Tuesday, May 24, 2016

रेस दौड़ने से पहले मत हारो यार



वह दीवार खुरच कर चला गया। उसने लिखा मैं सिलेबस पूरा नहीं कर पाया। मैं समय बरबाद करता रहा। आज का काम कल पर छोड़ देना मेरी सबसे बड़ी कमी थी। यह लिखकर वह फांसी के फंदे से झूल गया। अठारह साल का केशव यूं इस दुनिया से कूच कर गया। ये हकीकत हमारे प्रदेश के कोटा शहर का स्थाई भाव बनती जा रही है। इस साल की यह छठी खुदकुशी है, जो कोटा में हुई है। हैरानी है कि हम सब यह मंजर देख-सुनकर भी चुप हैं। ना केवल चुप हैं बल्कि अपने बच्चों को भी उसी दिशा में धकेलने को लालायित भी। कितने माता-पिता हैं जो अपने बच्चे की काउंसलिंग इसलिए कराना चाहते हैं कि वह भी इस भेड़चाल का हिस्सा ना बने। हम तो वे माता-पिता हैं जो बच्चे के विज्ञान विषय चुनने की बात से ही खुश हो जाते हैं कि अरे वाह ये तो सही दिशा में है। क्या वाकई? वह सही दिशा में है या उस पर भी दबाव है क्योंकि उसके ज्यादातर मित्रों-सहपाठियों ने विज्ञान विषय ही लिया है। वह भी गणित के साथ। जिन्हें गणित से तकलीफ है वह बायोलॉजी के साथ हैं। यही तो peer pressure है जो हम सब झेल रहे हैं।
  विज्ञान बेहतरीन विषय है लेकिन इस रूप में? हम जिस दबाव की बात करते हैं देखिए ये कैसे शुरु होता है? सातवीं-आठवीं से ही कोचिंग कक्षाओं के ये समूह स्कूलों में सेंध लगानी शुरु कर देते हैं? ममा आज हमारे स्कूल में 'रेमो' वाले या 'टीपी' वाले या 'टैलन' वाले आए। उन्होंने हमारी परीक्षा ली, आपका फोन नंबर लिया, हमारा पेपर बहुत अच्छा हुआ, सारे ऑब्जेक्टिव्ज थे। ठीक है भई,  बढ़िया। फिर इनके फोन आने शुरु होते हैं। 'सर, मैडम आपके बच्चे ने बहुत अच्छा किया है आपको इतने प्रतिशत छूट पर कोचिंग दी जाएगी। वाह साठ फीसदी, सत्तर फीसदी छूट। माता-पिता को भरोसा होने लगता है कि उनका बच्चा तो प्रतिभाशाली है। फिर वे कहते हैं हम साइंस ओलंपियाड, एनटीएस में भी बच्चों को पूरा गाइड करते हैं। यह कहकर वे अभिभावकों को और निश्चिंत कर देते हैं कि भई अब तो अपना बच्चा  कामयाब होकर ही  निकलेगा। ऐसी  होड़ मचती है कि कुछ दिन तो कोचिंग वाले घर से लाने ले जाने की व्यवस्था भी करते हैं। यह सब सातवीं-आठवीं से ही शुरु हो जाता है और दसवीं-ग्यारहवीं तक आते-आते तो आपका मोबाइल चीखने लगता है। समझ ही नहीं आता कि दुनिया के तमाम कोचिंग सेंटरों को यह नंबर दिया किसने। 
एक लड़का है सुशांत। पढऩे-लिखने में अच्छा है । व्यवहार में भी उत्तम। दसवीं तक कोई ट्यूशन नहीं। लगता था कि ना सुशांत और ना अभिभावक कभी किसी कोचिंग सेंटर के फेर में आएंगे। दसवीं अभी हुई ही नहीं कि वे भी कथित श्रेष्ठ कहे जाने वाले सेंटर में परीक्षा दे आए। स्कॉलरशिप उतनी नहीं बनी कि चुका सकें। उन्होंने घर में ही बच्चे की कोचिंग की व्यवस्था की। उनका कहना था कि हमारा मकसद बच्चे के कॉन्सेप्ट्स क्लियर कराने का है ना कि स्कूल के विकल्प के तौर पर इन सेंटरों पर जाने का। समझते हुए सुशांत जो भी परीक्षाएं पास करे वह काफी है।
सुशांत के माता-पिता से अलग
  ऐसे  भी हैं जो स्कूल से महज खानापूर्ति का संबंध बनाए हुए कथित अच्छे कोचिंग सेंटर्स में बच्चे को भेज रहे हैं। जाहिर है स्कूल को दोयम दर्जे पर ठेल देने की कुप्रथा दसवीं के बाद से पूरी तरह चल पड़ती है। बच्चे अपने स्कूल को छोड़ एक साधारण स्कूल में प्रवेश लेते हैं जहां उपस्थिति की कोई जरूरत नहीं है और खूब पैसा देकर कोटा-जयपुर के किसी बडे़ कोचिंग इंस्टीट्यूट में दाखिला ले लेते हैं।
कोटा अब कोचिंग हब नहीं खुदकुशी हब बनता जा रहा है। अब तक 273 होनहार (बेशक वे होनहार थे शिक्षा के दबाव ने उन्हें मजबूर किया) बच्चे अपनी जान दे चुके हैं। एक लाख साठ हजार बच्चे वहां पढ़ते हैं। पचास से ज्यादा कोचिंग संस्थान हैं। कुछ अन्तरराष्ट्रीय संस्थानों ने भी वहां जडे़ं जमा ली हैं। विज्ञान पढऩा सुखद नहीं दबाव का पर्याय बनता दिखाई दे रहा है। क्योंकि विज्ञान स्कूल प्रांगणों से निकलकर कोचिंग इंस्टीट्यूट के एसी रूम्स में घुस गया है। हम, स्कूल, शिक्षा विभाग, सब कैसे इस षड्यंत्र में शामिल हो गए कि बच्चे लगातार आत्महत्या कर रहे हैं और हम चुप्पी साधे बैठे हैं। सुना है कोटा कलेक्टर ने बच्चों के अभिभावकों को चिट्ठियां लिखी हैं कि उन पर दबाव ना बनाएं। दबाव केवल माता-पिता का नहीं है, यह कहीं ओर से पड़ रहा है। आइजैक न्यूटन का ही गति का तीसरा नियम है- हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। एवरी फोर्स हैज इक्वल एन अपोजिट रिएक्शन। नए युग में यह उल्टा फोर्स कुछ ज्यादा गति से लग रहा है।

7 comments:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 26 -05-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2354 में दिया जाएगा
धन्यवाद

varsha said...

shukriya dilbag ji

GathaEditor Onlinegatha said...

Thanks for sharing such a wonderful post
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shubham sharma said...

वर्षा जी आपने स्टूडेंट्स के जीवन में पढाई को लेकर जो दबाव है उसका आपने बहुत साक्षात् रूप से व बहुत ही रोचक वर्णन किया हैं......आप ऐसी ही अन्य रचनाएं शब्दनगरी के माध्यम से प्रकाशित कर सकतीं हैं....

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन आज़ादी के दो अमर दीवानों को ब्लॉग बुलेटिन का नमन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Jatinder Mangat said...

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Kavita Rawat said...

कई माँ बाप बहुत दबाव बनाते हैं बच्चों पर जो की बहुत ही गलत है। उन्हें लगता है बच्चा कमजोर होगा तो क्या करेगा।।
सबको सोचने की जरुरत है आज। . ऐसी दुखद घटनाएं सब जगह सुनने में आ रही है.

चिंतनशील प्रस्तुति हेतु धन्यवाद