मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

हे कलेक्टर! ये अपमान और एहसान क्यों


 हम सब अनजाने ही एक महामारी की चपेट में धकेल दिए गए हैं। ऐसी महामारी जिसके बारे  में किसी को भी सही-सही कुछ नहीं पता। सारे विशेषज्ञ इस कोरोना महामारी के लिए ज़िम्मेदार वायरस पर टकटकी लगाए बैठे हैं लेकिन हर रोज़ लगता है जैसे शिकार उनके हाथ आया है फिर अचानक किसी चंचल पंछी की तरह हाथ से छूट भागता है। विशेषज्ञ हाथ मलते रह जाते हैं और हाथ आए पंख या फिर पंछी की ऊष्मा के आधार पर अपनी समझ का गणित बैठाते रहते हैं। ठीक है माना कि इसके अलावा कोई और रास्ता भी नहीं लेकिन आधी-अधूरी जानकारी और शोध के आधार पर यह सख्ती का माद्दा अपनाने का हुनर भला कहां से आता है। शहरों की तालाबंदी ,वैक्सीन को लेकर जोर जबरदस्ती क्यों ? लॉकडाउन ज़िन्दगियों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। यह धीमा ज़हर है जो उन्हें मौत के करीब ले जा रहा है और जो मरेंगे उन्हें यह यकीन बिलकुल भी नहीं है कि कोरोना उन्हें मारेगा ही मारेगा। ये तम्बाकू चबाते और नशा पीती  ये बेरोज़गार आबादी जब बीमार होगी  तो उनके लिए अस्पताल होंगे आपके पास ?
खबर राजस्थान के धौलपुर से है।  यहाँ के कलेक्टर ने आदेश दिया है कि जब तक यहां के लोग टीका नहीं लगवा लेते तब तक उन्हें सरकारी सुविधाओं मसलन मनरेगा ,राशन और प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभ से वंचित रखा जाए। आपका सारा ज़ोर और जबर पावर बस गरीब पर ही चलता है। उसने तो आपको इतने मरीज़ भी नहीं दिए हैं जितने शहरों के अमीरों ने। जिन छह ज़िलों के आंकड़े आपने सौ मरीज़ों के पार दिए हैं उसमें धौलपुर कहीं नहीं। शहरों में कोरोना मापने का एक ही मापक है एक बिस्तर पर दो मरीज़। अब आपके अस्पताल ही कम हों और उनमें बिस्तर तो और भी कम तो इस मापक के कोई मायने नहीं रह जाते। एक अनार सौ बीमार के इन हालत में वैक्सीन का आंकड़ा बढ़ाने के लिए सरकारी नुमाइंदे ये जुगत लगा रहे हैं तो फिर संजय गांधी का जनसंख्या नियंत्रण क्या बुरा था।  वह भी तो जबरदस्ती थी।  हो ही जाती तो बेहतर था आज विस्फोटक आबादी यूं महामारी और फिर तालाबंदी की धीमी मौत से तो न रूबरू  हो रही होती। टीके अतीत में भी लगे हैं।  सरकारों ने पोलियो की बूंदे घर-घर जाकर पिलाई हैं लताड़ नहीं पिलाई। बच्चों को स्कूल स्टेशन सब जगह कई-कई बार पोलियो की बूंदे दी गई। अब भारत पोलियो मुक्त है और ये नामुराद वैक्सीन के बारे में तो यहां तक कहा जा रहा है कि हर साल नया टीका आ सकता है। अनिश्चिता। अंतहीन अनिश्चिता। इस बीमारी से ज़्यादा दखल तो सरकारों का जीवन में हो गया है। छोड़ दो यार हमको हमारे हाल पर। मोटा पहनकर और खा कर हमारे पूर्वज जीते ही आए हैं अपने बूते पर। धमकी क्यों देते हो कि यह नहीं देंगे वो नहीं देंगे। इतना अहसान जताना उफ़। अफ़सोस। 









