शनिवार, 4 जुलाई 2020

तुम पानी


तुम पानी 
अपने आकार  की 
कोई पहल नहीं 
अपनी गहराई की कोई थाह नहीं 
 सरहद का कोई इल्म नहीं 
 दौड़ की कोई राह नहीं 
 भेद में कोई निष्ठा नहीं

बस वर्षा में ही तेरी आस्था रही।  
image:varsha

बरस जाता है 
बह जाता है 
अलौकिक रफ़्तार में 
उलझी जड़ों तक के रेशों में 
जो घोल ले ठोस से ठोस अहंकार को 
फिर भी आतुर और पी लेने को। 

और मैं 
अचंभित तुम्हें यूं 
बहते-चलते देखते हुए
शायद तुम इस पानी को कभी 
मेरी आँखों में देख सकते हो 
और हाँ यह सब मैंने
 पानी पर ही लिखा है 
मिटा देने के लिए। 
यही तो पानी भी चाहता है। 

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