मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

डर से आगे प्रेम है

दुनिया में केवल दो ही तरह के भाव हैं पहला डर और दूसरा प्रेम। डर आपको दर्दनाक, नफ़रत , विषैले और जीवन को तबाह करनेवाले मोड़ पर छोड़कर आ सकता है जबकि प्रेम ख़ुशी, ख़ूबसूरती और नए क्षितिज की और ले जाने वाली उड़ान का रास्ता दिखाता है।

कुछ नहीं यह नन्हीं  तितली यूं ही दरवाज़े पर आ बैठी मुझे अनायास प्रेम और ख़ुशी देने के लिए।
ऐसा अक्सर होता है जब मैं अपने ही ख़यालो में गुम होकर उदास या दुखी होती हूँ ऐसे मंज़र मुझे भयमुक्त कर देते हैं। बेशक ये मुझ पर असर करते हैं लेकिन बालकनी में इठलाता कबुतरों का जोड़ा शाम को निश्चित समय पर क़रीब से गुजरने वाले तोतों का झुंड और मुंडेर पर पैनी निगाह लिए बैठा शिकरा। सच कहूँ तो ये मेरा इंतज़ार हैं। कोई कह सकता है कि वक़्त त से पहले बुढ़ाना इसी को कहते हैं लेकिन मुझे लगता है कि जीवन से निग़ाह मिल रही है फिर मेरी। फिर प्रेम हो रहा है। डर छूट रहा है। यही सब तो हुआ था जब तुम मिले थे। सच डर से आगे प्रेम है।




2 टिप्‍पणियां:

दिलबागसिंह विर्क ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 06.12.20-18 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3177 में दिया जाएगा

धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुंदर