Thursday, June 30, 2016

दहेज़ नहीं दिया तो माथे पर लिख दिया मेरा बाप चोर है




महिलाओं के खिलाफ ऐसे नए-नए अपराधों की बाढ़ आ गई है कि दहेज थोड़ा पुराना-सा लगने लगा है। आउट ऑव फैशन-सा लेकिन यह धोखा है, भ्रम है हमारा। इसे आउट ऑव फैशन समझने-बताने वाले वे लोग हैं जो इन बातों के प्रचार में लगे हैं कि महिलाएं दहेज का झूठा केस ससुराल वालों पर करा देती हैं और अधिकांश ऐसे मामले अदालत की देहरी पर हांफने लगते हैं। ठीक है कुछ देर के लिए यही सच है ऐसा मान भी लिया जाए तो क्या बेटी के  माता-पिता के मन में बेटी के पैदा हेाते ही धन जोडऩे के खयाल ने आना बंद कर दिया है? क्या बेटे के जन्म लेने के बाद माता-पिता ने धन का एक हिस्सा इसलिए रख छोड़ा है कि यह नई बहू और बेटे के लिए हमारा तोहफा होगा? क्या बहुओं के मानस पर ऐसी कोई घटना अंकित नहीं है जब ससुराल पक्ष के किन्ही रिश्तेदारों न लेन-देन को लेकर ताने ना कसे हों? 
जब तक इस सोच में बदलाव देखने को नहीं मिलेगा दहेज का दानव कभी पीछा छोड़ ही नहीं सकता। दरअसल दहेज की अवधारणा लड़की की विदाई से जुड़ी है। पाठक नाराज हो सकते हैं कि क्या लड़की क ो विदा करना ही गलत हो गया? हां, हम क्यों कन्यादान, विदाई, पराई, जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं? सारी पीर इसी पराई शब्द में छिपी है? दो परिवार एक समाज मिलकर ब्याह कराते हैं। यह दो आत्माओं का मिलन है तो फिर एक पक्ष पर इस कदर बोझ क्यों ? क्यों एक लड़की से ही यह उम्मीद की वह अपनी जड़ों से उखड़कर नई जगह में पल्लवित हो? सब यही सोचते हैं कि ऐसा ही होता आया है, यही  रीत है, परंपरा है लेकिन कभी किसी ने इस नए सिरे-से खिलने में एक लड़की के खत्म होने की और ध्यान नहीं दिया। किसी ने कभी इस छीजत का हिसाब नहीं किया। उल्टे यह तो नियति है, यही तो होता आया है सदियों से, यही कहते हुए उसे इस पथ पर चलाते आए। 
जहां लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई हो रही है वहां हालात थोड़े बदले हैं लेकिन जहां ऐसा नहीं हो सका वहां काफी-कुछ अब भी भयावह हैं। वहां ताने और फटकार बहू के खिलाफ जुर्म में बदल जाते हैं। अलवर की बहू और जयपुर की बेटी के साथ जो हुआ वह हैवानियत को भी शर्मसार करता है।  दहेज के 51 हजार रुपए ना देने के नाम पर एक साल पहले ब्याही लड़की के माथे पर गुदवा दिया गया कि मेरा बाप चोर है। उसके हाथों, जांघों पर अपशब्द गुदवा दिए गए। यह समाज के माथे पर गोदा गया कलंक है। ऐसा पति ने अपने भाइयों के साथ मिलकर किया। उसके हाथ-पैर बांधे गए ,मुंह में कपड़ा ठूस दिया गया और मशीन से गालियां गुदवाई गई। ऐसा जुर्म करने की जुर्रत उसी दिमाग से आती है जहां यह सोच कुंडली मारे बैठी हो कि स्त्री इसी लायक है और इसके पिता से धन ऐंठना हमारा जायज हक। यह सोच तभी बदलेगी जब ऐसे अपराधी  कड़ी सजा पाएंगे। 
पुलिस भी यह मानेगी कि दहेज अपराध की श्रेणी में आता है और जो अलवर जिले  के राजगढ़ के रैणी गांव में हुआ है वैसा फिर कभी नहीं होगा। सिंदूर लगाने की जगह पर लिखवा देना कि तेरा बाप चोर है यह कहता है कि अपराधियों को लगता है कि अपराधी वे खुद नहीं बल्कि लड़की का पिता है? आखिर किस संस्कृति की कौनसी सोच है यह जहां स्त्री इतनी हेय समझ ली जाती है? गांव वाले या उसकी पंचायतें स्त्री का तो जुलूस निकलवा देती हैं, लेकिन ऐसे जघन्य अपराधियों के लिए उनके  पास कोई उपाय नहीं है। सब यह मानकर चलते हैं कि दहेज तो दिया ही जाना था।
माता-पिता को ही यह हिम्मत करनी होगी कि हम कोई दहेज नहीं देंगे। बच्चों की पसंद सबसे ऊपर होगी ना कि जो आंकड़ा कम बताएगा बेटी उसको ब्याह दी जाएगी। इस व्यापार में इस पवित्र बंधन को कैसे उलझा गए हम? मानवीय अवनति की ऐसी मिसाल इतिहास में शायद ही कहीं और होगी।

