Wednesday, December 21, 2016

पम -पम दादा का यूं चले जाना

अनुपम मिश्र चले गए एक बेहद निजि यात्रा पर। जिसका रोम-रोम सबके लिए धडक़ता हो, जो अपने होने को हवा, मिट्टी, पानी से जोडक़र देखता हो ऐसे अनुपम मिश्र का जाना समूचे चेतनाशील समाज के लिए बड़े शून्य में चले जाना है। कर्म और भाषा दोनों  से सादगी का ऐसा दूत  यही यकीन दिलाता रहा कि गांधी ऐसे ही रहे होंगे। उनसे मिलकर यही लगता कि हम कितने बनावटी हैं और वे कितने असल। वे पैदा जरूर वर्धा महाराष्ट्र में हुए , मध्यप्रदेश से जुड़े रहे, दिल्ली में गाँधी शांति प्रतिष्ठान के  हमसाया बने रहे लेकिन उनकी कर्मभूमि रहा राजस्थान। आज भी खरे हैं तालाब और राजस्थान की रजत बूंदों  में उन्होंने पानी बचाने वाले समाज का इतना गहराई से ब्योरा दिया कि खुद राजस्थानी भी इठलाने पर मजबूर हो गया। अलवर, बाड़मेर, लापोड़िया उनकी  प्रेरणा के बूते हरिया रहे हैं।
   अनुपम दा से कई मुलाकातें हैं। जितनी बार भी मिले उनका सरोकार होता पर्यावरण, गांधी मार्ग जिसके वे संपादक थे और मेरे बच्चे। वे बच्चों से इस कदर जुड़े रहते कि उन्हें खत भी लिखते। खतो-किताबत में उनका कोई सानी नहीं हो सकता। संवाद इस कदर सजीव कि बात करते हुए खुद के ही जिंदा होने का आभास मिलने लगता। कलम के करीब और माबाइल से दूर थे इसलिये शायद इतने सच्चे थे। वे कहते जिस तरह हम बोलते है उस तरह तू लिख और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख। एक पाठक के तौर पर आप भी क्रोधित हो सकते हैं कि मैंने उनके कहने के बावजूद गांधी मार्ग के लिए कोई पत्र नहीं लिखा जबकि उस पत्रिका का हर लेख मन को छू जाता। वे खुद तो इतना सरल-सहज लिखते कि लगता पास खड़े होकर बोल रहे हों। उन्होंने खुद अपने कैंसर की खबर फोन पर दी और मैं दिल्ली जाकर उनसे मिल भी न पाई। ऐसे कई अफसोस मुझे झिंझोड़ रहे हैं और आंख बस बह जाने को आतुर। क्या पता अब कब, कहां ऐसी सरल आत्मा के दर्शन नसीब हों?
    पत्रकार प्रभाष जोशी ने अनुपम मिश्र के लिए कहा था सच्चे, सरल, सादे विनम्र, हंसमुख पोर-पोर से मानवीय। इस जमाने में भी बगैर मोबाइल, बगैर टीवी और बगैर वाहन वाले नागरिक। दो जोड़ी कुरते पायजामे और झोले वाले इंसान। गांधी मार्ग के पथिक। गांधी मार्ग के संपादक। पर्यावरण के चिंतक। कितना सटीक लेखन एक दूसरे लेखक के बारे में। अनुपम मिश्र ने खुशबू के लिए भी लिखा। कभी पारिश्रमिक को लेकर बात होती तो कहते इसकी कोई जरूरत नहीं बस बात दूर तक पहुंचनी चाहिए। उन्होंने सप्रमाण लिखा कि हजारों हजार साल पहले जैसलमेर के मरुस्थल में समंदर हिलौरे मारता था। उन्होंने मध्यप्रदेश के ऐसे गांव के बारे में बताया जहां रस्सियों के सहारे गहरे नीचे उतरना होता था। वहां के आदिवासियों को औषधियों का गहरा ज्ञान था।
तस्वीर -साभार इंडियन एक्सप्रेस 

दिल गहरे तक उदास है की उन्हें रुकना चाहिए था। कुछ और सिपाही पानी को बचाने के लिए तैयार हो जाते फिर भी वे जो कर गए हैं, जो लिख गए हैं , वह पीढ़ियों तक हमारे मार्ग को रोशन रखेगा , काश सरकारें भी ऐसी शांत और शालीन शख्सियतों से प्रेरणा ले सकतीं । 

ps :एक बार वे मेरे पति शाहिद मिर्ज़ा साहब के इंदौर स्थित  निवास पर आये।  शाहिद जी की छोटी सी भांजी मिंटू को देखकर उन्होंने कहा की हमारा नाम पम-पम है तुम कौन हो।  सब हंस पड़े और हमारे घर में फिर उन्हें पम -पम दादा ही कहा जाने लगा। 


Saturday, November 26, 2016

पति को माता-पिता से अलग करना पत्नी की क्रूरता और पति के सम्बन्ध क्रूरता नहीं


लगभग एक महीने पहले सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया था कि पति को माता-पिता से अलग करना पत्नी की क्रूरता है और  हाल ही एक निर्णय आया है कि पति का विवाहेत्तर संबंध हमेशा क्रूरता नहीं होता, लेकिन यह तलाक का आधार हो सकता है। क्या ये दोनों ही फैसले स्त्रियों के सन्दर्भ में जड़वत बने रहने की पैरवी नहीं है?

लगभग एक महीने पहले सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया था कि पति को उसके माता-पिता से अलग करना पत्नी की क्रूरता है। दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अपने फैसेले में जो कहा वह इस प्रकार है-सामान्य परिस्थितियों में उम्मीद की जाती है कि पत्नी शादी के बाद पति का घर-परिवार संभालेगी। कोई नहीं सोचता कि वह पति को अपने माता-पिता से अलग करने की कोशिश करेगी। यदि वह पति को उनसे दूर करने की कोशिश करती है तो जरूर इसकी कोई गंभीर वजह होनी चाहिए लेकिन इस मामले में ऐसी कोई खास वजह नहीं है कि पत्नी पति को उसके माता-पिता से अलग करे सिवाय इसके कि पत्नी  को खर्च की चिंता है। आमतौर पर कोई पति इस तरह की बातों को बर्दाश्त नहीं करेगा। जिस माता-पिता ने उसे पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया है उनके प्रति भी उसके कर्त्तव्य  हैं।
सामाजिक रीति-रिवाजों के हिसाब से यह फैसला ठीक मालूम होता है लेकिन नजीर के हिसाब से इसकी समीक्षा जरूरी है।एक पल के लिए यह खयाल भी आता है कि जब लड़के की तरह पढ़ी-लिखी लड़की अपने माता-पिता का घर छोड़ती है, वह किस किस्म  क्रूरता होती है। संतान तो दोनों ही अपने माता-पिता की ही होती हैं फिर क्यों लड़की का सबकुछ छोडऩा इतना सामान्य है। रवायत के नाम पर कितनी बड़ी क्रूरता हमारा समाज लड़कियों से कराता आया है और वे इसे खुशी-खुशी करती भी आई हैं। नरेंद्र बनाम के.मीना के इस मामले में ऐसा मालूम होता है जैसे घर के  बड़े-बुजुर्गों  ने कोई फरमान सुनाया हो।
एक और फैसला हाल ही का है जब पति महोदय इस आधार पर तलाक चाहते थे कि गर्भावस्था में संबंध से इन्कार करना पत्नी की कू्र रता है। दरअसल, एक अन्य मामले में पति ने पत्नी के  ना कहने को क्रूरता बताते हुए तलाक मांगा था और उसे तलाक मिल भी गया था। इनसे अलग दिल्ली हाईकोर्ट ने एक  फैसले में पति की तलाक संबंधी याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि यदि पत्नी सुबह देर से सोकर उठती है और बिस्तर पर चाय की फरमाइश करती है तो वह आलसी के दायरे में भले ही आती हो, लेकिन आलसी होना निर्दई या क्रूर होना नहीं है।
विवाहेत्तर संबंध के आधार पर एक व्यक्ति को उसकी पत्नी के प्रति क्रूरता का दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला एक मामले में सुनाया और आरोपी पति को बरी कर दिया। एक व्यक्ति की पत्नी ने उसके कथित विवाहेत्तर संबंधों के कारण आत्महत्या कर ली थी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, विवाहेत्तर संबंध अवैध या अनैतिक तो हो सकता है लेकिन इसे पत्नी के प्रति क्रूरता के लिए पति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। क्योंकि इसे आपराधिक मामला करार देने के लिए कुछ और परिस्थितियां भी जरूरी होती हैं।क्या हम आप सब ऐसे मामलों के गवाह नहीं हैं जब दूसरी महिला की मौजूदगी पत्नी को ऐसे अवसाद में ले जाती है जहाँ वह आत्महत्या भी कर गुज़रती है।  यह क्रूरता कैसे नहीं हो सकती?
 
जाहिर है हमारी मानसिकता ही कभी अदालत में तो कभी अदालत के बाहर सर टकराती रहती है। समाज परिवार यही मान के चलते हैं कि हर हाल में पति की आज्ञा का पालन करना पत्नी का फर्ज है। शादी के सात फेरों में या किसी भी अन्य  विवाह तौर तरीकों में दोनों की बराबर भूमिका पर जोर है लेकिन प्रचलित तौर-तरीके इस कदर हमारे दिलों में बसे हैं कि हम मानवीय बराबरी को ही भुला बैठते हैं। ऐसी सहमतियां जब उच्च सदनों से आती हैं तो आधी आबादी खुद को यू-टर्न लेता हुआ पाती है।
शैली बताती हैं कि मेरी सास मुझे हर बार गर्भावस्था में कम खाने को देती थीं। हम बड़ों की बातों पर यकीन भी करते हैं क्योंकि इन मामलों में उन्हीं का अनुभव काम आता है लेकिन मेरे तीन बार अबॉर्शन हुए क्योंकि मैं ऐनिमिक थी। दरअसल ऐसी अनेक छोटी-बड़ी अनबन परिवार के  बीच वैमनस्य को बढ़ाती हैं और तलाक ऐसी ही वजहों की तलाश में रहता है। वह तो फै सलों को चाहिए कि वे ऐसी परंपराएं न  स्थापित कर दें जो एकतरफा मालूम होती हों।
लीगल स्कॉलर फ्लाविया एग्नस अपने एक स्तंभ में लिखती हैं कि ऐसे फैसले इसलिए भी आते हैं क्योंकि हिंदू विवाह अधिनियम में कन्यादान की अवधारणा है, लड़की को पराया धन माना जाता है। यही बात न्याय व्यवस्था को भी परिचालित करती है। ऐसा फैसला ईसाई या पारसी शादियों में कभी नहीं दिया जा सकता कि बहू के अलग रहने की मांग को क्रूरता की संज्ञा दी जाए। लड़कियों को शादी के बाद परेशानी होने पर भी परिवार वापस ससुराल भेजने में ही भलाई समझते हैं।
यूं तो यह पति-पत्नी की ही सहमती होती है कि वे माता पिता के पास रहना चाहते हैं या नहीं। ऐसे में दबाव काम नहीं कर सकता। कई भारतीय परिवार  बरसों-बरस इस चक्रव्यूह में उलझे तो रहते हैं लेकिन कोई हल नहीं निकाल पाते।  पति-पत्नी के बीच यह तनाव किसी बरछी की तरह साथ चलता है। वे जब-तब इसे एक दूसरे को चुभाते रहते हैं।  शादी दो आत्माओं का संबंध है तलाक इसमें जाने कौन-कौन सी प्रेतात्माओं को शामिल करा
देता है।

