Monday, November 13, 2017

क़रीब-क़रीब सिंगल या ऑलमोस्ट मुकम्मल


क़रीब-क़रीब सिंगल पूरी तरह मुकम्मल मालूम फिल्म मालूम होती है। स्त्री-पुरुष के रिश्तों को इतने रोचक अंदाज़ में पिरोना कि देखनेवाला पूरे समय बस ठुमकती हुई हंसी हँसता रहे आसान नहीं है। इस गुदगुदाने के हुनर में इरफ़ान तो माहिर हैं ही पहली बार हिंदी फिल्म में नज़र आईं पार्वती भी कहीं उन्नीस नहीं  हैं। निर्देशक तनूजा चंद्रा हैं जिन्हें बरसों पहले से हम दुश्मन (फिल्म) के नाम से अपने ज़ेहन में बसाए हुए हैं पूरे 20 साल बाद फॉर्म में नज़र आई  हैं । इन बीस सालों में उनकी संघर्ष, सुर, ज़िन्दगी रॉक्स जैसी फ़िल्में आई लेकिन यह मनोरंजन की नई परिभाषा गढ़ती हैं। प्यारे से रिश्ते के अंकुर फूटने से पहले का मनोरंजन। इरफ़ान के अभिनय जितनी ही सरल सहज है क़रीब क़रीब सिंगल लेकिन जिस किरदार पर मेहनत हुई है वह जया का है। स्त्री होने के नाते तनूजा ने इस किरदार को बहुत ही बेहतरीन रंग दिया है। एक विधवा जो पति के नाम को पासवर्ड बनाकर अब भी उसी की यादों में जी रही है। योगी (इरफ़ान) यहीं तंज़ कसता है कि तुम लड़कियों का अजीब मामला है पति साथ रहे तो सरनेम वर्ना पासवर्ड।
शौक से कवि और पेशे से फक्कड़ योगी और पेशे से बीमा अधिकारी और स्वाभाव से गंभीर जया एक डेटिंग साइट पर मिलते हैं और जब दूसरी मुलाकात में ही कवि महोदय शेखी बघारते हैं कि उनकी तीन गर्लफ्रेंड्स रही हैं और आज तक वे सभी उनकी याद में आंसूं बहा रही हैं  तो जया को बिलकुल यकीन नहीं आता। योगी वहीँ उन्हें सच्चाई को परखने की चुनौती देता है। गर्लफ्रेंड्स से मुलाकातों का यह सफर ऋषिकेश ,जयपुर  और गैंगटोक होता हुआ बहुत ही दिलचस्प बन जाता है। और ये दो एक दूसरे से उलट किरदार कई मज़ेदार मंज़र पैदा करते हैं। योगी दुनिया और इसके लोगों से प्यार करनेवाला बंदा है और जया बंद ख़याल जिसे डेटिंग साइट पर जाने से भी घबराहट होती है।
क़रीब-क़रीब सिंगल को तनुजा चंद्रा की मां कामना चंद्रा ने लिखा है। वही कामना चंद्रा  जिन्होंने चांदनी , 1942 अ लव स्टोरी और प्रेम रोग लिखी है। गीत संगीत अच्छा है लेकिन जो मुझे याद रहा वह बड़े अच्छे लगते हैं जैसे मशहूर गीत का दोहराना जो योगी अपनी पहली गर्लफ्रेंड के घर पर उसके पति और बच्चों की मौजूदगी में गाते हैं। अपनी पानी की बोतल भी योगी से ना शेयर करनेवाली जया क्या अंत में ऐसा कर पाती हैं या दोनों को अपने पुराने साथी और ज़िन्दगी में लौट जाने की प्रेरणा यह सफर दे जाता है,जानने के लिए फिल्म देखने का आईडिया बुरा नहीं है। ऑलमोस्ट मुकम्मल वाली फीलिंग भी आ सकती है। 


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