शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

अरे ओ बेरंग ज़रा देख रंगों का कारबार क्या है


नोटबंदी से नोटजमा  तक का व्यंग्यात्मक खाका 
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पांच सौ का पुराना नोट दराज़ में जमे अख़बार के नीचे से निकल-निकल कर मुँह चिढ़ा रहा था और दूसरा उस लाल बक्से में से जी दीपावली की पूजा के बाद चांदी के दो सिक्कों के साथ बंद हो गया। .... और हज़ार और पांच सौ के वे दो नोट भी जो  बेटे ने अपने मुद्रा संग्रहालय के लिए ज़बरदस्ती रख लिए थे। तो कितने हुए ? कुल जमा ढाई हज़ार रुपए। अरे नहीं मैं भूल कर  रही हूँ। पांच सो का एक नोट और है जो बटुए में से निकलते हुए अल्लाह को प्यारा हो गया था यानी फट गया था। । ये तीन हज़ार रुपए का काला-धन  मुझे दो दिन से ठेंगा दिखा-दिखा कर  नाच रहा है कि थोड़ा और ज़्यादा होता तो आतंकवाद, नक्सलवाद और जालीनोट वालों की तो कमर ही टूट गयी होती।
    खैर मज़ाक नहीं यह गंभीर मसला है। पूरे देश ने महीनों अपना सफ़ेद समय इस  काले-धन को उजागर करने में लगाया है। अब क्या करें जो 99 फ़ीसदी धन बैंकों में आ गया है, ये सारा का सारा सफ़ेद थोड़ी है।  इसमें काला भी है ।  आप खामखां लगे हैं सरकार को कोसने में। आपको तो बधाई देनी चाहिए कि  अपने नागरिकों का काला धन सफ़ेद करने के लिए इतनी प्रतिबद्ध और मुस्तैद  सरकार किस देश की होती है ? सब काला आराम से सफ़ेद हो गया। गुलज़ार साहब को पता नहीं की केवल उम्र बरसकर सफ़ेद नहीं  होती, नोट भी बंद होकर सफ़ेद होते हैं। थोड़ी हींग फिटकरी लगी, नए नोट छापने में  भई इतना खर्च तो होगा ही । 
   दरअसल , आपको  दर्द एक नहीं  कई हैं। हमारी माँ ,बहनों, पत्नियों की जमा-पूंजी बेनकाब हुई तो आपको क्या तकलीफ है।  वे सड़कों पर आईं क्या विरोध प्रदर्शन करने के लिए?  भाईसाहब आंदोलन हो जाता आंदोलन अगर उनको तकलीफ होती तो। गलती इनकी ही है।  ये ससुरियां  हमेशा भविष्य की चिंता में नोटों को दबाएं रखतीं।  कभी मर्तबान में, कभी तकिये में और कभी-कभी तो सोना ही गढ़वा लेतीं। इतने पवित्र देश में ऐसी चोरी सांस्कृतिक लज्जा की बात है। ये सब गड़ा धन जब सामने आया तो पति ने कूट भी दिया। क्या करता बेचारा।
     उस दिन मुन्नू  का बापू सुबह से ही चिल्ला रहा था। पिछले साल जब  नई  साइकिल के लिए पैसे मांगे तब कहने लगी नहीं हैं मेरे पास। मुन्नू  की माँ तुमसे तो  भगवान ही निपटेगा। मुन्नू  की माँ ने जैसे ही मुँह खोला कि पिछली बार जब दिए थे, तुम दारू पीकर पड़े रहे थे कित्ते दिन। मुन्नू का बापू उसकी और लपकते हुए चिल्लाया- "ज़बान लड़ाती है, चल निकल यहाँ से , बैंक जा और  नोट बदलवा।" मुन्नू  की माँ बच्चे को लेकर घर से निकल गई  और मुन्नू  का बापू दुखी होकर घर में पसर गया।  उसका मजदूरी के लिए चोखटी पर जाने का टाइम निकल चुका  था। मुन्नू  की माँ  बिना खाए-पिए लगातार कुछ दिनों तक बैंक की लम्बी लाइन में लगती रही। सोच रही थी बहुत दिनों से कोई व्रत नहीं किया था , अब इकट्ठे ही हो गए।  मुन्नू  को बिस्कुट का पैकेट लेकर दे देती थी। कुछ दिनों में पैसे मिल गए लेकिन वह नादान अपनी इस उपलब्धि पर खुश ही नहीं हो पा रही थी। इतने सुंदर करारे जामुनी नोट मिले वह फिर भी दुखी थी। अब उसे कौन समझाता की यह काले नहीं, इस रंगीन धन को देखने का समय  है । काले की बजाय  इसमें छिपी कला को देख। इतने मुड़े-तुड़े नोट के बदले  नए और रंगीन  नोट पाकर भी खुश नहीं होते ये लोग।  कभी किसी का शुक्रिया अदा नहीं करते, इसलिए पिछड़े ही  रहते हैं । नोटबंदी-नोटबंदी कर  रहे हैं। कभी ऐसी नोटबदली की है किसी ने इनके साथ ? भलाई का तो समय ही नहीं रहा। 
  एक और हैं, उनका नाम लाली है। कमबख्त को जब उसके बच्चे  ने आकर नोटबंदी के बारे में बताया तो भागी -भागी पंसारी के पास गई। उसने साफ़ कहा सबका राशन लेना पड़ेगा मैं छुट्टा  नहीं दूंगा। उसे तो पंसारी भगवान मालूम हुआ। देसी घी, आटा, चावल, बूरा सब ले आयी। हज़ार रुपए पूरे। कल की  कल देखेंगे। इस लाली को कौन समझाए। कभी इतना घी खाया था पिछले दिनों। खीर, पूड़ी, हलवा खाकर भी  सरकार को कोस रही है। 
         क्या हुआ जो सौ-सवासो इस अभियान में शहीद हो गए। बाज़ार में पैसा आया है।  लोगों को आसान दरों पर क़र्ज़ मिला है। देश बदलने के लिए शहादत तो देनी ही पड़ती है। आपको अपनी जान की पड़ी है , आपने  प्रधान सेवक की आँख में आसूं नहीं देखे थे क्या? स्वार्थी और निष्ठुर कहीं के।  आपको वो आसूं देखने चाहिए थे। आप सिर्फ  एक ही चश्में से हर चीज़  देखते हैं। आपका कुछ नहीं हो सकता।  ये चश्मा उतारिये पहले। आपको आलोचना में ही आनन्द  आता है। आप देश हित  के बारे में सोच ही नहीं सकते। यही 8 नवंबर की रात से कर रहे हो और अब जब 99 फीसदी पैसा वापस आ गया है तब भी वही कर रहे हो। आपकी समझ ही मोटी है। आप काम-धंधे बंद होने और नौकरी जाने की झूठी बात करते हो। आप देशद्रोही हो। आज का युवा नौकरी देता है करता नहीं। सत्तर सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ। 
दराज़ में रखा वह  500 का पुराना  नोट फिर उछल -उछल कर कह रहा था अरी ओ दृष्टिहीन मैं हरा नहीं काला हूँ।  फेंक दे मुझे। इसे रखना ग़ैर क़ानूनी है।


3 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, स्व॰ हबीब तनवीर साहब और ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

laxman ने कहा…

बहुत सही लिख डाला
अंधों को भी आईना दिखा डाला

varsha ने कहा…

Abhar blog bulletin ka aur laxman ji aapko yahan dekhkar achha laga ☺