मंगलवार, 11 मई 2021

जो मंटो आज होते इस कोविड 'काल' में क्या लिखते

 बेहतरीन कहानीकार सआदत हसन 'मंटो ' आज जो ज़िंदा होते 110 साल के होते।आज उनका जन्मदिन है।  बंटवारे पर लिखे उनके अफ़साने इंसानी हृदय को चीर कर रख देते हैं ,मनुष्य को ऐसा आईना दिखाते हैं कि फिर वह आंख नीची करने पर मजबूर हो जाता है। उनकी कहानियां टोबाटेक सिंह ,खोल दो, ठंडा गोश्त,काली शलवार  आम इंसान के जजबात को झिंझोड़  कर रख देती है तो सियासत और दुनिया पर राज करते रहने का सपना देखने वालों का खूनी पंजा भी दिखाती हैं। सवाल ये उठता है कि आज जब अस्पताल बेबस और सियासत अपने राज को कायम रखने के लिए सारी हदें पर कर रही हो तब मंटो क्या लिखते। क्या लिखते वे जब इंसान को एक कुत्ते की तरह सड़क पर फैला दूध चाटते देखते ?  बीमार को एक-एक सांस के लिए यूं  गिड़गिड़ाते हुए देखते? पार्थिव देव को अंतिम संसार के लिए कतार में देखते ? एक गरीब की ज़िन्दगी जो लॉकडाउन ने महामारी से पहले ही घोंट दी है इस समय बीसवीं सदी का यह लेखक इक्कीसवीं सदी में क्या लिखता ? 
शायद वह लिखता कि व्यवस्था आज खुद की नाकामी को छिपाने के लिए लोगों को घर के भीतर कैद कर चुकी है ,उसके पास अस्पताल नहीं है इसलिए उसने तालाबंदी का सस्ता रास्ता चुना ,उसके पास महामारी की  वैक्सीन होकर भी नहीं है इसलिए उसने लोगों को घर की दीवारों में चुनवाना बेहतर समझा। क्या भूखे इंसान की चार दीवारें उसे अनाज देंगी ? गरीब जब भूख से जूझ रहा होगा तो वह बाहर निकलना चाहेगा लेकिन यह व्यवस्था इसकी खौफनाक तालाबंदी उसे फिर भीतर धकेल देगी। यह सन्नाटा और भूख उसे जीते जी तबाह कर देगी। निज़ाम को यह भ्रम कैसे है कि चूल्हों में आग अपने आप लगती है और रोटी की फसल घर के भीतर लहलहाती है। सिस्टम औंधा पड़ा है ,उसकी जनता अस्पताल से गुहार लगा रही है कि हम मर रहे हैं हमारी सुध लो। उफ़ मंटो शब्द रीत जाते हैं आपकी युगांतरकारी कलम का कोई सानी नहीं ,वो दृष्टि नहीं जो इस दोजख के दर्द को कह सके। 
दरअसल रविशंकर बल के एक बेहतरीन बांग्ला उपन्यास दोज़ख़नामा में एक प्रयास हुआ है मंटो को ज़िंदा रखने का। रविशंकर बल का चार  साल पहले देहांत हो गया। हिंदी अनुवादक अमृता बेरा ने भाषा का प्रवाह कायम रखा है । दो नामचीन हस्तियों की मुलाकात का दस्तावेज है बल का उपन्यास दोज़खनामा। उन्नीसवीं सदी के महान शायर मिर्जा असदउल्ला बेग खां गालिब(1797-1869) और बीसवीं सदी के अफसानानिगार सआदत हसन मंटो (1912-1955 )की कब्र में हुई मुलाकात से जो अपने-अपने समय का खाका पेश होता है वही दोख़नामा है। गालिब अपने किस्से कहते हैं कि कैसे मैं आगरा से शाहजहानाबाद यानी दिल्ली में दाखिल हुआ जो खुद अपने अंत का मातम मनाने के करीब होती जा रही थी। बहादुरशााह जफर तख्त संभाल चुके थे और अंग्रेज आवाम का खून चूसने पर आमादा थे। 1857 की विफल क्रांति ने गालिब को तोड़ दिया था और उनके इश्क की अकाल मौत ने उन्हें तन्हाई के साथ-साथ कर्ज के भी महासागर में धकेल दिया था। सरकार जो पेंशन उनके वालिद के नाम पर दिया करती थी वह भी मिलनी बंद हो गई। ये सब सिलसिलावार किस्से मंटो के साथ जब गालिब साझा करते हैं तो मंटो भी हिंदुस्तान में जिए हुए किस्सों और पाकिस्तान से मिली निराशा को लफ्ज़ देते हैं। 
यूं तो मंटो के बारे में कहने को इतना कुछ है कि मंटो पढ़ाई-लिखाई में कुछ ख़ास नहीं थे कि मंटो कॉलेज में उर्दू में ही फ़ेल हो गए थे कि शायर फैज़ अहमद फैज़ मंटो से केवल एक साल बड़े थे कि उन्हें भी चेखोव कि तरह टीबी था कि वे बेहद निडर थे कि उनकी कई कहानियों पर अश्लीलता के मुक़दमे चले कि बटवारे के बाद वे  पकिस्तान चले गए कि उन्होंने दंगों की त्रासदी को भीतर तक उतारा कि वे मित्रों को लिखा करते कि यार मुझे वापस बुला लो कि उन्होंने ख़ुदकुशी की नाकाम कोशिश  की और ये भी कि वे बहुत कम [43] उम्र जी पाए गोया कि  चिंतन और जीवन का कोई रिश्ता हो। उनके बारे में पढ़ते-लिखते दिल दहल जाता है और उनकी कहानियां पढ़ते हुए  और ज्यादा। बेशक मंटो का फिर पैदा होना मुश्किल है।हमारा नसीब कि उनका लिखा अभी मिटा नहीं है। 


