गुरुवार, 24 नवंबर 2022

थारे जैसी न रहना, इश्क जरूर करना



इस लेख से पहले ऐसा कोई डिसक्लेमर नहीं है जो कहे कि लिव इन रिश्ता पाप है और युवाओ को इससे बचना चाहिए । बस इतना ज़रूर कि  ज्यों ही आपका लिव-इन पार्टनर ऊंची आवाज़ में बात करे और उसका हाथ आपके खिलाफ उठ जाए उसका साथ छोड़ दो। ना केवल छोड़ो बल्कि कानूनी कार्रवाई भी करो। लिव इन रिश्तों से जुड़ा भारतीय कानून बहुत स्पष्ट और स्त्री के हक़ में है। हो सकता है कि आगे बढ़ते हुए  पीछे के सारे पुल आपने ढहा दिए हों तब भी नया रास्ता खोजिये और जो नहीं मिलता है तो बनाइये। माता -पिता से सबसे बड़ी अरज कि वे बच्चों को माफ़ करना सीखें। उन्हें  सबक सिखाने की मंशा ना पालें। बेटा हो या बेटी उम्र के इस दौर में उनका साथ ना छोड़ें। हो यह रहा है कि बच्चे जिस दुनिया में बड़े हो रहे हैं वह इंटरनेट की दुनिया है। संसार उनके सामने एक गांव की तरह है और दुनिया की संस्कृति भी। तभी तो 'एमिली इन पेरिस' जैसी वेब सीरीज भारत के युवाओं में भी लोकप्रिय है। 
'एमिली इन पेरिस' में अमेरिका के  शहर से एक लड़की फ्रांस की राजधानी पेरिस पहुंचती है जो साथ ही  साथ दुनिया में  फैशन और कला की राजधानी भी है। वह एक मार्केटिंग कंपनी में है और शहर में कई लड़कों से मिलती है वह भी तब जब उसका ब्रेक अप हो चुका है। अपने काम में वह माहिर है और किसी रिश्ते का बोझ वह नहीं ढोती,कोई मलाल या अपराध बोध उसे नहीं है।  भारत का युवा रिश्ते जोड़ने की शुरुआत तो कर चुका है लेकिन उन परिवार नहीं।  ऐसे में उसके टूटने पर वह तकलीफ  को बर्दाश्त नहीं कर पाता। वह तनाव और अपराध बोध में घिर जाता है नतीजतन रिश्ते में अनबन,हिंसा और ख़ुदकुशी। घर से दूर जुड़ने की पहली सीढ़ी वह पार कर लेता है लेकिन फिर जब सामाजिक बंधन और रिश्ता निभाने की बात आती है तो परिवार साथ नहीं देता। सामजिक कट्टरता  उसे तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ती । विधर्मी तो बहुत-बहुत दूर की बात है परिवार विजातीय से भी शादी की अनुमति नहीं देते। ऐसे में युवा आत्महत्या की ओर मुड़ता है। परिवार के दबाव में आत्महत्या करने वाले लड़कों की संख्या भी बढ़ी है। लड़कियों का हाल लड़कों से ज़्यादा बुरा है। साल 2021 में जिन 45 हज़ार महिलाओं ने खुदकुशी की उनमें  1752 आत्मनिर्भर और प्रोफेशनल महिलाएं थीं और जिन्होंने प्रेम  में धोखा खाने के बाद यह अंधेरा रास्ता चुना उनकी संख्या 2894  थी। इन आंकड़ों को लिखने का आशय यह नहीं है कि विवाहित स्त्रियां आत्महत्या नहीं करती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आकड़े बताते हैं कि कुल आत्महत्या करने महिलाओं में से 64 फीसदी महिलाएं विवाहित होती हैं। दुनिया से निराश वे ही ज़्यादा होती हैं।  आत्महत्या करने वाली महिलाओं में 24 फीसदी अविवाहित होती हैं। 
   ज़ाहिर है विवाह ख़ुशी या सुरक्षा की पावती नहीं है। आप कहेंगे देश इस वक्त  जब देश और उसका मीडिया छह महीने पहले हुई एक जघन्य हत्या  के हत्यारे आफ़ताब पर  बात कर रहा है यहां खुदकशी की बात हो रही है ? यह लिव इन रिश्ते का मामला तो है ही कथित लव जेहाद का भी है यानी एक मुस्लिम लड़के का हिन्दू लड़की  को जाल में उलझाना और फिर मार डालना। पुलिस ने किसी क्राइम थ्रिलर के अंदाज़ में इस अपराध को जनता के सामने रख दिया है। आफ़ताब बनाम श्रद्धा सबकी ज़ुबां पर है और टीवी डिबेट्स में विशेषज्ञ आकर बता रहे हैं कि एविडेंस कैसे बनाए और नष्ट किये जा सकते हैं और श्रद्धा का फ़ोन अब तक नहीं मिला है। सोशल मीडिया पर आफ़ताब हत्यारा तो साबित हो ही गया है समुदाय विशेष को यह कहकर भी गालियां दी जा रही हैं कि ये तो बहुत प्यार से बकरा भी पालते हैं और फिर मार कर खा जाते हैं। श्रद्धा के साथ इस कसाई ने यही किया। यह वही थ्योरी है जो अमुमन सब सुनना चाहते हैं। पिछले कुछ बरसों में ऐसा माहौल तो देश में हम सबने तैयार कर ही दिया है।
 
