Friday, January 11, 2019

नमो रागा के एक से राग





राहुल गाँधी ने रक्षा मंत्री में पहले जेंडर देखा और फिर उसे भी कमतर देखा वर्ना वे ये नहीं कहते कि " चौकीदार लोकसभा में पैर नहीं रख पाया।  और एक महिला से कहता है कि निर्मला सीतारमण जी आप मेरी रक्षा कीजिए, मैं अपनी रक्षा नहीं कर पाऊंगा।  आपने देखा कि ढाई घंटे महिला रक्षा नहीं कर पाई। '' यह बयान हमारे ही शहर जयपुर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने किसान रैली को सम्बोधित करते हुए दिया। इसके बाद  राष्ट्रीय महिला आयोग ने नोटिस जारी कर राहुल गाँधी से जवाब माँगा है।  उन्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए था लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह कहना चाहिए था कि वह कांग्रेस की कौनसी विधवा (सोनिया गाँधी ) थी जो रूपए लेती थी ,या फिर यह कि क्या किसी ने 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड (शशि थरूर की पत्नी सुनन्दा पुष्कर के लिए तब उनकी शादी नहीं हुई थी ) देखी है या फिर रेणुका चौधरी के लिए यह कहना कि आज बहुत दिनों बाद रामायण सीरियल के बाद ऐसी हंसी सुनने का मौका मिला है। 
ज़ाहिर है ये कोई सद्वचन नहीं हैं जो मोदी जी ने कहे थे। आशय रावण की बहन शूर्पणखा की और था। यही राहुलजी भी कर गए। महिला आयोग के पास दो अलग-अलग निगाहें नहीं होनी चाहिए। वाकई हैरानी होती है कि धुर विरोधी विचारधराओं वाली दृष्टि भी महिलाओं के सन्दर्भ में किस कदर एक सी होती है। क्योंकि यह हमारे भीतर तक पैंठी हुई है। हमने उन्हें सम्मान  देना सीखा ही नहीं और ना ही उन्हें स्वीकारना सीखा है। बड़े पदों पर तो बिलकुल ही नहीं। राहुल गाँधी ने अगले दिन फिर एक ट्वीट कर  कहा कि  कहा, ''हमारी सभ्यता में महिलाओं का सम्मान घर से शुरू होता है. डरना बंद कीजिए. मर्दों की तरह बात कीजिए. और मेरे सवाल का जवाब दीजिए. क्या वायुसेना और रक्षा मंत्रालय ने असली रफ़ाल डील को ख़त्म किए जाने का विरोध किया था?'' लगा था कि वे वाक्य विन्यास कुछ बेहतर करेंगे लेकिन फिर वही बात मर्दों की तरह बात कीजिये यानी महिला की तरह बात करना तो कमज़ोर होना है। जाने क्यों इनकी बातों से ये समझ आता है कि दहाड़ना ही सच्चाई का प्रतीक है,शालीनता सादगी और सहज संवाद के कोई मायने नहीं है। ये थिएट्रिकल अंदाज़ राजनीति के मंच पर वो सम्मोहन पैदा नहीं करते। बुरा लगता है जब कोई बड़ा नेता भी उसी आम सोच की नुमाइंदगी करने लगता है जिसे बदले जाने की उम्मीद उससे थी। सार्वजनिक जीवन में हम महिलाएं उनसे इस बुनियादी शिष्टाचार की अपेक्षा करती  हैं तो कुछ ज़्यादा तो नहीं करती। इन्हें समझना होगा कि इनकी ऐसी सोच जब भी ज़ाहिर होती है,लिंगभेद की दिशा में चल रही सुधार प्रक्रिया बहुत पीछे चली जाती है। 

ps : 9 जनवरी को राहुल गाँधी का जयपुर में दिया शेष सम्बोधन वाकई बेहतरीन था लेकिन हमारे नेताओं को संवेदनशील होना ही होगा खासकर जब वे संसद या सार्वजनिक सभाओं में बोल रहे हों और ये सभी बयान इन्हीं महत्वपूर्ण जगहों से दिए गए हैं। सार्वजानिक सभाओं से ही ये संसद की पवित्र देहरी चढ़ते हैं। 



Friday, December 28, 2018

मुझे तो डॉ साहब भीष्म जैसे लगते हैं और सोनिया गाँधी ?

the accidental prime minister credit you tube 



मुझे तो डॉ साहब भीष्म जैसे लगते हैं यह एक नई फिल्म का संवाद है जिसे लेकर कांग्रेस परेशान और भाजपा खुश है। मेरा सवाल केवल इतना है कि एक निर्देशक को कैसा लगता होगा जब उसकी फिल्म दर्शकों की बजाय राजनीतिक की शरण में चली जाए। 

बड़ा ही दिलचस्प समय है।  एक फीचर फिल्म के ट्रेलर को एक राजनीतिक दल ने अपने ऑफिशिअल ट्विटर हैंडल पर शेयर किया है कि कैसे एक  राजनीतिक परिवार ने  दस साल तक प्रधानमंत्री की कुर्सी को बंधक बनाए रखा ताकि उसके  उत्तराधिकारी की ताजपोशी हो सके ।  दल ने अपने बयान  के साथ फिल्म का ट्रेलर लिंक भी साझा  किया है। ये राज-प्रतिनिधि थे पूर्व प्रधामंत्री  डॉ मनमोहन सिंह और उत्तराधिकारी राहुल गाँधी। फिल्म का नाम है द  एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर,निर्देशक विजय आर गुट्टे हैं। हम सब जानते हैं मनमोहन  सिंह की भूमिका में अनुपम खेर हैं और फिल्म में अच्छी खासी भूमिका सोनिया गाँधी की भी है जिसे जर्मन कलाकार सुज़ैन बर्नर्ट  ने निभाया है।  

