Wednesday, September 12, 2018

गली गुलैयां तो नहीं मिली उलझे स्त्री की भूल भुलैया में

गली गुलैयाँ में मनोज बाजपेई 
सोमवार की शाम एक बच्चे और बड़े की जटिल दुनिया में झाँकने का मन था सो मैं बेटे के साथ जयपुर के थिएटर के बाहर खड़ी थी। वेबसाइट पर समय तो दे रखा था लेकिन टिकट बुक न हो सकी।  पहुंचे तो पता लगा गली गुलैयां तो नहीं है, 'स्त्री चलेगी'? उन्होंने पूछा। उनका कहना था कि " गली गुलैयाँ तो चली नहीं ,परफॉर्म ही नहीं कर सकी ,कल संडे के शो में ही पांच लोग आए थे। हम तो स्त्री ही चला रहे  हैं बढ़िया चल रही है।" पहले टिकट खिड़की पर  फिर  आईनॉक्स मैनेजर ने भी यही बात दोहराई। मन कुछ खास तत्पर नहीं था स्त्री के लिए लेकिन सोचा राजकुमार राव की न्यूटन अच्छी लगी थी, स्त्री भी ठीक ही होगी। किशोर बेटे की भी यही राय थी।  फिर तो स्त्री की भूल भुलैया में ऐसे उलझे कि समझ ही नहीं पाए कि डायरेक्टर तंत्र -मंत्र, भूत -प्रेत की इज़्ज़त बढ़ा रहे हैं या स्त्री की। कहीं गहरे झाँकने पर यह भी लगा निर्देशक शान तो स्त्री की ही बढ़ाना चाहते थे लेकिन  'चुड़ैलगिरि' कुछ ज़्यादा हावी हो गई। हमारे समाज में जहाँ अब भी तंत्र-मन्त्र मनुष्य के अवचेतन में डेरा जमाए हुए हैं, वहां से स्त्री के हक़ में छिपे गूढ़ सन्देश को साफ़-साफ़ समझ  पाना  नामुमकिन ही मालूम होता है । फिर जब स्क्रिप्ट की ताकत के बीच में आइटम सांग और द्वीअर्थी संवाद सेंध मारते हैं तो फिल्म की दीवार भी कमज़ोर होती जाती है।

स्त्री में श्रद्धा कपूर और राजकुमार राव 
दरअसल ये चुड़ैल इतनी आज्ञाकारी है कि उस घर के मर्दों को नहीं उठाती है जहाँ दीवार पर लिख दिया जाता है ,ओ स्त्री कल आना। चंदेरी की हर दीवार पर लाल रंग से यह ऐसे ही लिखा है जैसे घर पर हथेलियों के निशान बना देने से किसी अनर्थ से बचने की अफवाह कुछ अरसा पहले चरम पर थी। उससे पहले पत्तियों पर लोगों ने सांप भी देखे थे और गणेशजी ने दूध भी पिया था। बरहाल इन तथ्यों के साथ हास्य-व्यंग्य का ज़बरदस्त स्कोप पटकथा में हो सकता था लेकिन वह रुक-रुक कर मिलता है और कहानी भूत-प्रेत की गिरफ्त में आती मालूम होती है। अँधेरी सड़कें ,सुनसान रातें ,  भूतनी के उलटे पैर और भुतहा किले की  पृष्ठभूमि यूं भी ग्रामीण भारत जो बादके बरसों में शहरों  में बसा ,उन सब के मानस  में पैबस्त  है और लोग कनेक्ट भी  होते हैं।  स्त्री उसे ही भुनाने की कोशिश है। मध्यप्रदेश का चंदेरी  अपने सूत के लिए ख्यात है ,चंदेरी साड़ियां स्त्री की गरिमा और सौंदर्य का पर्याय हैं लेकिन निर्देशक अमर कौशिक  के दृष्टिकोण में चुड़ैल का ही साया हावी रहा।