  आफताब हत्यारा हो सकता है लेकिन अभी पुलिस की जांच जारी है और अदालती सुनवाई बाकी। एक साल पहले ये दोनों वसई ,मुंबई के एक फ्लैट में भी किराए से रहे थे जहां के पड़ोसी इस बात की पुष्टि करते हैं कि ये दोनों यहां  भी लड़ते थे लेकिन किसी ने भी सोसाइटी में जाकर शिकायत नहीं की। यह दोनों  खुद को शादीशुदा बताकर रहते थे क्योंकि सोसाइटी अविवाहित जोड़ों को रहने नहीं देती। इन दोनों ने अपनी तस्वीर के साथ अपने माता-पिता की तस्वीर भी वहां जमा की थी ताकि आभास हो कि  इनके परिजन यहां आते-जाते रहेंगे जबकि श्रद्धा के माता -पिता इस रिश्ते से नाखुश थे। ऐसे अनगिनत जोड़े हमारे समाज में हैं जो झूठ बोलकर अपने लिए रहने के ठिकाने ढूंढते हैं। मकान या फ्लैट देने वालों के लिए अविवाहित लड़कियां तो जैसे बिजली का नंगा तार हैं। समाज को वे लड़कियां भी नापसंद हैं जो अपने आस-पास के माहौल से अलग या खिलाफ होकर खुद का मुकाम बनाती हैं। ज्यों ही इनके नाकाम या गिरने की कोई खबर आती है समाज दूसरी लड़कियों को इनका उदाहरण देने लगता है। लड़कियों के आगे  बढ़ने के फैसलों को इन घटनाओं से बड़ा झटका लगता है और वे पीछे धकेल दी जाती हैं। परिवार और समाज से छिपकर ऐसे रिश्ते बनते हैं तो लड़कियों के आपराधिक तत्वों के सम्पर्क में आने की आशंका बढ़ जाती है। 

