शुक्रवार, 17 जून 2022

सरकार का आग से खेलने वाला पथ अग्निपथ

बुलेट ट्रैन के सपनों को जीते-जीते हम बुलडोज़र और अब अग्निवीर की  बुलेट ट्रेनिंग के पहले ही निशाने पर आ गए हैं। सरकार इसे नौकरी कह रही है लेकिन युवा को ऐसा नहीं लग रहा ।वह सड़क पर है आंदोलित है उद्वेलित है।  सरकार उस युवा को सेना में चार साल के लिए नौकरी देने की बात कर रही है  जो चार साल से कड़ी मेहनत सेना में भर्ती के लिए कर रहा था । कुछ तो इस अवधि में आयु सीमा भी पार कर चुके। तीनों सेनाओं के लिए छियालीस  हज़ार युवाओं  की भर्ती होगी जिनकी उम्र अठारह से इक्कीस साल होगी। पहले साल तीस हज़ार ,  दूसरे साल 33  तीसरे साल  36हजार पांच सो और चौथे साल 40 हज़ार रुपए दिए जाएंगे कुल लगभग ग्यारह  लाख सेवा के अंत में  इन सैनिकों  को मिलेंगे । कोई पेंशन नहीं कोई स्वास्थ्य सुविधा नहीं। अब भर्ती रैलियां भी नहीं होगी। तर्क ये कि बूढी सेना अब  जवान होगी लेकिन  वे जज़्बात जो मृत्यु से यारी के होते हैं प्रतिबद्धता के होते है, देश पर मर मिटने के होते हैं वे कहां से आएंगे? चार साल की तो डिग्री होती है और उसके बाद फिर इंटर्नशिप भी। चार साल बाद भी ये युवा तो  युवा ही रहेंगे। वे फिर बेरोज़गार की कतार में शामिल नहीं हो जाएंगे  ? आगे की नौकरी और लाभ इनमें से चुनिंदा पचीस फीसदी को मिलेंगे तब शेष फिर किन्हीं बड़े कॉर्पोरेट घरानो को  छोटी-छोटी  पगारों  पर सौंप दिए  जाएंगे  ? कुछ को पुलिस और  अर्द्धसैनिक बलों में शामिल कर भी लिया जाए  तब भी क्या ये दोनों सेवाएं प्रशिक्षण के एक ही पैमाने से होकर गुजरती हैं? अच्छे नतीजों की कल्पना कर भी ले  जाए तो क्या ये हो सकता है कि ये वाली पुलिस आरोपी को थाने में  कूटेगी  नहीं और खुद ही न्यायाधीश बनकर आरोपियों के (नहीं आरोपी की बीवी के) घर पर बुलडोज़र नहीं चलवाएगी। 

फिलहाल इन सबके  जवाब देश के युवाओं की आँखों से पढ़े जा सकते हैं।  वे  हताशा और गुस्से में है। राजस्थान ,बिहार, हरियाणा ,उत्तरप्रदेश,हिमाचल और मध्यप्रदेश का युवा सड़कों पर है। वह छला हुआ महसूस कर रहा है। दरअसल यह पूरी कवायद एक चतुर वणिक के सीईओ की मालूम होती है जिस पर कर्मचारियों की छटनी का दबाव हो  और वह एक ऐसी धांसू स्कीम मालिक के सामने रख देता है जिसमें नए कर्मचारी ठेके पर हों वह भी  बहुत कम समय के लिए हो। मालिक का आर्थिक भंडार बचने लगता है और कर्मचारी का संघर्ष बढ़ने।  दूसरे लफ़्ज़ों में कहें तो 'धंधा नी वात' है ये लेकिन कल्याणकारी राष्ट्र ऐसी  बुद्धि पर नहीं चलते । सामाजिक ताना बाना भी यूं नहीं चलता।