Wednesday, November 23, 2016

धूप पर कोई टैेक्स नहीं लगा है

इमेज क्रेडिट -उपेंद्र शर्मा, अजमेर 

भूल जाइये तमाम रंज ओ गम
मजा लीजिए मौसम का
कि सर्दी की दस्तक पर कोई बंदिश नहीं है
धूप पर कोई टैेक्स नहीं लगा है
धरा ने नहीं उपजी है कोई काली फसल
रेत के धोरे भी बवंडर में नहीं बदले  हैं
पेड़ों ने छाया देने से इंकार नहीं किया है
परिंदों की परवाज में कोई कमी नहीं है
आसमान का चांद अब भी शीतल  है
दुनिया चलाने वाले ने निजाम नहीं बदला है
फिर हम क्यों कागज के पुर्जों में खुद को खाक कर रहे हैं

शुक्र मनाइये कि सब कुछ सलामत है
नदी की रवानी भी बरकरार है
कच्ची फुलवारी भी खिलने को बेकरार है
करारे नोटों का नहीं यह हरेपन का करार है
भूल जा तमाम रंज ओ गम
कि कुदरत अब भी तेरी है
ये बहार अब भी तेरी है
हुक्मरां कोई हो
हुकूमत केवल उसकी है
और बदलते रहना उसकी ताकत
भूल जाइये तमाम रंज ओ गम
मजा लीजिए मौसम का
किसी के काला कह देने से कुछ भी काला नहीं होता
 ... और सफ़ेद कह देने से भी नहीं ।

Wednesday, October 26, 2016

परम्पराओं की पगथलियों पर

दुनिया में शायद ही कोई देश हो जहाँ हज़ारों साल बाद भी जनमानस परम्पराओं की पगथलियों पर यूं चल रहा हो। जाने क्यों कुछ लोग  परम्पराओं को बिसरा देने का ढोल ही पीटा करते हैं  

इन दिनों हरेक जुनून में जीता हुआ दिखाई देता है। लगातार अथक प्रयास करता हुआ। जैसे उसने प्रयास नहीं किए तो उसके हिस्से की रोशनी और उत्साह  मद्धम पड़ जाएंगे। त्योहार ऐसी ही प्रेरणा के जनक हैं। वर्षा और शरद ऋतु के संधिकाल में मनाया जानेवाला दीपावली बेहिसाब खुशियों को समेटने वाला पर्व है। अपने ही बहाव में ले जाने की असीमित ताकत है इस त्योहार में। आप साचते रहिए कि इस बार साफ-सफाई को वैसा पिटारा नहीं खोलेंगे जैसा पिछली बार खोला था या फिर क्या जरूरत है नई शॉपिंग की, सबकुछ तो रखा है घर में, मिठाइयां भी कम ही बनाएंगे कौन खाता है इतना मीठा अब? आप एक के बाद एक संकल्प दोहराते जाइये दीपावली आते-आते सब ध्वस्त होते जाएंगे। यह त्योहार आपसे आपके सौ फीसदी प्रयास करवाकर ही विदा लेता है। कौनसा शिक्षक ऐसा है जो आपसे आपका 100 फीसदी ले पाता है। यह दीपावली है जो पूरा योगदान लेती है और बदले में आपको इतना ताजादम कर देती है कि आप पूरे साल प्रफुल्लित महसूस करते हैं।
भगवान राम का लंका से आगमन तो हर भारतवासी के दिलो-दिमाग पर अंकित है। यह विजयगाथा त्रेता-युग से इसी तरह गाई जा रही है। उनके आने से जो जन-मन उत्साहित होता है उसका असर आज हजारों साल बाद भी जस का तस  है। यह बताता है कि हम बहुत परंपरावादी तो हैं ही दिल के एक कौने में आदर्श के लिए भी जीते हैं। सीता केवल कथा  नहीं है। भारतीय स्त्रियों में उनकी मौजूदगी को आज भी महसूस किया जा सकता है। उस दौर में राम-सा आदर्श कि वे आजीवन एकनिष्ठ रहेंगे कितने महान मूल्यों की स्थापना है जबकि उनके पिता दशरथ की तीन पटरानियां थीं । उनके बाद द्वापर  के कृ ष्ण भी ऐसा कोई प्रण लेते नहीं दिखे। राम का प्रजा से प्रेम किसी राजा की तरह ना होकर ऐसा था जैसे एक व्यक्ति शाही खजाने का संरक्षक हो और उसे केवल इतना अधिकार है कि वह इस खजाने का इस्तेमाल केवल जनता के हित में करे। राम जब अयोध्या लौटे तो अमावस की काली रात, रोशन रात में बदल चुकी थी।
कुछ लोगों की यह पारंपरिक शिकायत है कि यह त्योहार भी अपने असली स्वरूप को खो चुका है। क्या खोया है हमने। मिट्टी के दीयों के बगैर दीवाली नहीं मनती है। पूजा में गन्ने हैं, रंगोली-मांडने हैं। पारंपरिक पकवान हैं, खील-पताशे हैं। धूप-दीप, अगरबत्ती, कपूर, दीया-बाती सब है फिर काहे की फिक्र है उन्हें। बस बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद और दान-पुण्य को बढ़ा दीजिए। रामा-श्यामा में कुछ जोश और भर दीजिए। त्योहार भी पूरेपन से भर जाएगा। याद नहीं आता कि दुनिया का कोई और त्योहार इतने सालों बाद भी इतने मूल रूप में मौजूद हो।
चीनी सामान के लिए तो यूं  भी आक्रोश अब फूट ही पड़ा है। सोच का यह पटाखा सबसे ज्यादा चमकदार और प्रकाशवाला हो, फुस्स ना हो यही सबसे अच्छा होगा। काश यह सोच पहले ही बदली होती तो हमारे घरेलू उद्योग यूं तबाह नहीं होते। स्वदेशी थोड़ा महंगा है लेकिन बेहतर है। आज की यह राष्ट्रवादी सोच छोटे-छोटे उद्योगों के लिए पहले पनपी होती तो इतना नुकसान नहीं होता।
शुभ-दीपावली। 

Wednesday, August 31, 2016

मिनी स्कर्ट से भी मिनी सोच

'विदेशी पर्यटकों को एयरपोर्ट पर एक वेलकम किट दी जाती है। इसमें एक कार्ड पर €या करें और €या न करें की जानकारी होती है। हमने बताया है कि छोटी जगहों पर रातवात में अकेले न निकलें, स्कर्ट न
पहनें।'
केंद्रीय पर्यटन मंत्री ने अपने इस बयान के साथ आगरा में विदेशी पर्यटकों की सहायता के लिए एक हेल्पलाइन नंबर भी 1363 भी जारी किया था लेकिन बात केवल स्कर्ट पर सिमट कर रह गई। रहना गलत भी नहीं €क्योंकि फर्ज कीजिए एक भारतीय सैलानी जो इटली के किसी ऐतिहासिक चर्च का दौरा कर रही हो और उसने साड़ी या शलवार (सलवार नहीं) कमीज पहन रखी हो और उन्हें कोई नसीहत दे कि, अपने कपड़े बदलो और स्कर्ट या कुछ और पहन कर आओ। क्या यह फरमान तकलीफ देने वाला नहीं होगा? आप कहेंगे ऐसा €क्यों किसी को कहना चाहिए? पूरे कपड़े पहनना तो शालीनता है। ऐसा नहीं है। यह हमारी सोच है। हमने यह मानक तय कर लिया है और इसे ही परम सत्य मान लिया है और तो और इसे ही अपनी संस्कृति तक करार दे दिया है। भारत जैसे विशाल देश की संस्कृति में €क्या  गोवा, सिक्किम  या मणिपुर शामिल नहीं है €क्या  वहां का पहनावा हमारा पहनावा नहीं है? €क्या हम यहां के सैलानियों से भी ऐसी ही अपेक्षा करेंगे। 
   भारत जैसा अद्वितीय देश इसलिए भी धरती पर अनूठा है क्योंकि पृथ्वी पर किसी देश में इतनी संस्कृतियों का मिलन नहीं। यह सांस्कृतिक समावेश और उदारता ही इसकी ताकत है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में एक जर्मन लेखिका आई थीं कोर्नेलिया फूंके जो अपने देश की लोककथाओं पर बात कर रही थीं। जब उनसे भारत के बारे में सवाल किया गया तो बोलीं यह तो कई देशों का एक देश है और इसे किसी एक शैली में बांध पाना नामुमकिन है। जाहिर है भारत कभी किसी को यह आसानी नहीं देता। इसके पग-पग पर विलक्षणता है। हम इस विलक्षणता को किसी एक फरमान में बांधेंगे तो भूल करेंगे। अनेकता में एकता महज निबंध में पढ़ी जानेवाली पंक्ति नहीं है, इसके गहरे मायने हैं। वैसे भी पहनावा या पारंपरिक पहनावा उस क्षेत्र विशेष की जलवायु पर निर्भर करता है। अरब के लोग खुले-खुले और पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनते हैं ताकि लू के गर्म थपेड़े उन्हें अपनी चपेट में ना ले लें। यूरोपीय देशों को सर से पांव तक पूरी तरह कसकर ढकना होता है ताकि बर्फीली हवाएं उन्हें भेद ना सकें। शर्ट के मोटे कॉलर पर टाय हवाओं को चीरने नहीं देती। वे चर्च में भी जूते पहनकर दाखिल होते हैं। हममें से कुछ मजाक उड़ा सकते हैं कि अजीब लोग हैं जूते पहनकर ही पूजा घरों में दाखिल हो जाते हैं।
यह सोच बचपने से ज्यादा कुछ नहीं। एक बचपना हम भारतवासी जरूर करते हैं  पूरे साल अपने स्कूली बच्चों को जबरदस्ती टाय पहनाते हैं। गर्मी में कई बार यह टाय बच्चों के गले की आफत बनकर सामने आती है। किसी को सचमुच कुछ करना ही है तो इस टाय के फरमान से मुक्त करना चाहिए। हमारे दक्षिण भारत में किसान, मछुआरे सबके लिए लुंगी ही मौसम से राहत देने का काम करती है, वहां की उमस भरी हवाएं कसे हुए कपड़ों की बिल्कुल इजाजत नहीं देती। जब भी कोई टूरिस्ट अपने देश से सैर को निकलता है तो उसका
देश भी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के लिए उसे अलग-अलग जानकारियां देता है। मेजबान से पहले मेहमान भी तैयारी करता है। जब किसी सैलानी को उस देश के सरकारी पर्चों से यह पता चले कि आप अगर स्कर्ट या मिनी स्कर्ट पहनने से आपको खतरा है तो वह किस पर यकीन करके यहां बेफिक्र होकर घूमेगा? हम किसी भी देश में क्योंकर जाएंगे जहां कि सरकार सुरक्षा देने की बजाय बचके रहने के उपायों पर जोर दे रही हो? आपके देश में दुनिया का सातवा आश्चर्य ही क्यों  ना हो पर्यटक वहां जाने की हिम्मत नहीं करेगा। अतिथि देवो भव वाले हमारे संस्कार कब आतिथि को ही निर्देश देने लगे। €क्या  ऐसे अतुल्य भारत के दर्शन हम विदेशी मेहमानों को  कराना चाहते हैं कि जहां कपड़ों की लंबाई-चौड़ाई घटने भर से अपराध घट जाते हैं। बेहतर होता जो हमने ऐसे पर्चे और दिशा-निर्देश सैलानियों के लिए नहीं छेड़-छाड़ करने वालों के लिए जारी किए होते। स्कर्ट पर बोलकर तो इतने बड़े पद से मिनी स्कर्ट से भी मिनी सोच सामने आई  है। 