आखिर क्यों माता पिता इन रिश्तों को नहीं स्वीकार पाते। ब्रिटेन में रह रहीं भारतीय नागरिक नीरा एक जगह लिखती हैं कि ऐसे देश में रहती हूं जहां लिव-इन टुगेदर  आम बात है। इसका अंजाम मैंने देखा है कि नॉनकमिटल मर्दों के साथ अकेली मांओं की संख्या बढ़ी है। नारीवादी हूं। दो बेटियों की मां भी। कल अगर वे ऐसा करना चाहें तो खुशी-खुशी करने दूंगी, कह नहीं सकती। यही भय हर माता -पिता के हिस्से आता है और वे प्रतिरोध भी करते हैं लेकिन ऐसा भी तो नहीं है कि सभी विवाहों में पुरुष प्रतिबद्ध ही होते हैं या वे टूटते ही नहीं। कितनी एकल माएं अपने बच्चों को पूरी लगन से बड़ा कर रही हैं। जैसा की ऋषि कन्या शकुन्तला ने भी किया। शकुन्तला ने अपने पुत्र भरत को वन में बड़ा किया क्योंकि समाज तब भी वही था। विवाह संस्था होते हुए भी राजा दुष्यंत और शकुंतला ने गंधर्व विवाह किया। ऐसा विवाह जिसके लिए राजा प्रतिबद्ध नहीं था और वह रिश्ते को ही भूल गया। यह शकुंतला का ही तप था कि बेटे को इस कदर काबिल बनाया कि राजा को लौटना पड़ा। यह पौराणिक कहानी स्त्री के साहस की तो है ही लिव इन रिश्तों की भी है जो हर काल खंड में रहे हैं। 
 सिंध की शायरा अतिया दाऊद की एक कविता है  जो उन्होंने अपनी बेटी के लिए लिखी है। 
गर तुझे कारी-कारी कहकर मारें,
मर जाना, इश्क जरूर करना।
शराफत के शो-केस में
बुर्का लगाकर न बैठना,
इश्क जरूर करना।
प्यासी ख्वाहिशों के बियाबां में
थारे जैसी न रहना,
इश्क जरूर करना।
गर किसी की याद हौले से,
तेरे मन में उठ रही हो, मुस्करा पडऩा,
इश्क जरूर करना।
वो लोग क्या करेंगे?
सिर्फ पत्थर फैं क कर,
तुझे मारेंगे
जीवन पल को तू भोगना,
इश्क जरूर करना।
तेरे इश्क को गुनाह भी कहा जाएगा
तो क्या....? सह लेना,
इश्क जरूर करना।

आफ़ताब श्रद्धा का हत्यारा साबित होता है तो उसे फांसी की सजा देने की मांग लोग कर रहे हैं या शायद वे इस हैवानियत को सुनकर इस नतीजे पर पहुंच गए हैं। श्रद्धा की मां इस दुनिया में नहीं लेकिन पिता भी आफताब को फांसी पर ही देखना चाहते हैं। आफताब को फांसी होना ठीक ही होगा  क्योंकि फिर किसी के मन में उस हत्यारे के प्रति सद्भावना नहीं जागेगी  जैसे  बिलकिस बानो के अपराधियों के साथ जागी।  उन्हें समय से पहले ही अच्छे आचरण के कारण रिहा कर दिया गया। मार्च 2002 के  गुजरात दंगों में उनसे सामूहिक बलात्कार हुआ ,उनकी तीन साल की बेटी मार दी गईं ,उनके गर्भस्थ शिशु की भी मौत हो गई , परिवार के सात सदस्यों को भी  मार दिया गया। सीबीआई की विशेष अदालत ने मुजरिमों को सजा दी जिसे बॉम्बे हाई कोर्ट ने बरक़रार रखा था । ये संख्या में ग्यारह थे जिन्हें इस साल पंद्रह अगस्त को गुजरात सरकार ने रिहा कर दिया। आफताब को फांसी होनी ही चाहिए ताकि फिर कभी वह इस अपराध से मुक्त ना किया जाए कोई श्रद्धा इसलिए ना मारी जाए क्योंकि उसने अपने मन की सुनी थी। 

वर्षा भम्भाणी मिर्ज़ा 

  

रविवार, 16 अक्तूबर 2022

सर ढंकना औरत की सोच को नियंत्रित करने की साज़िश

कर्नाटक के शिक्षण संस्थानों में हिजाब को प्रतिबंधित किए जाने के बाद दो जजों की पीठ के दो अलग-अलग फैसले आए हैं ठीक वैसे ही जैसे पिछले साल इसी वक्त पूरा देश बहस करते हुए दो धड़ों में बंट गया था ,अपनी राय दे रहा था और तर्क रख रहा था। अभी एक पखवाड़े पहले ही सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की पीठ ने महिला को गर्भपात का अधिकार दिया है। महिला का वैवाहिक स्टेटस जो भी हो वह 24 सप्ताह के गर्भ को समाप्त कर सकती है। यह उसके शरीर पर उसके कानूनी हक के  उद्घोष की तरह  है। क्या हिजाब के मामले को भी इस नजरिए से देखा जा सकता है कि यह उसकी देह है, वह चाहे तो हिजाब पहने, चाहे तो नहीं। कोई मजहब, कोई कानून उस पर थोपा नहीं जाए कि उसे इसे पहनना ही है। ईरान की स्त्रियां यही तो कह रही हैं। जान कुर्बान कर रही हैं कि आप इसे हम पर थोप नहीं सकते। हमारे देश में जो यह सवाल चला वह एक शैक्षणिक संस्था से चला था। संस्थान में एक ड्रेसकोड है जिसका पालन होना ही चाहिए लेकिन हमने जानते हैं  कि भारत विविधता और विविध विचारधाराओं का देश है। 