 वीर भूमि राजस्थान की धरा से लाखों सिपाही सेना में हैं। शांतिकाल में भी उनकी देह के गांवों में आने का सिलसिला बना रहता है। युद्ध के समय तो गिनती बहुत मुश्किल हो जाती है। वीर माताएं गांवों में शहीद की मूर्तियों और बहादुरी की गाथाएं सुना सुना कर बच्चों को बड़ा करती हैं तब कहीं जाकर मिलते हैं सेना को देश पर जान न्योछावर करनेवाले सपूत । सरकार में शामिल इसी सेना के मेजर कह रहे हैं कि देश की सेना बूढ़ी हो रही थी अब जवान होगी। 33 वर्ष की औसत आयु वाली इसी सेना ने देश पर कुर्बान करने वाले सैनिक दिए हैं जो कई मोर्चों पर कामयाब रहे हैं । मेजर जनरल डॉ यश मोर ने तो अपने ट्वीट में साफ कहा है   कि अब इस पर प्रतिक्रियाओं की बौछार होगी और फिर बदलाव। इस शानदार स्कीम को तुरंत प्रभाव से रोक दिया जाना चाहिए और पहले की तरह भर्ती की जानी  चाहिये। प्रतिरोध का नतीजा तुरंत मिला और अब फैरबदल  करते हुए अग्निपथ स्कीम की आयु सीमा साढ़े सत्रह से 21 की बजाय  23 कर दी गई है। 

हरियाणा के रोहतक जिले में सचिन नाम के एक युवा ने जन दे दी है । वह अपने गांव से आकर पीजी में रहकर सेना में भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रहा था ।दो साल पहले कोरोना की वजह से भर्ती टल रही थी और अब इस अग्निपथ योजना ने उसके सारे सपनो को आग के हवाले कर दिया। सरकार ने आयुसीमा में ढील की घोषणा अब की है लेकिन तब तक सचिन मौत को गले लगा चुका था।रोहतक में विरोध प्रदर्शन बढ़ गया है और किसान आंदोलन से जुड़े नेता भी इसमें शामिल हैं। फिलहाल यहां न जय जवान हैं और न जय किसान।हर साल एक करोड़ युवा इस परीक्षा की तैयारी करते हैं।ज्यादातर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं।इस वर्ग में निराशा है जिसका संज्ञान सरकार को लेना जरूरी है। 

ऐसा क्यों है कि बड़ी और देश की सुरक्षा और आत्मसम्मान से जुडी भर्तियां भी किसी पैकेज की तरह साधी जा रही हैं ?हम इजराइल से प्रभावित रहते हैं लेकिन इतना पैसा तो बल्कि इससे भी ज्यादा तो चार साल की ट्रेनिंग में सिपाहियों को जेबखर्च बतौर दे दिया जाता है। सबसे बड़ी सेना दुनिया में चीन के पास है इकीस लाख अस्सी हज़ार की जबकि भारत की तकरीबन साढ़े चौदह लाख और लगभग एक लाख खाली पड़े हैं । चीन रक्षा बजट में एक सौ बाईस लाख करोड़ खर्च करता है और भारत खर्च करता है छह लाख करोड़। बजट की इस कमी की गाज भर्ती रैलियों पर ही गिरी मालूम होती है। एक कॉन्ट्रैक्ट को नौकरी का नाम युवाओं को आक्रोशित कर रहा है। अग्निपथ के अग्निवीर किसी अग्नि परीक्षा से ही गुजरेंगे। हरिवंश राय बच्चन की कविता इस माहौल पर भी मौजूं होगी सोचा नहीं था शायद यही श्रेष्ठ कवि होना है। अंतिम चार पंक्तियां देखिये। 

यह महान दृश्य है, 

चल रहा मनुष्य है ,

अश्रु स्वेद रक्त से, 

लथपथ लथपथ  लथपथ ,

अग्निपथ अग्निपथ  अग्निपथ। 

यही सब जनता ने नोटबंदी ,कोरोना के समय देशबंदी , सीएए और  किसान अंदोलन के दौरान भी देखा था। बीच बीच में कई बदलाव और जनता सड़कों पर। इस बार सेना में भर्ती के  इच्छुक युवा की बारी है और वह सड़कों पर है। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल पी के सहगल को चार साल की अग्निपथ योजना किसी इंटर्नशिप और ड्यूटी पर किसी टूर की तरह लगती है। वे कहते हैं यह जल्दबाज़ी में लाई गई है, इसमें रिस्क है।  मौजूदा सिस्टम में कोई खामी नहीं है और इसमें छेड़छाड़ की कोई ज़रुरत ही नहीं है। फिर सरकार को इस योजना को इतनी जल्दबाजी में लाने की क्या पड़ी थी ?राजस्थान के नागौर के सांसद हनुमान बेनीवाल न कांग्रेस के हैं न भाजपा के हां  प्रधानमंत्री से अपनी सहमति वक्त-वक्त पर जताते रहते हैं  लेकिन उनकी राष्ट्रीय  लोकतान्त्रिक पार्टी ने भी अग्निपथ योजना के विरोध में राजस्थान भर में प्रदर्शन कर रही है । उनका कहना है एक मुलाकात में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कोरोना की वजह से आयु में दो साल की छूट का वादा किया था ये लेकिन वे मुकर गए। देश की सरकार ने पहले किसानों को छला और अब जवानों को छल रही है। ज़रुरत पडी तो हम विरोध प्रदर्शन करने के लिए दिल्ली कूच  करेंगे। 

देखा जाए सरकार के लिए बीता पखवाड़ा बड़ा ही कठिन साबित हो रहा है। नूपुर शर्मा के हज़रत मोहम्मद पैगम्बर को लेकर बयान के बाद कई देशों के सख्त रवैये के बाद देश में ही लोग सड़कों पर थे। बुलडोज़र बाबा की सरकार ने प्रयागराज ने उस महिला के मकान को ही गिरा दिया जो आरोपी भी नहीं। पुलिस खुद ही आरोपी बना रही है, पोस्टर लगा रही है जेल में डाल रही है और फिर बुलडोज़र से मकान भी गिरा रही है। बदले की कार्रवाई नोटिस भी दिलाएगी इसी डर से से लोग मकान- दुकान  बेच रहे हैं। क्या कोई सरकार इसलिए चुनकर आती है कि नागरिक की नाक में दम करे। उसे रोज़गार और जीने के अधिकार से अलग कर दे। नूपुर शर्मा को दूसरा पैनेलिस्ट उकसाता है वे नफरती बयान दे डालती है, पार्टी निलंबित कर कहती है कि कार्रवाई कर तो दी अब और क्या करें ? आप तो दंगाई हैं। उकसाना शायद ऐसा ही होता है। हिंसा और बलप्रयोग दोनों ही गलत है इसके लिए उकसाने वाले राष्ट्रविरोधी हैं। आंदोलन शांतिपूर्ण हो यही महात्मा गांधी के देश की पहचान और सलीका रहा है। यहां डेमोक्रेसी है बुलडो क्रेसी नहीं। 





शुक्रवार, 13 मई 2022

जनता के खिलाफ द्रोह से डरो सरकारो

 कानून 124 A पर सरकार पुनर्विचार करे इससे पहले एक मजबूत विचार सुप्रीम कोर्ट ने रख दिया है।  अब इस कानून के तहत नए मामले दर्ज़ होना स्थगित रहेगा ,जो जेल में हैं वे ज़मानत के लिए अपील कर सकते हैं। वाकई एक बड़ा दिशा निर्देश उन पत्रकारों , कॉमेडियंस ,मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए जो सत्ताधारी दल के निशाने पर केवल इसलिए होते क्योंकि वे अपनी राय रख रहे होते  हैं। वे  तोते की तरह नहीं बोलते जो अपने आकाओं की खुशामद में अपना विवेक अपना ज़मीर ताक पर रखकर चलता है। 1860का यह कानून अंग्रेज़ी हुकूमत की देन था एक अंग्रेज इतिहासकार जिसे हम थॉमस मैकाले के नाम से जानते हैं। जिसकी शिक्षा प्रणाली को हम कोसते नहीं थकते उसी कानून को हम आज़ादी के अमृत महोत्सव तक खींच कर ले आए हैं सिर्फ इसलिए कि असहमत की आवाज़ दबा सकें, उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट ला सकें ,जेल में सड़ा सकें। महात्मा गांधी ,बाल गंगाधर तिलक ,भगतसिंह, सुखदेव ,जवाहर लाल नेहरू जैसे कई देशभक्त इस राजद्रोह कानून के तहत जेल में डाले  जा चुके हैं।  अब जब कानून मंत्री किरण रिजिजू लक्ष्मण रेखा याद दिला रहे हैं तो सरकार की मंशा पर भी संदेह झलकता दिखाई देता है। 