Thursday, June 23, 2016

गुजरात उड़ता है दमन तक


गुजरात में नशे पर रोक है, लेकिन ज्यों ही गुजरात सीमा खत्म होकर समुद्र से सटे केंद्र शासित शहर  दमन की सीमा शुरू होती है, शराब की दुकानें साथ चलने लगती है। पहले दो-तीन किलोमीटर तक आपको सिर्फ यही दुकानें मिलती हैं, क्योंकि जिन गुजरातियों को नशे की लत है वे बिंदास रफ्तार से दमन तक आते हैं, समंदर किनारे देर रात तक रहते हैं और लौट जाते हैं। ये गुजरात उड़ता है दमन तक। जाहिर है बैन इसका इलाज नहीं। इसका उपलब्ध होना ही समस्या है। तेजाब से लड़कियां जलाई जा रही हैं, तेजाब फेंकना अपराध है, लेकिन तेजाब का मिलना उससे भी बड़ा अपराध है। जब एसिड ही नहीं होगा तो एसिड अटैक कैसे होंगे? 
हाल ही नशाखोरी से जुड़ी उड़ता पंजाब बड़े संघर्ष के बाद सिनेमाघरों की सूरत देख सकी। कुछ लोगों का मानना है कि अगर कें द्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड ने इतना हल्ला न मचाया होता तो फिल्म आती और चली जाती, लेकिन क्या वाकई देश की गंभीर समस्याएं भी यूं  ही आकर चली जाती हैं? ये तो पूरी पौध को बरबाद कर रही हैं। कम अज कम फिल्म ने बताया है कि पंजाब नशे की लत में डूब चुका है। ये खरीफ या रबी की फसल के बरबाद होने की कथा नहीं है, बल्कि एक सम्पन्न प्रांत के तबाह होने का सच है। गेहूं और सरसों की लहलहाती फसलों के बीच किसी ने यह महसूस ही नहीं किया कि इनके खलिहानों में जहर असर कर गया है। हमें भी पंजाब से चार बोतल वोदका और पटियाला पैग लगा के.. सुनने की आदत पड़ गई है। बुल्ले शाह और बाबा फरीद के सूफी कलाम पर कब यह नशा हावी हो गया पता ही नहीं चला।  जिस पंजाब से नशे का इतना महिमामंडन हो रहा हो, फिल्मकारों को हरे-भरे खेत दिखाने से फुरसत ही ना मिले, वहां के बारे में  उड़ता पंजाब जैसी स्याह हकीकत का सामने आना मायने रखता है। मायने रखता है निर्माता-निर्देशक का फिल्म बनाना और सेंसर की कैंची के खिलाफ उच्च न्यायालय जाना और वहां से उड़ता पंजाब का केवल एक कट के साथ रिलीज होना। यह अभिव्यक्ति की आजादी की बहाली है। दरअसल, प्रतिबंध तो उन फिल्मों पर लगना चाहिए जो खराब हालात के बावजूद खुशनमा दृष्यों की अफीम बेचते हैं। विकास के नकली दृश्य दिखाते जाओ, नशे के असली दृश्य उड़ाते जाओ। उड़ता पंजाब से पंजाब उड़ाओ। 
