Monday, August 6, 2018

बेहतरीन है मुल्क

वाकई बेहतरीन है मुल्क। उतनी ही जितना अपना मुल्क। कुछ महीनों से लग रहा था जैसे मुल्क में कुछ अच्छा नहीं हो रहा है। जैसे कोई बुरी नज़र ,कोई बुरा साया ,कोई नर पिशाच धीरे-धीरे किसी ज़िंदगी को लीलता है , मुल्क पर भी कोई ऐसा ही संकट मालूम होता। कौन मानता है इस दौर  में बुरी नज़र या काले साए  को ,मैं भी नहीं लेकिन जब इलाज नामालूम  हो तो मर्ज़ को ऐसे ही नाम दे दिए जाते हैं। बेचैनी यूं ही हावी होती रही  कि ऐसा क्या  फ़र्ज़ अदा हो कि मर्ज़  क़ाबू  किया जा सके। जब मुल्क देखी तो  लगा जैसे बेहतर सोचने वाले सृजनशील लोग भी हैं जो अपने सृजन से  दिलों पर जमीं गर्द मिटा रहे  हैं। खुद पर शर्म भी आई कि ऐसे कही जाती है बात। चुप पड़े रहना तो लकवा मार जाना  है।  

   अनुभव सिन्हा ने इस फिल्म के ज़रिये गहरा अनुभव सिद्ध किया है हालाँकि उनकी तुम बिन, रा-वन ,दस नहीं देखीं हैं। मुल्क दरअसल एक आवाज़ है जो देशभक्ति को परिभाषित करने की  राह में देशगान करती हुई लगती है और आज के कटीले हालात की जड़ों पर प्रहार भी करती है । मसलन एक मुसलमान अफसर को लगता है कि मुसलमान आतंकवादी को एनकाउंटर में ख़त्म करके ही कौम को सबक दिया जा सकता है ताकि फिर कोई दूसरा ऐसा ना हो। शेष समाज को लगता है कि इनके यहाँ चार-चार शादियां होती हैं इसलिए बच्चे ज़्यादा  होते हैं और फिर ये भी कि एक-दो जेहाद  के नाम पर क़ुर्बान कर दो। लगता यह भी है कि इन्हें तो आज़ादी के बाद ही पाकिस्तान चले जाना चाहिए था और लगता है कि बिन लादेन और सामान्य मुसलमान की दाढ़ी भी एक सी है। ऐसी तमाम लगने वालीं कपोल कल्पनाओं  को जब वकील मुराद अली की बहू आरती मोहम्मद चुनौती देती हैं तो सरकारी वकील निरुत्तर होते चले जाते हैं और मुल्क की सच्चाई बयान होती चली जाती है।

       फिल्म की कहानी वकील मुराद अली मोहम्मद के परिवार की कहानी है जो बनारस के एक मोहल्ले में मिल-जुलकर ज़िंदगी बसर कर रहा  है।  बहू आरती अचानक लंदन से लौटकर यह कहती है कि वह और अशरफ़ एक-दो महीने अलग रहेंगे क्योंकि भविष्य में पैदा होने वाले बच्चों के धर्म को लेकर दोनों में  कुछ अनबन है।  अभी परिवार में इस बात पर कोई बात होती इससे पहले ही आरती का  देवर शाहिद  एक बम ब्लास्ट में पकड़ा जाता है और अफ़सर जावेद के हाथों एनकाउंटर में मारा जाता है। मोहल्ला जो दावतों और दुःख में शरीक़ रहा करता था, इस घटना के बाद पूरे परिवार पर संदेह करने लगता है। देशद्रोही मानने लगता है। आतंकी के पिता बिलाल को भी गिरफ्तार कर लिया जाता है जो पहले ही इस गिरफ्त में है कि वह बड़े भाई मुराद अली पर आश्रित है और  परिवार चलाने में कोई आर्थिक हिस्सेदारी नहीं निभा पाया। 
  अदालत में यही साबित करने की कोशिश की जाती है कि पूरा का पूरा परिवार आतंकवादी है और घर में अड्डा चलता है। जबकि परिवार इस बात से बेखबर था कि उनके घर  का एक बच्चा मुसलमानों की जहालत के लिए यहाँ के निज़ाम को दोषी मानता  है और कौम के लिए कुछ करने की दिशा में इस्तेमाल हो गया है।  उसमें ऐसी सोच पैदा करने वाला शेख आलम है जो ऐसे बच्चों को अपना टारगेट बनाते हैं। पोस्टमार्टम के बाद शाहिद  की लाश को लेने से उसकी माँ साफ़ इंकार कर देती है। वह कहती है यह मेरा बेटा नहीं हो सकता। 

