Tuesday, March 29, 2016

इस सरज़मीं से मोहब्बत है

सरसब्ज इलाके मालवा में मुनष्य की औसत आयु का एक चौथाई हिस्सा गुजारने के बाद जब जोधपुर की सरजमीं को छुआ तो लगा जल ही जाएंगे। जून के महीने में धरा आग उगल रही थी। काली बिंधी हुई मिट्टी की जगह बिखरी पीली रेत थी, मानो मौसम का दूसरा नाम ही गुबार हो। समझ आ गया था कि एक बहुत ही प्रतिकूल वातावरण में जीवन का अनुकूल हिस्सा आ गया है। सूखता हलक और घूमता सर बीमार न था, लेकिन इस वातावरण से रूबरू होने की इजाजत मांग रहा था। इतने सूखेपन के बावजूद वहां कोई एक नहीं था जो शिकायत करता। परिधान और पगडिय़ों के चटख रंग ऐसे खिलते जैसे फूल। मुस्कुराते लब ये कहते नजर आते
            ऊंची धोती और अंगरखी, सीधो सादौ भैस।
        रैवण ने भगवान हमेसां दीजै मरुधर देस ।।
सूर्यनगरी के इस ताप को सब जैसे कुदरत का प्रसाद समझ गृहण किए हुए थे। ऐसा नहीं कि रोटी-पानी की जुगाड़ में यहां इल्म की हसरत पीछे छूट गई हो। यह यहां के कण-कण में मौजूद है। ज्ञानी और सीधे-साधे ग्वाले के बीच का यह संवाद यहां के बाशिंदे के अनुभव की पूरी गाथा कह देगा।
ज्ञानी कहते हैं- सूरज रो तप भलो, नदी रो तो जल भलो
भाई रो बल भलो, गाय रो तो दूध भलो।
यानी सूरज का तो तप अच्छा है। जल नदी का अच्छा है। भाई का बल भला है और दूध गाय का अच्छा है।
अनुभव के ताप से गुज़रा ग्वाला उत्तर देता है-
आंख रो तप भलो, कराख रो तो जल भलो।
बाहु रो तो बल भलो, मा रो तो दूध भलो
 
यानी तप तो आंख यानी अनुभव का, पानी कराख यानी कंधे पर लटकी सुराही का, बल अपनी भुजा का ही काम आता है और दूध तो मां का ही भला है।
पूरे मारवाड़ में अपनी विरासत को समेटने की होड़ थी जैसे। कई कथाकार, कवि, लेखक अरसे से अपने समय को दर्ज कर रहे थे। लंगा, मांगणियार के महान संगीत को कोमल कोठारी ने सहेजा, तो विजयदान देथा 'बिज्जी'

की कहानियां रेत से निकले वे रंग थे कि इंद्रधनुष शरमा जाए। शीन काफ निजाम साहब का कोई शेर दाद पाए बिना नहीं गुजरता था। खूबसूरत किलों, पत्थरों के इतने अद्भुत रंग के बीच सृजन का अद्भुत सिलसिला इस पूरी पट्टी को विशेष बनाता था। हबीब कैफी कहानियां लिख रहे थे तो हसन जमान अपनी हिंदी उर्दू पत्रिका शेष के साथ अशेष और अथक परिश्रम से जुड़े थे।
सरहद से लगा पाकिस्तान इस पूरे इलाके में आजादी के बाद से ही सैनिक हलचल बनाए था। गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर की 1070 किलोमीटर सीमा पाकिस्तान से लगी है। जैसलमेर जिले के पोकरण  ने ही 1998 में देश को परमाणु ताकत बख्शी। आधुनिक राजस्थान पत्थरों, प्राकृतिक गैस और खनिज संपदाओं से भरपूर है। केवलादेव की बर्ड सेंचुरी में पक्षी किलौल करते हैं तेा रणथंबोर में टाइगर की दहाड़ सुनना हर सैनी की हसरत। पूरी संभावना है कि सही दिशा देश के सबसे बड़े प्रांत को सबसे विकसित राज्य की श्रेणी में खड़ा कर सकता है। मेट्रो, पुल सड़कें, रेल जितने ही जरूरी है स्कूल और बिजली। कई ढाणियां और गांव इन सुविधाओं से वंचित है। समृद्ध विरासत के साथ जब विधिवत शिक्षा और विकास का समावेश हो जाएगा तो कोई शक नहीं कि इस प्रदेश की रफ्तार कभी नहीं थमेगी। मारवाड़ हो या मेवाड़ या फिर मेवात, ढूंढाड़ और हड़ौती, आधी दुनिया बेहद श्रमशील है, लेकिन उसका हक अब भी दबा और अधूरा है। जिस दिन यह ईमानदारी से मिल जाएगा, सूरत और बेहतर होगी। खम्मा घणी।