उड़ता पंजाब एक अच्छी फिल्म है। चिट्टा वे एक रूपक है जो सफेद नशा है जिसके नशे में पूरा पंजाब स्याह हो चुका है। रॉक स्टार शाहिद प्रतीक है कि ये नशे की पैरवी करने वाले गीत आखिर आते कहां से आते हैं। आलिया का किरदार कमाल है जो हकीकत में स्त्री को भेडिय़ों के निगाह से दिखाता है। हुक्मरान इस कारोबार में लिप्त हैं, यह सच किसे बरदाश्त होता। नशा करने के अपराध में बंद कैदियों को जेल में ही नशा मिल जाता है, यह व्यवस्था का कौनसा निजाम है? फिल्म पर तो बैन लगना ही था। बोर्ड के कायदे ही आदिम हैं। ये वही बोर्ड है जिसने अगस्त 2015 में 28 शब्दों की सूचि जारी कर दी थी कि ये फिल्मों में नहीं होने चाहिए। किसी ने सही कहा है कि बोर्ड को दादी-नानी की तरह व्यवहार करना बंद करना चाहिए। आजादी के लगभग सात दशक बाद भी हम बंधक हैं। न्याय व्यवस्था, सरकारें इन बहसों में उलझी रहती हैं कि ये फिल्म, ये किताब, ये कलाकृति बैन लगाने लायक है या नहीं? 
आलिया भट्ट उड़ता पंजाब में 
मकबूल फिदा हुसैन की पैंटिग बैन, सलमान रश्दी की सैटनिक वर्सेज बैन, तस्लीमा की लज्जा बैन, सोनिया गांधी पर लिखी रेड साड़ी बैन ,लेसली उडविन की इंडियाज डॉटर बैन। लेसली ने निर्भया पर फिल्म बनाकर हमें आईना दिखाया था। समझ में नहीं आता कि यह बैन संस्कृति हम क्यों चलाते आ रहे हैं। अपने देशवासियों से डरते हैं इसलिये या उन्हें अंधेरे में रखना चाहते हैं इसलिए? कालीन के नीचे सच्चाई को पटक देने से बड़ा खतरा कोई नहीं।  समस्याएं छिपाते जाएंगे तो वह कैंसर के रूप में ही यकायक सामने आएंगी फिर हमारे पास कुछ नहीं बचेगा।

ps : नागेश कुकनूर की फिल्म धनक में बच्चों की मासूमियत और राजस्थान के रंग हैं, लेकिन ऐसी फिल्मों को कौन पूछता है। बच्चों की दुनिया से यूं भी किसी को कहां लेना-देना है। विवाद और इंद्रधनुषी रंग दोनों साथ हो तो सब  विवाद की तरफ दौड़तें हैं। रंगों से हमारी मैत्री तो कभी की खत्म हो गई है।

Wednesday, June 8, 2016

ग़ैर ज़िम्मेदार मॉम -डैड ने ली गोरिल्ला की जान !