सोमवार, 22 मार्च 2021

जीन्स तो फिर भी सिल जाएगी फटा दिमाग नहीं

 तीरथ भाई ने जब फटी जीन्स पर  बयान दिया था तब  कई लोगों ने लिखा और कहा कि दिमाग फटा हुआ नहीं होना चाहिए। मुझे लगा था कि कोई बात नहीं , ये मेरी दादी जैसे हैं जिन्हें गलती से  भी  बच्चों का कोई कपड़ा फटा या फिर कपड़े में लटकता धागा दिख जाए तो खुद कैंची लेकर आ जाती और कैंची-सी ही घायल करने वाली वो लताड़ लगातीं कि बच्चा  फिर  कभी  फटे कपड़े पहन उनके सामने नहीं आता। लेकिन वे लताड़ लड़का -लड़की देखकर नहीं लगाती सबको सामान रूप से पड़ती थी । तीरथ जी रावत फिर यहीं नहीं रुके। वे बोल गए तुमको अच्छा चावल ज़्यादा चाहिए था तो काहे को जल गए ज़्यादा बच्चे पैदा क्यों नहीं किये। इस बयानबाज़ी में बेचारे अमेरिका को भी कोस गए। बता गए कि अमेरिका ने भारत को दो सौ साल गुलाम रखा। वाह नए -नए बयानजीवी। गुलाम बनाया अमेरिका ने और आज़ादी फिर हम ब्रिटेन से मांगते रहे।   ये देश के  सबसे बड़े दल ने जो पहले के मुख्यमंत्री को खो किया क्या वह इसलिए कि उनका IQ थोड़ा ज्यादा था। खैर मज़ाक छोड़िये पहले बयान पढ़िए जो उन्होंने कल अंतर्राष्ट्रीय वन्य दिवस पर नैनीताल में दिया था।  यह भाषण पहले फेसबुक पर लाइव किया जा  रहा था जिसे बाद में हटा लिया गया । नए-नए सीएम ने कहा 

" हर घर में पर यूनिट पांच किलो राशन देने का काम किया। जिसके दस थे तो पचास किलो आ गया ,बीस थे तो क्विंटल (सौ  किलो )आ  गया। दो थे तो दस किलो आ गया ,लोगों ने स्टोर बना लिए। खरीदार सामने ढूंढ लिए। इतना बढ़िया चावल आया, कभी अपने आप भी लिया नहीं सामान्य जीवन के लिए। ... कि मुझे दो हैं तो दस किलो मिला बीस वाले को क्विंटल क्यों मिला ? अब इसमें जलन काहे कि जब समय था तो आपने दो ही पैदा किये, बीस क्यों नहीं किये ?"

हंसना मना है क्योंकि सवाल बड़ा है। नेताजी देश की कम आबादी पर चिंता ज़ाहिर कर रहे हैं।बता रहे हैं की  खामखां  ही हम चीन से दूसरे नंबर पर पिछड़े हैं। नेताजी आपके शयन कक्ष में दाखिल हो रहे हैं और आप हैं कि लगातार पिछड़  रहे हैं , जलने-भुनने में लगे हैं। बेवजह आपके अच्छे चावल का नुकसान हो गया। इसे देश का दूसरा नागरिक खा गया, खाता  ही रहा है, खता आपकी है । यह हरा -भरा बयान कुमाऊं से आया है। नैनीताल जहाँ  शेष भारत का मिडिल क्लास  एक बार जाकर बरसों तक उसकी ठंडक और पहाड़ जैसी  खूबसूरती में गुम रहता है। मैं भी। 

बहरहाल एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या इन्हीं बयानों को देने के लिए नया सीएम लाया गया ?  खैर  उत्तराखण्ड के मुखिया तो इसी  उत्तरदाईत्व को निभाने में मुस्तैदी से लग गए हैं। उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया  कि कोरोना महामारी कुम्भ के लिए कोई बाधा नहीं है ,वह तो केंद्र ने दखल दिया, झाड़ लगाई कि इसके पूरे इंतज़ाम किये जाएं। नए सीएम  को समझना होगा कि पार्टी  रात-दिन मेहनत कर बंगाल आसाम एक  कर रही है और वे अजीब -अजीब बयान दिए जा रहे हैं। दस महीने बाद देवभूमि में चुनाव हैं। जीन्स तो फिर भी सिल जाएगी ,फटे दिमाग की सिलाई अभी चिकित्सा विज्ञान के लिए भी मुमकिन नहीं है।


गुरुवार, 18 मार्च 2021

भारतीय सांसद के घर से ब्रिटिश राजघराने तक बहुओं के बोलने पर है पाबंदी

 भारत हो या इंग्लैंड ,राजघराना हो या सांसद का घर, बहुओं की आवाज़ इन्हें कभी रास नहीं आती। सबका DNA सामंती रवैये को ही डिकोड करता है। 