एक अर्थ में मंटो सव्यसाची थे हास्य व्यंग्य पर उनका बराबर का अधिकार था।बंटवारे से पहले उन्होंने मुंबई में बतौर फिल्म लेखक भी जिंदगी का जायका लिया। उन्हें समझने के लिए उन्हीं से जुड़ा  एक सच। 
मुग़ल ए आज़म से प्रसिद्धि पानेवाले के. आसिफ उन दिनों नए-नए डिरेक्टर थे और फूल नाम कि फिल्म बना रहे थे।  इसी काम के लिए वे एक  दिन मंटो के घर गए. मंटो से कहा कि कहानी सुनाने आया हूं  । मंटो ने मजाक किया -'तुम्हें पता है  कहानी सुनने  की भी फीस लेता हूं। ' यह सुनकर आसिफ उलटे पैर लौट गए।  मंटो मानाने के लिए दौड़े लेकिन आसिफ तब तक जा चुके थे। मंटो को बड़ा पछतावा हुआ। कुछ दिन बाद एक आदमी लिफाफा लेकर मंटो के घर आया ।मंटो ने लिफाफा खोला तो उसमें सौ-सौ के पांच नोट थे और एक चिट्ठी भी- 'फीस भेजी है कल आ रहा हूँ'   मंटो स्तब्ध रह गए उन दिनों कहानी लिखने के ही उन्हें बमुश्किल तीस पैैंतीस रुपए मिला करते  थे और फिर कहानी वह भी किसी और की लिखी हुई को सिर्फ सुनने का पांच सौ रुपए । दूसरे दिन सुबह नौ बजे आसिफ उनके घर पहुंचे। 'डॉक्टर साहब फीस मिल गयी न ? मंटो शर्मिंदा महसूस करने लगे।  पल भर सोचा  कि रुपए वापस कर दूं, तभी आसिफ बोले यह पैसा मेरे या मेरे पिता का नहीं है प्रोड्यूसर का है।  मेरी यह भूल थी कि आपकी फीस के बारे में सोचे बगैर ही आपके पास आ गया। चलिए कहानी सुनने के लिए तैयार हो जाइए।  किसी और की लिखी कहानी सुनाने के बाद आसिफ ने पूछा-'कैसी है ?' 'बकवास है', मंटो ने जोर देकर कहा. 'क्या कहा?' अपने होंठ काटते हुए आसिफ ने कहा।  मंटो ने फिर कहा बकवास। आसिफ ने उन्हें समझाने का का प्रयास किया। मंटो ने कहा - 'देखिये आसिफ साहब, आप एक बड़ा वज़नदार पत्थर लाकर भी मेरे सर पर रख दो फिर ऊपर बड़ा हथौड़ा मारो तब भी यही कहूँगा कि यह कहानी बेकार है। आसिफ ने मंटो का हाथ चूमते हुए कहा सचमुच ही बकवास है आपके पास यही सुनने आया था।  आसिफ ने उस कहानी पर फिल्म बनाने का इरादा छोड़ दिया। मंटो कि साफगोई पर आसिफ फ़िदा हो गए थे वर्ना 500  रुपये में इतनी ताकत है कि वह कचरा कहानी को भी बेमिसाल कहला सके। 
happy birthday मंटो साहब !!




