Wednesday, April 20, 2016

मारवाड़ से सीखे मराठवाड़ा

 मराठवाड़ा पहुंची ट्रैन          तस्वीर इंडियन एक्सप्रेस से साभार कैप्शन जोड़ें

सोमवार सुबह से दो अखबार की दो बातें बार-बार कौंध रही हैं। अंग्रेजी के अखबार में महाराष्ट्र के सतारा जिले के गांव तालुुका फलटण के किसान का साक्षात्कार है जबकि हिंदी के अखबार में वैसे ही संपादकीय पृष्ठ पर जैसलमेर के चतरसिंह जाम का लेख है जो अकाल में भी पानी की प्रचुरता की कहानी कहता है। वे लिखते हैं कि हमारे यहां पानी की बूंदों की कृपा मराठवाड़ा से भी कम होती है लेकिन हमारे यहां पानी का अकाल नहीं बल्कि मनुहार होती है। आखिर यह विरोधाभास क्यों, कि जो क्षेत्र अकाल के लिए चिन्हित  और अपेक्षित है वहां पानी का इतना सुनियोजन और जहां ठीक-ठाक पानी पड़ता है वहां हालात इस कदर सूखे कि रोज पशुओं की मौत हो रही है और परिवार के सदस्य खेती छोड़ मजदूरी करने को मजबूर।
सतारा जिले से 70 किमी दूर बसे गांव तालुका फलटण के किसान लक्ष्मण का कहना है कि मेरे परिवार में सात सदस्य हैं। माता-पिता, मैं, मेरी पत्नी और तीन बच्चे। हमारे गांव में कोई नदी नहीं बहती इसलिए किसानी पूरी तरह वर्षाजल पर ही आश्रित है। सूखा पहले भी हुआ है लेकिन इस बार हालात बहुत खराब हैं। गन्ना बुनियादी फसल है।  चार बड़ी शकर मिलें हैं और सभी नेताओं की हैं।  इन्होंने सीधे ही नहर से पानी उठा लिया इसलिए भी पानी की कमी हो गई। नलों में पानी आना तो कब का बंद हो गया। पिताजी ने कंस्ट्रक्शन साइट पर काम ले लिया है। हमने इस साल खेत में अनार बोया था सब सूख गया। साढे़ तीन लाख रुपयों की आय की उम्मीद थी, सूख गई। लक्ष्मण स्नातक (ग्रेजुएट) हैं लेकिन फिलहाल हालात यह है कि घर में मां के इलाज के पैसे नहीं हैं और पानी की हर बूंद के लिए टैंकर पर आश्रित हैं। नहाना, खाना, सब तब ही होता है जब टैंकर आता है।