हम जिस स्कूल में पढ़ा करते थे वहां की स्कूल यूनिफॉर्म घुटनों तक की ट्यूनिक थी लेकिन लड़कियां शलवार कुर्ती या चूड़ीदार पायजामा पहनकर भी आती थीं। सिख लड़के-लड़कियां सिर पर जूड़ा या दस्तार बांधकर आते थे। हां लड़कियां भी दस्तार बांधती हैं।  इसे सहज ही स्कूल प्रशासन ने स्वीकार किया था। थोड़ा अलग सोचें कि अगर स्कूल को एतराज़ होता तब क्या परिस्थितियां बनती? शायद माता - पिता स्कूल से निवेदन करते या किसी और स्कूल के बारे में सोचते या फिर शायद लड़कियों की पढ़ाई भी बंद करा देते क्योंकि अक्सर लड़किया वहां सातवीं-आठवीं तक पढ़ती और फिर पंजाब लौट जाती। पढ़ाई उनकी छूट ही जाती,वे घर-बार के काम और खेती में लग जातीं । यह भी हो सकता था कि मामला कुछ और बढ़ता तब सरकारें दखल देतीं,कोर्ट कचहरी होती। प्रतिबन्ध लगता, जब तक फैसला नहीं होता लगा रहता। छात्र असमंजस में होते। इन हालात में कैसे कोई संस्थान सामान्य तरीके से अपना शैक्षणिक सत्र पूरा  कर सकता है। सियासत पूरी ताकत से कर्नाटक के हिजाब मामले में कूद चुकी थी।कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हिजाब पर बेन लगा रखा है। इस बेन के ख़िलाफ़ याचिकाएं सर्वोच्च न्यायलय में आईं। वहां दो जजों के बीच सहमति नहीं बनी और अब मामला तीन जजों की पीठ को भेजा जाएगा। ठीक है फैसले से पहले और बहस होगी, यही स्वस्थ लोकतंत्र का आधार भी  है। इन मामलों में सरकारों का रवैया  प्रभावी नहीं रहा है यह हम शाहबानो के मामले में देख चुके हैं। इंदौर की शाहबानो को गुज़ारा भत्ता ना देना पड़े इसके लिए संविधान में ही संशोधन कर दिया गया।इस मामले में भी दुर्भवनापूर्ण इरादों से इंकार नहीं किया जा सकता अन्यथा शिक्षा के मंदिर में ऐसा दृश्य कि एक तरफ कैसरिया पगड़ी और शॉल दी जा रही हो और दूसरी तरफ लड़कियां बुर्का और हिजाब पहने आमने-सामने हो ,शर्मनाक है। क्या सरकारों को मज़ा आता है इन दृश्यों में? उन्हें क्या यहां  भी वोटों की लहलहाती हुई फसल दिखती है। अफ़सोस कि जिस देश में लड़कियों के पैदा  होने , स्वस्थ रहने और फिर शिक्षित होने की राह में ही इतने संकट हैं वहां किसी भी सरकार के लिए अभी कितना काम बाकी है समझने के लिए क्या किसी रॉकेट विज्ञान की जरूरत है? अभी तो 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' का लक्ष्य ही पूरा नहीं हुआ है।  


