शनिवार, 1 सितंबर 2018

कर बिस्मिल्लाह खोल दी मैंने चालीस गांठें

सारा शगुफ़्ता 1954 -1984 


अमृता प्रीतम 1919 -2005 

सारा शगुफ़्ता अमृता प्रीतम को पढ़ते हुए कौन होगा जो घूँट चांदनी के ज़ायके से बच सकेगा। ऐसे लेखक का होना ही सादगी का होना है ,सच का होना है। हाल ही जब उनकी लिखी एक थी सारा पढ़ी तो सर ख़ुद ब ख़ुद सजदे में हो आया। एक थी सारा दो स्त्रियों से मुकम्मल होती है ।  पाकिस्तान की अज़ीम मगर बैचैन शायरा सारा शगुफ़्ता और हिन्दुस्तान की अदीब अमृता प्रीतम जिन्होंने अपनी आत्मकथा को रसीदी टिकट का नाम देकर  विनम्रता की नई परिभाषा ही गढ़ दी थी । सारा अमृता दोनों ही इस फ़ानी दुनिया  में नहीं है लेकिन दोनों की दोस्ती समझ का वह सेतु  बनाती है कि सरहद की परिकल्पना ही बेमायने लगने लगती है।  तमाम फ़ासलों के बावजूद,अदब क़ायदे की दुनिया के ये दो बड़े दस्तख़त  इस सूबे में स्त्री के हालात पर जो ख़त लिखते हैं, वह दस्तावेज़ हो जाते हैं दर्द और दवा की असरदार जुगलबंदी का ।

सारा की शायरी और ज़िन्दगी की दर्दभरी दास्तां 'एक थी सारा' में उन्हीं के ख़तों और नज़्मों के ज़रिये बयां हुई है जो सारा ने अमृता को लिखे हैं। अमृता लिखती हैं -एक वक़्त था जब पंजाब में सांदलबार के इलाके में एक रवायत होती थी-गांठें। जब  किसी की शादी तय होती तो इलाक़े का मौलवी दो रस्सियां लेकर मुक़र्ररा दिन में जितने दिन बाक़ी होते उतनी गांठें डाल देता।  एक रस्सी लड़की के कबीले को दे दी जाती और एक लड़के को।  दोनों क़बीले रोज़ सुबह उस रस्सी से गांठें खोल देते ,और आख़िरी गाँठ जिस रोज़ खोली जाती उस रोज़ शादी की शहनाइयां बज उठती ।

इस रवायत को बाद में पंजाब के सूफ़ी शायर बुल्लेशाह ने अपनी नज़्म में कहा ,रूहानी रंग में कि वह  रोज़  सुबह ज़िंदगी की रस्सी से एक गांठ खोलता है और देखता है कि ख़ुदा के वस्ल में कितने दिन रह गए ....

बुल्लेशाह का ही शेर है -कर बिस्मिल्लाह खोल दी मैंने चालीस गांठें। हो सकता है वह शेर उन्होंने अपने चालीसवें जन्मदिन पर लिखा हो।

आगे अमृता लिखती हैं ... और जब 1984 में 7 जून के दिन कराची से फ़ोन आया कि सारा शगुफ्ता ने 4 और 5 जून की रात रेलवे लाइन पर ख़ुदकुशी कर ली, तो तड़पकर मेरे मुँह से निकला --दोस्त ज़िंदगी की गांठ  को ऐसे खोलते हैं ? सारा अभी पूरे तीस बरस की भी नहीं थी। कमबख़्त ने खुद ही लिखा था -"क़दम दरवाज़े से ऊंचा नहीं,, दिन कायनात से छोटा नहीं" ..फिर भी ज़िंदगी भर दरवाज़े को आज़माती रही...  
और दुनिया के ये दरवाज़े निकाह लफ्ज़  को इस्तेमाल करते और सारा के क़दम को ख़ुशआमदीद कहते -लेकिन यह किसी दरवाज़े के बस की बात नहीं थी कि वह सारा के कायनात जितने बड़े दिल को ख़ुशआमदीद कह सकता। सारा के कदम जिस भी दरवाज़े अंदर दाखिल होते वह दरवाज़ा परेशान हो उठता और सारा के क़दम भी... और  फिर वही क़दम तलाक लफ्ज़ के ठोकर खाकर तड़पते हुए दरवाज़े से बाहर  निकल आते।
यह सब था-लेकिन मैं नहीं जानती थी कि इस नामुराद ज़िंदगी का दरवाज़ा भी इतना छोटा होगा कि सारा के कायनात जैसे बड़े दिल को वह अपनी बाँहों में नहीं ले सकेगा और सारा को ज़िंदगी की दहलीज़ पर क़दम रखते ही  हवा पानी और आकाश जैसी शक्तियों में लौट जाना पड़ेगा  ....


ps :यह सारा शगुफ़्ता और अमृता प्रीतम की दोस्ती का केवल एक सफ़ा  है लेकिन इनकी दोस्ती की गहराई को जो  समझना है तो एक थी सारा को पूरा पढ़ना होगा। पढ़ना होगा कि देह से गैर मौजूद होकर भी कोई कैसे बचा रहता है हमेशा अपने दर्द के साथ ।







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