Wednesday, August 17, 2016

नकली विलाप बंद करो रक्षा सूत्र बांधो


कल रक्षाबंधन है। ऐसा लगता है जैसे हमारे पुरखों ने इस त्योहार के साथ ही बंधुत्व भाव की ऐसी नींव रख दी थी कि दुनिया में हर कहीं संतुलन-सा कायम रहे। रक्षा-सूत्र बांधकर आप हर उस जीवन की रक्षा कर सकते हैं जिसे अधिक तवज्जो या महत्व की जरूरत है। कभी-कभार विचार आता है कि तुलसी का जो मान हम करते हैं या केला, नारियल, पंचामृत जो हमारे प्रसाद का हिस्सा हैं, या जो सोमवार या गुरुवार को एक या दो दिन ईश्वर के नाम पर व्रत करने की जो परिपाटी है, ये सब हमारे शरीर और जीवन को बेहतर बनाने की ही कोशिश है। एक दिन के उपवास में हम इतना पानी  पी जाते हैं कि वह डी-टॉक्सिफिकेशन का काम कर देता है। व्रत में फलों का सेवन कहीं ऊर्जा को कम नहीं होने देता
और खनिज और विटामिन की कमी को पूरा कर देता है।
गाय भी इसी परंपरा के लिहाज से देश में पूजी जाती है। हमारे तो ईश्वर ही गौ-पालक हैं। कृ ष्ण की वंशी पर नंदन-वन की गाय इकट्ठी होकर जिस गौधुली-बेला को रचती है, वह इस चौपाए को नई आभा देता है । ऐसा क्यों है भला? क्योंकि गाय ने उस युग में मानव को जिंदा रहने का साहस दिया है जब उसके पास कुछ नहीं था। गाय का दूध मानव शिशु के  लिए तो उसके  कंडे ईंधन के लिए और उससे लिपे घर आज के पक्के फर्श का विकल्प थे। गोबर से ही बनी खाद उस जमीन को फिर ऊपजाउ बना देती जो एक-दो फसल के बाद किसी काम की नहीं रह जाती। जब जमीन और जिंदगी दोनों ही गाय पर इस कदर आश्रित हो तो फिर घर का पहला निवाला, पहला तिलक किसके लिए होगा?
आज वही गाय सड़कों पर प्लास्टिक की थैलियां खाने  को मजबूर है, तिलक और चारा उसे दिन विशेष को ही नसीब होता है। गांवों में निर्धारित गौचर की भूमि हम चर गए, गौशालाओं में हमने उन्हें पलने के लिए नहीं मरने के लिए छोड़ा। इन सबके साथ हमने मगरमच्छ के आंसू बहाने और सीख लिए। सब इन नकली आंसुओं के साथ विलाप कर रहे हैं। गाय की यह दशा इन्सानियत के पतन का  पता देती है। उसके नाम पर देश को बांटने में हमें रत्ती भर शर्म नहीं आती। गाय से प्रेम करने वाला किसी इन्सान का कत्ल कैसे कर सकता है? यह शक क्यों कि किसी के ट्रक, किसी के फ्रिज किसी की टौकरी में वही है।  ...और जो इन शक करने वालों के खिलाफ कोई बयान आता है तो सब फिर उसी पर  हावी होने लगतें हैं।
दरअसल हमारी अपनी नफरत और भय ने  इन अकारणों पर जोर देने के लिए मजबूर किया है जबकि हदीस में ही लिखा है कि गाय के दूध में शफा है, मक्खन में दवा और गोश्त में बीमारी है। हजरत मोहम्मद के हवाले से भी यही बात कही गई है कि ऊपरवाले ने हर बीमारी की दवा नाजिल फरमाई है बस गाय का दूध पीया करो क्योंकि ये हर किस्म के दरख्तों से चरती है। 
जाहिर है गाय के गुणों ने इसे वंदनीय बनाया है और हमारे अवगुण इस बेबस प्राणी को  नहीं बचा पा रहे हैं। क्यों ना इस रक्षाबंधन पर गौरक्षा का वचन लें। हर भाई-बहन यह वचन ले कि पॉलीथीन का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करेंगे। उन्हें सड़कों पर खुला नहीं छोड़ेंगे। हिंगोनिया गौशाला के पशु चिकित्सक बताते हैं कि कई गाय ऐसी आती हैं जिनका पूरा पेट इन थैलियों से भरा रहता है और फिर इन्हें बचा पाना नामुमकिन होता है। लोगों से मार-पीट कर नहीं प्लास्टिक थैलियों को ना कह कर गाय की हिफाजत की जा सकती है। बछ बारस एक दिन नहीं बारह महीने मनानी होगी

Friday, August 5, 2016

go girls go medals are waiting for u


 दुनिया का सबसे बड़ा खेल उत्सव कल  तड़के  सुबह ब्राजील की राजधानी रियो डी जेनेरियो में शुरू होने जा रहा है  । यह सचमुच अच्छा वक्त है क्योंकि पुराने वक्त में तो दमखम दिखाने का एकाधिकार केवल पुरुषों के पास था। शरीर को साधने का कोई मौका स्त्री के पास नहीं था। खुद को सजाने और खूबसूरत दिखने का प्रशिक्षण तो जाने -अनजाने हर लड़की  को उसकी पुरानी पीढ़ी दे देती थी लेकिन शरीर से पसीना बहाना, इस तपस्या में खुद को ढालना और फिर खरा सोना बन जाने का हुनर केवल इक्कीसवीं सदी की स्त्री में दिखता है। उजले चेहरे और तपी हुई त्वचा को देखने की आदत हमारी पीढ़ी को 1982 के दिल्ली, एशियाड से मिली। संयोग से उन्हीं दिनों शहरों को टीवी का तोहफा भी मिला था और एशियाई खेल इस पर सीधे प्रसारित हुए थे। उडऩपरी पी टी उषा का सौ मीटर और दो सौ मीटर में चांदी का पदक जीतना। वो चांद राम का पैदल दौड़ में पहले आना । ये मंजर देख हम बच्चों की आंखें सपनों से भर जाती। भारत-पाकिस्तान के हॉकी फाइनल मैच को देखने घर के बरामदे तक  में तिल धरने की जगह ना थी। यह जोश जुनून खेल देता है।     
2012 के लंदन ओलंपिक्स में जब मेरी कोम और साइना नेहवाल ने कांस्य पदक जीते तो वह देश के लिए कभी ना भूलने वाला पल बन गया। अभिनव बिंद्रा ने जब बीजिंग में सोने पर निशाना लगाया तो रोम-रोम रोमांचित हुआ था। भारत के ऊपर उठते ध्वज के साथ जब जन गण मन बजा तो लगा जैसे यही तो वे क्षण हैं जो राष्ट्र को गौरवान्वित करते हैं। राष्ट्र की अवधारणा ही ऐसे मंचों पर सार्थक होती है। खून-खराबों और एक राष्ट्र का दूसरे पर वर्चस्व किसी राष्ट्र के होने का पता नहीं देते लेकिन ओलंपिक खेल देते हैं। हमारी पहले की पीढ़ी ने ध्यानचंद की हॉकी का जादू देखा है तो मिल्खा सिंह और पीटी उषा जैसे एथलीटों को सेकेंड के सौवें हिस्से से पदक चूकते भी। अस्सी पार धावक मिल्खा सिंह का तो एकमात्र सपना ही देश को एथलेटिक्स में मैडल लेते देखना है। 
सच है कि आबादी के हिसाब से इन खेलों में हम बहुत पिछड़े हुए हैं। सवा अरब से ज्यादा की आबादी एक स्वर्ण पदक के लिए तरसती है। बीच-बीच में सुशील कुमार और नरसिंह यादव जैसे विवाद सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या हमारे देश में खेल नीति नाम की कोई सोच है या नहीं। इतने बड़े खेलों में जाने से पहले हम कोर्ट कचहरी में उलझते हैं कि कौन जाएगा और कौन नहीं। यह शर्मनाक है कि ब्रॉन्ज जीतने वाले योगेश्वर दत्त ये कहें कि मैं साई (स्पोर्टस अथॉरिटी ऑव इंडिया) की मैस में खाना नहीं खाता क्योंकि वहां उसमें कुछ मिला दिए जाने की आशंका होती है। देशवासी केवल भौचक्के होकर इन बातों को पढ़ते-सुनते रहते हैं। उन्हें कुछ समझ नहीं आता कि कौन सही है और कौन गलत। आखिर इस तरह के हालात के लिए कोई तो जिम्मेदार होगा। क्यों उन्हें चिन्हित नहीं किया जाता? भाग लेने से पहले इतना तनाव क्या खिलाड़ी की एकाग्रता को तबाह नहीं करेगा?
       वैसे 2016 के हमारे दल पर नजर डालें तो हमने पाया ही है। महिला खिलाडिय़ों की संख्या आधी-आधी न सही लेकिन आधी से थोड़ी ही कम है। ऐसा कहीं नहीं है ना प्रशासनिक सेवाओं में ना संसद में लेकिन यहां है। मेहनतकश महिला खिलाडिय़ों ने अपने दम पर यह मुकाम हासिल किया है। तीरंदाज दीपिका एक ऑटो रिक्शॉ चालक की बेटी हैं  और दूती चंद को तो स्त्री मानने से ही इंकार कर दिया गया था। जिमनास्ट दीपा करमाकर के तो पैर ही सपाट बता दिए गए थे फिर भी वे भारतीय दल में हैं। अपनी योग्यता के दम पर। यहां तक पहुंचना वाकई बड़ी बात है। लंदन ओलंपिक्स में हम 23 थे, रियो के लिए 54 का दल जा रहा है। बिना किसी आरक्षण के  यह अपने बूते पर हासिल की गई उपलब्धि है। साइना नेहवाल , मेरी कोम ने तो पदक भी दिलाए हैं। हम जीत रहे हैं और जीतेंगे यदि स्कूल और स्टेडियम में माहौल सकारात्मक हो। हर लड़की को कोई ना कोई खेल जरूर खेलना चाहिए। खिलाड़ी खुद में अतिरिक्त ऊर्जा का अनुभव करती है। वह नकारात्मक में भी सकारात्मक सोच का परचम लहराती है। खेल भावना उसे जीवन में भी कभी हारने नहीं देती। वे जीत रही हैं और जीतेंगी बशर्ते मम्मी-पापा उनके बचपन से ही खेलों को मेकअप की तरह प्रवेश करा दें। कॉस्मेटिक्स की परत रोमछिद्रों को बंद करती है, खेलों में बहाया पसीना इन रोम छिद्रों को खोलता है। चयन आपका है कि आप किसे तरजीह देती हैं। 


