शुक्रवार, 13 मई 2022

जनता के खिलाफ द्रोह से डरो सरकारो

 कानून 124 A पर सरकार पुनर्विचार करे इससे पहले एक मजबूत विचार सुप्रीम कोर्ट ने रख दिया है।  अब इस कानून के तहत नए मामले दर्ज़ होना स्थगित रहेगा ,जो जेल में हैं वे ज़मानत के लिए अपील कर सकते हैं। वाकई एक बड़ा दिशा निर्देश उन पत्रकारों , कॉमेडियंस ,मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए जो सत्ताधारी दल के निशाने पर केवल इसलिए होते क्योंकि वे अपनी राय रख रहे होते  हैं। वे  तोते की तरह नहीं बोलते जो अपने आकाओं की खुशामद में अपना विवेक अपना ज़मीर ताक पर रखकर चलता है। 1860का यह कानून अंग्रेज़ी हुकूमत की देन था एक अंग्रेज इतिहासकार जिसे हम थॉमस मैकाले के नाम से जानते हैं। जिसकी शिक्षा प्रणाली को हम कोसते नहीं थकते उसी कानून को हम आज़ादी के अमृत महोत्सव तक खींच कर ले आए हैं सिर्फ इसलिए कि असहमत की आवाज़ दबा सकें, उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट ला सकें ,जेल में सड़ा सकें। महात्मा गांधी ,बाल गंगाधर तिलक ,भगतसिंह, सुखदेव ,जवाहर लाल नेहरू जैसे कई देशभक्त इस राजद्रोह कानून के तहत जेल में डाले  जा चुके हैं।  अब जब कानून मंत्री किरण रिजिजू लक्ष्मण रेखा याद दिला रहे हैं तो सरकार की मंशा पर भी संदेह झलकता दिखाई देता है। 

बेशक सुनवाई की अगली तारीख जुलाई 23 तय की गई है लेकिन पत्रकारों,मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सत्ता से अलग अपनी सियासी आवाज रखने वालों के लिए यह भरी गर्मी में राहत  की फुहार का वक्त है। तपती धूप में ठंडी छांव का आभास है।  पत्रकार विनोद दुआ , कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी , मानवाधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी, क्लाइमेट  कार्यकर्ता दिशा रवि पर राजद्रोह की यह धारा लगाई गई। विनोद दुआ और स्टेन स्वामी तो अब इस दुनिया में नहीं रहे।सत्ता कोई भी हो किसी भी राज्य की हो वह इस कानून के जरिए कई विस्सल ब्लोअर्स की सीटी बंद करने का काम करती आई  है ताकि उनकी सत्ता निरंकुश रहे। विनोद दुआ भाजपा की वजह से और असीम त्रिवेदी कांग्रेस कार्यकाल में सताए गए। विनोद दुआ यू ट्यूब पर एक शो करते थे जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की गई थी। उन पर हिमाचल प्रदेश के एक भाजपा नेता ने प्राथमिकी दर्ज की और राजद्रोह का मुकदमा कायम हुआ। कार्टूनिस्ट असीम ने यूपीए दो के कार्यकाल में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के तहत कार्टून अभियान चलाया था और फिर उनके खिलाफ राजद्रोह लगा दिया गया। दिशा रवि ने किसान आंदोलन के समय महज एक टूल किट शेयर की थी और दिल्ली पुलिस उन्हें बंगलौर से गिरफ्तार कर दिल्ली ले आई। किशोरचंद्र वांगखेम  मणिपुर के पत्रकार हैं उन्होंने मुख्यमंत्री बीरेन सिंह की आलोचना में एक वीडियो सोशल मीडिया पर डाला और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज  दिया गया, उनकी पत्नी दो बच्चों के साथ पति की जमानत के लिए भटकती रहीं।एक बार फिर  एक दूसरी पोस्ट जिसमें उन्होंने गाय के गोबर से कोरोना के इलाज  का मज़ाक उड़ाया था  , राष्ट्रिय सुरक्षा कानून के तहत जेल भेज दिया गया। सत्ता ऐसी आवाजों को कुंद करने के लिए 124 A का हमेशा दुरूपयोग करती आईं हैं जबकि 1962 के केदारनाथ केस के समय सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट कर चुका था कि जब तक हिंसा की आशंका ना हो तब तक इस धारा के तहत मुकदमा ना हो। इस लिहाज से राणा दंपति की बातों से इस बात की आशंका स्टेट को हो सकती है फिर भी महाराष्ट्र सरकार के राजद्रोह लगाने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। 