जो अपनी मोहब्बत को भी यहीं पनाह मिले तो क्यों न इस सरज़मीं  से मोहब्बत हो...HAPPY BIRTHDAY RAJASTHAN LUV U

Wednesday, March 16, 2016

ये दोज़ख़नामा नहीं जन्नत के रास्ते हैं


कल्पना कीजिए उन्नीसवीं सदी अगर बीसवीं सदी को आकर गले लगाए तो? दो सदियों के एक समय में हुए मिलन के जो हम गवाह बने तो? अंकों के हिसाब से यह अवसर सोलह साल पहले आया था जब दो सदियां 31 दिसंबर 1999 को रात बारह बजे एक लम्हे के लिए एक हुई थी लेकिन यहां बांग्ला लेखक रविशंकर बल ने तो पूरी दो सदियों को एक किताब की शक्ल में कैद कर लिया है। दो सदियों की दो नामचीन हस्तियों की मुलाकात का दस्तावेज है बल का उपन्यास दोज़खनामा। उन्नीसवीं सदी के महान शायर मिर्जा असदउल्ला बेग खां गालिब(1797-1869) और बीसवीं सदी के अफसानानिगार सआदत हसन मंटो (1912-1955 )की कब्र में हुई मुलाकात से जो अपने-अपने समय का खाका पेश होता है वही दो
ख़नामा है। गालिब अपने किस्से कहते हैं कि कैसे मैं आगरा से शाहजहानाबाद यानी दिल्ली में दाखिल हुआ जो खुद अपने अंत का मातम मनाने के करीब होती जा रही थी। बहादुरशााह जफर तख्त संभाल चुके थे और अंग्रेज आवाम का खून चूसने पर आमादा थे। 1857 की विफल क्रांति ने गालिब को तोड़ दिया था और उनके इश्क की अकाल मौत ने उन्हें तन्हाई के साथ-साथ कर्ज के भी महासागर में धकेल दिया था। सरकार जो पेंशन उनके वालिद (जो अलवर राजा की तरफ से लड़ते हुए शहीद हो गए थे) के नाम पर पेंशन दिया करती थी वह भी मिलनी बंद हो गई। ये सब सिलसिलावार किस्से मंटो के साथ जब गालिब साझा करते हैं तो मंटो भी हिंदुस्तान में जिए हुए किस्सों और पाकिस्तान से मिली निराशा को बखूबी शब्दों में ढालते हैं। दोनों की जीवनगाथा के साथ किताब कई और किस्सों के साथ भी आगे बढ़ती है जिन्हें वक्त की आपाधापी में हमने भुला दिया है।
  उपन्यास में दर्ज मंटो के अफसाने वही हैं जो हमने उनकी कहानियों में पढे़ हैं लेकिन वे इस तरह गढ़े गए हैं कि लगता है मंटो आत्मकथा सुना रहे होंं क्योंकि मंटो ने वही लिखा जो उनके आसपास का सच था। जहां-जहां मंटो की किस्सागोई है वहां दिल की धड़कनें थमती मालूम होती हंै क्योंकि उन शब्दों की रफ्तार ही इस कदर तेज है कि दिल धक से रह जाता है। उनके एक साल के बच्चे का इंतकाल हो या उनके जिंदा गोश्त (देहमंडी को वे यही कहते थे) के बाजार से आए किस्से या फिर बंटवारे का दर्द। वहीं गालिब से जुडे़ किस्से काफी ठहरे और गहरे मालूम होते हैं। एक किस्सा  किताब से...
 मंटो भाई, मैं राममोहन राय की बात बता रहा था न? उनको मैंने नहीं देखा था, पर उनके बारे में बहुत बातें सुनी थीं। सतीदाह के विरुद्ध उनकी लड़ाई की बात सुन कर मैंने उनके बारे में कही और बातों को याद नहीं रखा। नीमतला घाट के श्मशान पर मैंने सतीदाह देखा था। और गंगायात्रियों को भी देखा था। मृतप्राय: लोगों को गंगा के किनारे ले जाया जाता था, वहां उन्हें एक घर में रख दिया जाता था, रोज ज्वार के समय नाते-रिश्तेदार उनके शरीर को बहुत आगे तक गंगा के पानी में डुबोकर रख देते थे। इसका नाम अन्तर्जली यात्रा थी, मंटोभाई। वे दिनों-दिन धूप में जलकर, बारिश में भीगकर, ठंड से तकलीफ पाकर मरते थे। जब जरा सी मुखाग्नि देकर उन्हें पानी में बहा दिया जाता था।
   उसी तरह  बनारस के समीप पहुंचकर गालिब जो कहते हैं- सोचता था इस्लाम का खोल उतार फेंकू, माथे पर तिलक लगा, हाथ में जपमाला लेकर गंगा किनारे बैठकर पूरी जिंदगी बिता दूं, जिससे मेरा अस्तित्व बिलकुल मिट जाए। गंगा नदी की बहती धारा में एक बूंद पानी की तरह खो जा सकूं। अपने लेखन के हवाले से मंटो कहते हैं न मैं उन्हें और न प्रगतिशील मुझे बर्दाश्त कर पाते थे क्योंकि उनके हाथ में जो गज फीता होता है न उसके हिसाब से मैं कहानी नहीं लिख पाता। उन्हें कैसे बताता कि एक टूटी हुई दीवार का पलस्तर झड़ रहा है और फर्श पर अनजाने नक्शे बनते जा रहे हैं मैं उसी तरह की एक दीवार हूं।
  बहरहाल, एेसे बेहिसाब किस्सों से दोखनामा आबाद है। दो जिंदगियां पूरे संताप और शबाब के साथ खुलती और खिलती हैं। इक्कीसवीं सदी का पाठक सीधे तौर पर दो सदियों से और यूं कई सदियों का दौरा कर आता है। मूल बांग्ला से अनुवाद अमृता बेरा का है जो इस संताप और शबाब को महसूस करने में कहीं बाधा नहींं बनता।   आखिर में गालिब के दो शेर
थी खबर गर्म के गालिब के उडे़ंगे पुर्जे
देखते हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ

जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

जो भी हो आने वाली कई पीढि़यां इस राख को कुरेदती रहेंगी क्योंकि यहीं से मानवता की खुशबू आती है। इन किस्सों में विभाजन, फिरकों की वीभत्सता भी है तो मानवता का मरहम भी।


Wednesday, March 9, 2016

पधारो म्हारे देश से जाने क्या दिख जाए


इन दिनों एक जुमला हरेक की जुबां पर है। कुछ अलग हो, एकदम डिफरेंट, जरा हटके। सभी का जोर नएपन पर है, नया हो नवोन्मेष के साथ। कैसा नयापन? पधारो म्हारे देश से जाने क्या दिख जाए जैसा? बरसों से पावणों को हमारे राजस्थान में बुलाने के लिए इसी का उपयोग होता था। पंक्ति क्या दरअसल यह तो राजस्थान के समृद्ध संस्कारों को समाहित करता समूचा खंड काव्य है जिसके साथ मांड गायिकी की पूरी परंपरा चली आती थी। जब पहली बार सुना तो लगा था, इससे बेहतर कुछ नहींं हो सकता । खैर, अब नया जमाना है, नई सोच है मेहमानों को बुलाने के लिए नई पंक्ति आई है जाने कब क्या दिख जाए।
यूं भी हम सब चौंकने के मूड में रहते हैं, किसी अचानक, अनायास की प्रतीक्षा में ।    ...और जब सैर-सपाटे पर हों तो और भी ज्यादा। कभी रेगिस्तान में दूर तक रेत  के धोरे हों, कभी यकायक ओले गिर जाएं, कभी पतझड़ की तरह पत्ते झडऩे लगे और कभी बूंदे ही बरसने लगे। यही तो मौसम का मिजाज है इन दिनों हमारे यहां। इस  कैंपेन के जनक  एड गुरु पीयूष पाण्डे  हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान उन्होंने बताया कि मेहमान आ नहीं रहे थे  इसलिए बदलना पड़ा।  खैर यह बहस का मुद्दा हो  सकता है।
      बहरहाल, हम सब क्रिएटिविटी से जुडऩा चाहते हैं। कुछ नया रचने की ख्वाहिश में सृजनशील सदा ही प्रयासशील रहते हैं। सवाल उठता है कि बच्चों में कैसे क्रिएटिविटी का बीज रोपा जाए? वे कैसे इस विधा को साधें क्योंकि आने वाले वक्त में यही बाजार, नौकरी में भी टिके रहने के लिए जरूरी होगा। सृजन केवल लेखक, कवि, चित्रकार का हक नहीं है। 