Tuesday, August 2, 2016

मंच पर ये रंग दृष्टिहीन बच्चों ने खिलाए थे

बीते रविवार की शाम जो देखा वह ना देख पानेवालों का ऐसा प्रयास था जो आने वाले कई-कई रविवारों में रवि (सूर्य) जैसी ऊर्जा भरता रहेगा। यह एक नाटक था और मंच पर मौजूद बच्चे दृष्टिहीन थे। मंच पर ऐसे रंग खिले  कि लगा हम आंखवालों ने कभी मन की आंखें तो खोली ही नहीं बस केवल स्थूल आंखों से सबकुछ देखते रहे हैं। इनके पास तो अनंत की आंखें हैं और वो सब महसूस कर लेती हैं आंख वाले नहीं कर पाते। ये अनंत की आंखें रंग आकार से परे इतना गहरे झांक लेती हैं कि वे बेहतर मालूम होती हैं। शायद लेखक-निर्देशक भारत रत्न भार्गव  उनकी इसी शक्ति से दर्शक को रू-ब-रू कराना चाहते थे।
एक ज्योतिहीन बच्चे का मन चित्रकारी करने का हो और वह कुछ चित्रित करना चाहे तो आप कैसे उसका परिचय आकार, रंग और दुनिया में बिखरे सौंदर्य से कराएंगे। एक बालक की यही चाह है और इस चाह को पूरा करते हैं उसके गुरु जिन्हें वह हर दृष्य में चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करता है। वे उसका  आकार और रंग से तो परिचय कराते ही साथ ही यह भी बताते हैं कि चित्रकार स्थूल से परे देखता है। वे बताते हैं कि जिस पोदीने की खुशबू को तुम जानते हो उसकी पत्तियों का रंग हरा है, हल्दी की गंध है पीली सौंधी-सी माटी की रंगत है भूरी,  नील का रंग है नीला, जामुन है जामूनी रंगत का। इन तमाम रंगों को जानने के बाद बालक जो चित्र रचता है वह एक उल्टा पेड़ है जिसकी जड़ें अनंत में फली हैं और जो सूरज से ऊर्जा लेकर फल-पत्तों को रचती है और फिर जमीन को ही लौटा देती है। कमाल है एक बालक ने कैसे कुछ न देखकर भी जीवन चक्र को समझा दिया।
अचरज होता है कि कैसे ये बच्चे मंच पर एक बार भी ना टकराए, न घबराए और न ही गलत जगह तूलिका चलाई। इन्हें ध्वनि का पूरा आभास था। वे जरा फ्रे म से बाहर होते कि एक सुरीला संकेत उन्हें मिल जाता। संगीत इस पूरे नाट्य में कमाल का सेतु बंध बना। आवाज की मधुरता और गीतों के दार्शनिक बोल इस प्ले को नई ऊंचाई देते हैं। इस काम को डॉ. प्रेम भंडारी और गुरमिंदर सिंह पुरी अनंत तक ले जाते हैं। जानकर खुशी होती है कि जयपुर शहर में ऐसे इन्सान हैं जो अपनी जमीन अंधे बच्चों को उपलब्ध कराते हैं और वहां नाट्यकुलम जैसी संस्था का जन्म होता है।
बाल कलाकारों के बारे में बात करते हुए वरिष्ठ स्तंभकार जयप्रकाश चौकसे का कहना था कि अंग्रेजी के कवि जॉन मिल्टन की जब आंखें रही तब उन्होंने पेराडाइज लॉस्ट लिखा, लेकिन जब उनकी आंखों की रोशनी चली गई तब उन्होंने पेराडाइज रीगेन लिखा। यकीन करना मुश्किल है कि स्वर्ग तब खोया जब आंखें थीं और वापस तब मिला जब आंखें जा चुकी थीं। शायद यही वे अनंत की आंखें हैं जिनके नाम पर लेखक ने नाटक का नाम लिखा है। चौकसे ने बच्चों की मेहनत को झुक कर प्रणाम किया।
एक बात जो थोड़ी खलती है वह बच्चों की ओर से नहीं बल्कि बड़ों की और से है।  बड़ों की समस्याएं जैसे भ्रष्टाचार और आतंकवाद को बच्चों से बुलवाने की कोशिश में नाटक की स्वाभाविक बालसुलभता में थोड़ी कमी आती है। खलती एक और बात है कि जो शहर में यो यो हनी सिंह आते हैं तो टिकटों की मारा-मारी होती है और इतने खूबसूरत नाटक में टिकट खिड़कियां सूनी-सूनी रहती हैं

। अखबार छापते हैं, माता-पिता पढ़ते हैं, लेकिन उनके पास अपने बच्चों को रंगमंच तक लाने का समय नहीं होता। सुल्तान और हनी सिंह के बीच नाटक भी हमारे देखने-सुनने की फेहरिस्त में शामिल होने चाहिए। अगर हम इंतजार करेंगे कि कोई हीरो इसकी तारीफ करे फिर हम इसे देखेंगे तो यह  बच्चों के प्रति हमारी क्रूरता ही होगी।

Thursday, June 30, 2016

दहेज़ नहीं दिया तो माथे पर लिख दिया मेरा बाप चोर है




महिलाओं के खिलाफ ऐसे नए-नए अपराधों की बाढ़ आ गई है कि दहेज थोड़ा पुराना-सा लगने लगा है। आउट ऑव फैशन-सा लेकिन यह धोखा है, भ्रम है हमारा। इसे आउट ऑव फैशन समझने-बताने वाले वे लोग हैं जो इन बातों के प्रचार में लगे हैं कि महिलाएं दहेज का झूठा केस ससुराल वालों पर करा देती हैं और अधिकांश ऐसे मामले अदालत की देहरी पर हांफने लगते हैं। ठीक है कुछ देर के लिए यही सच है ऐसा मान भी लिया जाए तो क्या बेटी के  माता-पिता के मन में बेटी के पैदा हेाते ही धन जोडऩे के खयाल ने आना बंद कर दिया है? क्या बेटे के जन्म लेने के बाद माता-पिता ने धन का एक हिस्सा इसलिए रख छोड़ा है कि यह नई बहू और बेटे के लिए हमारा तोहफा होगा? क्या बहुओं के मानस पर ऐसी कोई घटना अंकित नहीं है जब ससुराल पक्ष के किन्ही रिश्तेदारों न लेन-देन को लेकर ताने ना कसे हों? 
जब तक इस सोच में बदलाव देखने को नहीं मिलेगा दहेज का दानव कभी पीछा छोड़ ही नहीं सकता। दरअसल दहेज की अवधारणा लड़की की विदाई से जुड़ी है। पाठक नाराज हो सकते हैं कि क्या लड़की क ो विदा करना ही गलत हो गया? हां, हम क्यों कन्यादान, विदाई, पराई, जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं? सारी पीर इसी पराई शब्द में छिपी है? दो परिवार एक समाज मिलकर ब्याह कराते हैं। यह दो आत्माओं का मिलन है तो फिर एक पक्ष पर इस कदर बोझ क्यों ? क्यों एक लड़की से ही यह उम्मीद की वह अपनी जड़ों से उखड़कर नई जगह में पल्लवित हो? सब यही सोचते हैं कि ऐसा ही होता आया है, यही  रीत है, परंपरा है लेकिन कभी किसी ने इस नए सिरे-से खिलने में एक लड़की के खत्म होने की और ध्यान नहीं दिया। किसी ने कभी इस छीजत का हिसाब नहीं किया। उल्टे यह तो नियति है, यही तो होता आया है सदियों से, यही कहते हुए उसे इस पथ पर चलाते आए। 
जहां लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई हो रही है वहां हालात थोड़े बदले हैं लेकिन जहां ऐसा नहीं हो सका वहां काफी-कुछ अब भी भयावह हैं। वहां ताने और फटकार बहू के खिलाफ जुर्म में बदल जाते हैं। अलवर की बहू और जयपुर की बेटी के साथ जो हुआ वह हैवानियत को भी शर्मसार करता है।  दहेज के 51 हजार रुपए ना देने के नाम पर एक साल पहले ब्याही लड़की के माथे पर गुदवा दिया गया कि मेरा बाप चोर है। उसके हाथों, जांघों पर अपशब्द गुदवा दिए गए। यह समाज के माथे पर गोदा गया कलंक है। ऐसा पति ने अपने भाइयों के साथ मिलकर किया। उसके हाथ-पैर बांधे गए ,मुंह में कपड़ा ठूस दिया गया और मशीन से गालियां गुदवाई गई। ऐसा जुर्म करने की जुर्रत उसी दिमाग से आती है जहां यह सोच कुंडली मारे बैठी हो कि स्त्री इसी लायक है और इसके पिता से धन ऐंठना हमारा जायज हक। यह सोच तभी बदलेगी जब ऐसे अपराधी  कड़ी सजा पाएंगे। 
पुलिस भी यह मानेगी कि दहेज अपराध की श्रेणी में आता है और जो अलवर जिले  के राजगढ़ के रैणी गांव में हुआ है वैसा फिर कभी नहीं होगा। सिंदूर लगाने की जगह पर लिखवा देना कि तेरा बाप चोर है यह कहता है कि अपराधियों को लगता है कि अपराधी वे खुद नहीं बल्कि लड़की का पिता है? आखिर किस संस्कृति की कौनसी सोच है यह जहां स्त्री इतनी हेय समझ ली जाती है? गांव वाले या उसकी पंचायतें स्त्री का तो जुलूस निकलवा देती हैं, लेकिन ऐसे जघन्य अपराधियों के लिए उनके  पास कोई उपाय नहीं है। सब यह मानकर चलते हैं कि दहेज तो दिया ही जाना था।
माता-पिता को ही यह हिम्मत करनी होगी कि हम कोई दहेज नहीं देंगे। बच्चों की पसंद सबसे ऊपर होगी ना कि जो आंकड़ा कम बताएगा बेटी उसको ब्याह दी जाएगी। इस व्यापार में इस पवित्र बंधन को कैसे उलझा गए हम? मानवीय अवनति की ऐसी मिसाल इतिहास में शायद ही कहीं और होगी।

