Wednesday, January 27, 2016

भीतर देवदासी चलेगी स्त्री नहीं


नए साल की ठंडी सांझ में चंडीगढ़ की सड़क पर जब एक गुरुद्वारा दिखा तो हम सब सर ढककर भीतर हो लिए। गुरुग्रंथ  साहब को प्रणाम कर जब पैसे निकाल कर दानपेटी ढूंढऩी चाही तो एक सेवादारनी ने धीमे लेकिन साफ शब्दों में कहा कि यहां पैसे नहीं चढ़ते। हमने चुपचाप पैसे अंदर रख लिए। यह निषेध था लेकिन मन को बहुत अच्छा लगा। अगर इन्होंने गुरुद्वारे के बाहर ही यह कहकर रोक लिया होता कि आप स्त्री हैं और भीतर नहीं जा सकती तब जाहिर है यह रोक या बैन हमें भीतर तक आहत कर जाता। केरल स्थित विश्व के बड़े तीर्थस्थल  सबरीमाला  अयप्पा मंदिर में यही सब हो रहा है। वहां दस से पचास वर्ष की महिला का भीतर जाना वर्जित है। उनके तर्क  हैं कि ये अवतार ब्रह्मचर्य का है और मासिक धर्म एक अपवित्र प्रक्रिया है। हमारे यहां किचन में भी उन दिनों स्त्री का जाना वर्जित है । उनका तीसरा तर्क है कि महिलाओं का इतनी लंबी और जंगल से होने वाली परिक्रमा करना ठीक नहीं है। वे मन ही मन ईश्वर का ध्यान कर सकती हैं। केरल के सबरीमाला में हर साल छह करोड़ यात्री दर्शन के लिए आते हैं और यह नाम उस आदिवासी शबरी के नाम पर है जिनके झूठे बेर राम ने खाए थे। वाकई हैरानी होती है कि  जो मंदिर ही शबरी के नाम पर है वहीँ महिलाओं को जाने की इजाज़त नहीं।
   महिलाओं को प्रवेश नहीं देने का यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय में है। याचिका दायर करने वाले वकील का कहना है कि उन्हें धमकियां मिल रही है इसलिए वे केस वापस लेना चाहते हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट का कहना है वकील चाहे तो पीछे हट सकते हैं  सुनवाई जारी रहेगी। महिलाओं को नहीं जाना चाहिए इस मामले में बोर्ड के मुखिया का एक और तर्क है कि जब हम तिरुअनंपुरम के उत्सव पोंगाला में नहीं जाते हैं जहां सिर्फ महिलाएं भाग लेती हैं तब हम तो विरोध नहीं करते। तर्क और भी हैं जब महिलाएं दाह संस्कार जैसे कर्मों से अलग की जा सकती हैं तो यहां क्यों नहीं। वे प्रकृति से कोमल होती हैं इसलिए उन्हें इन कठिन कार्यों से दूर रखा गया लेकिन अब जब ये ही बहादुर स्त्रियां अपने माता पिता या किसी अन्य प्रियजन की चिता को अग्नि देती हैं तो समाज और समाचार पत्र दोनों ही प्रोत्साहित करते हैं। एेसे किसी मामले में कोई न्यायालय का द्वार खटखटाते हुए नहीं मिला।
  बंदे और खुदा के बीच पर्दे की पैरवी करने वाले ये क्यों भूल जाते हैं ना तो स्वयं ईश्वर और ना ही हमारा संविधान किसी भी तरह के भेदभाव का समर्थन करता है। फिर कैसे महाराष्ट्र के  शनि शिंगणापुर मंदिर में एक स्त्री के छूने भर से कोई मूर्ति अपवित्र हो गई। बाद में उस मूर्ति को दूध से धोकर पवित्र किया गया। सालों पुराने हमारे नियमों में तो यह भी शामिल था कि जब भी कोई सात समंदर पार से लौटकर आए (यानी यूरोप और अमेरिका) तो उसकी भी शुद्धि की जाए। हम आज तो एेसा नहीं करते। उल्टे विकास के सारे मानदंड ही अब वहीं से तय हो रहे हैं। हमें मंदिर में देवदासी प्रथा को प्रश्रय देने से कोई ऐतराज नहीं है लेकिन उसके  प्रवेश से है। देवदासी ईश्वरीय सेवा के लिए नियुक्त स्त्रियों के नाम पर पुरुषों के हाथ का खिलौना थीं।
  प्रतिबंध तो हमने दलितों के प्रवेश पर भी लगा रखा था लेकिन आजादी के बाद हमारे संविधान ने उन्हें यह हक लौटाया। बहरहाल आठ साल से सबरीमाला मामला सर्वोच्च न्यायालय में है और अब इसकी सुनवाई हो रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि फैसला सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करेगा ना कि लिंग भेद को बढ़ावा दे। एेसा ही एक प्रतिबंध मुंबई की हाजी अली दरगाह पर भी चस्पा है। वहां भी मजार के एक हिस्से में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है। मामला मुंबई हाई कोर्ट में है। तर्क यही कि स्त्रियां पुरुष मजार के करीब नहीं हो सकती। लड़ाई जारी है बंदों ने खुदा से ही पर्दा करा दिया है।