बेशक सुनवाई की अगली तारीख जुलाई 23 तय की गई है लेकिन पत्रकारों,मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सत्ता से अलग अपनी सियासी आवाज रखने वालों के लिए यह भरी गर्मी में राहत  की फुहार का वक्त है। तपती धूप में ठंडी छांव का आभास है।  पत्रकार विनोद दुआ , कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी , मानवाधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी, क्लाइमेट  कार्यकर्ता दिशा रवि पर राजद्रोह की यह धारा लगाई गई। विनोद दुआ और स्टेन स्वामी तो अब इस दुनिया में नहीं रहे।सत्ता कोई भी हो किसी भी राज्य की हो वह इस कानून के जरिए कई विस्सल ब्लोअर्स की सीटी बंद करने का काम करती आई  है ताकि उनकी सत्ता निरंकुश रहे। विनोद दुआ भाजपा की वजह से और असीम त्रिवेदी कांग्रेस कार्यकाल में सताए गए। विनोद दुआ यू ट्यूब पर एक शो करते थे जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की गई थी। उन पर हिमाचल प्रदेश के एक भाजपा नेता ने प्राथमिकी दर्ज की और राजद्रोह का मुकदमा कायम हुआ। कार्टूनिस्ट असीम ने यूपीए दो के कार्यकाल में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के तहत कार्टून अभियान चलाया था और फिर उनके खिलाफ राजद्रोह लगा दिया गया। दिशा रवि ने किसान आंदोलन के समय महज एक टूल किट शेयर की थी और दिल्ली पुलिस उन्हें बंगलौर से गिरफ्तार कर दिल्ली ले आई। किशोरचंद्र वांगखेम  मणिपुर के पत्रकार हैं उन्होंने मुख्यमंत्री बीरेन सिंह की आलोचना में एक वीडियो सोशल मीडिया पर डाला और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज  दिया गया, उनकी पत्नी दो बच्चों के साथ पति की जमानत के लिए भटकती रहीं।एक बार फिर  एक दूसरी पोस्ट जिसमें उन्होंने गाय के गोबर से कोरोना के इलाज  का मज़ाक उड़ाया था  , राष्ट्रिय सुरक्षा कानून के तहत जेल भेज दिया गया। सत्ता ऐसी आवाजों को कुंद करने के लिए 124 A का हमेशा दुरूपयोग करती आईं हैं जबकि 1962 के केदारनाथ केस के समय सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट कर चुका था कि जब तक हिंसा की आशंका ना हो तब तक इस धारा के तहत मुकदमा ना हो। इस लिहाज से राणा दंपति की बातों से इस बात की आशंका स्टेट को हो सकती है फिर भी महाराष्ट्र सरकार के राजद्रोह लगाने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। 

इस कानून का इस्तेमाल हमेशा अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए सरकारें करती रही हैं और आकाओं  के अंधभक्त अपने अंक बढ़वाने के लिए। आरोपी दरअसल यहां पीड़ित होता है ,मीडिया में उसके खिलाफ हैडलाइन बन जाती है, जमानत नहीं हो पाती और ट्रायल सालों साल चलती है।  कोई अपराध सिद्ध नहीं हो पाता। ऐसा इसलिए क्योंकि अपराध साबित होने की दर दो  फीसदी भी नहीं है। 2018 में 70 मामलों में से एक भी नहीं,2019 में 93 में से दो और 2020 में 73  में से  केवल एक मामले में अपराध साबित हुआ। जाहिर है यह धारा केवल उत्पीड़न का एक हथियार भर है। रिटायर्ड आईपीएस विजयशंकर सिंह साफ़ कहते हैं कि राजद्रोह हो या राष्ट्रिय सुरक्षा कानून इसमें कुछ मामले ऐसे भी होते हैं जो केवल राजनैतिक संकेतों के आधार पर कायम किए जाते हैं। हमें अच्छी तरह से पता होता है कि ये अदालत में टिक नहीं पाएंगे। उस समय तो यही होता है कि चार्जेस लगाओ, देखा जाएगा। दिक्कत ये भी है कि पुलिस का  न्यायायिक दिमाग दक्ष नहीं होता और न ही इस दिशा में कोई प्रयास होते हैं ये बीमारी ब्रिटिश काल से है ,अफसर भी इस बात को जानते हैं लेकिन अफसर भी तो वही होता है जो सत्ता को पसंद होता है तो निष्पक्ष सरकार का होना जरूरी है। 

सरकार  की निष्पक्षता का तो ये हाल है कि उसे तो मसखरे भी  बर्दाश्त नहीं होते। कॉमेडियंस वीर दास ,मुनव्वर फारुकी , कुणाल कामरा ,श्याम रंगीला का व्यंग्य ही सरकारों को बाण की तरह चुभता है। मुनव्वर को दो महीने तक मध्यप्रदेश सरकार ने जेल में रखा। वह  इंदौर में शो से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया। क्या करता है एक पत्रकार और व्यंग्यकार लिखता बोलता ही तो है। ऐसा करने पर ही सत्ता उसे अपराधी मानने लगती है। वह लिखेगा बोलेगा नहीं तो क्या करेगा। आपका काम नेतागिरी है तो उसका लिखना। वह कैसे अपना काम करे। प्रजातंत्र में इस पाए का मज़बूत होना बहुत जरूरी है और सुप्रीम कोर्ट के इस कानून के स्थगन से इस बिरादरी की बाकायदा सुध ली गई है। आशंका होती है जब कानून मंत्री कहते हैं कि एक लक्ष्मण रेखा होती है जिसका सभी को ध्यान रखना चाहिए लेकिन क्या कानून मंत्री ने इस बात में लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखा है जब वे कहते हैं कि  प्रधामंत्री की इच्छा से कोर्ट को अवगत करा दिया गया है?