Thursday, June 23, 2016

गुजरात उड़ता है दमन तक


गुजरात में नशे पर रोक है, लेकिन ज्यों ही गुजरात सीमा खत्म होकर समुद्र से सटे केंद्र शासित शहर  दमन की सीमा शुरू होती है, शराब की दुकानें साथ चलने लगती है। पहले दो-तीन किलोमीटर तक आपको सिर्फ यही दुकानें मिलती हैं, क्योंकि जिन गुजरातियों को नशे की लत है वे बिंदास रफ्तार से दमन तक आते हैं, समंदर किनारे देर रात तक रहते हैं और लौट जाते हैं। ये गुजरात उड़ता है दमन तक। जाहिर है बैन इसका इलाज नहीं। इसका उपलब्ध होना ही समस्या है। तेजाब से लड़कियां जलाई जा रही हैं, तेजाब फेंकना अपराध है, लेकिन तेजाब का मिलना उससे भी बड़ा अपराध है। जब एसिड ही नहीं होगा तो एसिड अटैक कैसे होंगे? 
हाल ही नशाखोरी से जुड़ी उड़ता पंजाब बड़े संघर्ष के बाद सिनेमाघरों की सूरत देख सकी। कुछ लोगों का मानना है कि अगर कें द्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड ने इतना हल्ला न मचाया होता तो फिल्म आती और चली जाती, लेकिन क्या वाकई देश की गंभीर समस्याएं भी यूं  ही आकर चली जाती हैं? ये तो पूरी पौध को बरबाद कर रही हैं। कम अज कम फिल्म ने बताया है कि पंजाब नशे की लत में डूब चुका है। ये खरीफ या रबी की फसल के बरबाद होने की कथा नहीं है, बल्कि एक सम्पन्न प्रांत के तबाह होने का सच है। गेहूं और सरसों की लहलहाती फसलों के बीच किसी ने यह महसूस ही नहीं किया कि इनके खलिहानों में जहर असर कर गया है। हमें भी पंजाब से चार बोतल वोदका और पटियाला पैग लगा के.. सुनने की आदत पड़ गई है। बुल्ले शाह और बाबा फरीद के सूफी कलाम पर कब यह नशा हावी हो गया पता ही नहीं चला।  जिस पंजाब से नशे का इतना महिमामंडन हो रहा हो, फिल्मकारों को हरे-भरे खेत दिखाने से फुरसत ही ना मिले, वहां के बारे में  उड़ता पंजाब जैसी स्याह हकीकत का सामने आना मायने रखता है। मायने रखता है निर्माता-निर्देशक का फिल्म बनाना और सेंसर की कैंची के खिलाफ उच्च न्यायालय जाना और वहां से उड़ता पंजाब का केवल एक कट के साथ रिलीज होना। यह अभिव्यक्ति की आजादी की बहाली है। दरअसल, प्रतिबंध तो उन फिल्मों पर लगना चाहिए जो खराब हालात के बावजूद खुशनमा दृष्यों की अफीम बेचते हैं। विकास के नकली दृश्य दिखाते जाओ, नशे के असली दृश्य उड़ाते जाओ। उड़ता पंजाब से पंजाब उड़ाओ। 
उड़ता पंजाब एक अच्छी फिल्म है। चिट्टा वे एक रूपक है जो सफेद नशा है जिसके नशे में पूरा पंजाब स्याह हो चुका है। रॉक स्टार शाहिद प्रतीक है कि ये नशे की पैरवी करने वाले गीत आखिर आते कहां से आते हैं। आलिया का किरदार कमाल है जो हकीकत में स्त्री को भेडिय़ों के निगाह से दिखाता है। हुक्मरान इस कारोबार में लिप्त हैं, यह सच किसे बरदाश्त होता। नशा करने के अपराध में बंद कैदियों को जेल में ही नशा मिल जाता है, यह व्यवस्था का कौनसा निजाम है? फिल्म पर तो बैन लगना ही था। बोर्ड के कायदे ही आदिम हैं। ये वही बोर्ड है जिसने अगस्त 2015 में 28 शब्दों की सूचि जारी कर दी थी कि ये फिल्मों में नहीं होने चाहिए। किसी ने सही कहा है कि बोर्ड को दादी-नानी की तरह व्यवहार करना बंद करना चाहिए। आजादी के लगभग सात दशक बाद भी हम बंधक हैं। न्याय व्यवस्था, सरकारें इन बहसों में उलझी रहती हैं कि ये फिल्म, ये किताब, ये कलाकृति बैन लगाने लायक है या नहीं? 
आलिया भट्ट उड़ता पंजाब में 
मकबूल फिदा हुसैन की पैंटिग बैन, सलमान रश्दी की सैटनिक वर्सेज बैन, तस्लीमा की लज्जा बैन, सोनिया गांधी पर लिखी रेड साड़ी बैन ,लेसली उडविन की इंडियाज डॉटर बैन। लेसली ने निर्भया पर फिल्म बनाकर हमें आईना दिखाया था। समझ में नहीं आता कि यह बैन संस्कृति हम क्यों चलाते आ रहे हैं। अपने देशवासियों से डरते हैं इसलिये या उन्हें अंधेरे में रखना चाहते हैं इसलिए? कालीन के नीचे सच्चाई को पटक देने से बड़ा खतरा कोई नहीं।  समस्याएं छिपाते जाएंगे तो वह कैंसर के रूप में ही यकायक सामने आएंगी फिर हमारे पास कुछ नहीं बचेगा।

ps : नागेश कुकनूर की फिल्म धनक में बच्चों की मासूमियत और राजस्थान के रंग हैं, लेकिन ऐसी फिल्मों को कौन पूछता है। बच्चों की दुनिया से यूं भी किसी को कहां लेना-देना है। विवाद और इंद्रधनुषी रंग दोनों साथ हो तो सब  विवाद की तरफ दौड़तें हैं। रंगों से हमारी मैत्री तो कभी की खत्म हो गई है।

Wednesday, June 8, 2016

ग़ैर ज़िम्मेदार मॉम -डैड ने ली गोरिल्ला की जान !


माता-पिता होना दुनिया की सबसे बड़ी खुशनसीबी हैं तो उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है। किसी कंपनी के सीईओ होने से भी बड़ी जिम्मेदारी। दिल दहल गया था जब पिछले सप्ताह सिनसिनाती जू में तीन साल के बच्चे को बचाने के लिए सत्रह साल के गोरिल्ला हरांबे को गोली मारने पड़ी थी। यहां इस बात में कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए कि एक बच्चे की जान बचाने के लिए गोरिल्ला की जान ली गई। इंसानी जान बचाना पहला फर्ज होना चाहिए लेकिन लापरवाह माता-पिता को भी बेशक तलब किया जाना चाहिए। हरांबे के समर्थन में बड़ा जनसमूह आ गया है। उनका मानना है कि उस बेजुबां कि खामखा जान गई। फेसबुक पर जस्टिस फॉर हरंबे  नाम से एक पेज बन चुका है जिससे तीन लाख से भी ज्यादा वन्यजीव प्रेमी जुड़ चुके हैं, उनका कहना है हरंबे  बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा रहा था। जबर्दस्त विरोध के बीच बच्चे की मां मिशेल ग्रेग का कहना है कि हमें दोषी ठहराना आसान है। मैं हमेशा अपने बच्चों को कड़ी निगरानी में रखती हूं। यह एक दुर्घटना थी।
   
       बच्चों की परवरिश के दौरान माता-पिता गंभीर होते हैं लेकिन यह भी सच्चाई है कि कई बार बच्चे उन्हीं की लापरवाही का शिकार होते हैं। खेलते -खेलते पानी की टंकी में गिर जाना, गैस या माचिस से खुद को जला लेना, दिवाली पर पटाखों से जल जाना, संक्रांति पर छत से गिर जाना, गाडिय़ों में बंद हो जाना जैसे बेशुमार उदाहरण हैं जहां जाहिर होता है कि दुर्घटना हम बड़ों की असावधानी से घटती है। उस वक्त बहुत हैरानी और दिक्कत हुई थी जब मेरे घर में पलंग के आस-पास गद्दे बिछ गए थे, नीचे के पॉवर प्लग्ज मोटे लाल टेप से बंद कर दिए गए थे और टूटे कांच की किरचों को पोछे के बाद आटे की लोई से उठाया जाता कि कोई बारिक कांच भी घुटने चलते बच्चे को चुभ ना जाए। ये बच्चे के पिता के मां को दिए कोई सख्त आदेश नहीं थे बल्कि वे स्वयं इन कामों को किया करते। अभिभावक होना इतनी ही रुचि और जिम्मेदारी का काम है। यदि आपके सामने कुछ और सपने नहीं तैर रहे हैं, तभी आप इस बड़े सपने को हकीकत में बदलने की जिम्मेदारी लीजिए।
हमारे पुरखों ने जो संयुक्त परिवार प्रणाली समाज के लिए विकसित की थी वह बच्चों के विकास के लिए बहुत जरूरी थी। वे बड़ों की  आंखों के सामने बड़े होते। किसी समझदार ने कहा भी है कि बड़ों की बात इसलिए नहीं मानी जानी चाहिए क्योंकि वे बड़े हैं बल्कि इसलिए क्योंकि उनके पास अनुभवों का खजाना है। बड़े बुजुर्ग इसी अनुभव का लाभ अपने बच्चों को हर पल देते हैं। एकल परिवार छोटी-छोटी बातों से भयभीत होकर डॉक्टर के पास दौड़ जाते हैं। बच्चा चल नहीं रहा या इसके सर के नीचे इतना गीला क्यों रहता है या इसे छह महीने की उम्र में इतने दस्त क्यों लगे हैं इन सबके जवाब अनुभवी दादी-नानियों के पास होते हैं। झूलाघर में पल रहे बच्चों की आयाओं के पास नहीं। 
         