Wednesday, January 13, 2016

जयपुर से फुलेरा

हमारी लापरवाही की उधड़ी लेकिन सिस्टम की सिली बखिया दिखाती एक पोस्ट 
एएसआई रामखिलावन मीणा, हेड कांस्टेबल भागूराम और कांस्टेबल शिव सिंह टैब सौपते हुए

नए साल का आगाज जो यकीन से हो तो उम्मीद बंधती है और जो नायकीनी से हो तो? जयपुर रेलवे स्टेशन से चली आशंका अगर फुलेरा पर जाकर निर्मूल साबित होती है तो हालात बेहतर हैं एेसा मानना चाहिए। घटना कुछ यूं है कि चंडीगढ़ से तीन जनवरी की सुबह जयपुर पहुंची गरीब रथ से उतरने के बाद बेटे को याद आया कि हम अपना टैब (मोबाइल और लेपटॉप के बीच का वर्जन) तो ट्रेन की ऊपरी बर्थ पर ब्लैंकेट के नीचे ही भूल आए हैं। लापरवाही हो  चुकी थी] ऑटो स्टेंड से प्लेटफॉर्म पर लौटे तो देखा ट्रेन प्लेटफॉर्म छोड़ अजमेर की ओर सरक चुकी है। तुरंत स्टेशन मास्टर के कार्यालय पहुंचे। ट्रेन की लोकेशन मालूम कर उन्होंने कहा कि आप आरपीएफ (रेलवे पुलिस फोर्स) में जाकर शिकायत लिखा दीजिए। वहां सब इंस्पेक्टर बलराम काजला (यही नाम उनके बैज पर लिखा था) अपने काम में मसरूफ थे। हमें बैठाकर उन्होंने फोन पर कहीं सूचना दी पता लगा गाड़ी करीब डेढ़ घंटे बाद फुलेरा पहुंचेगी तभी कुछ हो सकता है। टैब जिस कवर में था उसके रंग-आकार का पूरा ब्यौरा उन्होंने आरपीए को दे दिया। लगा था कि फुलेरा में अगर पुलिस को मिला तो लौटती ट्रेन से जयपुर भिजवा दिया जाएगा। माफ कीजिएगा आशंका तो यह भी थी कि शायद बीच में ही कहीं गायब ना हो गया हो।
      सुबह आठ से भी पहले का वक्त था यह। पुलिसकर्मी एक-एक कर आते और जय हिंद के साथ काजला जी के रजिस्टर में हाजिरी दस्तखत करते जाते। जब काफी अमला दफ्तर  आ चुका तो उन्होंने एक कांस्टेबल को पुकारा-'कहां थे तुम कल? अपनी बीट छोड़ फिल्म देख रहे थे? अभी रिपोर्ट डालता हूं। 'आप तो अधिकारी हैं कुछ भी कर सकते हैं- सिपाही ने मुुंह खोला। 'अच्छा अधिकारी' .. तो बताओ तुम कहां थे। 'वो साब उन्होंने चाय पीने को बुलाया तो मैं चला गया था।' सिपाही बुदबुदाया। 