Monday, April 9, 2018

ब्लैकमेल को A सर्टिफ़िकेट मिलना था

कल हिंदी फ़िल्म ब्लैकमेल देखी। इरफ़ान ख़ान वह नाम है जिनके अभिनय प्रतिभा के लिए टिकट लेने के लिए बट , परन्तु, लेकिन, किन्तु कभी सर नहीं उठाते । फिर इरफ़ान निराश भी नहीं करते हैं । वे वह सब सहजता से फिल्म के लिए कर जाते हैं जिसे करने का साहस हिंदी फिल्मों की  स्टार ब्रिगेड में नहीं होता। दफ्तर के सहकर्मियों की मेज़ से लड़कियों की तस्वीरें चुराकर वॉशरूम ले जाने का साहस भला किस स्टार में हो सकता है। सहकर्मी जब यह कहे कि प्रभा वर्जिन  है, मैं दावे के साथ कह सकता हूँ क्योंकि उसके होंठ बहुत पतले हैं। .. और मैं लड़की को देखकर बता सकता हूँ कि उसका स्टेटस क्या है ,यह सुनने का साहस भी इरफ़ान के निभाए किरदार के पास ही हो सकता है।ऐसा लिखने की ज़रुरत केवल इसलिए महसूस हुई क्योंकि फिल्म को बच्चों के लिए भी जारी किया गया है। यह कोई पारिवारिक कॉमेडी ड्रामा नहीं है।  
      दरअसल फ़िल्म उस पति पत्नी की कहानी है जिनकी शादी में एकतरफ़ा प्रेम  है। लड़की शादी इसलिए करती है क्योंकि उसके प्रेमी रंजीत ने उसे धोखा  दिया है। वह प्रेमी जिससे शादी करता है वह अमीर है। उसकी  नज़र में पति की इज़्ज़त टॉमी यानी एक पालतू से ज़्यादा  नहीं वह जानती है कि रिश्ते  में  उसे फ़रेब मिल रहा है। ऐसे ही एक  फ़रेब को देव (इरफ़ान) देख लेते हैं और इस शख़्स को ब्लैकमेल करने लगते हैं।  रंजीत फिर इरफ़ान की बीवी को ही ब्लैकमेल करने लगता है। बात दफ्तर की उस लड़की प्रभा को भी  पता चलती है  और वह भी बदले में पैसे मांगती है। रंजीत  डिटेक्टिव की  सेवा लेता है फिर वह भी इरफ़ान को ब्लैकमेल करने लगता  है । एक दिन दुर्घटनावश इरफ़ान के सामने ही प्रभा की  मौत हो जाती है जो हत्या नज़र आती है। अब पुलिस भी इस खेल में है। रंजीत की बीवी भी उसे रंगे हाथों पकड़ लेती है। इस झगड़े में रंजीत अपनी बीवी का खून कर  देता है। 
उफ़ इतने सारे किरदार एक-एक कर जुड़ते जाते हैं लेकिन कसावट भरे संपादन से सभी कहानी में बंध जाते हैं। निर्देशक अभिनय देव ने एक मसाला  कॉमेडी परोसी है जो हमारे समाज का नंगा सच इस मायने में दिखाती है कि हर कोई एक-दूसरे को धोखा  दे रहा है। पैसा हर रिश्ते से ऊपर है। नैतिक मूल्य सूखे हुए गुलाब से किताबों में बंद हो  चुके हैं। अपना उल्लू साधने के अलावा किसी का कोई और मकसद शेष नहीं है। बेशक करारा व्यंग्य है यह हमारे समाज पर लेकिन संवाद का खुलापन इसके  एक एडल्ट फिल्म होने की मांग करता है। दिक्कत यही है कि हमारे यहाँ  सर्टिफिकेट्स भी स्थूल आँखों से दिए जाते हैं। बच्चों के लिए ब्लैकमेल नहीं है। 

अभिनय के मामले में सभी बेहतर हैं। कीर्ति कुलहरि ,अरुणोदय सिंह, दिव्या दत्ता और थ्री इडियट्स के चतुर यानी ओमी भी हैं। वे उस कंपनी के मैनेजर हैं जहाँ इरफ़ान काम करते हैं। कंपनी टॉयलेट पेपर बनाती है और बाज़ारवाद की मजबूरियों और मूर्खताओं की  मिसाल पेश करती है। जैसे एक संवाद में मैनेजर  कहता है हम कर्मचारियों को कोई वृद्धि नहीं देंगे क्योंकि इस बार कंपनी एक बड़े प्रोजेक्ट  को अंजाम  देने जा रही है। वॉशरूम में तस्वीर भले ही देव (इरफ़ान ख़ान ) ले जाते हैं लेकिन शक बेचारे ग़रीब वॉचमैन  पर ही इस मैनेजर को होता है। बहरहाल संगीत अच्छा है। बैकड्रॉप में बजते गीत कहानी में सुर मिलाते हैं।  





ps : इरफ़ान ख़ान विलक्षण और  विरले कलाकार हैं  इन दिनों गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। वे जल्द सेहतयाब हों। 

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