इस कानून का इस्तेमाल हमेशा अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए सरकारें करती रही हैं और आकाओं  के अंधभक्त अपने अंक बढ़वाने के लिए। आरोपी दरअसल यहां पीड़ित होता है ,मीडिया में उसके खिलाफ हैडलाइन बन जाती है, जमानत नहीं हो पाती और ट्रायल सालों साल चलती है।  कोई अपराध सिद्ध नहीं हो पाता। ऐसा इसलिए क्योंकि अपराध साबित होने की दर दो  फीसदी भी नहीं है। 2018 में 70 मामलों में से एक भी नहीं,2019 में 93 में से दो और 2020 में 73  में से  केवल एक मामले में अपराध साबित हुआ। जाहिर है यह धारा केवल उत्पीड़न का एक हथियार भर है। रिटायर्ड आईपीएस विजयशंकर सिंह साफ़ कहते हैं कि राजद्रोह हो या राष्ट्रिय सुरक्षा कानून इसमें कुछ मामले ऐसे भी होते हैं जो केवल राजनैतिक संकेतों के आधार पर कायम किए जाते हैं। हमें अच्छी तरह से पता होता है कि ये अदालत में टिक नहीं पाएंगे। उस समय तो यही होता है कि चार्जेस लगाओ, देखा जाएगा। दिक्कत ये भी है कि पुलिस का  न्यायायिक दिमाग दक्ष नहीं होता और न ही इस दिशा में कोई प्रयास होते हैं ये बीमारी ब्रिटिश काल से है ,अफसर भी इस बात को जानते हैं लेकिन अफसर भी तो वही होता है जो सत्ता को पसंद होता है तो निष्पक्ष सरकार का होना जरूरी है। 

सरकार  की निष्पक्षता का तो ये हाल है कि उसे तो मसखरे भी  बर्दाश्त नहीं होते। कॉमेडियंस वीर दास ,मुनव्वर फारुकी , कुणाल कामरा ,श्याम रंगीला का व्यंग्य ही सरकारों को बाण की तरह चुभता है। मुनव्वर को दो महीने तक मध्यप्रदेश सरकार ने जेल में रखा। वह  इंदौर में शो से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया। क्या करता है एक पत्रकार और व्यंग्यकार लिखता बोलता ही तो है। ऐसा करने पर ही सत्ता उसे अपराधी मानने लगती है। वह लिखेगा बोलेगा नहीं तो क्या करेगा। आपका काम नेतागिरी है तो उसका लिखना। वह कैसे अपना काम करे। प्रजातंत्र में इस पाए का मज़बूत होना बहुत जरूरी है और सुप्रीम कोर्ट के इस कानून के स्थगन से इस बिरादरी की बाकायदा सुध ली गई है। आशंका होती है जब कानून मंत्री कहते हैं कि एक लक्ष्मण रेखा होती है जिसका सभी को ध्यान रखना चाहिए लेकिन क्या कानून मंत्री ने इस बात में लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखा है जब वे कहते हैं कि  प्रधामंत्री की इच्छा से कोर्ट को अवगत करा दिया गया है?


 



मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

खबर और मनोहर कहानियां का फर्क मिटा दिया इस दौर ने

जेएनयू में अब वेज v/ s नॉनवेज हो गया। रामनवमी पर मांसाहार नहीं परोसना तय किया गया। दूसरा पक्ष भिड़ गया कि दिखाओ कहां कोई लिखित आदेश है। अब ऐसे तमाम मसलो के कहां कोई आदेश-वादेश होते हैं। रामनवमी थी। आराध्य  का दिन था ,इससे बड़ा क्या कोई मौका होता विवाद पैदा करने के लिए। वे लड़ लिए। नए नवेलों की राजनीति चमक गई, उनके बुजुर्ग नेताओं ने भी देख लिया और अख़बार टीवी की कृपा दृष्टि भी हो गई। ये  ऐसे ही चटपटे मसालों की तलाश में रहते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि ये चटपटे मसाले पुराने हो गए हैं। जाले पड़ गए हैं इनमें,बांस रहे हैं बांसी सामग्रियों के साथ। घिन आती है ऐसे मुद्दों पर और ऐसी सियासत पर। मत खाओ एक दिन। शोर नहीं मचाओगे तो वे भी क्या  कर लेंगे। तुम शोर मचाते जाते हो, वे मामले ढूंढ के लाते जाते है। सब मौजूद है हमारे देश में । वेज -नॉनवेज,पर्दा बेपर्दगी , मूर्त-अमूर्त। सब एक साथ। अब आप इन्हीं पर भिड़ रहे हो ,लड़ रहे हो ,अड़ रहे हो। क्या बेरोज़गारी ख़त्म हो गई ?महंगाई मर गई ?बलात्कारी बेहोश हो गए ? पत्रकार बेखौफ लिख रहे ? गैर ज़रूरी मुद्दों पर आप लड़ रहे हो। आप कायदे के मुद्दे उठाओगे तो वे भी रास्ते पर आएंगे। बड़ी ज़िम्मेदारी है।  पाश को याद करते हो। उनकी लिखी कविता  दोहराते हो कि हम लड़ेंगे कि बगैर लड़े कुछ नहीं मिलता। फिर ये कहां चूक हो रही है । सब कुछ साथ रहता  रहा है और अब बेवजह टकरा रहा है। उफ ये टकराहट के सौदागर। 

सियासत हो या मीडिया इन्हें सिर्फ विवाद चाहिये। पहले इवेंट ,फिर वहां विवाद और फिर इन कच्ची पक्की जानकारियों को वायरल कराती आई टी सेल। पहले सनसनी लपकने का काम मीडिया करता था अब सियासत करने लगी। काम का नमूना देखिये। क्या कहा समाजवादी अखिलेश ने अपने समाजवादी पिता मुलायम सिंह को चाटा मारा। कब हुआ ,क्या प्रमाण है यह मत ढूंढो ,वायरल कर दो। फैला दो सब जगह। एक कद्दावर  भाजपा नेता का यह बयान था। सोशल मीडिया पर तथ्य जांचने की कोई ज़रुरत नहीं है चलने दो ,छलने दो जनता को। असर हुआ तो ठीक ,नहीं हुआ तो भी क्या घटा। न हींग चाहिए न फिटकरी रंग चोखा आ ही जाता है क्योंकि जनता भोली है। तभी तो आए दिन हिजाब ,हलाल ,महंत के मजहब विशेष की महिलाओं से दुष्कर्म की धमकी जैसे मुद्दे सुर्खियां बनते हैं। खबर और मनोहर कहानियां का फर्क ही मिटा दिया इस अजीब दौर ने। 

खाने -पीने  , पहनने -ओढ़ने  ,प्रेम -मित्रता जैसी  बेहद निजी बातों को चौराहे की बात बना देने वाली व्यवस्था जिसमें मीडिया का बड़ा हाथ है , आखिर किसे प्रिय लग रही है ? मध्यप्रदेश में पत्रकारों के कपड़े उतरवाने ,उत्तरप्रदेश में  दलित लड़की के उत्पीड़न और फिर हत्या को कवर करने वाले पत्रकार सिद्दीक कप्पन को जेल में डालने ,पत्रकार राणा अय्यूब को हवाई अड्डे पर हिरासत में ले लेने जैसी घटनाओं पर मीडिया की ज़ुबां बंद रहती है। पत्रकार राणा दिल्ली उच्चा न्यायालय के दखल के बाद इटली जा पाती हैं। वहां जो आपबीती उन्होंने दुनिया को सुनाई है वह देश का सर शर्म से झुका देती है। वे साफ कहती हैं मैं भाग्यशाली पत्रकार हूं जिसकी आवाज सुनी जाती है। मेरे कई साथियों की आवाज दबाई जा रही है ,उन्हें डराया जा रहा है।वे कहती हैं मैं नहीं जानती देश लौटकर मेरा क्या होगा लेकिन भारत की आवाज सुनना जरूरी है। सोचने की बात है कि यहां देश के नेताओं को यह फिक्र क्यों नहीं हो रही है कि दुनिया भारत को किस नजरिये से देखेगी। ऐसे ही एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुखिया और लेखक आकार पटेल को भी अमेरिका जाने से रोक दिया गया । अभिव्यक्ति को यूं दबाने का सिलसिला कुछ कुछ बदले की भावना जैसा है । पत्रकार सत्ता के खिलाफ हमेशा लिखते रहे हैं । पत्रकार राजेंद्र माथुर ने भी  सत्ता के खिलाफ लिखा लेकिन उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव शोक प्रकट करने उनके निवास पर गए थे। इन दिनों हालात यूं हैं कि पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी जाती है और शिखर नेतृत्व से कोई स्वर सुनाई नहीं देता। 