'मैं तो रिपोर्ट डाल रहा हूं। काजला सख्त थे। तभी बीच बचाव के लिए अन्य सिपाही साथी आए और बोले साहब देख लीजिए। एक मौका दे दीजिए। शायद काजला कुछ नर्म पडे़ थे। इस सबके बीच ट्रेन फुलेरा पहुंच चुकी थी और वहां से अच्छी खबर आ गई थी कि एक टैब ट्रेन में मिला है। काजला ने फोन पर ही कहा ठीक है अगली ट्रेन से उसे जयपुर भिजवा दीजिए। उधर से आवाज आई कि नहीं भिजवाया जा सकता।  सवारी को मय टिकट और पहचान पत्र के फुलेरा आना होगा। एक सिपाही ने तुरंत बताया कि फुलेरा जाने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म पर खड़ी है आप जल्दी निकलिए। फुलेरा जाने के लिए 100 रुपए के दो जनरल टिकट लेकर ज्यों ही प्लेटफॉर्म पर पहुंचे ट्रेन रवाना हो चुकी थी। अब अगली ट्रेन एक घंटे बाद पूजा एक्सप्रेस थी जो पूरे दो घंटे लेट होकर जयपुर पहुंची।
फुलेरा पहुंचे तो आरपीएफ कार्यालय ने सभी दस्तावेजों की फोटो प्रति ली। बरामद वस्तु के बारे में सभी तथ्य क्रॉस चैक किए कि ये हमारा है भी कि नहीं। अब तक बरामद वस्तु के दर्शन नहीं कराए गए थे। एक सादे कागज पर लिखवाया गया कि हमें हमारी वस्तु मिल गई है। हमने मौजूद स्टाफ का नामजद शुक्रिया अदा किया लिखकर। एक तस्वीर ली गई। यह उनकी उपलब्धि बतौर थी और भविष्य में प्रमाण के तौर पर काम आ सकती थी। ज्यों ही टैबलेट हमारे हाथ आया तो यकीन आया कि अभी सिस्टम का पूरी तरह दाह-संस्कार नहीं हुआ है। अच्छा यह भी था कि किशोर होते बेटे का भी भरोसा बना था। एएसआई रामखिलावन मीणा, हेड कांस्टेबल भागूराम और कांस्टेबल शिव सिंह को धन्यवाद देकर हम निकल ही रहे थे कि फुलेरा से जयपुर जाने वाली ट्रेन सामने खड़ी थी। टिकट खिड़की यहां भी स्टेशन से बाहर थी। टिकट लेकर (यहां सत्तर रुपए के दो टिकट) जब तक प्लेटफॉर्म पहुंचे, यह ट्रेन भी रवाना हो गई। खैर, आधे घंटे में ही अगली ट्रेन मिली। जनरल में खडे़-खड़े यात्रा की थकान के बीच भी बड़ी खुशी थी कि खोई वस्तु मिला करती हैं। एक बात महसूस हुई कि सरकार भले ही तकनीक तकनीक कहे,  ये विभाग अब भी पूरी तरह कागज़ों पर ही आश्रित है, तकनीक से बहुत दूर
। काम की शैली भी पुरानी है।  

ps :सोचा था आपसे चंडीगढ़ शहर की नेकी (नेकचंद के बसाए रॉक गार्डन समेत) पर बात होगी लेकिन फिर इसे लिखने से रोक नहीं पाई। सिस्टम को जो हम सब दिन-रात कोसते हैं, वहां कभी उम्मीद को किरण मिल जाए तो उसका जिक्र भी जरूर होना चाहिए।