अच्छा खेलती हैं।  90 देश LGBT के हक़ में हैं और अमेरिका ने तो सेना में इनकी भरती पर लगी रोक भी हटाई है। 
सच तो यही है कि इस दौर में मौलिक अधिकार और निजी स्वंत्रता पर यूं वार नहीं किया जा सकता जिस तरह से धारा 377 करती है। इस कारण लोग अपने संबंधों को छिपाते हैं और परिजन उनकी शादी भी कर देते हैं। उन्हें लगता है कि यह बीमारी है जो शादी के बाद ठीक हो जाएगी। 

दिल्ली हाई कोर्ट के जुलाई 2009 में आये फैसले के बाद एक संवाद लिखा था ,वही आपकी नज़र 
फाइल इमेज ऑ फ़  प्राइड मार्च -AFP



टॉम-उफ...क्या हो गया है देश को
डिक-क्यों क्या हुआ...
टॉम-अरे... अब ऐसे घृणित काम को भी कानूनी मान्यता मिल गई... महिला का महिला और पुरुष का पुरुष के साथ संबंध पर कोर्ट को कोई एतराज नहीं...
डिक-तो इसमें गलत क्या है
टॉम-गलत ही गलत है। ये कुदरत के खिलाफ है। सोचकर ही घिन आती है। यह फैसला शादी, परिवार जैसी व्यवस्था को खत्म कर देगा।
डिक-यह सब पर लागू नहीं होता, बल्कि जो लोग ऐसे हैं उन्हें प्रताड़ना से बचाएगा। इन्हें समझने की बजाए हम घरों में कैद कर देते हैं। पुलिस उनके साथ खराब सुलूक करती है।
टॉम-इन्हें क्या समझना...ये तो बीमार और पागल हैं।
डिक- यह न तो बीमार हैं और न असामान्य। जैसे आप किसी स्त्री को पसंद करते हैं या कोई स्त्री पुरुष को पसंद करती हैं, वैसे यह प्रवृत्ति भी जन्मजात है।
टॉम-सब बकवास है। इनका तो इलाज होना चाहिए, न कि इन्हें अधिकार दिए जाने चाहिए। इन्हें बढ़ावा क्यों दे रहे हैं?
डिक-नहीं, यह कोई छूत की बीमारी नहीं है, जो दूसरों में फैल जाएगी। इसके लिए एक जीन जिम्मेदार है।
टॉम-ऐसे गन्दे काम के लिए भी जीन जिम्मेदार हैं।
डिक-हां है, तुम उसे सिर्फ सेक्स तक ही देखते हो, वह तो सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा है। मूल बात है भावनात्मक लगाव, जो सामान्य तौर पर किसी भी स्त्री-पुरुष में होता है। उनकी सारी जिंदगी यहीं तक तो सीमित नहीं रहती।
टॉम-इसके लिए सड़कों पर उतरने की क्या जरूरत। जी लो जिंदगी। इमोशनल तरीके से।
डिक-जिस तरह दो प्रेमी एक-दूसरे के बिना नहीं जी पाते, वैसा ही आकर्षण ये महसूस करते हैं। यह बात एक शोध से भी सिद्ध हो चुकी है। ये केवल इतना चाहते हैं कि इन्हें भी दुनिया समझे। ये इस दुनिया में खुद को अल्पसंख्यक और असुरक्षित मानते हैं।
टॉम-मुझे तो कानून ही सही लगता है। इन्हें समाज में नहीं होना चाहिए।
डिक-क्यों... इन्होंने क्या अपराध किया है। उल्टे इन्हें समझने वाला कोई नहीं है। ये मौत से बदतर जिंदगी जीते हैं, जबकि बिलकुल सामान्य जिंदगी जी सकते हैं।
टॉम- ऐसा कोई शास्त्र नहीं कहता। सब धर्मों ने इसे वर्जित माना है।
डिक-वहां तो कई बातें वर्जित हैं। क्या उन सबका पालन हम कर पाए हैं और क्या वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर कई पुरानी धारणाएं बदली नहीं हैं।
टॉम-फिर कुछ लोग सुधर कैसे जाते हैं..
डिक-वे बदलते हैं खुद को। परिवार और समाज के दबाव के आगे। ठीक वैसे ही जैसे कोई लड़का या लड़की परिजनों की मर्जी के आगे घुटने झुका देता है, लेकिन इससे उसका झुकाव कम नहीं होता। क्षणिक आवेश में मौके का फायदा कई लोग उठाते हैं, लेकिन उनमें सड़कों पर उतरने का साहस नहीं होता ।
टॉम- आगे ये शादी का अधिकार मांगेंगे फिर बच्चे गोद लेने का।
डिक-इसमें दिक्कत क्या है, यह उनकी मर्जी पर छोड़ देना चाहिए।
टॉम-कोई मरना चाहता है। उसे भी चलाने दो मर्जी। आत्महत्या को क्यों जुर्म मान रखा है?
डिक-ये तो जिंदगी जीना चाहते हैं और वो खत्म करना। दोनों में फर्क है।
टॉम-लगता है तुम भी पागल हो गए हो, कहीं तुम भी...
डिक-मैं ऐसा तो नहीं हूं, लेकिन होता तो भी मुझे कोई शर्म नहीं आती।
टॉम-तुम सरफिरे हो। तुम्हारी पूरी सोच ही अजीब है..
डिक-या रब न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात,
दे और दिल उनको, जो न दे मुझको जुबां और।


.... और यह ज़ुबाँ  मिलने का ही वक़्त है 

गौरतलब है की सर्वोच्च न्यायालय ने मुद्दे को खारिज करने की बजाय धारा ३७७ के समर्थन में एन जी ओ नाज़ और सरकार को नोटिस जारी कर दिए हैं. बहस के सारें रस्ते अभी खुले हैं कि यह कुफ्र है यां कुछ और.