 



मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

खबर और मनोहर कहानियां का फर्क मिटा दिया इस दौर ने

जेएनयू में अब वेज v/ s नॉनवेज हो गया। रामनवमी पर मांसाहार नहीं परोसना तय किया गया। दूसरा पक्ष भिड़ गया कि दिखाओ कहां कोई लिखित आदेश है। अब ऐसे तमाम मसलो के कहां कोई आदेश-वादेश होते हैं। रामनवमी थी। आराध्य  का दिन था ,इससे बड़ा क्या कोई मौका होता विवाद पैदा करने के लिए। वे लड़ लिए। नए नवेलों की राजनीति चमक गई, उनके बुजुर्ग नेताओं ने भी देख लिया और अख़बार टीवी की कृपा दृष्टि भी हो गई। ये  ऐसे ही चटपटे मसालों की तलाश में रहते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि ये चटपटे मसाले पुराने हो गए हैं। जाले पड़ गए हैं इनमें,बांस रहे हैं बांसी सामग्रियों के साथ। घिन आती है ऐसे मुद्दों पर और ऐसी सियासत पर। मत खाओ एक दिन। शोर नहीं मचाओगे तो वे भी क्या  कर लेंगे। तुम शोर मचाते जाते हो, वे मामले ढूंढ के लाते जाते है। सब मौजूद है हमारे देश में । वेज -नॉनवेज,पर्दा बेपर्दगी , मूर्त-अमूर्त। सब एक साथ। अब आप इन्हीं पर भिड़ रहे हो ,लड़ रहे हो ,अड़ रहे हो। क्या बेरोज़गारी ख़त्म हो गई ?महंगाई मर गई ?बलात्कारी बेहोश हो गए ? पत्रकार बेखौफ लिख रहे ? गैर ज़रूरी मुद्दों पर आप लड़ रहे हो। आप कायदे के मुद्दे उठाओगे तो वे भी रास्ते पर आएंगे। बड़ी ज़िम्मेदारी है।  पाश को याद करते हो। उनकी लिखी कविता  दोहराते हो कि हम लड़ेंगे कि बगैर लड़े कुछ नहीं मिलता। फिर ये कहां चूक हो रही है । सब कुछ साथ रहता  रहा है और अब बेवजह टकरा रहा है। उफ ये टकराहट के सौदागर। 

सियासत हो या मीडिया इन्हें सिर्फ विवाद चाहिये। पहले इवेंट ,फिर वहां विवाद और फिर इन कच्ची पक्की जानकारियों को वायरल कराती आई टी सेल। पहले सनसनी लपकने का काम मीडिया करता था अब सियासत करने लगी। काम का नमूना देखिये। क्या कहा समाजवादी अखिलेश ने अपने समाजवादी पिता मुलायम सिंह को चाटा मारा। कब हुआ ,क्या प्रमाण है यह मत ढूंढो ,वायरल कर दो। फैला दो सब जगह। एक कद्दावर  भाजपा नेता का यह बयान था। सोशल मीडिया पर तथ्य जांचने की कोई ज़रुरत नहीं है चलने दो ,छलने दो जनता को। असर हुआ तो ठीक ,नहीं हुआ तो भी क्या घटा। न हींग चाहिए न फिटकरी रंग चोखा आ ही जाता है क्योंकि जनता भोली है। तभी तो आए दिन हिजाब ,हलाल ,महंत के मजहब विशेष की महिलाओं से दुष्कर्म की धमकी जैसे मुद्दे सुर्खियां बनते हैं। खबर और मनोहर कहानियां का फर्क ही मिटा दिया इस अजीब दौर ने। 