 उत्तर पुस्तिकाओं में एक जैसे उत्तर लिखकर अंक तो हासिल किए जा सकते हैं, लेकिन भविष्य में कुछ बेहतर रचा जा सकता है इसकी संभावना बहुत ज्यादा नहीं रहती है। भविष्य रचनाशीलता का है। लेखिका एलिजाबेथ गिल्बर्ट ने इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की है। ईट, प्रे एंड लव और बिग मैजिक की लेखिका गिल्बर्ट के अपने कोई बच्चे नहीं हैं, लेकिन वे कभी बच्ची थीं और यह जवाब वहीं से आया है। वे लिखती हैं हम भी किसी सामान्य अमेरिकी परिवार की तरह अस्सी के दशक में अपना शहरी जीवन जी रहे थे। सब परिवारों के अपने घर थे, गाड़ियां  थीं, टीवी था। सब काम पर जाते थे और लौट आते थे। मेरे पिता नेवी छोड़ चुके थे और एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर थे। मां पार्ट टाइम नर्स थीं और शेष समय में वे बेहतरीन गृहिणी की तरह हम दो भाई-बहन को संभालती थीं। एक दिन उन दोनों को लगा कि यह तो वो जिंदगी नहीं जिसे वे जीना चाहते थे। वे हम दोनों बच्चों को लेकर शहर से बाहर अपने पुराने फार्म हाउस में आ गए। वह एक टूटा-फू टा घर था जहां बिस्तर से उठते ही पानी के नाम पर बर्फीले पानी का गिलास मिलता। बर्फ के क्रिस्टल मेरी खिड़की पर जमे होते। घर का केवल एक हिस्सा गर्म किया जाता वो भी उस लकड़ी से जिसे मेरे पिता काटकर लाते। हमने वहां बकरियां, बत्तख और मुर्गियां पाली थीं। मां घर का बना मक्खन, चीज हमें खिलाती थीं। सब्जियां भी फार्म हाउस में उगार्ई थींं।
   बेशक हम बच्चों को यह जिंदगी काफी मुश्किल लगती थी क्योंकि कभी-कभी तो बाथरूम में पानी भी नहीं होता था। हम बारिश के इकट्ठे  पानी से काम चलाते थे। पिता ने कार चलाना, शेविंग करना छोड़ दिया था। वे साइकिल से आते-जाते थे। वे दिनभर अपने काम में लगे रहते। उन्होंने अपने लिए जैसी जिंदगी सोची थी वैसा ही किया। वे खुश थे। उन्होंने उपभोक्ता बनने की बजाय नया रचने की कोशिश की। तब वाकई बुरा लगता था, लेकिन आज सोचती हूं तो अच्छा लगता है। आज मैं उस चुनौतीपूर्ण बचपन के लिए उनकी आभारी हूं। मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि मेरे माता-पिता ने कुछ अलग करने की कोशिश की। बच्चों को कुछ भी कहने से वो नहीं सीखते, वे सीखते हैं यदि अपने सामने कुछ होता हुआ देखें। मेरे पिता को नौ से पांच की वह ऊब भरी जिंदगी पसंद नहीं थी इसलिए उन्होंने खुद को बदला।
    जाहिर है क्रिएटिविटी की कोई कक्षा नहीं होती। इसे किसी पाठ की तरह भी नहीं पढ़ाया जा सकता। जीवन जीने की शैली इस बीज को रोपती है। क्रिएटिविटी का यह बीज मशीनी मानव तैयार करके नहीं पल्लवित होगा। सृजन कारखानों में नहीं होता। उस जमीन से होता है जहां उसे खुलकर खिलने की आजादी हो। बंधे-बंधाए ढर्रे को तोडऩा ही सृजन है। हम लीक पर चलकर नया नहीं करे सकते।
लीक लीक गाड़ी चले लीकहिं चले कपूत
 लीक छोड़ तीनों चलें शायर सिंह सपूत