फिल्म 'ओ स्त्री कल आना' और 'ओ स्त्री रक्षा करना ' के बीच बेहद मनोरंजक और व्यंग्यात्मक  बन सकती थी जो कि नहीं बन पाई है। राजकुमार राव आँखों से नाप ले लेनेवाले युवा दर्ज़ी विकी के किरदार में बेहतर हैं ,उनके दोस्त अपारशक्ति खुराना ( भाई आयुष्मान खुराना की धुंधली कार्बन कॉपी ) और अभिषेक बैनर्जी भी जमे हैं लेकिन श्रद्धा कपूर सामान्य ही लगी हैं। पंकज त्रिपाठी (रूद्र भैया )चंदेरी पुराण को थामे हैं यानी उनके पास वो किताब है जिसमें चंदेरी का इतिहास है जिसके कुछ पन्ने फटे हुए हैं। आम कस्बों में जो रहस्य और कुंठाएं स्त्री को लेकर रहती हैं उसकी बानगी भी कुछ हद तक स्त्री में है। रूद्र जैसा किरदार हर कस्बे  में होता है जो जानता भले ही कम है लेकिन उस पर क़स्बे का भरोसा ज़्यादा होता है। वह यह भी बताता है कि जब भूतनी प्यार से आवाज़ दे तो  पलटना मत वह ले जाएगी। और हाँ फिल्म की शुरुआत और मध्यांतर में राजस्थान सरकार  ढेरों विज्ञापन दिखाकर बताती है कि योजनाओं  ने ग्रामीण जनता की सूरत बदल दी है। काश ये 2014 -15 में भी दिखाए गए होते की ये-ये योजनाएं हैं। विपक्ष का एक भी विज्ञापन न अख़बार में है न रुपहले परदे पर। 

बहरहाल , यहाँ मकसद स्त्री की समीक्षा करना नहीं है बल्कि यह बताना है कि दिमाग की तहों और मानव मन के अकेलेपाने में झाँकने की कवायद वाली फिल्म गली गुलैयाँ को दर्शक नहीं मिलते और स्त्री उसे 'खो' कर देती है। इस सिनेमा पर आधा-अधूरा हॉरर और कमज़ोर कॉमेडी हावी  हो गई। स्त्री को दर्शक मिल रहे हैं गली गुलैया को नहीं मिले। सिनेमा में अब  आइटम गीत और लाल किताब टाइप मसाले कम काम करते हैं यह ख़ामख़याली भी दूर हुई।





Saturday, September 8, 2018

दल दुविधा में हैं देश का दिल नहीं


       इन दिनों दो मुद्द्दे ऐसे हैं जिन पर राजनीतिक दल खुलकर सामने नहीं आ पा रहे हैं। न कहते बनता है न ज़ब्त करते। पहला है sc /st अत्याचार निरोधक अधिनियम और दूसरा  LGBTQ से जुड़ी धारा 377 का ग़ैरक़ानूनी हो जाना। ऐसा क्यों है कि इन दोनों ही मुद्द्दों पर जब अवाम सड़कों पर हैं तो राजनीतिक दल घरों में  कैद। जनता बोल रही है लेकिन इनके मुँह में दही जमा है। गर जो वोटों का डर  स्टैंड लेने से  रोक रहा है तो फिर यह कूनीति तो हो सकती  है, राजनीति नहीं। मार्च में दलित सड़कों पर थे और हाल ही ख़ुद को उनसे बेहतर मानने वाले।  दोनों के बीच जो रार   ठनी है वह किसी भी देशभक्त को निराश कर सकती है और यह दुविधा किसकी फैलाई हुई है यह समझना भी कोई मुश्किल नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने की जल्दबाज़ी  में पूरी संसद (और इसे नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता क्योंकि वहां हमारे ही चुने हुए प्रतिनिधि हैं ) थी। कोर्ट ने कहा था कि सरकारी कर्मचारी की गिरफ़्तारी बिना सक्षम अथॉरिटी  की जांच के नहीं हो सकेगी , तुरंत मुकदमा भी दर्ज़ नहीं किया जा सकेगा। इससे संदेश यह गया कि सरकार इस कानून को अब कमज़ोर करने का मन बना चुकी है।  नया संदेश देने के लिए सरकार ने तुरंत इस फैसले को पलटा और अपना मत ज़ाहिर किया। इस मत से दूसरा पक्ष नाराज़ हो गया और सड़कों पर उतरा। अब इसे कौन समर्थन दे रहा है कौन नहीं, यह बात दलों की समझ में अब तक नहीं आयी है। यानी वे ख़ुद ही कंफ्यूज हैं और वही उन्होंने अवाम के साथ भी किया है। 