दरअसल हमें उस स्त्री के योगदान को बिल्कुल भी नहीं भूलना चाहिए जो पूरे समय अपने बच्चों की देखभाल में लगी है। उसने अपनी जॉब, ट्रेनिंग सबको दूसरे दर्जे पर  रखा है। ऐसे में यदि पिता लंबा अवकाश अपने बच्चे के लिए लेता है तो वह भी उतना ही सराहनीय है। बच्चों को अकेला छोड़कर काम पर निकल जानेवाले माता-पिता को बेहद  गैर जिम्मेदार की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
अपने देश की बात करें तो हम बच्चों के लिहाज से एक क्रूर समाज हैं। गरीबी इस क्रूरता में कई गुना ज्यादा इजाफा कर देती है। बच्चों की जिम्मेदारी लेनी है या नहीं उसकी बात तो तब होगी जब जोड़े को परिवार नियोजन की समझ हो। बच्चे अब भी हमारे यहां ऊपरवाले की मर्जी के नाम पर ही आते हैं और कई बार पाले भी जाते हैं। सड़क किनारे बच्चों को छोड़ देश के विकास कार्यों के निर्माण में लगा परिवार कहां चाहकर भी जिम्मेदारी निभा सकता है। उसके बच्चे तो कई बार खेलते-खेलते बोरवेल में गिर जाते हैं और कई बार किसी वाहन के नीचे आ जाते हैं। कभी कोई बंदर, कुत्ता या सांड ही उनकी जान का दुश्मन बन जाता है। हम बच्चों के लिए सहिष्णु समाज होते तो क्या जमवारामगढ़ के विमंदित बालगृह में इतने बच्चों की जान जाती? वैसे जन्मदाताओं की लापरवाही किसी माफी की हकदार नहीं है और जो ये ज्यादा कमाई के लालच में होती है तब तो और भी नहीं। आपके बच्चे हैं हमेशा आपकी निगरानी में होने चाहिए।

Tuesday, June 7, 2016

मैं और तुम



दरख़्त 
था एक दरख़्त
हरा
घना
छायादार
इस क़दर मौजूद
कि अब ग़ैरमौजूद है
फिर भी लगता है जैसे
उसी का साया है
उन्हीं पंछियों का कलरव है
और वही पक्का हरापन है
सेहरा ऐसे ही एहसासों में
जीता है सदियों तक
और एक दिन मुस्कुराते हुए
हो जाता है
समंदर

ख़ुशबू 

मैंने चाहा था ख़ुशबू को मुट्ठी में कैद करना
ऐसा कब होना था
वह तो सबकी थी
उड़ गयी
मेरी मुट्ठी में रह गया वह लम्स 
उसकी लर्ज़िश
और खूबसूरत एहसास
काफ़ी है एक उम्र के लिए


याद 


यादों की सीढ़ी से
आज फिर 
एक तारीख
उतरी है मेरे भीतर... 
तुम जान भी पाओगे जाना
कि बाद तुम्हारे
मैं कितनी बार गुजर जाती हूँ
इन तारीखों से गुजरते हुए।

Friday, June 3, 2016

क्यों नहीं देख पाते देह से परे

बड़े-बुजुर्ग अक्सर दुआओं में कहते हैं ईश्वर तुम्हें बुरी नजर से बचाए और जब ये बुरी नजरें 
लगती हैं तो कलेजा छलनी हो आता है और मन विद्रोह से भर उठता है। ये नजरें इसलिए भी खराब 
हैं, क्योंकि ये पढ़े-लिखों की हैं। उस जमात की, जिससे हम बेहतरी की उम्मीद करते हैं। ये पहले सौ किलोमीटर तक केवल देह की देहरी में घूमते हैं और उसके बाद भी ऐसे बहुत कम हैं जो समझते हैं कि इस देह के भीतर भी एक दिल है जो धड़कता है और दिमाग जो सोचता है। आखिर कब हम स्त्री के दिलो-दिमाग का सम्मान करना सीखेंगे। आसाम की एक्टर से विधायक बनीं अंगूरलता डेका की समूची उपलब्धि उन ग्लैमरस तस्वीरों के आस-पास बांध दी जाती हैं , जो उनकी हैं ही नहीं और एक हिंदी अखबार की वेबसाइट को देश की टॉप दस आईएएस और आईपीएस में खूबसूरती ढूंढऩी है। बदले में आईपीएस मरीन जोसफ की फटकार झेलनी पड़ती है और इस लिंक को हटाना पड़ता है। 
ips मरीन जोसेफ 
mla  अंगूरलता डेका 

ये अजीब समय है। एक ओर तो हम चांद और मंगल तक अपनी उड़ान भर चुके हैं और जब बात स्त्री की आती है तो हम देह से परे कहीं झांकने को ही तैयार नहीं। किसी ने जीता होगा दिन-रात एक कर चुनाव, लेकिन हमें उसकी मेहनत को ग्लैमर का नाम देते हुए वायरल कर देने में चंद मिनट लगतेे हैं। बात यहीं तक सीमित नहीं ग्लैमर का तड़का जरा ज्यादा लगे, हम अहमदाबाद की योग ट्रेनर सपना व्यास की तस्वीरें विधायक के नाम पर साझा कर देते हैं। ये दो महिलाओं का अपमान एक साथ किया जा रहा था। असम से भाजपा  की नवनिर्वाचित विधायक अंगूरलता डेका और योग शिक्षिका सपना व्यास के साथ यही हुआ पिछले दिनों। अंगूरलता के तो नाम के साथ छेड़छाड़ करने से भी सोशल मीडिया बाज नहीं आया। फिल्म मेकर रामगोपाल वर्मा ने ट्वीट किया अगर कोई विधायक ऐसा दिख सकता है मतलब अच्छे दिन आ गए। पहली बार राजनीति से प्यार हुआ है। हालांकि आपत्ति के बाद रामगोपाल वर्मा ने अपने ट्वीट पर सफा



ई पेश की। ग्लैमरस, हॉट, सेक्सी शब्द सुनकर एक एक्टर या मॉडल की मुस्कान भले ही बड़ी हो सकती है, लेकिन चुनावी समर में कमर कसने वाली महिला, या आईपीएस, वैज्ञानिक या पत्रकार की नही। तभी तो आईपीएस मरीन जोसेफ आहत हो गईं और उन्होंने फेसबुक पर एक बड़ी हिंदी वेबसाइट को लताड़ते हुए अपना गुस्सा जाहिर किया। वेबसाइट को देश की टॉप टेन खूबसूरत आईपीएस और आईएएस के  लिंक को हटाना पड़ा।
बोल्ड ऑफिसर हैं मरीन
आईपीएस  मरीन जोसेफ फिलहाल केरल के मन्नार में सहायक पुलिस अधीक्षक के पद पर नियुक्त हैं और उनका सिंघम स्टाइल उस समय ही लोकप्रिय हो गया था जब वे केरल के ही अर्नाकुलम जिले में  ट्रेनी थीं। एक साल पहले हिंदू अखबार को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि हम इंटरनेट के दौर के हैं और देश के ज्यादा से ज्यादा नौजवानों को इससे जुडऩा चाहिए। वे मानती थीं कि एक अच्छा  पुलिस ऑफिसर बनना और 24 घंटे जनता के लिए उपलब्ध रहना बड़ी चुनौती है। यह सच है कि विभाग में 99 फीसदी पुरुषों का वर्चस्व है और मुझे अपने अधीनस्थों का विश्वास भी जीतना होगा। जोसफ ने जब पोस्ट लिखी कि क्यों नहीं टॉप टेन मेल मॉडल्स की खूबसूरती की कोई सूची बनती तो उसे जबरदस्त समर्थन हासिल हुआ।
कोसने से बात नहीं बनेगी
समाज की आधी दुनिया दूसरी आधी दुनिया को कोसती रहे इससे बात नहीं बनेगी। बार-बार पितृसत्तात्मक समाज या पुरुष प्रधान समाज के उल्लेख से हम ऊब चुके हैं। स्वीकारना होगा कि इस नई दुनिया में स्त्री भी उसी स्पेस की हकदार है। फर्ज कीजिए एक मर्द रिपोर्टर अपनी रिपोर्ट पर बात करने कि लिए संपादक के पास जाए और वह रिपोर्ट के बजाय मुद्दे को देह के आस-पास केंद्रित कर दे तो या एक ट्रेनी ऑफिसर को उनका वरिष्ठ काबिलियत के लिए नहीं उनकी बॉडी के लिए शाबाशी दे तो? कोई कोच नई खिलाड़ी को फिजियो के टिप्स की बजाय कुछ और समझाने लगे तो? यह सब होता है, कई लड़कियों के साथ होता है। लड़कियां निराश होकर लक्ष्य से दूर हो जाती हैं। ये अतिरिक्त बाधाएं कई लड़कियों को कई स्तर पर पार करनी पड़ती हैं।
माता-पिता को पता चलता है तो वे पहला काम उन्हें रोकने का करते हैं, जो नहीं पता चलता तो अनाम समझौतों की गंदी गलियों में उनका प्रवेश हो जाता है। इसलिए लड़कियों को पहली ही हरकत पर ही आवाज उठानी होगी। उन्हें सायरन की तरह बजना होगा, ताकि लड़कियां सायरन की आवाज सुन सतर्क हो जाएं। मरीन जोसफ ने इस सायरन को ही बजाया है। अपनी बात कहना हर हाल में जरूरी है।
मीडिया के मायने
इन दिनों हर किसी को लगता है कि सोशल मीडिया महत्वपूर्ण जरिया है अपनी बात कहने का, अपने काम को प्रचारित करने का । यह सच भी है।यहां बहुत जल्दि हमजुबां लोगों का कारवां बनता चला जाता है।कुछ बयान, तस्वीरें,विचार वायरल होते हैं यानी उनको देखने-पढऩेवालों की तादाद इतनी ज्यादा होती है कि पोस्ट वायरल हो जाती है और ट्रेंड करने लगती है। वेबसाइट के लिए काम कर रही संगीता कहती हैं अजीब ट्रेंड्स हैं, आप कितना ही अच्छा लिखें वायरल तोवही होता है, जिसमें लव सेक्स और धोखेवाला तत्व शामिल हो।
संगीता कहती हैं 
बेशक संगीता की बात में दम है, लेकिन फेसबुक की बात करें तो कई स्त्रियों ने बेशुमार मुद्दों को सलीके से रखा है और उनकी पोस्ट पर मिले हजारों लाइक्स बताते हैं कि पाठक उनसे इत्तेफाक रखते है। रजिया शबाना 'रूही', मनीषा पांडेय, आराधना  मुक्ति, स्वर्णलता की बेबाक लेखनी हजारों बरसों के ढर्रे को आईना दिखाती हैं तो पाठक जिनमें पुरुष भी शामिल है खूब पसंद करते हैं। सच्चाई यह भी है कि उनके इनबॉक्स में अपशब्दों की भरमार उड़ेली जाती है। कई बार इन्हें बेचैनी महसूस हुई होगी, मन, घृणा से भरा, दिल रोया भी, लेकिन इनका सबसे मजबूत पक्ष है कि इन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। वही लिखा जो महसूस किया। ऐसी कई स्त्रियां हमारे समाज का सायरन ही हैं। एक ईरानी ब्लॉगर सही कहती हैं  कि भारत का समाज आज भी परंपराओं में जकड़ा है। कानून से ज्यादा यहां परंपरा मायने रखती है। परंपरा कई बार वक्त के साथ अप्रासंगिक होती चली जाती है और ये स्त्रियां इन्हीं परंपराओं को नए जमाने का आईना दिखाती है। इन बातों में दम आता है जब पुरुषों की राय भी साथ हो लेती है। आरोप-प्रत्यारोप से हालात नहीं बदलेंगे। देह को बीच में मत लाइए। ईमानदारी से मुद्दे की बात करें।

