Thursday, November 15, 2018

घूंघट की आड़ में प्रत्याशी

यहाँ जो घूंघट की आड़ में नज़र आ रही हैं वे भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी पूनम कँवर हैं जिन्होंने कल बुधवार को राजस्थान के बीकानेर की कोलायत सीट से पर्चा दाख़िल किया। मुझे निजी तौर पर लगता है कि उनके मतदाताओं को दस बार सोचना चाहिए क्योंकि जो विधायक आँख में आँख डालकर  बात नहीं कर पाएगा वह जनता के हित कैसे साध पाएगा ? प्रत्याशी जब प्रेस वार्ता को सम्बोधित कर रहीं थींतब भी केवल वही घूंघट में  थीं। अच्छी बात यह थी कि उनके साथ स्त्रियों  का हुजूम था। पूनम कोलायत से सात बार विधायक रह चुके कद्दावर भाजपा नेता देवी  सिंह भाटी की पुत्रवधु  हैं। उम्मीद की जानी चाहिए की यह परिवार एक क़दम और आगे बढ़ाते हुए इस परदा प्रथा को भी ख़त्म करेगा।

एक सवाल मुझसे भी  पूछा जा सकता है  कि क्या किसी बुर्कानशीं के लिए भी आप यही राय दोहराएंगी ? बेशक पर्देदारी  की ज़रुरत ही क्या है।आँख पर किसी भी  किस्म का  परदा क्योंकर होना चाहिए।  लोकतंत्र  का आधार ही संवाद है और परदा , घूंघट संवाद में बाधा। परदा  नहीं जब कोई ख़ुदा से बन्दों से परदा  करना क्या ......
तस्वीर भास्कर से साभार है 

Tuesday, October 23, 2018

मैं अपना यह हक़ छोड़ती हूँ।






जब सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने की इजाज़त दे दी है तो ये कौन ताकतें हैं जो ख़ुद को संविधान से ऊपर मानने लगी हैं। तकलीफ़  तो कुछ लोगों को तब भी हुई  होगी  जब    सती प्रथा के ख़िलाफ़ क़ानून बना होगा। कुछ देर के लिए मंदिर में स्त्री के प्रवेश को निषेध मानने वालों को सही भी मान लिया जाए तो क्या ये भी मान लिया जाए कि पूजा स्थल भी स्त्री को देह रूप में ही देखते हैं। देह भी वह जो दस से पचास के बीच होती है। पवित्र स्थल के  संचालकों को इनसे  डर लगता है। चलिए आप एक देह हैं आपको भय लग  सकता है लेकिन भगवान अयप्पा को भी आपने उसी श्रेणी में रख दिया? वे ईश्वर हैं। देह उम्र के भेद से परे लेकिन भक्तों ने उन्हें अपने भय से मिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सृष्टि के चक्र को चलाने वाले मासिक चक्र से भय। आख़िर क्यों डरना चाहिए रजस्वला स्त्री से किसी को भी? वे डरते हैं ,उन्हें दूर रखते हैं ,ये भी मान लेते हैं कि इश्वर को भी वे मंज़ूर नहीं होंगी लेकिन जीवन के धरातल पर इसी उम्र की स्त्री देह ही सर्वाधिक शोषण की भी शिकार है। यौन शोषण की भी। यहां दूरी,परहेज़,अस्पृश्यता सब विलीन हो जाती है।  मंदिर में बतौर देवदासी उसका स्वागत है लेकिन दर्शन के लिए नहीं। ये दोहरे मानदंड नहीं  हैं क्या ? 
     एेसा ही एक प्रतिबंध मुंबई की हाजी अली दरगाह पर भी चस्पा था।  वहां भी मजार के एक हिस्से में महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी। मामला मुंबई हाई कोर्ट में सुना गया । यहाँ भी तर्क यही कि स्त्रियां पुरुष पीर हाजी अली शाह बुखारी की मजार के करीब नहीं हो सकती। प्रवेश की यह जंग भी महिलाओं ने जीती। सुविधा के  लिए यह ज़रूर किया गया  है कि भीतर जाने के लिए उनके प्रवेश का रास्ता अलग है। हर तबके हर उम्र और मज़हब की महिलाएं यहाँ अब अपनी उम्मीद का धागा भी बांध रही हैं और चादर भी चढ़ा रही हैं। शायद यही भेद का अंत होना भी है। 
          
नए साल की उस ठंडी सांझ में चंडीगढ़ की सड़क पर जब एक गुरुद्वारा दिखा तो हम सब सर ढककर भीतर हो लिए। गुरुग्रंथ  साहब को प्रणाम कर जब पैसे निकाल कर दानपेटी ढूंढऩी चाही तो एक सेवादारनी ने धीमे लेकिन साफ शब्दों में कहा कि यहां पैसे नहीं चढ़ते। हमने चुपचाप पैसे अंदर रख लिए। यह निषेध था लेकिन मन को बहुत अच्छा लगा। अगर इन्होंने गुरुद्वारे के बाहर ही यह कहकर रोक लिया होता कि आप स्त्री हैं और भीतर नहीं जा सकती तब जाहिर है यह रोक या बैन हमें भीतर तक आहत कर जाता। 

