Friday, August 5, 2016

go girls go medals are waiting for u


 दुनिया का सबसे बड़ा खेल उत्सव कल  तड़के  सुबह ब्राजील की राजधानी रियो डी जेनेरियो में शुरू होने जा रहा है  । यह सचमुच अच्छा वक्त है क्योंकि पुराने वक्त में तो दमखम दिखाने का एकाधिकार केवल पुरुषों के पास था। शरीर को साधने का कोई मौका स्त्री के पास नहीं था। खुद को सजाने और खूबसूरत दिखने का प्रशिक्षण तो जाने -अनजाने हर लड़की  को उसकी पुरानी पीढ़ी दे देती थी लेकिन शरीर से पसीना बहाना, इस तपस्या में खुद को ढालना और फिर खरा सोना बन जाने का हुनर केवल इक्कीसवीं सदी की स्त्री में दिखता है। उजले चेहरे और तपी हुई त्वचा को देखने की आदत हमारी पीढ़ी को 1982 के दिल्ली, एशियाड से मिली। संयोग से उन्हीं दिनों शहरों को टीवी का तोहफा भी मिला था और एशियाई खेल इस पर सीधे प्रसारित हुए थे। उडऩपरी पी टी उषा का सौ मीटर और दो सौ मीटर में चांदी का पदक जीतना। वो चांद राम का पैदल दौड़ में पहले आना । ये मंजर देख हम बच्चों की आंखें सपनों से भर जाती। भारत-पाकिस्तान के हॉकी फाइनल मैच को देखने घर के बरामदे तक  में तिल धरने की जगह ना थी। यह जोश जुनून खेल देता है।     
2012 के लंदन ओलंपिक्स में जब मेरी कोम और साइना नेहवाल ने कांस्य पदक जीते तो वह देश के लिए कभी ना भूलने वाला पल बन गया। अभिनव बिंद्रा ने जब बीजिंग में सोने पर निशाना लगाया तो रोम-रोम रोमांचित हुआ था। भारत के ऊपर उठते ध्वज के साथ जब जन गण मन बजा तो लगा जैसे यही तो वे क्षण हैं जो राष्ट्र को गौरवान्वित करते हैं। राष्ट्र की अवधारणा ही ऐसे मंचों पर सार्थक होती है। खून-खराबों और एक राष्ट्र का दूसरे पर वर्चस्व किसी राष्ट्र के होने का पता नहीं देते लेकिन ओलंपिक खेल देते हैं। हमारी पहले की पीढ़ी ने ध्यानचंद की हॉकी का जादू देखा है तो मिल्खा सिंह और पीटी उषा जैसे एथलीटों को सेकेंड के सौवें हिस्से से पदक चूकते भी। अस्सी पार धावक मिल्खा सिंह का तो एकमात्र सपना ही देश को एथलेटिक्स में मैडल लेते देखना है। 
सच है कि आबादी के हिसाब से इन खेलों में हम बहुत पिछड़े हुए हैं। सवा अरब से ज्यादा की आबादी एक स्वर्ण पदक के लिए तरसती है। बीच-बीच में सुशील कुमार और नरसिंह यादव जैसे विवाद सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या हमारे देश में खेल नीति नाम की कोई सोच है या नहीं। इतने बड़े खेलों में जाने से पहले हम कोर्ट कचहरी में उलझते हैं कि कौन जाएगा और कौन नहीं। यह शर्मनाक है कि ब्रॉन्ज जीतने वाले योगेश्वर दत्त ये कहें कि मैं साई (स्पोर्टस अथॉरिटी ऑव इंडिया) की मैस में खाना नहीं खाता क्योंकि वहां उसमें कुछ मिला दिए जाने की आशंका होती है। देशवासी केवल भौचक्के होकर इन बातों को पढ़ते-सुनते रहते हैं। उन्हें कुछ समझ नहीं आता कि कौन सही है और कौन गलत। आखिर इस तरह के हालात के लिए कोई तो जिम्मेदार होगा। क्यों उन्हें चिन्हित नहीं किया जाता? भाग लेने से पहले इतना तनाव क्या खिलाड़ी की एकाग्रता को तबाह नहीं करेगा?
       वैसे 2016 के हमारे दल पर नजर डालें तो हमने पाया ही है। महिला खिलाडिय़ों की संख्या आधी-आधी न सही लेकिन आधी से थोड़ी ही कम है। ऐसा कहीं नहीं है ना प्रशासनिक सेवाओं में ना संसद में लेकिन यहां है। मेहनतकश महिला खिलाडिय़ों ने अपने दम पर यह मुकाम हासिल किया है। तीरंदाज दीपिका एक ऑटो रिक्शॉ चालक की बेटी हैं  और दूती चंद को तो स्त्री मानने से ही इंकार कर दिया गया था। जिमनास्ट दीपा करमाकर के तो पैर ही सपाट बता दिए गए थे फिर भी वे भारतीय दल में हैं। अपनी योग्यता के दम पर। यहां तक पहुंचना वाकई बड़ी बात है। लंदन ओलंपिक्स में हम 23 थे, रियो के लिए 54 का दल जा रहा है। बिना किसी आरक्षण के  यह अपने बूते पर हासिल की गई उपलब्धि है। साइना नेहवाल , मेरी कोम ने तो पदक भी दिलाए हैं। हम जीत रहे हैं और जीतेंगे यदि स्कूल और स्टेडियम में माहौल सकारात्मक हो। हर लड़की को कोई ना कोई खेल जरूर खेलना चाहिए। खिलाड़ी खुद में अतिरिक्त ऊर्जा का अनुभव करती है। वह नकारात्मक में भी सकारात्मक सोच का परचम लहराती है। खेल भावना उसे जीवन में भी कभी हारने नहीं देती। वे जीत रही हैं और जीतेंगी बशर्ते मम्मी-पापा उनके बचपन से ही खेलों को मेकअप की तरह प्रवेश करा दें। कॉस्मेटिक्स की परत रोमछिद्रों को बंद करती है, खेलों में बहाया पसीना इन रोम छिद्रों को खोलता है। चयन आपका है कि आप किसे तरजीह देती हैं। 


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