Tuesday, May 24, 2016

रेस दौड़ने से पहले मत हारो यार



वह दीवार खुरच कर चला गया। उसने लिखा मैं सिलेबस पूरा नहीं कर पाया। मैं समय बरबाद करता रहा। आज का काम कल पर छोड़ देना मेरी सबसे बड़ी कमी थी। यह लिखकर वह फांसी के फंदे से झूल गया। अठारह साल का केशव यूं इस दुनिया से कूच कर गया। ये हकीकत हमारे प्रदेश के कोटा शहर का स्थाई भाव बनती जा रही है। इस साल की यह छठी खुदकुशी है, जो कोटा में हुई है। हैरानी है कि हम सब यह मंजर देख-सुनकर भी चुप हैं। ना केवल चुप हैं बल्कि अपने बच्चों को भी उसी दिशा में धकेलने को लालायित भी। कितने माता-पिता हैं जो अपने बच्चे की काउंसलिंग इसलिए कराना चाहते हैं कि वह भी इस भेड़चाल का हिस्सा ना बने। हम तो वे माता-पिता हैं जो बच्चे के विज्ञान विषय चुनने की बात से ही खुश हो जाते हैं कि अरे वाह ये तो सही दिशा में है। क्या वाकई? वह सही दिशा में है या उस पर भी दबाव है क्योंकि उसके ज्यादातर मित्रों-सहपाठियों ने विज्ञान विषय ही लिया है। वह भी गणित के साथ। जिन्हें गणित से तकलीफ है वह बायोलॉजी के साथ हैं। यही तो peer pressure है जो हम सब झेल रहे हैं।
  विज्ञान बेहतरीन विषय है लेकिन इस रूप में? हम जिस दबाव की बात करते हैं देखिए ये कैसे शुरु होता है? सातवीं-आठवीं से ही कोचिंग कक्षाओं के ये समूह स्कूलों में सेंध लगानी शुरु कर देते हैं? ममा आज हमारे स्कूल में 'रेमो' वाले या 'टीपी' वाले या 'टैलन' वाले आए। उन्होंने हमारी परीक्षा ली, आपका फोन नंबर लिया, हमारा पेपर बहुत अच्छा हुआ, सारे ऑब्जेक्टिव्ज थे। ठीक है भई,  बढ़िया। फिर इनके फोन आने शुरु होते हैं। 'सर, मैडम आपके बच्चे ने बहुत अच्छा किया है आपको इतने प्रतिशत छूट पर कोचिंग दी जाएगी। वाह साठ फीसदी, सत्तर फीसदी छूट। माता-पिता को भरोसा होने लगता है कि उनका बच्चा तो प्रतिभाशाली है। फिर वे कहते हैं हम साइंस ओलंपियाड, एनटीएस में भी बच्चों को पूरा गाइड करते हैं। यह कहकर वे अभिभावकों को और निश्चिंत कर देते हैं कि भई अब तो अपना बच्चा  कामयाब होकर ही  निकलेगा। ऐसी  होड़ मचती है कि कुछ दिन तो कोचिंग वाले घर से लाने ले जाने की व्यवस्था भी करते हैं। यह सब सातवीं-आठवीं से ही शुरु हो जाता है और दसवीं-ग्यारहवीं तक आते-आते तो आपका मोबाइल चीखने लगता है। समझ ही नहीं आता कि दुनिया के तमाम कोचिंग सेंटरों को यह नंबर दिया किसने। 
एक लड़का है सुशांत। पढऩे-लिखने में अच्छा है । व्यवहार में भी उत्तम। दसवीं तक कोई ट्यूशन नहीं। लगता था कि ना सुशांत और ना अभिभावक कभी किसी कोचिंग सेंटर के फेर में आएंगे। दसवीं अभी हुई ही नहीं कि वे भी कथित श्रेष्ठ कहे जाने वाले सेंटर में परीक्षा दे आए। स्कॉलरशिप उतनी नहीं बनी कि चुका सकें। उन्होंने घर में ही बच्चे की कोचिंग की व्यवस्था की। उनका कहना था कि हमारा मकसद बच्चे के कॉन्सेप्ट्स क्लियर कराने का है ना कि स्कूल के विकल्प के तौर पर इन सेंटरों पर जाने का। समझते हुए सुशांत जो भी परीक्षाएं पास करे वह काफी है।
सुशांत के माता-पिता से अलग
  ऐसे  भी हैं जो स्कूल से महज खानापूर्ति का संबंध बनाए हुए कथित अच्छे कोचिंग सेंटर्स में बच्चे को भेज रहे हैं। जाहिर है स्कूल को दोयम दर्जे पर ठेल देने की कुप्रथा दसवीं के बाद से पूरी तरह चल पड़ती है। बच्चे अपने स्कूल को छोड़ एक साधारण स्कूल में प्रवेश लेते हैं जहां उपस्थिति की कोई जरूरत नहीं है और खूब पैसा देकर कोटा-जयपुर के किसी बडे़ कोचिंग इंस्टीट्यूट में दाखिला ले लेते हैं।
कोटा अब कोचिंग हब नहीं खुदकुशी हब बनता जा रहा है। अब तक 273 होनहार (बेशक वे होनहार थे शिक्षा के दबाव ने उन्हें मजबूर किया) बच्चे अपनी जान दे चुके हैं। एक लाख साठ हजार बच्चे वहां पढ़ते हैं। पचास से ज्यादा कोचिंग संस्थान हैं। कुछ अन्तरराष्ट्रीय संस्थानों ने भी वहां जडे़ं जमा ली हैं। विज्ञान पढऩा सुखद नहीं दबाव का पर्याय बनता दिखाई दे रहा है। क्योंकि विज्ञान स्कूल प्रांगणों से निकलकर कोचिंग इंस्टीट्यूट के एसी रूम्स में घुस गया है। हम, स्कूल, शिक्षा विभाग, सब कैसे इस षड्यंत्र में शामिल हो गए कि बच्चे लगातार आत्महत्या कर रहे हैं और हम चुप्पी साधे बैठे हैं। सुना है कोटा कलेक्टर ने बच्चों के अभिभावकों को चिट्ठियां लिखी हैं कि उन पर दबाव ना बनाएं। दबाव केवल माता-पिता का नहीं है, यह कहीं ओर से पड़ रहा है। आइजैक न्यूटन का ही गति का तीसरा नियम है- हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। एवरी फोर्स हैज इक्वल एन अपोजिट रिएक्शन। नए युग में यह उल्टा फोर्स कुछ ज्यादा गति से लग रहा है।