Wednesday, March 2, 2016

आंदोलन की आड़ में अस्मत


मुरथल के हालात बताते हैं कि आधी दुनिया के लिए शेष आधी दुनिया अब भी उपभोग की वस्तु है। जिसे जब भी मौका मिलेगा वह उसे दबोच लेगा। यह भयावह है कि आंदोलन का एक हथियार यह भी था। अव्यवस्था और अविश्वास का आलम देखिए कि पीडि़त को ना तो पुलिस पर भरोसा है और ना व्यवस्था पर। कोई सामने नहीं आ रहा। एक पीडि़ता सामने आई है जिन्होंने अपने देवर को भी दुष्कर्म के गुनाह में शामिल किया है। पुलिस को लगता है कि ये पारिवारिक मामला हो सकता है। किसके खिलाफ लिखाएं रिपोर्ट? कौन सुनवाई करेगा, कहां-कहां अपने जख्मों को दिखाएंगी वे? आठ मार्च महिला दिवस  से  जुड़े सप्ताह में एेसी कहानियां कौन लिखना चाहता है लेकिन समय तो जैसे वहीं रुका हुआ है। वह सभ्य होना ही नहीं चाहता। बर्बरता उसकी रग-रग में समाई है।
 
टंकी में जा छिपी लड़कियां
ये वाकई दहलाने वाला है कि दिल्ली से 50 किमी दूर सोनीपत जिले में मुरथल एक सैर-सपाटे की जगह है जहां अकसर परिवार और जोड़े घूमने के लिए जाया करते हैं। बाईस और २३ फरवरी के दरम्यान जाट आंदोलन के दौरान तीन ट्रक चालकों ने कहा है कि उन्होंने देखा है कि आंदोलनकारी महिलाओं को गाडि़यों से खींचकर निकाल रहे थे। कुछ ने भागकर सुखदेव ढाबे में छिपकर खुद को बचाया तो कुछ को ये राष्ट्रीय राजमार्ग (एन एच-वन) के आसपास के खेतों में ले गए। कुछ लड़कियां घंटों तक टंकियों में छिपी रहीं। आरोप है कि उनके साथ दुष्क र्म हुआ। पुलिस ने इन खेतों से कपड़ों के टुकडे़ भी जमा किए हैं। इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक ट्रक मालिक-चालक निरंजन सिंह के बयान के मुताबिक इसी हाईवे पर भीड़ ने मेरे ट्रक को भी जला दिया। २२ फरवरी को सुबह साढे़ ग्यारह बजे के आसपास कुछ आंदोलनकारी मोटर साइकिल पर सवार होकर आए। उसी समय कुछ स्त्रियां उस क्षेत्र में स्थित एक स्कूल में छिपने के लिए जा रही थीं तब इन्होंने उनसे कहा कि खतरा है आप चक्कर लगाकर जाएं। जब उन्होंने रास्ता बदला तो इन मोटर बाइक सवारों ने उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया। उनके बैग, जेवर छीने। उन्हें थप्पड़ भी मारे। मुझे नहीं लगता कि उन्होंने और नुकसान नहीं पहुंचाया होगा। तीन लड़कियों ने घंटों टंकी में छिपकर खुद को बचाया।
वे नहीं दौड़ पाईं
निरंजन सिंह पठानकोट के थे। जालंधर के सतवीर सिंह उस दिन चंढीगढ़ से दिल्ली आ रहे थे। उनका कहना था कि महिलाएं अपने वाहनों से निकलकर दौड़ रही थीं। जो नहीं दौड़ पाईं वे दबोच ली गईं। नहीं जानता था कि वे कौन थीं और उनके साथ क्या हुआ। नंगे पैर खुद को बचाते हुए दौड़ती महिलाओं को उस दिन कई लोगों ने देखा। मोहम्मद शाहीन जो पानीपत से दिल्ली लौट रहे थे उन्होंने भी कई महिलाओं को सुखदेव ढाबे में शरण लेते हुए देखा। भीड़ में से अधिकांश नशे में थे। उनकी कार को भी आग लगा दी गई। वे मानते हैं कि जो हालात थे उससे किसी भी अनहोनी से इनकार नहीं किया जा सकता। काश स्त्रियों से कहा जाता कि आप सुरक्षित हैं, हमारा कोई बंदा आपको तकलीफ नहीं देगा।