बात LGBTQ के अधिकारों की। फ़ैसले  के बारे में जस्टिस इंदू मल्होत्रा की टिप्पणी किस क़दर  संजीदा मालूम होती है जब वे कहती हैं कि इतिहास को इनसे और इनके परिवार से माफ़ी मांगनी चाहिए क्योंकि जो कलंक और निष्कासन इन्होंने सदियों  से  भुगता है उसकी कोई भरपाई नहीं है।  आज के इंडियन एक्सप्रेस  में प्रकाशित यह कार्टून देखिये जिसमें LGBTQ बिरादरी का सदस्य सुप्रीम कोर्ट की ओर देख कह रहा है    वह निवास है लेकिन आज यहाँ  मुझे  घर -जैसा  लग रहा  है।





       वाकई बड़े गहरे और व्यापक अर्थ हैं 377 को हटाने के। इस धारा की विदाई  इंसान के बुनियादी हक़ को तो बहाल  कर ही  रही है  साथ ही उसकी आज़ादी और सबकी बराबरी भी सुनिश्चित कर रही है । प्रेम और निजता को सर्वोच्च माना है सर्वोच्च न्यायलय ने। यह मनुष्य का बुनियादी हक़ है कि वह कैसे  ज़ाहिर हो अपने निजी पलों में। कोई क़ानून महज़ इसलिए उसे सलाखों के पीछे कैसे डाल सकता है? और जो बात हमारी सभ्यता और संस्कृति की करें तो उसने कभी भी यौन रुझान के कारण किसी को दंड का भागीदार नहीं माना था। दरअसल हम खुद अपनी असलियत से परे इस विक्टोरियन कानून को 128 साल से गले लगाए हुए थे । आपको जानकर हैरानी होगी कि ख़ुद अंग्रेज़ी हुकूमत को अपने देश के कानून से भारत में इसे उदार बनाना  पड़ा था। 
जहाँ तक बात वर्तमान सरकार की है, वह यहाँ भी दुविधा में ही दिखाई देती है। उनके कई बयान हैं जो धारा 377 का समर्थन करते हैं  लेकिन समय की आहट को  समझते हुए उन्हें यह कहना पड़ा कि जो सुप्रीम कोर्ट कहेगा, हमें मान्य होगा।  उम्मीद है कि यहाँ पलटने की कोई मंशा सरकार की नहीं है। 
            दरअसल  दोनों ही मसलों पर अब समाज को ही संवेदनशील होना होगा। दमन की शिकार जातियां भी यही अपेक्षा करती हैं और LGBTQ (Q यानी क्वीर का ताल्लुक अजीब,अनूठे, विचित्र रिश्तों से हैं ) समुदाय भी।  प्रेम और सद्भावना  से ही दोनों को देखे जाने की ज़रुरत है। तमाम जातियों को भी और जातिगत रिश्तों को भी। आक्रामक हो जाने से हम समाज का अहित ही करेंगे और सच कहूं तो आक्रामक हो जाने जैसी कोई आशंका भी नहीं है। दल दुविधा में हो सकते हैं ,देश का दिल नहीं।  
the rainbow nation                                   photo credit  -ndtv 




Saturday, September 1, 2018

कर बिस्मिल्लाह खोल दी मैंने चालीस गांठें

सारा शगुफ़्ता 1954 -1984 


अमृता प्रीतम 1919 -2005 

सारा शगुफ़्ता अमृता प्रीतम को पढ़ते हुए कौन होगा जो घूँट चांदनी के ज़ायके से बच सकेगा। ऐसे लेखक का होना ही सादगी का होना है ,सच का होना है। हाल ही जब उनकी लिखी एक थी सारा पढ़ी तो सर ख़ुद ब ख़ुद सजदे में हो आया। एक थी सारा दो स्त्रियों से मुकम्मल होती है ।  पाकिस्तान की अज़ीम मगर बैचैन शायरा सारा शगुफ़्ता और हिन्दुस्तान की अदीब अमृता प्रीतम जिन्होंने अपनी आत्मकथा को रसीदी टिकट का नाम देकर  विनम्रता की नई परिभाषा ही गढ़ दी थी । सारा अमृता दोनों ही इस फ़ानी दुनिया  में नहीं है लेकिन दोनों की दोस्ती समझ का वह सेतु  बनाती है कि सरहद की परिकल्पना ही बेमायने लगने लगती है।  तमाम फ़ासलों के बावजूद,अदब क़ायदे की दुनिया के ये दो बड़े दस्तख़त  इस सूबे में स्त्री के हालात पर जो ख़त लिखते हैं, वह दस्तावेज़ हो जाते हैं दर्द और दवा की असरदार जुगलबंदी का ।

