Wednesday, February 17, 2016

ये राष्ट्रवाद और ये राष्ट्रद्रोह

साल 1947 में मिली आजादी खून में लिपटी हुई थी। बंटवारे ने आजाद देश तो बनाए, लेकिन वे अपनों के ही खून से रंगे हुए थे। हम चाहकर भी इसे भुला नहीं सकते। आजादी के बाद सांस ले रही तीसरी किशोर पीढ़ी भी इस पीड़ा से मुक्त नहीं है। नतीजतन, हम इस नफरत की आग से घिरे हुए हैं और पाकिस्तान, ये नाम ही हमारे खून में उबाल लाने के लिए काफी है। देशभक्ति की तमाम परिभाषाएं इस मुल्क में विरोध के आसपास सिमट गई हैं। टीवी चैनल्स भी दोनों तरफ के नुमाइंदों को बैठाकर इस कदर चीखते-चिल्लाते हैं कि लगता है यही सही है। अपशब्दों की जुगाली कइयों  की रोजी है। हाल में कु छ एेसा भी हो गया है कि पाकिस्तान का विरोध देशभक्ति है और पाकिस्तान के हक में बोल जाना देशद्रोह। क्या राष्ट्रवाद की इतनी सीमित परिभाषा के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने कुर्बानी दी होगी कि आजादी के बाद इतने साल साल नफरत की आग पर बने मुल्क को कोसते हुए बिता दो। सच है कि हमने युद्ध भी लड़े हैं लेकिन लड़ाई तो चीन ने भी हमसे की?
इन दिनों हम क्या कर रहे हैं? इसी आधार पर अपने विद्यार्थियों से जूझ रहे हैं। असहमति के लिए कोई जगह नहीं है हमारे पास। कोई उस मुल्क को जिंदाबाद कह रहा था, कोई आतंकवादी इस बरसी के आयोजन को सपोर्ट कर रहा था इस आधार पर हम पूरे विश्वविद्यालय को कटघरे में खड़ा नहीं कर सकते। बेशक आतंकवाद और आतंकवादी के समर्थकों की जगह समाज से बाहर है लेकिन फांसी जैसी बर्बरता को बरकरार रखा जाए या नहीं इस पर तो बहस हो ही सकती है। एक सहिष्णु देश में इस पर पूरी बहस करने का अधिकार हम सबको है। यहां दोहराना जरूरी है कि अगर आतंकवाद का समर्थन और देश के खिलाफ नारेबाजी साबित होती है तो जरूर कार्रवाई होनी चाहिए।  

         पाकिस्तान का नाम लेना इतना ही बड़ा गुनाह है तो क्यों हमारे देश के लोकप्रिय लीडर वहां जाकर जन्मदिन की बधाई देते हैं। उनकी माताजी को शॉल भेंट करते हैं। क्यों वे भी यहां आकर शपथ समारोह का हिस्सा बनते हैं? ये बर्फ पिघलाने की कोशिश करें तो दुनिया के समझदार लीडर्स और जो इनके देशवासी करें तो दोषी? कोई पाकिस्तानी खिलाड़ी की तारीफ करे या टीम को जीत के काबिल बताए तो देशद्रोही। राष्ट्रवाद की इस परिभाषा को बदलने की जरूरत है। सोशल  नेटवर्किंग साइट्स पर भावनाओं का ज्वार ज्वर में बदल चुका है। विश्वविद्यालय और उसके विद्यार्थियों पर बेहिसाब आरोपों की गोलियां हैं। सही समय है कि हमें तय करना होगा कि ये पड़ोसी मुल्क हमारा जानी दुश्मन है। हमारे सैनिक शांतिकाल में भी लगातार कश्मीर में शहीद हो रहे हैं। मौसम से लड़ाई वे सियाचिन में लड़ते हैं। माइनस पचास डिग्री तक के तापमान में अब तक हमारे नौ सौ शहीदों में से अस्सी फीसदी मौसम का शिकार हुए हैं। पठानकोट जैसी घटनाएं भी हो रही हैं। एेसे में हमें आर-पार की लड़ाई लडऩी चाहिए। विद्यार्थियों को भी ये स्पष्ट होना चाहिए कि पाकिस्तान की बात करना ही गुनाह  है, देशद्रोह है। इस दुविधा या कन्फ्यूजन को दूर होना चाहिए कि हमारा दुश्मन देश पाकिस्तान ही है। किसी को नागरिकता देने, गीता को लौटा लाने की पहल जैसे भाव युवाओं को भ्रमित करते हैं।
मेरे पुरखे सिंध से विभाजन के दौरान भारत आए थे। अपना सब कुछ छोड़कर हिंदुस्तान आने के लिए मजबूर सिंधियों का दिल अब भी सिंध में रखा है। वे सिंध को खूब याद करते हैं और अब भी सिंधी सम्मेलनों में वही गीत, वही नाटिकाएं मंचित होती हैं, जो देखने वालों को सिंध की याद में रुला देती हैं। क्या वे देशद्रोही हो गए?  वैसे वे पाकिस्तान से नफरत करते हैं। उन्हें लगता है कि इसी पाकिस्तान के कारण उन्हें अपना अबाणा (अपनी जमीन) छोडऩी पड़ी थी। भारत की सहिष्णुता और उनके व्यवहार ने उन्हें कभी महसूस नहीं होने दिया कि वे बेघर या शरणार्थी हैं, जबकि पाकिस्तान के कई शोधार्थी यह जानना चाहते हैं कि क्या यहां सिंधी-पंजाबियों के साथ मुहाजिरों जैसा बर्ताव नहीं होता। खैर, विषय से भटकने का एकमात्र मकसद यही था कि हम कुछ चीजों को पूरी तरह काटकर रखना चाहने के बावजूद  काट नहीं पाते।
बहरहाल, पुणे, अलीगढ़ हैदराबाद के बाद दिल्ली के विद्यार्थी निशाने पर हैं। सारे विद्यार्थियों में खोट है क्या? कहीं हमारे चश्मे पर ही तो धुंध नहीं छा गई है?