राजनीति पर पहले भी कई फ़िल्में बन चुकी हैं लेकिन जिस फिल्म का नाम तुरंत  ध्यान आता है वह है आंधी जिसके बारे में कहा जाता है कि वह पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के जीवन से प्रेरित थी । फिल्म ज़बरदस्त चर्चा में रही ।  तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी ने फिल्म तो नहीं देखी  लेकिन दो सदस्यों  को स्क्रीनिंग के लिए भेजा। उन्होंने  आंधी को क्लीन चिट दी। निर्देशक गुलज़ार ने खुद कहा कि पीएम और आरती के किरदार में कोई साम्य नहीं है बीस हफ्ते के बाद जब गुजरात के विपक्ष ने धूम्रपान और नशे के दृष्यों के साथ यह प्रचारित किया कि ये इंदिरा गाँधी हैं। यह 1975  का दौर था। यह आज का समय है जब सोशल मीडिया की तरह सिनेमा भी वोटर्स को प्रभावित करने वाला होगा। इसलिए यह दिलचस्प समय है कि एक सत्ताधारी पार्टी यानी भाजपा ने इस फिल्म को एक तरह से गोद ले लिया है। ट्रेलर अपने आप में दिलचस्पी जगाता है ,सोनिया गाँधी को खल पात्र बताने की कोशिश के साथ जब  मालूम होता है कि एक पार्टी की इसमें विशेष दिलचस्पी है, यह कुछ-कुछ प्रायोजित की श्रेणी में आता हुआ भी लगता  है। फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि द  एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर  2004 से 2008 तक मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की इसी नाम से आई किताब पर आधारित है। पता नहीं निर्देशक को कैसा लगता होगा जब उसकी फिल्म जनता के बीच आने से पहले एक दल विशेष की अनुशंसा पा ले ,बशर्ते कि फिल्म भी किसी द्वेष से प्रेरित होकर न बनी हो।अब जब एक दल को  पसंद आई है तो दूजे को विरोध में आना ही था   फिल्म 11 जनवरी को रिलीज़ होने वाली है लेकिन लगता है उससे पहले इन राजनीतिक दलों के कई विवाद रिलीज़ होंगे।दो दलों की रस्साकशी के बीच हिंदी फिल्म का यूं  दुर्घटनाग्रस्त होना  वाकई रोचक होगा शायद यही उसे  हिट की नैया में भी सवार करा दे। 

Friday, December 21, 2018

जनरल आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी

वाकई हैरानी और दुःख है सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के बयान पर कि फिलहाल वे भारतीय सेना में महिलाओं को लड़ाई में आगे रखने के स्थिति में नहीं है। वे कहते हैं महिलाएं कहेंगी वे हमें देख रहें हैं और फिर हमें उनके लिए आवरण का इंतज़ाम करना पड़ेगा।
माफी चाहेंगे जनरल लेकिन आप उन झाँकने वालों का इंतज़ाम कीजिये , महिलाओं के एतराज़ का नहीं। हो सकता है कुछ व्यावहारिक  परेशानियों हो लड़ाई में लेकिन आप वे शख़्स नहीं होने चाहिए जो ये सब बातें बताएं,आपको यह बताना चाहिए की महिलाएं कैसे  इन चुनौतियों से मुकाबला करें । आपको नए और साहसी तरीकों पर बात करनी चाहिए। आप कैसे पुराने और बने -बनाए ढर्रों पर चलने की बात कर सकते हैं। कौन साठ  साल पहले यह यकीन कर सकता था कि बॉक्सर मैरी कोम ना केवल मर्दों की दुनिया में प्रचलित खेल को अपनाएंगी बल्कि वर्ल्ड चैंपियन भी होंगी। तीन बच्चों की माँ ने साबित किया है कि वह परिवार और प्रोफेशन दोनों मोर्चे बखूबी संभाल सकती हैं। बछिन्द्री पाल का  एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचना भी वैसा ही साहस है। कल्पना चावला का अंतरिक्ष में रहना भी उन लोगों को मुँह तोड़ जवाब है जो स्त्री को केवल बंधी-बंधाई भूमिका में देखना चाहते हैं। स्त्री हर खांचे को तोड़ रही है और यह भी सही है की पहली बार उन्हें यह मौका संजीदा और उन पर यकीन करने वाले ओहदेदार पुरुषों ने ही दिया होगा। जनरल आपसे भी यही उम्मीद थी कि आप नए प्रतिमान गढ़ेंगे। आपके नेतृत्व में स्त्री साहस की उस लकीर पर चलकर भारतीय सेना के फलक पर नई इबारत लिखेगी। लेकिन अफ़सोस।

यूं तो वह 1857 से आज तक अपनी वीरता और साहस के परचम लहरा रही हैं । झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से लेकर जयपुर निवासी पत्रकार  बणा जीतेन्द्र सिंह जी शेखावत की  पुत्री मेजर स्वाति शेखावत "खाचरियावास" तक।  मेजर स्वाति इस समय माइनस 25 डिग्री की सबसे ठंडी व बर्फीली सीमा पर देश की रक्षा में तैनात है। जनरल आप कैसे ऐसा कह सकते हैं ?