माता-पिता होना दुनिया की सबसे बड़ी खुशनसीबी हैं तो उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है। किसी कंपनी के सीईओ होने से भी बड़ी जिम्मेदारी। दिल दहल गया था जब पिछले सप्ताह सिनसिनाती जू में तीन साल के बच्चे को बचाने के लिए सत्रह साल के गोरिल्ला हरांबे को गोली मारने पड़ी थी। यहां इस बात में कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए कि एक बच्चे की जान बचाने के लिए गोरिल्ला की जान ली गई। इंसानी जान बचाना पहला फर्ज होना चाहिए लेकिन लापरवाह माता-पिता को भी बेशक तलब किया जाना चाहिए। हरांबे के समर्थन में बड़ा जनसमूह आ गया है। उनका मानना है कि उस बेजुबां कि खामखा जान गई। फेसबुक पर जस्टिस फॉर हरंबे  नाम से एक पेज बन चुका है जिससे तीन लाख से भी ज्यादा वन्यजीव प्रेमी जुड़ चुके हैं, उनका कहना है हरंबे  बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा रहा था। जबर्दस्त विरोध के बीच बच्चे की मां मिशेल ग्रेग का कहना है कि हमें दोषी ठहराना आसान है। मैं हमेशा अपने बच्चों को कड़ी निगरानी में रखती हूं। यह एक दुर्घटना थी।
   
       बच्चों की परवरिश के दौरान माता-पिता गंभीर होते हैं लेकिन यह भी सच्चाई है कि कई बार बच्चे उन्हीं की लापरवाही का शिकार होते हैं। खेलते -खेलते पानी की टंकी में गिर जाना, गैस या माचिस से खुद को जला लेना, दिवाली पर पटाखों से जल जाना, संक्रांति पर छत से गिर जाना, गाडिय़ों में बंद हो जाना जैसे बेशुमार उदाहरण हैं जहां जाहिर होता है कि दुर्घटना हम बड़ों की असावधानी से घटती है। उस वक्त बहुत हैरानी और दिक्कत हुई थी जब मेरे घर में पलंग के आस-पास गद्दे बिछ गए थे, नीचे के पॉवर प्लग्ज मोटे लाल टेप से बंद कर दिए गए थे और टूटे कांच की किरचों को पोछे के बाद आटे की लोई से उठाया जाता कि कोई बारिक कांच भी घुटने चलते बच्चे को चुभ ना जाए। ये बच्चे के पिता के मां को दिए कोई सख्त आदेश नहीं थे बल्कि वे स्वयं इन कामों को किया करते। अभिभावक होना इतनी ही रुचि और जिम्मेदारी का काम है। यदि आपके सामने कुछ और सपने नहीं तैर रहे हैं, तभी आप इस बड़े सपने को हकीकत में बदलने की जिम्मेदारी लीजिए।
हमारे पुरखों ने जो संयुक्त परिवार प्रणाली समाज के लिए विकसित की थी वह बच्चों के विकास के लिए बहुत जरूरी थी। वे बड़ों की  आंखों के सामने बड़े होते। किसी समझदार ने कहा भी है कि बड़ों की बात इसलिए नहीं मानी जानी चाहिए क्योंकि वे बड़े हैं बल्कि इसलिए क्योंकि उनके पास अनुभवों का खजाना है। बड़े बुजुर्ग इसी अनुभव का लाभ अपने बच्चों को हर पल देते हैं। एकल परिवार छोटी-छोटी बातों से भयभीत होकर डॉक्टर के पास दौड़ जाते हैं। बच्चा चल नहीं रहा या इसके सर के नीचे इतना गीला क्यों रहता है या इसे छह महीने की उम्र में इतने दस्त क्यों लगे हैं इन सबके जवाब अनुभवी दादी-नानियों के पास होते हैं। झूलाघर में पल रहे बच्चों की आयाओं के पास नहीं। 
         