भारत जैसे विशाल प्रजातंत्र के शिखर नेतृत्व का मौन यूं मालूम होता है मानो कह रहा हो सब चलता है। एक भी पत्रकार वार्ता में सीधे सवालों का सामना नहीं हुआ है। जो प्रिय हैं उन्हें साक्षात्कार दिए गए ,वे अभिनेता भी हो सकते हैं। शेष को देशद्रोही तक कह दिया जाता है। लिखता ही तो है पत्रकार। उससे इतना भय क्यों कि उसे यात्रा से पहले हिरासत में लिया जाए या फिर जेल भेजा जाए ? चूक कहां हो रही है इसे देश के  सत्ता शिखर से अलग शक्तिशाली और वरिष्ठ नागरिकों को भी  देखना होगा। वोट लेने का गणित सत्ता का होता है लेकिन देशप्रेमी का मन अलग माटी का होता है। उसे हर मुद्दे पर लड़ाने -भिड़ाने का उद्देश्य अगर किसी पक्ष  का है तो फिर विपक्ष क्यों आंखें मूंदे पड़ा है। देश के कस्बे ,शहर, प्रदेश प्रयोगशाला बन रहे हैं लेकिन विपक्ष सुस्ता रहा है। वह  सत्ता पक्ष के मुद्दों की बीन पर नाच रहा है, उसकी अपनी सोच कुंद है जबकि जनता की तकलीफ कोई नहीं समझ पा रहा कि उसकी आठ हजार की पगार में उसका तीन हज़ार रूपया तेल पर खर्च हो रहा है। रसोई गैस, खाने का तेल का खर्च उसका अपना तेल निकालने के लिए काफी है। 

 रूसी लेखक इवान तुर्गनेव ने अपना पहला उपन्यास रूदिन लिखा था। रूदिन  खूबसूरत नौजवान और औजपूर्ण वक्त था लेकिन जीवन में कुछ भी पूरी तरह हासिल नहीं कर पाया। उसके साथी पैसा कमाकर परिवार बसा चुके लेकिन रूदिन केवल लोगों की भलाई और खुशहाली के सपने देखता रहा उसका प्रेम भी नाकाम रहा। फिर एक दिन  जब पेरिस की राष्ट्रीय वर्कशापों का विद्रोह कुचला जा चुका था एक आवाज को गोली लगी वह लाल झंडा हिला रहा था। शाही गार्ड की गोली उसे लग चुकी थी। वह ढेर हो चुका था और रूसी रूदिन को मारने वाले ने कहा एक और पोलैंडवासी मारा गया। 







