Thursday, June 30, 2016

दहेज़ नहीं दिया तो माथे पर लिख दिया मेरा बाप चोर है




महिलाओं के खिलाफ ऐसे नए-नए अपराधों की बाढ़ आ गई है कि दहेज थोड़ा पुराना-सा लगने लगा है। आउट ऑव फैशन-सा लेकिन यह धोखा है, भ्रम है हमारा। इसे आउट ऑव फैशन समझने-बताने वाले वे लोग हैं जो इन बातों के प्रचार में लगे हैं कि महिलाएं दहेज का झूठा केस ससुराल वालों पर करा देती हैं और अधिकांश ऐसे मामले अदालत की देहरी पर हांफने लगते हैं। ठीक है कुछ देर के लिए यही सच है ऐसा मान भी लिया जाए तो क्या बेटी के  माता-पिता के मन में बेटी के पैदा हेाते ही धन जोडऩे के खयाल ने आना बंद कर दिया है? क्या बेटे के जन्म लेने के बाद माता-पिता ने धन का एक हिस्सा इसलिए रख छोड़ा है कि यह नई बहू और बेटे के लिए हमारा तोहफा होगा? क्या बहुओं के मानस पर ऐसी कोई घटना अंकित नहीं है जब ससुराल पक्ष के किन्ही रिश्तेदारों न लेन-देन को लेकर ताने ना कसे हों? 
जब तक इस सोच में बदलाव देखने को नहीं मिलेगा दहेज का दानव कभी पीछा छोड़ ही नहीं सकता। दरअसल दहेज की अवधारणा लड़की की विदाई से जुड़ी है। पाठक नाराज हो सकते हैं कि क्या लड़की क ो विदा करना ही गलत हो गया? हां, हम क्यों कन्यादान, विदाई, पराई, जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं? सारी पीर इसी पराई शब्द में छिपी है? दो परिवार एक समाज मिलकर ब्याह कराते हैं। यह दो आत्माओं का मिलन है तो फिर एक पक्ष पर इस कदर बोझ क्यों ? क्यों एक लड़की से ही यह उम्मीद की वह अपनी जड़ों से उखड़कर नई जगह में पल्लवित हो? सब यही सोचते हैं कि ऐसा ही होता आया है, यही  रीत है, परंपरा है लेकिन कभी किसी ने इस नए सिरे-से खिलने में एक लड़की के खत्म होने की और ध्यान नहीं दिया। किसी ने कभी इस छीजत का हिसाब नहीं किया। उल्टे यह तो नियति है, यही तो होता आया है सदियों से, यही कहते हुए उसे इस पथ पर चलाते आए। 
जहां लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई हो रही है वहां हालात थोड़े बदले हैं लेकिन जहां ऐसा नहीं हो सका वहां काफी-कुछ अब भी भयावह हैं। वहां ताने और फटकार बहू के खिलाफ जुर्म में बदल जाते हैं। अलवर की बहू और जयपुर की बेटी के साथ जो हुआ वह हैवानियत को भी शर्मसार करता है।  दहेज के 51 हजार रुपए ना देने के नाम पर एक साल पहले ब्याही लड़की के माथे पर गुदवा दिया गया कि मेरा बाप चोर है। उसके हाथों, जांघों पर अपशब्द गुदवा दिए गए। यह समाज के माथे पर गोदा गया कलंक है। ऐसा पति ने अपने भाइयों के साथ मिलकर किया। उसके हाथ-पैर बांधे गए ,मुंह में कपड़ा ठूस दिया गया और मशीन से गालियां गुदवाई गई। ऐसा जुर्म करने की जुर्रत उसी दिमाग से आती है जहां यह सोच कुंडली मारे बैठी हो कि स्त्री इसी लायक है और इसके पिता से धन ऐंठना हमारा जायज हक। यह सोच तभी बदलेगी जब ऐसे अपराधी  कड़ी सजा पाएंगे। 
पुलिस भी यह मानेगी कि दहेज अपराध की श्रेणी में आता है और जो अलवर जिले  के राजगढ़ के रैणी गांव में हुआ है वैसा फिर कभी नहीं होगा। सिंदूर लगाने की जगह पर लिखवा देना कि तेरा बाप चोर है यह कहता है कि अपराधियों को लगता है कि अपराधी वे खुद नहीं बल्कि लड़की का पिता है? आखिर किस संस्कृति की कौनसी सोच है यह जहां स्त्री इतनी हेय समझ ली जाती है? गांव वाले या उसकी पंचायतें स्त्री का तो जुलूस निकलवा देती हैं, लेकिन ऐसे जघन्य अपराधियों के लिए उनके  पास कोई उपाय नहीं है। सब यह मानकर चलते हैं कि दहेज तो दिया ही जाना था।
माता-पिता को ही यह हिम्मत करनी होगी कि हम कोई दहेज नहीं देंगे। बच्चों की पसंद सबसे ऊपर होगी ना कि जो आंकड़ा कम बताएगा बेटी उसको ब्याह दी जाएगी। इस व्यापार में इस पवित्र बंधन को कैसे उलझा गए हम? मानवीय अवनति की ऐसी मिसाल इतिहास में शायद ही कहीं और होगी।

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