इससे अलग जैसलमेर के रामगढ़ की हकीकत है। 2014 में यहां कुल 11  मिमी बारिश हुई थी। 2015  में 48  मिमी पानी बरसा। इस पानी से ही पांच सौ साल पुराने विप्रासर तालाब को भर लिया गया। अप्रैल के तीसरे सप्ताह में भी तालाब भरा है और सबसे सुखकर बात यह है कि इस तालाब की जमीन पर खडि़या मिट्टी या जिप्सम की तह जमी हुई है जो पानी को जमीन में रिसने नहीं देती। एेसी ही पट्टियां खेतों के बीच भी हैं। जाहिर है ये जिसके भी हिस्से आती वह मनमुताबिक फसल ले सकता था लेकिन समाज ने एेसा नहीं होने दिया। इसे सबका बना दिया गया। इन खेतों में अकाल के बीच भी अच्छी फसलें पैदा की जाती हैं। इतनी सी बारिश में यहां चना, गेहूं, सरसों जैसी  फसलें पैदा होती हैं।
ये दो दृश्य बताते हैं कि सवाल पानी की तंगी का नहीं तंग सोच का है। जहां पानी को लेकर दूरदृष्टि और समझदारी अपनाई गई वहां कम पानी में भी जीवन संभव हुआ और जहां ज्यादा मुनाफे के लालच में पानी के प्रतिकूल फसल लेने की कोशिश की गई वहां पानी खिसकता चला गया। गन्ने ने सारा पानी चूस लिया. क्या कर दिया हमारे सोच के अकाल ने। पहले पानी नीचे पहुंचाया और अब उसके पीछ-पीछे खुद गहरे कुंओं में उतरते हैं तब भी तलछट के सिवा कुछ हाथ नहीं आता।
रही सही कसर सूखे को आईपीएल से जोड़कर पूरी कर दी गई है। क्या इस समस्या को इसी तरह देखा जाना चाहिए। बुरा लगता है कि झोंपड़ी में पीने का पानी नहीं और महल एेशोआराम में घिरे हैं। यह भेद क्या आज का है? आईपीएल जैसे आयोजन होने चाहिए या नहीं यह अपने आप में एक अलग मसला है। उस नैतिकता से जुड़ा है कि जब तक हर नागरिक खुशहाल नहीं होगा मैं ऐसे किसी  दिखावे से नहीं जुड़ूंगा। संवेदनशीलता का अभाव इस कदर है कि एक मैच में होने वाली आय का हिस्सा भी किसानों के परिवारों को देना जरूरी नहीं समझा जाता। आईपीएल नाम का शोशा एक राज्य से हटाकर दूसरे राज्य में करने से हालात कैसे बदलेंगे? तकलीफ आंख में है और इलाज परिदृश्य का हो रहा है। समस्या की जड़ में अब भी कोई दाखिल नहीं हो रहा। जितना है उससे ज्यादा खर्च करेंगे तो तकलीफ में आएंगे ही। पानी को लेकर एेसा ही सूखा हमारे विचारों में है। कोई सीखे राजस्थान की रजत बूंदों से कि यहां तालाब आज भी किस कदर खरे हैं। कैसे खारेपन को मिठास में बदले हुए हैं।