Friday, February 5, 2016

इश्क़ रंगता है मुझे रोज़

आज किसी ने कहा
आपको देखकर लगता है
कोई नई ऊर्जा छू गई है
अब क्या कहती
सीधे तुम तक आ गयी
मेरी नई चेतना भी तुम
पुराना अचेत भी तुम
चेत, अचेत, अवचेतन सब तुम
मेरा हर फ़ेरा बस तुम

नित बदलती नई दुनिया में
तुम्हारा  हिमालय-सा यकीन
हर रोज नए मायने गढ़ लेता है
मैं उसी पुराने प्रेम के
नए रस में रोज भीगती हूं, बढ़ती हूं
नए समय के नए केनवस पर
भीगती,रंगती, खिलती, डूबती, मैं

प्रेम यूं भी देता है नए मायने
 

Wednesday, February 3, 2016

मेनका जी कैसे बता दें बच्चे का जेंडर


मेनका जी कैसे बता दें बच्चे का जेंडर ? आपको डॉक्टर्स के काम के बोझ की चिंता है उस स्त्री की नहीं जिसका दर्जा आज भी भारतीय समाज में दोयम ही है

 अब तक हम यही मानते आ रहे हैं कि गर्भ में पल रहे शिशु का लिंग जानना अपराध है। जोड़े जब अल्ट्रासाउंड (सोनोग्राफी) के लिए जाते भी तो एेसी कोई कोशिश नहीं करते। जिन्हें जानना होता था कि आने वाली संतान लड़की है और वे उसे गर्भ में ही समाप्त कर देना चाहते हैं, वे एेसी सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा भी नहीं बनते। ज्यादा पैसे लेकर जांच करने और उसे गर्भ में ही गिरा देने के लिए डॉक्टर्स, नर्सेस का स्टिंग ऑपरेशन हमारे शहर जयपुर में ही हुआ है। अब जयपुर में ही सोमवार को केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा  कि माता-पिता को  बताया जाए कि उनके गर्भ में पल रही संतान का लिंग क्या है और जो यह प्रक्रिया प्रसव तक नहीं पहुंचती है तो उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया जाए। मंत्री कहती हैं कि इससे घरों में होने वाले असुरक्षित प्रसवों पर भी रोक लगेगी और अनावश्यक तौर पर डॉक्टर्स और नर्सेस भी सलाखों के पीछे नहीं होंगे जो पहले ही ज्यादा काम के बोझ से दबे हैं।
     पहली नजर में यह सोच बेहतर लगती है लेकिन दूसरे ही पल लगता है कि गर स्त्री और उसके परिवार को गर्भस्थ शिशु का लिंग पता चल जाए तो क्या वे सामान्य रह पाएंगे। बेटी की मां बनने वाली को बेटे की मां बनने वाली जिताना ही दुलार और खान-पान मिल पाएगा? अगर स्त्री दूसरी या तीसरी बार भी बेटी की मां बनने जा रही है वह खुद को उत्फुल्लित रखकर गर्भस्थ शिशु का ध्यान रख पाएगी? गर्भस्थ शिशु को बिगाडऩे के तरीके केवल 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑव प्रेगनेंसी'(एमटीपी) के तहत ही नहीं होते, समाज ने सदियों से इन्हें ईजाद भी किया है और याद भी रखा है।
      यह भी याद किया जाना जरूरी है कि आखिर 1994 में मौजूद किन परिस्थितियों के चलते लिंग परीक्षण पर रोक लगाई गई थी। दुरुपयोग का जो खतरा तब था क्या आज 22 साल बाद टल गया है? क्या समाज  विकसित होकर नई करवट ले चुका है? क्या लड़के की आस में तीसरी बेटी भी कुबूल है? क्या हमने एक बेटी के बाद दूसरे चांस में बेटे की तमन्ना छोड़ दी है? क्या हम दूसरी-तीसरी बेटी के बाद भी दंपति को चहककर बधाई देते हैं ? इन सवालों के जवाब अगर हां है तब तो मंत्री बिलकुल सही कह रही हैं। हम लड़कियों के लिए उदार  समाज हैं हमें पैदा होने से पहले ही उनके आने का पता दे देना चाहिए। जो जवाब ना
4  बदलने की तैयारी चल रही है) वाला प्रतिबंध ही उचित है। बेटियों को गर्भ में तो शांति से पलने दो।
      ख्यात लोक नर्तकी गुलाबो को तो समाज ने पैदा होते ही दफन कर दिया  था। पैदा होने तक का ट्रेक रिकॉर्ड रख भी लिया तो पैदा होने के बाद गायब बच्चियों का क्या करोगे। स्त्री-पुरुष अनुपात तब सुधरेगा जब बेटियों के जिंदा रहने का माहौल होगा। शनिवार को धौलपुर में चौदह वर्षीय किशोरी उस समय दुष्कर्म के बाद कत्ल कर दी गई जब वह खेत में खाना लेकर जा रही थी। दुष्कर्म और हत्या की कई घटनाएं रोज पुलिस के रोजनामचे में चढ़ती हैं और कई तो नहीं भी चढ़ती। केवल गर्भ में ट्रैक रखकर कुछ नहींं होगा बल्कि इस तरह तो हम वहां भी उसका अहित ही करेंगे।