दरअसल हमें उस स्त्री के योगदान को बिल्कुल भी नहीं भूलना चाहिए जो पूरे समय अपने बच्चों की देखभाल में लगी है। उसने अपनी जॉब, ट्रेनिंग सबको दूसरे दर्जे पर  रखा है। ऐसे में यदि पिता लंबा अवकाश अपने बच्चे के लिए लेता है तो वह भी उतना ही सराहनीय है। बच्चों को अकेला छोड़कर काम पर निकल जानेवाले माता-पिता को बेहद  गैर जिम्मेदार की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
अपने देश की बात करें तो हम बच्चों के लिहाज से एक क्रूर समाज हैं। गरीबी इस क्रूरता में कई गुना ज्यादा इजाफा कर देती है। बच्चों की जिम्मेदारी लेनी है या नहीं उसकी बात तो तब होगी जब जोड़े को परिवार नियोजन की समझ हो। बच्चे अब भी हमारे यहां ऊपरवाले की मर्जी के नाम पर ही आते हैं और कई बार पाले भी जाते हैं। सड़क किनारे बच्चों को छोड़ देश के विकास कार्यों के निर्माण में लगा परिवार कहां चाहकर भी जिम्मेदारी निभा सकता है। उसके बच्चे तो कई बार खेलते-खेलते बोरवेल में गिर जाते हैं और कई बार किसी वाहन के नीचे आ जाते हैं। कभी कोई बंदर, कुत्ता या सांड ही उनकी जान का दुश्मन बन जाता है। हम बच्चों के लिए सहिष्णु समाज होते तो क्या जमवारामगढ़ के विमंदित बालगृह में इतने बच्चों की जान जाती? वैसे जन्मदाताओं की लापरवाही किसी माफी की हकदार नहीं है और जो ये ज्यादा कमाई के लालच में होती है तब तो और भी नहीं। आपके बच्चे हैं हमेशा आपकी निगरानी में होने चाहिए।

Tuesday, June 7, 2016

मैं और तुम



दरख़्त 
था एक दरख़्त
हरा
घना
छायादार
इस क़दर मौजूद
कि अब ग़ैरमौजूद है
फिर भी लगता है जैसे
उसी का साया है
उन्हीं पंछियों का कलरव है
और वही पक्का हरापन है
सेहरा ऐसे ही एहसासों में
जीता है सदियों तक
और एक दिन मुस्कुराते हुए
हो जाता है
समंदर

ख़ुशबू 

मैंने चाहा था ख़ुशबू को मुट्ठी में कैद करना
ऐसा कब होना था
वह तो सबकी थी
उड़ गयी
मेरी मुट्ठी में रह गया वह लम्स 
उसकी लर्ज़िश
और खूबसूरत एहसास
काफ़ी है एक उम्र के लिए


याद 


यादों की सीढ़ी से
आज फिर 
एक तारीख
उतरी है मेरे भीतर... 
तुम जान भी पाओगे जाना
कि बाद तुम्हारे
मैं कितनी बार गुजर जाती हूँ
इन तारीखों से गुजरते हुए।

Friday, June 3, 2016

क्यों नहीं देख पाते देह से परे

बड़े-बुजुर्ग अक्सर दुआओं में कहते हैं ईश्वर तुम्हें बुरी नजर से बचाए और जब ये बुरी नजरें 
लगती हैं तो कलेजा छलनी हो आता है और मन विद्रोह से भर उठता है। ये नजरें इसलिए भी खराब 
हैं, क्योंकि ये पढ़े-लिखों की हैं। उस जमात की, जिससे हम बेहतरी की उम्मीद करते हैं। ये पहले सौ किलोमीटर तक केवल देह की देहरी में घूमते हैं और उसके बाद भी ऐसे बहुत कम हैं जो समझते हैं कि इस देह के भीतर भी एक दिल है जो धड़कता है और दिमाग जो सोचता है। आखिर कब हम स्त्री के दिलो-दिमाग का सम्मान करना सीखेंगे। आसाम की एक्टर से विधायक बनीं अंगूरलता डेका की समूची उपलब्धि उन ग्लैमरस तस्वीरों के आस-पास बांध दी जाती हैं , जो उनकी हैं ही नहीं और एक हिंदी अखबार की वेबसाइट को देश की टॉप दस आईएएस और आईपीएस में खूबसूरती ढूंढऩी है। बदले में आईपीएस मरीन जोसफ की फटकार झेलनी पड़ती है और इस लिंक को हटाना पड़ता है। 
ips मरीन जोसेफ 
mla  अंगूरलता डेका 