Wednesday, April 13, 2016

मेरी पहली श्मशान यात्रा

स्त्रियों को कहाँ इजाज़त होती है मसान जाने की।  गुजरात के इस गांव में नदी किनारे बने श्मशान घाट पर जब पहली बार भाइयों के साथ मामाजी के फूल चुनने गई तो लगा कि मामाजी जाते-जाते भी दुनिया का अलग रंग नुमाया कर गए। इससे
पहले मामाजी  की बेटियों  ने भाई के साथ मिलकर मुखाग्नि दी थी।

 बेहद निजी अनुभव है। गुजरात के वलसाड़ जिले के नवसारी तहसील के एक गांव गणदेवी में मामाजी ने अंतिम सांस ली। बचपन से ही मधुमेह   (डायबिटीज) से पीड़ित मामाजी (58 )को पहले उनके माता-पिता और भाई-बहनों ने इस तरह बड़ा किया जैसे वे राजकुमार हैं और वक्त की पाबंदी में कोई भी कमी उनके जीवन पर संकट के बादल ला सकती है। उनका आना-जाना भी वहीं होता जहां मेजबान उनके मुताबिक बनी घड़ी का सम्मान कर पाता था। जीवन के पांच दशक उन्होंने इन्सुलिन के सुई (एक हार्मोन जो रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करता है) और घड़ी की सुई के साथ सटीक तालमेल बना कर बिताए। ब्याह हुआ। मामीजी के लिए कुछ भी आसान नहीं रहा होगा लेकिन उन्होंने इस रिश्ते को एेसा सींचा कि कुछ सालों में तो वे उनके चेहरे के भाव देखकर ही समझ जाती थीं कि उनके शरीर में शुगर का लेवल क्या है। वे वाकई मामाजी के साथ घड़ी बनकर जीवन गति बनाए हुए थीं। हर चीज़ वक़्त पर।  तभी दुख की इस भीषण घड़ी में उनके शब्द थे  'अब मैं घर की सारी घडि़यां उतार फेकूंगी। ' कर्मठ और विनयशील की तरह जाने जानेवाले मामाजी की अंतिम यात्रा में समूचा गणदेवी अश्रुधारा के साथ शामिल था। आंसुओं के साथ उन्हें हैरानी भी थी कि यात्रा में महिलाएं और मामाजी की दोनों बेटियां भी शामिल हैं। मामाजी का पुत्र तो आगे था ही। श्मशान घाट के दरवाजे पर पंडित ने समझाया कि बेटियो अब तुम यहींं से अंतिम दर्शन कर लौट जाओ। जाने किस घड़ी में कौनसा दृढ़ निश्चय उन्हें इतना दृढ़ बना गया था कि वे नहीं लौटीं। पंडित जी ने फिर कहा बच्चों मैं एेसा इसलिए नहीं कह रहा कि तुम लड़कियां हो बल्कि यह सब तुम्हारे लिए कष्टकारक होगा। अपना फैसला बदल लो। बेटियां नहीं मानी। उन्होंने हिम्मत बटोर कर भाई के साथ पिता को अग्नि के सुपुर्द किया। बड़ी बेटी की तो रुलाई ही तब फूटी जब वह इस जिम्मेदारी का निर्वाह कर चुकी। छोटी बेटी का कहना था कि दीदी अंतिम क्रिया के बाद मुझे इस सच्चाई को स्वीकारने की ताकत मिली कि पापा इस दुनिया में नहीं हैं। दुख का पहाड़ हल्का मालूम पड़ता है।
ये सचमुच नया वक्त है। नया दौर जिसे बेटियां गढ़ रही हैं। सदियों के निजाम को वे अब अपने मुताबिक ढाल रही हैं। बिल्कुल जरूरी नहीं है कि हर कोई एेसा ही करे लेकिन जो चाहे उस पर पाबंदी भी नहीं होनी चाहिए। महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में जब तेल चढ़ाने की अनुमति मिल सकती है तो तमाम अन्य स्थितियों पर भी पुनर्विचार हो सकता है। अब तक अनिष्ट की आशंका से डराकर ही उन्हें दूर रखा गया था। अधिकार कर्तव्य सब समान होने चाहिए।
बेटियों को और उनकी बेटियों को दान देने की परंपरा भी है, लेकिन सब बहनों की बेटियों ने इस दान को स्वीकार कर पुन: लौटा दिया। मौजूद सभी बुजुर्गों को यह ठीक नहीं लगा कि तुम कन्याएं हो और तुम्हें दिया दान सबसे बड़ा होता है। इसे मत लौटाओ, लेकिन बेटियों का कहना था कि एेसे कई दान बेटियों को कमतर भी बना देते हैं। जन्म देने वाले के मन में भी यही भाव होता है कि अब तो हर कदम पर बस इन्हें देना ही देना है। वह लगातार जोडऩे की जुगत में लग जाते है। इस देने की परंपरा पर जहां भी जैसे भी रोक लगे, वह स्त्री अस्मिता में वृद्धि ही करेगी। उसे हक मिले दान नहीं। वे सारे हक जो बेटे के पास हैं।
शरीर के ब्लड में शुगर का बहुत बढ़ जाना मृत्यु का कारण बनता है। उसका सामान्य होना जीवन के लिए बहुत जरूरी है। शायद वैसे ही समाज में स्त्री-पुरुष के बीच समानता का होना बहुत जरूरी है। इस हार्मनी का संतुलन कई परेशानियों से मुक्त कर सकता है। संभव है मामीजी चांदला (गुजराती में बिंदी को चांदला कहते हैं) भी लगाएं और सफेद वस्त्र भी ना धारण करें । सचमुच जब गांव इन बातों के साक्षी होंगे तो देश बदलेगा।