साहित्यकार नासिरा शर्मा एक लेख में लिखती हैं स्वतंत्र भारत में मुस्लिम स्त्री की दशा और दिशा का विश्लेषण इतना आसान नहीं है। भारतीय परिवेश में रहने वाली औरतें  अपनी सोच, संवेदना और व्यवहार में लगभग एक जैसी हैं, चाहे परिवेश और भौगोलिक  स्थिति में जितना भी अंतर हो। धर्म की विभिन्नता के कारण  उनके कर्मकांड और रीति-रिवाज़ भले अलग हों ,मगर जब हम उन सारे रिवाज़ों  का तुलनात्मक अध्ययन  करते हैं,तो पता चलता है कि त्योहारों और मनौतियों में गजब की समानता है । उनका सर्वव्यापी वात्सल्य, परिवार से जुड़ाव ,असीम धैर्य ,दुःख को सहना, दूसरों  के लिए कुर्बान  हो जाना। लगभग सभी में यह गुण कूट-कूटकर  भरा होता है इसलिए जब हम मुसलमान  औरत की बात करते हैं, तो उसकी आत्मा की नहीं बल्कि उसके ऊपरी आवरण की बात करते हैं जिससे वह ढकी -छुपी रहती है और  हम उसी सजावट को उसकी पहचान मान उसे देश की अन्य औरतों से अलग खड़ा कर देते हैं और उसके दुःख -सुख का बयान इस तरह करते हैं जैसे वह कोई अजूबा हो 


तब क्या हिजाब ,बुर्का या कोई अन्य आवरण हर औरत को अजूबे की श्रेणी में ले आते हैं ? वह अलग-थलग नज़र आती है। उसे अपने बालों को खोलने की कोई इजाज़त नहीं है। उस पर बंदिश है कि वह अपने बालों को सार्वजनिक जगहों पर यूं लहरा नहीं सकती। क्यों होनी चाहिए यह बंदिश? समाज मज़हब खुद ही उसे इससे मुक्त क्यों नहीं कर देता ? इन सवालों के जवाब में इतना ही कहा जा सकता है कि जिन घरों में इल्म की रौशनी पहुंची है वहां बदलाव हुआ है। बदलाव की आहट वहां बहुत धीमी होती है जहां असुरक्षा हो,कदम कदम पर डर हो । बंटवारे के बाद हुए फ़सादों के लिए बहुसंख्यक समाज इसी समुदाय को ज़िम्मेदार मानता है। आज़ादी के बाद भी फ़साद हमारे देश का सच है। ऐसे माहौल की गाज लड़कियों पर ही गिरती है ,उसी का बाहर निकलना दाव पर लगता है ,उसी की पढ़ाई छूटती है और जो फिर हिजाब  जैसा मसला बीच में आ जाए  तो दकियानूसी समाज सबसे पहली रोक लड़की पर ही लगाता है।  फ़र्ज़ कीजिये कि समाज इन रूढ़ियों को छोड़ आगे बढ़ना भी चाहे तो क्या सरकार के पास  कोई ठोस योजनाएं हैं जो इन्हें संभाले और सम्बल दें। लड़कियां तो सड़क पर ही सुरक्षित नहीं। ऐसे में ये उसी घेरे में रहने के लिए मजबूर हैं जो उन्हें मिला हुआ है। आखिर किस उम्मीद में वे अपने  दायरे तोड़ आगे आएं। संविधान में वर्णित अधिकार अभी सबको नसीब नहीं हुए हैं। आज की परिस्थितियों में तो यह और भी मुश्किल है जब उन पर नागरिकता साबित करने की तलवार लटकी हो , शक हो कि ये आतंकी और जेहादी होते हैं ,ये अवैध गतिविधियों में लिप्त होते हैं। ऐसे में एक लड़की के लिए अपने घर के भीतर और बाहर खुद की राह बनाने  का संघर्ष कहीं ज़्यादा बढ़  जाता है।  बाहरी दुनिया में जब संघर्ष बढ़ेगा तो वह फिर अपने खांचों में लौट जाएगी । ऐसे में हम उनको हिजाब  ना पहनने का बेहतरीन कानून ही क्यों ना दे दें , वास्तविक धरातल पर उसकी अहमियत कुछ नहीं  होगी। जो इसे हिजाब पहनने और ना पहनने जैसी सतही समझ से देख रहे हैं, वे भूल कर रहे हैं। 

हिजाब की अनिवार्यता न हो ,किसी घूंघट, परदे की भी नहीं लेकिन यह सुनिश्चित हो कि लड़की अकेली नहीं है ,देश को उसकी परवाह है ,सर से यह आवरण खुद ब खुद उड़ जाएगा।  बेहद प्रतिकूल हालात में इल्म का हाथ थामने वाली और दमन का मुकाबला करने वाली ईरानी पत्रकार मसीही अलनेजाद अपनी किताब में लिखती हैं सर ढंकना सिर्फ सर  ढंकना नहीं है औरत की पूरी सोच को नियंत्रित करने की साजिश है।  


गुजरात :भाजपा का छेल्लो शो !