ये अजीब समय है। एक ओर तो हम चांद और मंगल तक अपनी उड़ान भर चुके हैं और जब बात स्त्री की आती है तो हम देह से परे कहीं झांकने को ही तैयार नहीं। किसी ने जीता होगा दिन-रात एक कर चुनाव, लेकिन हमें उसकी मेहनत को ग्लैमर का नाम देते हुए वायरल कर देने में चंद मिनट लगतेे हैं। बात यहीं तक सीमित नहीं ग्लैमर का तड़का जरा ज्यादा लगे, हम अहमदाबाद की योग ट्रेनर सपना व्यास की तस्वीरें विधायक के नाम पर साझा कर देते हैं। ये दो महिलाओं का अपमान एक साथ किया जा रहा था। असम से भाजपा  की नवनिर्वाचित विधायक अंगूरलता डेका और योग शिक्षिका सपना व्यास के साथ यही हुआ पिछले दिनों। अंगूरलता के तो नाम के साथ छेड़छाड़ करने से भी सोशल मीडिया बाज नहीं आया। फिल्म मेकर रामगोपाल वर्मा ने ट्वीट किया अगर कोई विधायक ऐसा दिख सकता है मतलब अच्छे दिन आ गए। पहली बार राजनीति से प्यार हुआ है। हालांकि आपत्ति के बाद रामगोपाल वर्मा ने अपने ट्वीट पर सफा