आरती मोहम्मद वकील है और वह अपने ससुर बिलाल का का केस लेती है। कचहरी में वकील यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि बिलाल भी आतंकवादी है जिसकी दुकान से सिम भी अवैध तरीके से दिए जाए हैं। और बदले में आतंकवादी संगठन उसे मोटी  रकम देते हैं। बिलाल को रिमांड पर लिया जाता है और कस्टडी में ही उसकी मौत हो जाती है। जनाज़े में सिवाय मित्र पांडे के कोई नहीं आता। मोहल्ले के शरारती उनके घर के आगे लिख देते हैं go to pak . गिरफ्तारी की नौबत वकील मुराद अली मोहम्मद की भी आ जाती हैं जहाँ वकील आरती कहती है कि वे सम्मानित वकील हैं और पेशी पर मौजूद रहने की अहमियत जानते हैं। देशद्रोही का आरोप लिए वकील बेचैनी की  रात में टहलते हैं जहाँ बहू आरती आकर पूछती हैं क्यों अब्बू नींद नहीं आ रही है। मुराद कहते हैं जब तबस्सुम शादी के बाद इस घर में आई थी तो पूछा करती थी क्या तुम मुझसे प्यार करते हो। मैं कहता हां तो कहती साबित करो। अब तू ही बता मैं कैसे साबित करता। अब देश के लोग भी मुझसे सवाल कर रहे हैं कि साबित करो कि मैं अपने वतन, अपनी मिटटी से प्यार करता हूँ। बता मैं कैसे साबित करूँ यह। अब यह तेरी ज़िम्मेदारी है मेरी मिटटी से मेरी  मोहब्बत को साबित कर । 
दरअसल यह सारी तकलीफ़ जन्म ही तब लेती है जब इसे इनके और  में बांटकर देखा जाता है  हम मान कर नहीं। फिल्म में  एक संवाद है मेरे घर में मेरा स्वागत करने का हक़ उन्हें किसने दिया ? ये मेरा भी उतना है   जितना की आपका। अगर आप मेरी दाढ़ी और ओसामा की दाढ़ी में फर्क नहीं कर पा  रहे तो भी मुझे उतना ही हक़ है अपनी सुन्नत  निभाने का। एक अन्य संवाद में  वकील  आरती से  आपको बधाई कि आज फिर धर्म के आगे न्याय की जीत हुई है।
मुराद की भूमिका में ऋषि कपूर उससे भी  ज़्यादा कमाल करते हैं जो उन्होंने कपूर एंड संस में पैदा किया था। तापसी पन्नू पिंक में कटघरे में भी असरदार रहीं  तो मुल्क में कटघरे के बाहर बातौर वकील भी। बिलाल की भूमिका में मनोज पाहवा जो सांस उखड़ते  हुए पलों को जीते हैं ,वह उन्हें एक्टिंग के नए मुकाम पर पहुंचाता है। प्रतिपक्ष के वक़ील आशुतोष राणा को देखना बहुत सुखद है। नीना गुप्ता की छोटी भूमिका बड़ी हो गई है उनके अभिनय कौशल से। वे मुराद की बीवी हैं। आतंकी  की भूमिका में प्रतीक से बब्बर भी बेहतर हैं। एटीएस अफ़सर जावेद की भूमका में रजत कपूर शानदार हैं। फिल्म में असर पैदा होता है जब वे आतंकवाद की परिभाषा बताते हैं। जज का फैसला आप मुल्क देखकर ही जानिए। एक बात दोहरा देती हूँ जो  जज ने कही कि बच्चों से इतने बेखबर मत रहिये ,उन्हें देखिये वे क्या करते हैं। मुल्क के लिए सैलूट पेश  करने  का मन करता है अनुभव सिन्हा की पूरी टीम के लिए। सुनिधी चौहान ,स्वानंद किरकिरे की आवाज़ वाला गीत-संगीत भी हमारे मुल्क जैसा ही है। 

ps : मुल्क देखकर लगता है जैसे current affairs का एक चैप्टर पढ़कर बाहर आ  रहे हैं और दुःख भी होता है कि आख़िर कब तक बच्चों जैसे हमें यही बात समझानी पड़ेगी। 















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