मंटो के बारे में कहने को इतना कुछ है कि मंटो पढ़ाई-लिखाई में कुछ ख़ास नहीं थे कि मंटो कॉलेज में उर्दू में ही फ़ेल हो गए थे कि शायर फैज़ अहमद फैज़ मंटो से केवल एक साल बड़े थे कि उन्हें भी चेखोव कि तरह टीबी था कि वे बेहद निडर थे कि उनकी कई कहानियों पर अश्लीलता के मुक़दमे चले कि बटवारे के बाद वे  पकिस्तान चले गए कि उन्होंने दंगों की त्रासदी को भीतर तक उतारा कि वे मित्रों को लिखा करते कि यार मुझे वापस बुला लो कि उन्होंने ख़ुदकुशी की नाकाम कोशिश  की और ये भी कि वे बहुत कम [४३] उम्र जी पाए गोया कि  चिंतन और जीवन का कोई रिश्ता हो . उफ़... उनके बारे में पढ़ते-लिखते दिल दहल जाता है






रविवार, 9 मई 2021

यह पेंडेमिक नहीं इन्फोडेमिक है

 यह पेंडेमिक नहीं इन्फोडेमिक है। यह  ज़्यादा नुकसान कर रहा है। महामारी को सूचनामारी क्यों बनाया जा रहा है ?

हम संकट से विध्वंस की ओर कूच कर गए हैं। ऐसा कोविड -19 की वजह से हो रहा है। क्या सचमुच इस विध्वंस का सारा दोष इस वायरस पर ही मढ़ दिया जाना चाहिए ? अगर जो यह कोढ़ है तो सूचना तंत्र की बाढ़ और अव्यवस्था ने इसमें खाज का काम नहीं  किया है? खौफ ऐसा है कि कोविड जान ले इससे पहले हम फंदों पर झूल रहे हैं ,पटरियों पर लेट रहे हैं ,छत से कूद रहे हैं। अपनों को ख़त्म भी कर रहे हैं। बीते रविवार को राजस्थान के कोटा जिले में दादा-दादी इसलिए ट्रैन के नीचे आ गए क्योंकि उन्हें डर था कि उनका पोता भी कोरोना संक्रमित न हो जाए। उनकी रिपोर्ट कोरोना पॉजेटिव आई थी। दोनों ने अपने पोते को बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। इस वायरस का व्यवहार देखा जाए तो तथ्य यही है कि यह बच्चों को कम प्रभावित करता है और जो बच्चे संक्रमित हो भी जाएं तो यह उनके लिए जानलेवा नहीं है। कोरोना के  डर और व्यवस्था से  उपजी निराशा ने लोगों को कोरोना से पहले ही अपनी जान लेने पर मजबूर कर दिया है। सोचकर ही रूह कांपती है कि महामारी से पहले ही हम हार रहे हैं। सोमवार को रेवाड़ी में एक रिटायर्ड एसडीओ ने छत से कूदकर जान दे दी। कोरोना पोजेटिव आने के बाद उन्हें रेवाड़ी के ही अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड  में रखा गया था।  वायरस से भय और निराशा का यह वायरल विडिओ जाने कितने लोगों में दहशत भर रहा है।इससे पहले एक युवक ने पहले पत्नी, बच्चे और फिर खुद  का जीवन समाप्त कर लिया क्योंकि पत्नी ब्याह में मायके जाना चाहती थी।  यह खौफ कोरोना से ज्यादा तेजी से फ़ैल रहा है इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे इन्फोडेमिक भी कहा है। 

इन्फोडेमिक पर चर्चा से पहले यहां यह बताना ज़रूरी है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री लगातार जनता से संवाद तो कर रहे हैं लेकिन इस बार यानी दूसरी लहर में जनता ने उनकी निराशा को भी पढ़ा  है। वे कहते हैं कि इस बार 80 फीसदी को ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ रही है पिछली बार 20 को पड़ रही थी ,आज लगभग डेढ़ सौ मौतें प्रतिदिन हो रही हैं, पिछली बार यह संख्या  पूरे साल शून्य से बीस ही थी। वे यह भी कहते हैं कि हालात हृदय विदारक हैं ,जीवन रक्षक दवाइयां और ऑक्सीजन की कमी पड़ रही है जिसका कि प्रबंधन केंद्र सरकार द्वारा  किया जाता है। हमें गृहमंत्री से ऑक्सीजन की मांग फोन पर करनी पड़ती है। उधर निजी अस्पताल साफ़ कह रहे हैं कि ऑक्सीजन लाइये हम भर्ती कर लेंगे। ऑक्सीजन व्यवस्था इस कदर हांफ रही है कि अलवर के एक अस्पताल ने गेट पर ही बोर्ड लटका दिया कि प्रशासन की तरफ से ऑक्सीजन सप्लाई में निरंतर हो रही कमी के कारण हमारा अस्पताल कोविड -19 के मरीजों का इलाज नहीं कर पा रहा  है। 