 


 खेला होबे सियासत की दुनिया का लोकप्रिय मुहावरा हो गया है। किसे पता था कि पश्चिम बंगाल से चला यह शब्द खेल में 'सियासत होबे' का पाठ पढ़ा जाएगा। इस नई सियासत से दीदी के प्रदेश में यह नजरिया बन गया है कि चूंकि दादा ने पार्टी का साथ नहीं दिया इसकी वजह से उन्हें अध्यक्ष पद से चलता कर दिया गया है। दादा रबर स्टांप नहीं हो सकते थे लिहाजा उनकी पारी यहीं खत्म कर दी गई है। अगर जो दादा पार्टी का हाथ थाम लेते तो कथा कुछ और होती। 

बहरहाल, खेला गुजरात में भी बहुत रोचक हो गया है। विधानसभा चुनाव होने को हैं और 27 सालों से राज कर रही भारतीय जनता पार्टी का बुखार इस बात से ही नापा जा सकता है कि कभी प्रधानमंत्री तो कभी गृह मंत्री वहां डेरा डाले रहते हैं। घोषणाओं पर घोषणाएं जारी हैं और पार्टी एक नहीं कई गौरव यात्राओं की शरण में चली गई है क्योंकि जनता अब नेताओं को हवा में नहीं सड़क पर देखना चाहती है। पता नहीं क्यों प्रधानमंत्री को राजकोट रैली में कांग्रेस के बारे में गुजराती भाषा में यह कहना पड़ा कि "इस बार कांग्रेस कुछ कह नहीं रही है, शांत बैठी है, चुपचाप घर-घर जाकर अभियान चला रही है। इस बात से सावधान रहने की जरूरत है।" अब प्रधानमंत्री जनता से संवाद कर रहे थे या अपने कार्यकर्ताओं को आगाह कर रहे थे लेकिन यह तो साफ है कि भाजपा इस बार इन चुनावों को हल्के में ले सकने की स्थिति में कतई नहीं है। 27 सालों के शासन से नागरिकों में पैदा हुई परेशानियों के साथ अरविन्द केजरीवाल भी भाजपा की नाक में दम किए हुए हैं। चुनाव में तनाव है इसीलिए भाजपा के एक सांसद के नफरती उद्गार भी निकल आए हैं।

अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को अगर कोई भाजपा की 'बी' टीम मान रहा है तो उसे अपनी भूल सुधार लेनी चाहिए। दिल्ली में जिस भीषण जंग के बाद पार्टी भाजपा को हराकर सत्ता में आई और फिर पंजाब के बाद गुजरात में दम-खम दिखाया है, वह भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। इसे असदुद्दीन ओवैसी फैक्टर नहीं कहा जा सकता जो अल्पसंख्यकों के वोट काटकर भाजपा की जीत का गणित आसान कर देता हो। कांग्रेस और भाजपा के अलावा आप अकेली पार्टी है जिसकी देश के दो राज्यों में सरकार है। दूसरे बड़े नेता हैं लेकिन उनका जनाधार एक राज्य तक ही सिमटा हुआ है, फिर चाहे वह नीतीश कुमार हों ममता बैनर्जी या फिर स्टालिन या के चंद्रशेखर राव (केसीआर)। शरद पवार की एनसीपी के पास तो कोई राज्य भी नहीं है। गुजरात में आप और भाजपा नूरा कुश्ती नहीं कर रहे हैं। भाजपा कड़ी टक्कर में है और उसे 2017 में केवल 99 सीटें मिलीं थीं। कांग्रेस को 77 सीटें मिलीं थीं। कांग्रेस का वोट शेयर तो बढ़ा ही था, 32 साल बाद उसे इतनी सीटें भी मिली थीं। तोड़-फोड़ के बाद  जोड़ से भाजपा की सरकार बन गई थी। भाजपा को रेकॉर्ड 127 सीटें 2002 के दंगों के बाद मिली थीं। घोर ध्रुवीकरण से हासिल हुई सीटों के बाद 2007 में भाजपा की सीटें 117, 2015 में 115 और  2017 में घटकर 99 हो गईं। भाजपा का 49 तो कांग्रेस का मत प्रतिशत 41 था। अब इन दोनों के बीच गुजरात में 'आप' है। सूरत नगर निकाय चुनाव में पहली बार 27 सीटें जीतकर आप ने गुजरात में आधार बताकर देश का ध्यान खींचा था। यहां गांधीनगर निकाय चुनाव के नतीजों पर निगाह डालना भी दिलचस्प होगा जो साल भर पहले ही संपन्न हुए थे। यहां कांग्रेस और आप दोनों का सुपड़ा साफ़ था। दोनों को दो और एक सीट मिली थी लेकिन दोनों का वोट शेयर भाजपा से ज़्यादा था। कांग्रेस को 28 फ़ीसदी और आप को 22 फ़ीसदी मत मिले थे। हालांकि गांधीनगर म्युनिसिपल कार्पोरेशन का चुनाव कोई विधानसभा चुनाव के नतीजों की आहट नहीं देता है लेकिन ऐसा  हाल रहा तो गुजरात को नई सरकार तब मिलेगी जब ये दोनों मिल जाएं। ऐसा होना मुश्किल इसलिए भी है कि भाजपा हार कर भी जीत का ताज पहनना जानती है। महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश आदि मिसाल हैं फिर यह तो गुजरात है जिसे भाजपा के अध्यक्ष अपने चुनावी भाषण में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की गंगोत्री बताते हैं। 

फिलहाल आप से दोनों दलों ने दूरी बनाई हुई है। पंजाब में आप की सरकार कह रही है कि हमें पाकिस्तान से व्यापार की अनुमति मिलनी चाहिए। इस पर कांग्रेस-भाजपा दोनों ही पिल पड़े हैं। यह और बात है कि पंजाब के नेता और क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू बहुत पहले ही यह कह चुके हैं कि भाषा और खान-पान हमें पाकिस्तान से जोड़ता है। भारत का पंजाब और पाकिस्तान का पंजाब सांस्कृतिक रूप से क़रीब हैं शायद इसीलिये इमरान खान से सिद्धू की दोस्ती औरों को खटकती आई है। बहरहाल गुजरात में संघर्ष कहीं-कहीं  त्रिकोणीय है और यह रोचक भी  कि दो परंपरागत विरोधियों के बीच आप जगह बनाती दिख रही है। अस्थाई कर्मचारियों का असंतोष आप के हक में होता दिख रहा है।आप पार्टी के स्कूल और हेल्थ मॉडल के प्रति भी मतदाताओं का झुकाव है और यह भाजपा को चुनौती भी दे रहा है। कोविड के समय गुजरात के अस्पताल हांफ गए थे।


अगर जो 80 हज़ार करोड़ की योजनाओं की घोषणा और चकाचौंध के बूते वोट हासिल करना पर्याप्त होता तो मोदी-शाह को यूं गुजरात में वक्त न बिताना पड़ता और न ही यह कहना  पड़ता कि कांग्रेस चुप है कोई शोर नहीं मचा रही है, उधर चौकन्नी  नज़र रखना ज़रूरी है। राजकोट की इस रैली में प्रधानमंत्री की टोपी का रंग केसरिया से ज़्यादा लाल दिखाई दे रहा था और उन्होंने जयप्रकाश नारायण को याद करते हुए कहा कि मुझे उनके चरण छूने का सौभाग्य मिला है। जयप्रकाश नारायण भ्रष्टाचार मुक्त भारत की बात करते थे और उनके चरण छूना यानी लोहे के चने चबाने जैसा काम है। जो काम वे अधूरा छोड़ गए उसे पूरा करने का काम हमने उठाया और दिल्ली में  हम जैसे ही कुछ करते हैं खलबली मच जाती है और एक भीड़ इकट्ठी हो जाती है,भारत सरकार की संस्थाओं को बदनाम करती है,अरे भाई पहले उसका जवाब तो दो जो आपने देश से लूटा है । गौरतलब है कि गुजरात चुनाव में प्रधानमंत्री कांग्रेस को छुपा हुआ हमलावर  बता रहे हैं और खुद पूरी तरह हमलावर हो रहे हैं। गुजराती फिल्म 'छेल्लो शो' भारत की ओर से ऑस्कर के लिए आधिकारिक एंट्री है और भाजपा कतई नहीं चाहेगी कि यह गुजरात में उनका छेल्लो शो हो। गुजराती भाषा में  छेल्लो यानी आख़िरी। यह छेल्लो हुआ तो 2024 की लड़ाई पूरी तरह बिखर जाएगी। 