हक के नाम पर
जो आंदोलन की यही हकीकत है तो यह भयावह है। यह दुनिया अब भी स्त्रियों के जीने लायक नहीं है। भेडि़ए उनकी ताक में हमेशा हैं। एक ट्रक चालक का तो यह भी कहना है कि एेसा भयावह मंजर तो १९८4 में सिख दंगों के दौरान भी नहीं था। अराजक भीड़ इस कदर बेकाबू थी, जैसे उन्हें एेसा करने की छूट हो। दुष्कर्म के सबूत हैं, हालात को बयां करते बयान भी हैं लेकिन किसी के पास हिम्मत नहीं है कि वे आकर कहें कि हां हमारे साथ यह हादसा हुआ है। पुलिस न्यायालय इंतजार कर रहे हैं। हेल्प लाइन  18001802057 शुरू कर दी गई है लेकिन कोई नहीं बता रहा है। कोई क्या बताएगा? अनजानी जगह पर अनजाने लोगों ने उनके साथ बदसुलूकी की? कैसे साबित करेंगी वे? कोई यकीन करेगा? कौन ताजिंदगी उनके वकीलों के सवालों के जवाब देता फिरेगा? बेहतर है चुप्पी साधो। न्याय की उम्मीद में चुप्पी साधने में ही भलाई समझ रही हैं वे अपनी।
एक मामला आया सामने
इस मामले में एक महिला जो उस दिन बस से दिल्ली जा रही थी, ने पुलिस को शिकायत दर्ज कराई है। बस के खराब होने के बाद वे एक वैन में सवार हुई जब यह घटना हुई। उनकी चौदह साल की बेटी भी साथ थी जिसके कपड़े फाड़ दिए गए लेकिन अपराधियों ने उसे बख्श दिया। और भी महिलाएं हैं जिनके साथ एेसा हुआ। महिला ने कहा कि इसमें उसका देवर भी शरीक है इसलिए पुलिस उसे पारिवारिक विवाद की तरह भी देख रही है। यह चिंताजनक है कि बहन-बेटियों के लिए सुरक्षित समाज की रचना हम नहीं कर पाएं हैं। एेसी अराजकता कि आप गाडि़यों से निकाल-निकालकर उन्हें नुकसान पहुंचाएं। चित्तौड़ की महारानी पद्ििमनी के साथ स्त्रियों के जौहर, बंटवारे के समय दोनों ओर पैदा हुए उन्माद से किस तरह अलग किया जा सकता है इस वहशीपन को। जो भी इससे रूबरू हुआ होगा यह भयावह मंजर उसे जिंदगी के प्रति बेहद निराशा से भर देगा। यही तो हो रहा सदियों से। पढ़-लिखकर क्या बदला है हमने कि अभी कुछ पढ़ा-लिखा ही नहीं।
बनाई है तीन सदस्यीय जांच समिति
जाहिर है पुलिस चाहती है कि घटनाएं रिपोर्ट हों। पीडि़त अपना पक्ष रखे। इसके लिए डीआईजी राजश्री सिंह के नेतृत्व में डीएसपी भारती डबास और सुरिंदर कौर के साथ तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की गई है। तीनों महिलाएं हैं ताकि पीडि़ता नि:संकोच अपनी बात कह सकें लेकिन कोई हिम्मत नहीं कर सका है। बेशक कोशिश अपराध की तह में जाने की है लेकिन पहली ही पीडि़ता की शिकायत पर यह कहना कि ये पारिवारिक विवाद का मामला लगता है पुलिस की संवेदनशीलता को कम करता है। महिला उस दिन उस क्षेत्र में थीं, उनसे कई तरह के सबूत जुटाए जा सकते हैं।