ई पेश की। ग्लैमरस, हॉट, सेक्सी शब्द सुनकर एक एक्टर या मॉडल की मुस्कान भले ही बड़ी हो सकती है, लेकिन चुनावी समर में कमर कसने वाली महिला, या आईपीएस, वैज्ञानिक या पत्रकार की नही। तभी तो आईपीएस मरीन जोसेफ आहत हो गईं और उन्होंने फेसबुक पर एक बड़ी हिंदी वेबसाइट को लताड़ते हुए अपना गुस्सा जाहिर किया। वेबसाइट को देश की टॉप टेन खूबसूरत आईपीएस और आईएएस के  लिंक को हटाना पड़ा।
बोल्ड ऑफिसर हैं मरीन
आईपीएस  मरीन जोसेफ फिलहाल केरल के मन्नार में सहायक पुलिस अधीक्षक के पद पर नियुक्त हैं और उनका सिंघम स्टाइल उस समय ही लोकप्रिय हो गया था जब वे केरल के ही अर्नाकुलम जिले में  ट्रेनी थीं। एक साल पहले हिंदू अखबार को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि हम इंटरनेट के दौर के हैं और देश के ज्यादा से ज्यादा नौजवानों को इससे जुडऩा चाहिए। वे मानती थीं कि एक अच्छा  पुलिस ऑफिसर बनना और 24 घंटे जनता के लिए उपलब्ध रहना बड़ी चुनौती है। यह सच है कि विभाग में 99 फीसदी पुरुषों का वर्चस्व है और मुझे अपने अधीनस्थों का विश्वास भी जीतना होगा। जोसफ ने जब पोस्ट लिखी कि क्यों नहीं टॉप टेन मेल मॉडल्स की खूबसूरती की कोई सूची बनती तो उसे जबरदस्त समर्थन हासिल हुआ।
कोसने से बात नहीं बनेगी
समाज की आधी दुनिया दूसरी आधी दुनिया को कोसती रहे इससे बात नहीं बनेगी। बार-बार पितृसत्तात्मक समाज या पुरुष प्रधान समाज के उल्लेख से हम ऊब चुके हैं। स्वीकारना होगा कि इस नई दुनिया में स्त्री भी उसी स्पेस की हकदार है। फर्ज कीजिए एक मर्द रिपोर्टर अपनी रिपोर्ट पर बात करने कि लिए संपादक के पास जाए और वह रिपोर्ट के बजाय मुद्दे को देह के आस-पास केंद्रित कर दे तो या एक ट्रेनी ऑफिसर को उनका वरिष्ठ काबिलियत के लिए नहीं उनकी बॉडी के लिए शाबाशी दे तो? कोई कोच नई खिलाड़ी को फिजियो के टिप्स की बजाय कुछ और समझाने लगे तो? यह सब होता है, कई लड़कियों के साथ होता है। लड़कियां निराश होकर लक्ष्य से दूर हो जाती हैं। ये अतिरिक्त बाधाएं कई लड़कियों को कई स्तर पर पार करनी पड़ती हैं।
माता-पिता को पता चलता है तो वे पहला काम उन्हें रोकने का करते हैं, जो नहीं पता चलता तो अनाम समझौतों की गंदी गलियों में उनका प्रवेश हो जाता है। इसलिए लड़कियों को पहली ही हरकत पर ही आवाज उठानी होगी। उन्हें सायरन की तरह बजना होगा, ताकि लड़कियां सायरन की आवाज सुन सतर्क हो जाएं। मरीन जोसफ ने इस सायरन को ही बजाया है। अपनी बात कहना हर हाल में जरूरी है।
मीडिया के मायने
इन दिनों हर किसी को लगता है कि सोशल मीडिया महत्वपूर्ण जरिया है अपनी बात कहने का, अपने काम को प्रचारित करने का । यह सच भी है।यहां बहुत जल्दि हमजुबां लोगों का कारवां बनता चला जाता है।कुछ बयान, तस्वीरें,विचार वायरल होते हैं यानी उनको देखने-पढऩेवालों की तादाद इतनी ज्यादा होती है कि पोस्ट वायरल हो जाती है और ट्रेंड करने लगती है। वेबसाइट के लिए काम कर रही संगीता कहती हैं अजीब ट्रेंड्स हैं, आप कितना ही अच्छा लिखें वायरल तोवही होता है, जिसमें लव सेक्स और धोखेवाला तत्व शामिल हो।
संगीता कहती हैं 
बेशक संगीता की बात में दम है, लेकिन फेसबुक की बात करें तो कई स्त्रियों ने बेशुमार मुद्दों को सलीके से रखा है और उनकी पोस्ट पर मिले हजारों लाइक्स बताते हैं कि पाठक उनसे इत्तेफाक रखते है। रजिया शबाना 'रूही', मनीषा पांडेय, आराधना  मुक्ति, स्वर्णलता की बेबाक लेखनी हजारों बरसों के ढर्रे को आईना दिखाती हैं तो पाठक जिनमें पुरुष भी शामिल है खूब पसंद करते हैं। सच्चाई यह भी है कि उनके इनबॉक्स में अपशब्दों की भरमार उड़ेली जाती है। कई बार इन्हें बेचैनी महसूस हुई होगी, मन, घृणा से भरा, दिल रोया भी, लेकिन इनका सबसे मजबूत पक्ष है कि इन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। वही लिखा जो महसूस किया। ऐसी कई स्त्रियां हमारे समाज का सायरन ही हैं। एक ईरानी ब्लॉगर सही कहती हैं  कि भारत का समाज आज भी परंपराओं में जकड़ा है। कानून से ज्यादा यहां परंपरा मायने रखती है। परंपरा कई बार वक्त के साथ अप्रासंगिक होती चली जाती है और ये स्त्रियां इन्हीं परंपराओं को नए जमाने का आईना दिखाती है। इन बातों में दम आता है जब पुरुषों की राय भी साथ हो लेती है। आरोप-प्रत्यारोप से हालात नहीं बदलेंगे। देह को बीच में मत लाइए। ईमानदारी से मुद्दे की बात करें।