भारत से ब्रिटेन तक सब एक हैं। यहाँ सांसद की बहू है वहां राजघराने की । एक को उस राजसी माहौल में खदकुशी कर लेने का मन कर रहा था तो एक ने खुद की नस ही काट ली है। ज़िंदा दोनों हैं लेकिन दोनों बिना किसी अपराध के गुनहगार साबित की जा रही हैं। हाँ एक गुनाह दोनों ने किया है। बोलने का गुनाह। एक को आज तक टीवी चैनल वालों ने मुर्गे की लड़ाई दिखाने की  तर्ज़ पर जेठ के सामने कर दिया तो दूसरी ने दिल की बात ओपरा विनफ्रे के शो पर कह डाली । कह दिया कि शाही खानदान को डर था कि प्रिंस हैरी के बच्चे की चमड़ी का रंग कहीं अलग न हो । एक का नाम  अंकिता है और दूसरी का मेगन मर्केल। दोनों की कहानी अलग-अलग है लेकिन पृष्ठभूमि बिलकुल एक है ससुराल और ये ससुराल बहू की ऊंची आवाज़ ज़रा भी बर्दाश्त नहीं कर पाता। 

ससुराल जिस जगह का नाम है क्या वह डिज़ाइन ही इस तरह से होती है? हिंदुस्तान से इंग्लिस्तान तक  बच्चे के रंग और लिंग को लेकर जद्दोजहद होती है और जो ऐसा ना हुआ तो लड़की ने लड़के को काबू कर लिया जैसे मुद्दे ससुराल की देहरी पर लटकते मिलते हैं। उत्तरप्रदेश के मोहनलालगंज से भाजपा सांसद कौशल किशोर की बहू अंकिता का सामना जब चैनल ने उसके जेठ से कराया तो वह लगातार एक ही बात कह रहा था कि तुम हमारे भाई को ले गई, तुमने उसे नशे की लत दे दी ,तुमने उसे बरबाद कर दिया। इस आमने -सामने के तीन दिन बाद ही अंकिता ने अपने हाथ की नस काट ली ,विडिओ में वे कह  रही हैं मेरे पति और ससुराल वालों के अत्याचार के कारण मैं ऐसा कर रही हूँ। मेरे ससुर भाजपा के सांसद हैं और सासू विधायक। मैं और नहीं लड़ सकती। 

अंकिता आयुष के परिवार की पसंद नहीं थी। मेगन मर्केल भी  प्रिंस हैरी की पसंद थी। वे दोनों तो शाही खानदान से अलग  एक आम ज़िन्दगी बसर करने की ख्वाहिश रखते हैं। अंकिता  के हवाले से एक बात तो साफ़ है कि  इन सुविधाभोगी लड़कों के सर से ज्यों ही प्रेम का भूत उतरता है इन्हें पापा याद आते हैं। पापा का ऐशो -आराम फिर हासिल करने के लिए ये फिर अपनी ही पत्नी को अपमानित करने से नहीं चूकते। कैमरा के सामने बेशर्मी से ये तक कह देते हैं कि इसके जिंदगी में आने से पहले क्या शानदार लाइफ थी हमारी। इसने सब बरबाद कर दिया। आयुष ने यही किया,अंकिता अपमानित किया। 

मेगन मर्केल जो छोटी उम्र से ही समानता की पैरोकार रही हैं और  अपनी बात कहने से हिचकती नहीं हैं। उन्होंने  जब ब्रिटिश शाही खानदान का नस्लभेदी रंग उजागर किया तो फिर वे चौतरफा हमलों से घिर गईं। इलज़ाम लगा कि वे महल के कर्मचारियों को धमकाती थीं। मर्केल ने भले ही सबूत मांगे हों लेकिन हम सब जानत हैं सिलसिला अब रुकने वाला नहीं। ज़्यादा पुरानी बात नहीं है जब प्रिंस हैरी और विलियम की माँ डायना को लोगों ने महल की ज़िन्दगी से ऊबते देखा था। प्रिंस चार्ल्स का दूसरी स्त्री से सम्बन्ध जो आज उनकी पत्नी है ,डायना को किस कदर तोड़ने वाला रहा होगा। शायद इसीलिए बेटे हैरी ने खुद को महल से दूर एक सामान्य ज़िन्दगी जीने के लिए तैयार किया। यह सब आसान नहीं होना था। हैरी अपनी माँ की तरह ही शाही खानदान की शान के बोझ को जीते हुए सहज नहीं महसूस कर रहे हों। डायना भले ही ना बोली हों लेकिन मेगन मर्केल बोली हैं और उसकी अनुगूंज दूर तक सुनाई दे रही है। 

भारत हो या इंग्लैंड ,राजघराना हो या सांसद का घर, बहुओं की आवाज़ इन्हें कभी रास नहीं आती। सबका DNA सामंती रवैये को ही डिकोड करता है।