    केरल स्थित विश्व के बड़े तीर्थस्थल सबरीमाला अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के लिए  सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने महिलाओं के हक़ में फैसला दिया जबकि जस्टिस इंदु मल्होत्रा का कहना था कि धार्मिक मामलों को तय करना कोर्ट  का काम नहीं है जब तक कि यह सति प्रथा जैसी सामाजिक बुराई न हो। वे मानती हैं कि सबरीमाला मंदिर को अपना निज़ाम कायम रखने की व्यवस्था भारत का संविधान (आर्टिकल 25 ) देता है और इसे आर्टिकल 14 की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। उनका यह भी मानना था कि इसके दूरगामी परिणाम होंगे। 

    जो हालात सबरीमाला में  बने हैं क्या वे भी इसी मतभेद का नतीजा हैं ? राजनीतिक दलों ने भावनाओं को भुनाने के लिए कमर कस ली है और इसमें महिलाओं को भी अपने साथ कर लिया है। इतने प्राचीन मंदिर के आस-पास ऐसी परिस्थितियों का निर्माण सही नहीं कहा जा सकता। प्रवेश की इच्छुक महिलाओं को खुद ही पीछे हट जाना चाहिए। यह उनकी हार नहीं है। बल्कि राजनीतिक रोटियां सेंक रहे दलों की आग पर ठंडा पानी है। संविधान आपके हक़ में है। समाज भी होगा लेकिन इन दलों को यह हक़ नहीं होना चाहिए कि वे मंदिर और देश की फ़िज़ा बिगाड़ें । मैं अपना यह निजी हक़ छोड़ती हूँ। 13 नवंबर को खुली अदालत में रिव्यु पिटीशंस का फ़ैसला जो भी हो। 







Tuesday, October 9, 2018

सबसे ज़्यादा अनरिपोर्टेड समय

पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा साहब को याद करते हुए विनोद विट्ठल जी सा आपने जो कविता पुस्तक मुझे भेजी है उसके लिए आपका दिल की गहराइयों से आभार। आभार इसलिए भी कि आपने हमारे समय की बीमार नब्ज़ पर हाथ रख दिया है और उसके बाद इन हाथों ने जो लिखा है वह किसी वैद्य का कलात्मक ब्यौरा ही है। चाहो तो वक़्त रहते इलाज कर लो। कविता से पहले आपने सही लिखा है बाबाओं का बाज़ार है ,धार्मिक उन्माद है, मॉब लिंचिंग है, खाप  पंचायतें हैं, फ्री डाटा है ,व्हाट्सऍप -फेसबुक है ,टीवी के रियलिटी शो हैं ,खबरिया चैनल हैं,खूब सारा प्रकाशन- प्रसारण है लेकिन सबसे ज़्यादा  ज़्यादा अनरिपोर्टेड समय है। एक कवि की वाजिब चिंता कि कागज़ों में दुनिया भर की चिंता की जा रही है लेकिन लुप्त होते जा रहे इंसान की कोई बात नहीं कर रहा। वाकई ये कविताएं इस  अनरिपोर्टेड  समय की चिट्ठियां हैं जिसे हमें संभालना ही चाहिए। 
कविता लेटर बॉक्स में विनोद विट्ठल लिखते हैं
दर्ज़ करो इसे
कि अलीबाबा को बचा लेंगे जेकमा और माइक्रोसॉफ्ट को बिल गेट्स 
राम को अमित शाह और बाबर को असदुद्दीन ओवैसी 
किलों को राजपूत  और खेतों को जाट 
टीम कुक बचा लेने एप्पल को जाइए जुकरबर्ग फेसबुक को
तुम खुद उगो जंगली घांस की तरह इटेलियन टाइलें तोड़ कर 
और लहराओ जेठ की लू में लहराती है लाल ओढ़नी जैसे। 

इसके अलावा लाइक,अड़तालीस साल का आदमी, माँ की अलमारी और वित्तमंत्रीजी ,ढब्बू मियां, पिता का चश्मा,और स्टेटस के लिए भी मेरा लाइक स्वीकार कीजिये। अपनी बिटिया पाती के लिए जो कविता आपने लिखी है वह वाकई नई उम्मीद का राग है क्योंकि हवाओं ने बिलकुल तब ही कहा होगा मुझे नई बांसुरी दो।
कविता मिठाइयों का स्वाद जो  हमने चखा था , ज़ायका अब तक कायम है, यह कविता भी यहाँ है। शुक्रिया एक बार फिर अनरिपोर्टेड की  रिपोर्ट लिखने के लिए और हम जैसों को पढ़ाने के लिए। तरुण चौहान का आवरण चित्र कच्ची बस्ती के घर को जिस नीली आभा में पेश करता है वह भी उम्मीद पैदा करता है।