शुक्रवार, 11 मार्च 2022

वे हमसे नफरत करते हैं

पाव्लो सत्ताईस साल का एक यूक्रेनी युवा है जो कम्प्यूटर्स में मास्टर्स है। उसकी गर्लफ्रेंड का नाम लूबा है। ये दोनों यूक्रेन की राजधानी कीव से दो सौ किलोमीटर  दूर पालतोवा में रहते हैं। पाव्लो के माता पिता गांव में रहते हैं। उसका एक भाई भी है जो पुलिस में था लेकिन हालात की वजह से आर्मी में है। अब आर्मी पुलिस सब एक है। एक पखवाड़े पहले तक पाव्लो यूक्रेन के गांव, देहात, शहरों से दुनिया को रूबरू कराया करता था लेकिन आज सन्नाटा है। पाव्लो के व्लॉग्स में ज़िन्दगी यूं ही हंसती थी जैसे किसी भी शांत, सद्भावी  और सुंदर देश में। गांव में उसकी मां बत्तख और मुर्गियां पाला करती है और उसके पड़ोस की सफेद  गाय बारह लीटर तक दूध दे देती है।अपने पिता के साथ कैमरे के सामने वह पूछता है क्या मैं इनके जैसा दिखता हूं..  नहीं बिल्कुल नहीं मैं तो मेरी मां जैसा हूं। फिर मजाक करते हुए अपने पिता से पूछता है कि क्या मैं आप ही का बेटा हूं। भोले पिता मुस्करा देते हैं क्योंकि अंग्रेजी में उन्हें कुछ पल्ले  नहीं पड़ता।   पाव्लो के आलावा कोई अंग्रेजी नहीं बोलता यहां  तक कि लूबा भी सारे जवाब यूक्रेनी भाषा में ही देती है। ये दोनों कभी कभार किसी सुपर मार्केट में भी घुस जाते हैं और बताते हैं कि हमारा देश कितने कम खर्च में कितना खाना मुहैय्या करा देता है। फिर ये खाना लेकर बैठ जाते हैं और पेपर सिजर खेलते हुए खाना खाते जाते हैं। यानी  जो जीता वो पहले अपनी पसंदीदा डिश चखता है । 
लेकिन यह सूरत एक पखवाड़े पहले की है। ये दोनों अब अपने अपार्टमेंट में कैद हैं। आस -पास धमाकों का शोर लगातार गूंजता है। माता -पिता के पास गांव जा नहीं सकते क्योंकि रूसी हमले में जान का खतरा है। भाई रूसी बॉर्डर पर लड़ रहा है।

 पाव्लो की आंखें दुःख और  भय में  घिरी नजर आती है जैसे किसी ने विश्वासघात कर दिया हो। वह रोता नहीं लेकिन आवाज़ भरी हुई है। वह कहता है वे हमसे नफरत करते हैं और उनका एक ही मकसद है तबाही तबाही और तबाही। हम में से किसी ने भी नहीं सोचा था कि इक्कीसवीं सदी में कोई देश किसी देश पर यूं हमला करेगा। पुतिन पागल हो चुके हैं। हमारे देश में कोई फासीवादी ,कोई नार्सिस्ट नहीं है। मैंने कभी नहीं देखा। उन्होंने खारकीव में चार सौ रहवासी इमारतों पर हमले किये हैं। बच्चे मारे गए हैं। हम फ़िलहाल सुरक्षित हैं लेकिन मैं अपना देश छोड़कर कहीं नहीं जाने वाला। मैं यूक्रेनी हूं ,यहीं बड़ा हुआ हूं। मैं लड़ने जाना चाहता हूँ लेकिन फिलहाल मेरे आगे काफी लोगों के आवेदन हैं।  जो कभी परिंदों की तरह उड़ता था आज एक कमरे में कैद है। वहां अपने कंप्यूटर की खिड़की खोल वह दुनिया से जुड़ता है। बदले में दुनिया के लोग उसकी झोली  समर्थन,स्नेह और आर्थिक सहयता की पेशकश से भर देते हैं। हमेशा मुस्कुराने वाला यह जोड़ा
 तकलीफ के बावजूद हिम्मत बांधे दिखता है। दुनिया के लिए यह नए किस्म का अनुभव है।  युद्धरत या कहें कि युद्ध में धकेल दिए  गए  छोटे-से   देश के वासी सीधे तकनीक के ज़रिये अपनी बात कह रहे हैं। बिना डरे साहस के साथ। जंग के इलाकों से इतना सीधा संपर्क शेष दुनिया को पहली बार हो रहा है। उम्मीद की यह बुरा वक्त जल्द खत्म हो और कोई देश यूं किसी देश के वजूद को न रौंदे।