अव्यवस्था,अभाव और भय ने नागरिकों को जीते जी मार दिया है। कोई कह रहा है ऑक्सीजन नापते रहो ,कोई स्टीम लेने की बात करता है तो कोई पेट  के बल लेट कर ऑक्सीजन बढ़ाने की ,कोई काढ़ा पीने की. कोई कहता है केवल पैरासिटोमोल और विटामिन से ही दुरुस्त  हो जाओगे। कोई कहता है रेमडेसवीर प्रभावी है, कोई कहता है यह WHO से स्वीकृत ही नहीं है।कोई कहता है वैक्सीन जरूरी है कोई कहता है रक्त का  थक्का  जमा देती है।  महामारी को सूचनामारी क्यों बनाना? महामारी के बीच सूचना की ऐसी महामारी मानव सेहत  के साथ न केवल अभूतपूर्व है बल्कि खिलवाड़ है,जानलेवा है। शायद यही कारण है कि  WHO ने इसे  इन्फोडेमिक भी कहा है। यह शब्द इंफोर्मेशन और पंडेमिक से मिलकर बना है।  इन्फोडेमिक यानी ऐसी भ्रामक सूचनाओं का प्रचार प्रसार जो उसके सुलझने से पहले ही हालात को और गंभीर और भयावह बना देता  है। इससे इतना ज्यादा कंफ्यूजन और खुद को खतरे में डालने वाला व्यवहार बढ़ रहा जो सेहत पर खराब असर  डाल रहा  है। अफवाह और डर जंगल की आग से भी तेज फ़ैल रहे हैं। कोरोना के सन्दर्भ में सोशल मीडिया और इंटरनेट के जरिये यही हो रहा है । तो फिर क्या हो ?

विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO ने इससे लड़ने के लिए इन्फोडेमिक मैनेजमेंट की स्थापना की है  जिसका मकसद इस आपात स्थिति में सही जानकारी देना है। पहला लोगों की तकलीफ और उनके सवालों को सुनना।दूसरा  खतरनाक व्यवहार  का अध्ययन  और विशषज्ञों की बात  का प्रचार।तीसरा गलत सूचना से मुक्ति दिलाना और चौथा कम्युनिटीज को सकारात्मक प्रभाव देने  के लिए तैयार करना। इन्फोडेमिक मैनेजमेंट कारगर होने में वक्त लग  सकता है तब तक  हमारा फर्ज यही हो कि बीमारी से भी और उससे  पहले भी कोई न मरे। अफसोस मौत  बीमारी से पहले आ रही है जबकि 85 फीसदी मरीज सामान्य इलाज से ठीक हो रहे हैं। इस दुष्प्रचार को समझिये ,कमज़ोर मत पड़िए।संकट से समाधान की ओर चलिए विध्वंस की ओर नहीं।  कफ़स को उदास मत होने दीजिये,मौसम का कारोबार पहले की तरह चलने दीजिये।  फैज अहमद फैज का शेर है  

कफ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो 

कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले। 

मंगलवार, 4 मई 2021

ये जो सिस्टम है

 सात साल पहले भारत वर्ष की पवित्र संसद की देहरी पर जब उस लोकप्रिय शख्स ने शीश नवाया था तो लगा था ,देश को उसका नेता मिल  गया है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक समान और संवेदनशील निगाह रखेगा। अतीत के कुछ संदेह थे भी तो भोले-भाले मतदाताओं ने ताक पर रख दिए और आस भरी नज़र से






















 नेता की ओर देखने लगे। फिर देश ने देखा मॉब लिंचिंग यानी भीड़ जब घेरकर किसी को मार दे तो व्यवस्था का मौन ,नागरिकता कानून के खिलाफ जब महिलाएं शाहीन बाग़ में विरोध प्रकट करें तो व्यवस्था ने संवेदना की बजाय उन्हें खदेड़ने में दिलचस्पी ,यहां तक की व्यवस्था ने राजधानी के एक हिस्से को दंगे की भेंट चढ़ जाने का मंज़र भी आँख मूंद कर  देखा। किसानों ने सिस्टम से खेती कानून पर फिर विचार करने की गुहार लगाई वह तब भी मौन साध गया। 