सारा की शायरी और ज़िन्दगी की दर्दभरी दास्तां 'एक थी सारा' में उन्हीं के ख़तों और नज़्मों के ज़रिये बयां हुई है जो सारा ने अमृता को लिखे हैं। अमृता लिखती हैं -एक वक़्त था जब पंजाब में सांदलबार के इलाके में एक रवायत होती थी-गांठें। जब  किसी की शादी तय होती तो इलाक़े का मौलवी दो रस्सियां लेकर मुक़र्ररा दिन में जितने दिन बाक़ी होते उतनी गांठें डाल देता।  एक रस्सी लड़की के कबीले को दे दी जाती और एक लड़के को।  दोनों क़बीले रोज़ सुबह उस रस्सी से गांठें खोल देते ,और आख़िरी गाँठ जिस रोज़ खोली जाती उस रोज़ शादी की शहनाइयां बज उठती ।

इस रवायत को बाद में पंजाब के सूफ़ी शायर बुल्लेशाह ने अपनी नज़्म में कहा ,रूहानी रंग में कि वह  रोज़  सुबह ज़िंदगी की रस्सी से एक गांठ खोलता है और देखता है कि ख़ुदा के वस्ल में कितने दिन रह गए ....

बुल्लेशाह का ही शेर है -कर बिस्मिल्लाह खोल दी मैंने चालीस गांठें। हो सकता है वह शेर उन्होंने अपने चालीसवें जन्मदिन पर लिखा हो।

आगे अमृता लिखती हैं ... और जब 1984 में 7 जून के दिन कराची से फ़ोन आया कि सारा शगुफ्ता ने 4 और 5 जून की रात रेलवे लाइन पर ख़ुदकुशी कर ली, तो तड़पकर मेरे मुँह से निकला --दोस्त ज़िंदगी की गांठ  को ऐसे खोलते हैं ? सारा अभी पूरे तीस बरस की भी नहीं थी। कमबख़्त ने खुद ही लिखा था -"क़दम दरवाज़े से ऊंचा नहीं,, दिन कायनात से छोटा नहीं" ..फिर भी ज़िंदगी भर दरवाज़े को आज़माती रही...  
और दुनिया के ये दरवाज़े निकाह लफ्ज़  को इस्तेमाल करते और सारा के क़दम को ख़ुशआमदीद कहते -लेकिन यह किसी दरवाज़े के बस की बात नहीं थी कि वह सारा के कायनात जितने बड़े दिल को ख़ुशआमदीद कह सकता। सारा के कदम जिस भी दरवाज़े अंदर दाखिल होते वह दरवाज़ा परेशान हो उठता और सारा के क़दम भी... और  फिर वही क़दम तलाक लफ्ज़ के ठोकर खाकर तड़पते हुए दरवाज़े से बाहर  निकल आते।
यह सब था-लेकिन मैं नहीं जानती थी कि इस नामुराद ज़िंदगी का दरवाज़ा भी इतना छोटा होगा कि सारा के कायनात जैसे बड़े दिल को वह अपनी बाँहों में नहीं ले सकेगा और सारा को ज़िंदगी की दहलीज़ पर क़दम रखते ही  हवा पानी और आकाश जैसी शक्तियों में लौट जाना पड़ेगा  ....


ps :यह सारा शगुफ़्ता और अमृता प्रीतम की दोस्ती का केवल एक सफ़ा  है लेकिन इनकी दोस्ती की गहराई को जो  समझना है तो एक थी सारा को पूरा पढ़ना होगा। पढ़ना होगा कि देह से गैर मौजूद होकर भी कोई कैसे बचा रहता है हमेशा अपने दर्द के साथ ।







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