दिल्ली में भाजपा के ही एक सांसद प्रवेश वर्मा ने फिर नफ़रत भरे बयान का वमन कर दिया है। एक पार्टी जिसके बड़े नेता और संघ मेल-जोल की बात कह रहे हैं लेकिन बीच-बीच में अन्य नेता ऐसी चिंगारी सुलगा देते हैं जिससे ऐसा लगता है कि यह भी रणनीति के तहत हो रहा है। हम पानी के छीटें डालेंगे तुम आग लगाते जाना अन्यथा कैसे यह बयान आता है -"जहां जहां ये आपको दिखाई दें, मैं कहता हूं  अगर इनका दिमाग ठीक करना है तो एक ही इलाज है, वह है  सम्पूर्ण बहिष्कार। आप इस बात से सहमत हों तो मेरे साथ बोलो हम इनका  सम्पूर्ण बहिष्कार करेंगे, हम इनकी दुकान, रेड़ियों  से कोई सामान नहीं खरीदेंगे, हम इनको मजदूरी नहीं देंगे। "सांसद ने भी यह बयान दिल्ली के दिलशाद गार्डन में मनीष नामक युवक की हत्या के ख़िलाफ़ आयोजित एक सभा में दिया था। पुलिस का आरोप है कि हत्या जिन युवकों ने की है वे अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। बेशक गुस्सा जायज़ है लेकिन गुस्से के बदले में दो समुदायों को भड़काना भारतीय दंड विधान के तहत अपराध है। मामला दर्ज़ हुआ है लेकिन आयोजक विश्व हिन्दू परिषद के ख़िलाफ़, सांसद पर नहीं। अनुराग ठाकुर पर भी नहीं हुआ था जब उन्होंने 'देश के गद्दारों को...'नारे को गुंजाया था।  नुपूर शर्मा की  नफ़रती भाषा ने भले ही  सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुसीबत में पड़ी हो, अपने नेताओं को 'फ्रिंज एलिमेंट' कहना पड़ा हो, लेकिन गिरफ़्तारी किसी की भी नहीं हुई। नफ़रत की भाषा जारी है। साफ़ है कि बाहर माफ़ी की मुद्रा मजबूरी है और भीतर इन्हें पार्टी की शह है अन्यथा किसी नेता की हिम्मत नहीं कि वह पार्टीलाइन के ख़िलाफ़ जा सके।  

सच तो यह है कि जनता इस खेल से ऊब चुकी है। इस खेल से ऊबकर जो वह  खेलों की दुनिया से ऊर्जा हासिल करना चाहे तो वहां भी सियासत दिखाई देती है। सौरव गांगुली को पटखनी दी जा चुकी है और रोजर बिन्नी बीसीसीआई के नए अध्यक्ष बन चुके हैं। नेताओं के बेटों का कार्यकाल जारी रहेगा, दादा का ख़त्म। शायद यह पार्टी से दूरी का ही परिणाम है। सबके कयास थे कि बंगाल चुनाव से पहले जो महाभोज बेंगाल टाइगर ने अमित शाह के साथ किया था, उसके बाद वे भाजपा  में शामिल हो जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दादा ही अस्पताल में भी दाखिल रहे और भाजपा को मिथुन दा से काम चलाना पड़ा। अमिता शाह के बेटे जय के सचिव बने रहने के साथ यह देखना दिलचस्प होगा कि 1983 के विश्व कप हीरो रोजर बिन्नी रबर स्टाम्प तो नहीं बनते।