   कोरोना महामारी के पहले दौर के बाद जब सिस्टम अपनी पीठ  रहा था, देश ने वह भी देखा।  यह समय से पहले आया पार्टी का जयघोष था।   'भारत ने न केवल प्रधानमंत्री  के नेतृत्व में कोविड को हरा दिया है बल्कि अपने सभी नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाने के प्रति विश्वास से भी भर दिया है। पार्टी कोविड के खिलाफ जंग के मामले में भारत को दुनिया के सामने एक गौरवशाली और विजेता देश रूप में पेश करने के लिए निर्विवाद  रूप से अपने नेतृत्व को सलाम करती है। ' क्या यह दूसरी लहर के प्रति अनभिग्यता थी यां हर बार उत्सव मानाने में हुई जल्दबाजी ?यह अनभिग्यता तो खतरनाक है ,अवैज्ञानिक है ,दूसरे देशों से भी सबक न लेने की एक बुरे अंत वाली कहानी है। नहीं भूलना है कि कोविड से हुई हर मृत्यु अपने प्रिय के अंत की कहानी है। 

 व्यवस्था के चौपट होनेका आलम तो यह है कि छोटा सा पड़ोसी देश पाकिस्तान भी मदद पेश करने लगे। इस पेशकश में  कोई बुराई नहीं लेकिन साधनहीन भी आपके सामने साधन संपन्न लगने लगे यह शर्म से माथा झुका देने वाली बात है।  बेशक शेष दुनिया भी मदद का भाव रख रही है लेकिन विदेशी मीडिया हमें बख्श नहीं रहा है। देश की आपात स्थिति पर निरुत्तर कर देने वाले शब्द और व्यंग्य मीडिया में बिखरे पड़े हैं। ऑस्ट्रेलिया के मशहूर कार्टूनिस्ट ने डेविड रो ने प्रधानमंत्री की शाही सवारी को एक मरे हुए हाथी पर दिखया है। यह समय उन्हें विदेशी ताकतों की कुदृष्टि कहने का भी नहीं है जैसा सिस्टम ने पर्यवरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग  और दिशा रवि के समय किया था। यह समय अपने गिरेबान में झांकने का है कि क्यों केंद्र जो ऑक्सीजन और वैक्सीन आपूर्ति के लिए ज़िम्मेदार है वह जरूरत  नहीं पूरी कर पा  रहा है। वैक्सीन के अलग अलग दाम की बात ही तकलीफदेय  लगती है। जब देश की अवाम इस वायरस से अपने प्राण हार रही है सिस्टम उसे प्राणवायु नहीं दे पा रहा है । वैक्सीन को लेकर यह कितना अजीब है कि निर्माता केवल दो हैं लेकिन  देश के तमाम मुख्यमंत्री इनसे अलग -अलग भावताव करेंगे। एक दाम होने पर क्या वैक्सीन के उत्पादन में तेज़ी लाते हुए काम नहीं होना था ? अच्छी बात ये हुई है कि सिरम इंस्टीट्यूट क अदार पूनावाला के अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन को ट्वीट करने के बाद वैक्सीन से जुड़ा कच्चा माल मिलने की राह आसान हुई है। 

क्या यह केंद्रीय सिस्टम का फर्ज नहीं था कि पूरे देश को वैक्सीनेट किया जाए। वैक्सीन अभियान को विकेन्द्रित करना है उसकी खरीद को नहीं। आपक कितने में  खरीद रहे कितने में नहीं उससे देश की जनता को क्या लेना-देना। क्या अवाम के रखवाले इस तरह पैसा  दिखा दिखा के खर्च करेंगे ,एहसान जताते हुए। वे पिता की तरह क्यों नहीं हो सकते ?देश क्यों फिर अब भी उन्हें माई -बाप माने बैठा है ?राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वैक्सीन खरीदने और जनता को फ्री देने का का अच्छा ऐलान किया साथ ही यह भी कह दिया कि इसके बाद राज्य की कल्याणकारी योजनाओं पर असर पड़ेगा। दिल्ली के सीएम ने भी कहा है कि एक देश में एक दाम क्यों नहीं ?बेशक यह महामारी का समय है हर जान कीमती है जो टीकाकरण के बाद खुद तो सुरक्षित रहेगी ही इस जानलेवा वायरस को फैलने से भी रोकेगी। यह राष्ट्रहित का मसला है। राज्यों की सरहदों में तो हम बंधे बैठे वायरस सर्वव्यापी है। सरहद विहीन। रौंद रहा है देश को। हमें एक होना है हर हाल में हर सरहद, हर मजहब ,हर दल से मुक्त एक भारत जिसका राष्ट्रीय नारा हो किल कोविड।