Friday, February 5, 2016

इश्क़ रंगता है मुझे रोज़

आज किसी ने कहा
आपको देखकर लगता है
कोई नई ऊर्जा छू गई है
अब क्या कहती
सीधे तुम तक आ गयी
मेरी नई चेतना भी तुम
पुराना अचेत भी तुम
चेत, अचेत, अवचेतन सब तुम
मेरा हर फ़ेरा बस तुम

नित बदलती नई दुनिया में
तुम्हारा  हिमालय-सा यकीन
हर रोज नए मायने गढ़ लेता है
मैं उसी पुराने प्रेम के
नए रस में रोज भीगती हूं, बढ़ती हूं
नए समय के नए केनवस पर
भीगती,रंगती, खिलती, डूबती, मैं

प्रेम यूं भी देता है नए मायने
 

2 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " भारत और महाभारत - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रेम साध लेता है।