खाने -पीने  , पहनने -ओढ़ने  ,प्रेम -मित्रता जैसी  बेहद निजी बातों को चौराहे की बात बना देने वाली व्यवस्था जिसमें मीडिया का बड़ा हाथ है , आखिर किसे प्रिय लग रही है ? मध्यप्रदेश में पत्रकारों के कपड़े उतरवाने ,उत्तरप्रदेश में  दलित लड़की के उत्पीड़न और फिर हत्या को कवर करने वाले पत्रकार सिद्दीक कप्पन को जेल में डालने ,पत्रकार राणा अय्यूब को हवाई अड्डे पर हिरासत में ले लेने जैसी घटनाओं पर मीडिया की ज़ुबां बंद रहती है। पत्रकार राणा दिल्ली उच्चा न्यायालय के दखल के बाद इटली जा पाती हैं। वहां जो आपबीती उन्होंने दुनिया को सुनाई है वह देश का सर शर्म से झुका देती है। वे साफ कहती हैं मैं भाग्यशाली पत्रकार हूं जिसकी आवाज सुनी जाती है। मेरे कई साथियों की आवाज दबाई जा रही है ,उन्हें डराया जा रहा है।वे कहती हैं मैं नहीं जानती देश लौटकर मेरा क्या होगा लेकिन भारत की आवाज सुनना जरूरी है। सोचने की बात है कि यहां देश के नेताओं को यह फिक्र क्यों नहीं हो रही है कि दुनिया भारत को किस नजरिये से देखेगी। ऐसे ही एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुखिया और लेखक आकार पटेल को भी अमेरिका जाने से रोक दिया गया । अभिव्यक्ति को यूं दबाने का सिलसिला कुछ कुछ बदले की भावना जैसा है । पत्रकार सत्ता के खिलाफ हमेशा लिखते रहे हैं । पत्रकार राजेंद्र माथुर ने भी  सत्ता के खिलाफ लिखा लेकिन उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव शोक प्रकट करने उनके निवास पर गए थे। इन दिनों हालात यूं हैं कि पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी जाती है और शिखर नेतृत्व से कोई स्वर सुनाई नहीं देता। 

भारत जैसे विशाल प्रजातंत्र के शिखर नेतृत्व का मौन यूं मालूम होता है मानो कह रहा हो सब चलता है। एक भी पत्रकार वार्ता में सीधे सवालों का सामना नहीं हुआ है। जो प्रिय हैं उन्हें साक्षात्कार दिए गए ,वे अभिनेता भी हो सकते हैं। शेष को देशद्रोही तक कह दिया जाता है। लिखता ही तो है पत्रकार। उससे इतना भय क्यों कि उसे यात्रा से पहले हिरासत में लिया जाए या फिर जेल भेजा जाए ? चूक कहां हो रही है इसे देश के  सत्ता शिखर से अलग शक्तिशाली और वरिष्ठ नागरिकों को भी  देखना होगा। वोट लेने का गणित सत्ता का होता है लेकिन देशप्रेमी का मन अलग माटी का होता है। उसे हर मुद्दे पर लड़ाने -भिड़ाने का उद्देश्य अगर किसी पक्ष  का है तो फिर विपक्ष क्यों आंखें मूंदे पड़ा है। देश के कस्बे ,शहर, प्रदेश प्रयोगशाला बन रहे हैं लेकिन विपक्ष सुस्ता रहा है। वह  सत्ता पक्ष के मुद्दों की बीन पर नाच रहा है, उसकी अपनी सोच कुंद है जबकि जनता की तकलीफ कोई नहीं समझ पा रहा कि उसकी आठ हजार की पगार में उसका तीन हज़ार रूपया तेल पर खर्च हो रहा है। रसोई गैस, खाने का तेल का खर्च उसका अपना तेल निकालने के लिए काफी है। 

 रूसी लेखक इवान तुर्गनेव ने अपना पहला उपन्यास रूदिन लिखा था। रूदिन  खूबसूरत नौजवान और औजपूर्ण वक्त था लेकिन जीवन में कुछ भी पूरी तरह हासिल नहीं कर पाया। उसके साथी पैसा कमाकर परिवार बसा चुके लेकिन रूदिन केवल लोगों की भलाई और खुशहाली के सपने देखता रहा उसका प्रेम भी नाकाम रहा। फिर एक दिन  जब पेरिस की राष्ट्रीय वर्कशापों का विद्रोह कुचला जा चुका था एक आवाज को गोली लगी वह लाल झंडा हिला रहा था। शाही गार्ड की गोली उसे लग चुकी थी। वह ढेर हो चुका था और रूसी रूदिन को मारने वाले ने कहा एक और पोलैंडवासी मारा गया।