Wednesday, April 20, 2016

मारवाड़ से सीखे मराठवाड़ा

 मराठवाड़ा पहुंची ट्रैन          तस्वीर इंडियन एक्सप्रेस से साभार कैप्शन जोड़ें

सोमवार सुबह से दो अखबार की दो बातें बार-बार कौंध रही हैं। अंग्रेजी के अखबार में महाराष्ट्र के सतारा जिले के गांव तालुुका फलटण के किसान का साक्षात्कार है जबकि हिंदी के अखबार में वैसे ही संपादकीय पृष्ठ पर जैसलमेर के चतरसिंह जाम का लेख है जो अकाल में भी पानी की प्रचुरता की कहानी कहता है। वे लिखते हैं कि हमारे यहां पानी की बूंदों की कृपा मराठवाड़ा से भी कम होती है लेकिन हमारे यहां पानी का अकाल नहीं बल्कि मनुहार होती है। आखिर यह विरोधाभास क्यों, कि जो क्षेत्र अकाल के लिए चिन्हित  और अपेक्षित है वहां पानी का इतना सुनियोजन और जहां ठीक-ठाक पानी पड़ता है वहां हालात इस कदर सूखे कि रोज पशुओं की मौत हो रही है और परिवार के सदस्य खेती छोड़ मजदूरी करने को मजबूर।
सतारा जिले से 70 किमी दूर बसे गांव तालुका फलटण के किसान लक्ष्मण का कहना है कि मेरे परिवार में सात सदस्य हैं। माता-पिता, मैं, मेरी पत्नी और तीन बच्चे। हमारे गांव में कोई नदी नहीं बहती इसलिए किसानी पूरी तरह वर्षाजल पर ही आश्रित है। सूखा पहले भी हुआ है लेकिन इस बार हालात बहुत खराब हैं। गन्ना बुनियादी फसल है।  चार बड़ी शकर मिलें हैं और सभी नेताओं की हैं।  इन्होंने सीधे ही नहर से पानी उठा लिया इसलिए भी पानी की कमी हो गई। नलों में पानी आना तो कब का बंद हो गया। पिताजी ने कंस्ट्रक्शन साइट पर काम ले लिया है। हमने इस साल खेत में अनार बोया था सब सूख गया। साढे़ तीन लाख रुपयों की आय की उम्मीद थी, सूख गई। लक्ष्मण स्नातक (ग्रेजुएट) हैं लेकिन फिलहाल हालात यह है कि घर में मां के इलाज के पैसे नहीं हैं और पानी की हर बूंद के लिए टैंकर पर आश्रित हैं। नहाना, खाना, सब तब ही होता है जब टैंकर आता है।
इससे अलग जैसलमेर के रामगढ़ की हकीकत है। 2014 में यहां कुल 11  मिमी बारिश हुई थी। 2015  में 48  मिमी पानी बरसा। इस पानी से ही पांच सौ साल पुराने विप्रासर तालाब को भर लिया गया। अप्रैल के तीसरे सप्ताह में भी तालाब भरा है और सबसे सुखकर बात यह है कि इस तालाब की जमीन पर खडि़या मिट्टी या जिप्सम की तह जमी हुई है जो पानी को जमीन में रिसने नहीं देती। एेसी ही पट्टियां खेतों के बीच भी हैं। जाहिर है ये जिसके भी हिस्से आती वह मनमुताबिक फसल ले सकता था लेकिन समाज ने एेसा नहीं होने दिया। इसे सबका बना दिया गया। इन खेतों में अकाल के बीच भी अच्छी फसलें पैदा की जाती हैं। इतनी सी बारिश में यहां चना, गेहूं, सरसों जैसी  फसलें पैदा होती हैं।
ये दो दृश्य बताते हैं कि सवाल पानी की तंगी का नहीं तंग सोच का है। जहां पानी को लेकर दूरदृष्टि और समझदारी अपनाई गई वहां कम पानी में भी जीवन संभव हुआ और जहां ज्यादा मुनाफे के लालच में पानी के प्रतिकूल फसल लेने की कोशिश की गई वहां पानी खिसकता चला गया। गन्ने ने सारा पानी चूस लिया. क्या कर दिया हमारे सोच के अकाल ने। पहले पानी नीचे पहुंचाया और अब उसके पीछ-पीछे खुद गहरे कुंओं में उतरते हैं तब भी तलछट के सिवा कुछ हाथ नहीं आता।
रही सही कसर सूखे को आईपीएल से जोड़कर पूरी कर दी गई है। क्या इस समस्या को इसी तरह देखा जाना चाहिए। बुरा लगता है कि झोंपड़ी में पीने का पानी नहीं और महल एेशोआराम में घिरे हैं। यह भेद क्या आज का है? आईपीएल जैसे आयोजन होने चाहिए या नहीं यह अपने आप में एक अलग मसला है। उस नैतिकता से जुड़ा है कि जब तक हर नागरिक खुशहाल नहीं होगा मैं ऐसे किसी  दिखावे से नहीं जुड़ूंगा। संवेदनशीलता का अभाव इस कदर है कि एक मैच में होने वाली आय का हिस्सा भी किसानों के परिवारों को देना जरूरी नहीं समझा जाता। आईपीएल नाम का शोशा एक राज्य से हटाकर दूसरे राज्य में करने से हालात कैसे बदलेंगे? तकलीफ आंख में है और इलाज परिदृश्य का हो रहा है। समस्या की जड़ में अब भी कोई दाखिल नहीं हो रहा। जितना है उससे ज्यादा खर्च करेंगे तो तकलीफ में आएंगे ही। पानी को लेकर एेसा ही सूखा हमारे विचारों में है। कोई सीखे राजस्थान की रजत बूंदों से कि यहां तालाब आज भी किस कदर खरे हैं। कैसे खारेपन को मिठास में बदले हुए हैं।


Wednesday, April 13, 2016

मेरी पहली श्मशान यात्रा

स्त्रियों को कहाँ इजाज़त होती है मसान जाने की।  गुजरात के इस गांव में नदी किनारे बने श्मशान घाट पर जब पहली बार भाइयों के साथ मामाजी के फूल चुनने गई तो लगा कि मामाजी जाते-जाते भी दुनिया का अलग रंग नुमाया कर गए। इससे
पहले मामाजी  की बेटियों  ने भाई के साथ मिलकर मुखाग्नि दी थी।

 बेहद निजी अनुभव है। गुजरात के वलसाड़ जिले के नवसारी तहसील के एक गांव गणदेवी में मामाजी ने अंतिम सांस ली। बचपन से ही मधुमेह   (डायबिटीज) से पीड़ित मामाजी (58 )को पहले उनके माता-पिता और भाई-बहनों ने इस तरह बड़ा किया जैसे वे राजकुमार हैं और वक्त की पाबंदी में कोई भी कमी उनके जीवन पर संकट के बादल ला सकती है। उनका आना-जाना भी वहीं होता जहां मेजबान उनके मुताबिक बनी घड़ी का सम्मान कर पाता था। जीवन के पांच दशक उन्होंने इन्सुलिन के सुई (एक हार्मोन जो रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करता है) और घड़ी की सुई के साथ सटीक तालमेल बना कर बिताए। ब्याह हुआ। मामीजी के लिए कुछ भी आसान नहीं रहा होगा लेकिन उन्होंने इस रिश्ते को एेसा सींचा कि कुछ सालों में तो वे उनके चेहरे के भाव देखकर ही समझ जाती थीं कि उनके शरीर में शुगर का लेवल क्या है। वे वाकई मामाजी के साथ घड़ी बनकर जीवन गति बनाए हुए थीं। हर चीज़ वक़्त पर।  तभी दुख की इस भीषण घड़ी में उनके शब्द थे  'अब मैं घर की सारी घडि़यां उतार फेकूंगी। ' कर्मठ और विनयशील की तरह जाने जानेवाले मामाजी की अंतिम यात्रा में समूचा गणदेवी अश्रुधारा के साथ शामिल था। आंसुओं के साथ उन्हें हैरानी भी थी कि यात्रा में महिलाएं और मामाजी की दोनों बेटियां भी शामिल हैं। मामाजी का पुत्र तो आगे था ही। श्मशान घाट के दरवाजे पर पंडित ने समझाया कि बेटियो अब तुम यहींं से अंतिम दर्शन कर लौट जाओ। जाने किस घड़ी में कौनसा दृढ़ निश्चय उन्हें इतना दृढ़ बना गया था कि वे नहीं लौटीं। पंडित जी ने फिर कहा बच्चों मैं एेसा इसलिए नहीं कह रहा कि तुम लड़कियां हो बल्कि यह सब तुम्हारे लिए कष्टकारक होगा। अपना फैसला बदल लो। बेटियां नहीं मानी। उन्होंने हिम्मत बटोर कर भाई के साथ पिता को अग्नि के सुपुर्द किया। बड़ी बेटी की तो रुलाई ही तब फूटी जब वह इस जिम्मेदारी का निर्वाह कर चुकी। छोटी बेटी का कहना था कि दीदी अंतिम क्रिया के बाद मुझे इस सच्चाई को स्वीकारने की ताकत मिली कि पापा इस दुनिया में नहीं हैं। दुख का पहाड़ हल्का मालूम पड़ता है।
ये सचमुच नया वक्त है। नया दौर जिसे बेटियां गढ़ रही हैं। सदियों के निजाम को वे अब अपने मुताबिक ढाल रही हैं। बिल्कुल जरूरी नहीं है कि हर कोई एेसा ही करे लेकिन जो चाहे उस पर पाबंदी भी नहीं होनी चाहिए। महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में जब तेल चढ़ाने की अनुमति मिल सकती है तो तमाम अन्य स्थितियों पर भी पुनर्विचार हो सकता है। अब तक अनिष्ट की आशंका से डराकर ही उन्हें दूर रखा गया था। अधिकार कर्तव्य सब समान होने चाहिए।
बेटियों को और उनकी बेटियों को दान देने की परंपरा भी है, लेकिन सब बहनों की बेटियों ने इस दान को स्वीकार कर पुन: लौटा दिया। मौजूद सभी बुजुर्गों को यह ठीक नहीं लगा कि तुम कन्याएं हो और तुम्हें दिया दान सबसे बड़ा होता है। इसे मत लौटाओ, लेकिन बेटियों का कहना था कि एेसे कई दान बेटियों को कमतर भी बना देते हैं। जन्म देने वाले के मन में भी यही भाव होता है कि अब तो हर कदम पर बस इन्हें देना ही देना है। वह लगातार जोडऩे की जुगत में लग जाते है। इस देने की परंपरा पर जहां भी जैसे भी रोक लगे, वह स्त्री अस्मिता में वृद्धि ही करेगी। उसे हक मिले दान नहीं। वे सारे हक जो बेटे के पास हैं।
शरीर के ब्लड में शुगर का बहुत बढ़ जाना मृत्यु का कारण बनता है। उसका सामान्य होना जीवन के लिए बहुत जरूरी है। शायद वैसे ही समाज में स्त्री-पुरुष के बीच समानता का होना बहुत जरूरी है। इस हार्मनी का संतुलन कई परेशानियों से मुक्त कर सकता है। संभव है मामीजी चांदला (गुजराती में बिंदी को चांदला कहते हैं) भी लगाएं और सफेद वस्त्र भी ना धारण करें । सचमुच जब गांव इन बातों के साक्षी होंगे तो देश बदलेगा।

Tuesday, March 29, 2016

इस सरज़मीं से मोहब्बत है

सरसब्ज इलाके मालवा में मुनष्य की औसत आयु का एक चौथाई हिस्सा गुजारने के बाद जब जोधपुर की सरजमीं को छुआ तो लगा जल ही जाएंगे। जून के महीने में धरा आग उगल रही थी। काली बिंधी हुई मिट्टी की जगह बिखरी पीली रेत थी, मानो मौसम का दूसरा नाम ही गुबार हो। समझ आ गया था कि एक बहुत ही प्रतिकूल वातावरण में जीवन का अनुकूल हिस्सा आ गया है। सूखता हलक और घूमता सर बीमार न था, लेकिन इस वातावरण से रूबरू होने की इजाजत मांग रहा था। इतने सूखेपन के बावजूद वहां कोई एक नहीं था जो शिकायत करता। परिधान और पगडिय़ों के चटख रंग ऐसे खिलते जैसे फूल। मुस्कुराते लब ये कहते नजर आते
            ऊंची धोती और अंगरखी, सीधो सादौ भैस।
        रैवण ने भगवान हमेसां दीजै मरुधर देस ।।
सूर्यनगरी के इस ताप को सब जैसे कुदरत का प्रसाद समझ गृहण किए हुए थे। ऐसा नहीं कि रोटी-पानी की जुगाड़ में यहां इल्म की हसरत पीछे छूट गई हो। यह यहां के कण-कण में मौजूद है। ज्ञानी और सीधे-साधे ग्वाले के बीच का यह संवाद यहां के बाशिंदे के अनुभव की पूरी गाथा कह देगा।
ज्ञानी कहते हैं- सूरज रो तप भलो, नदी रो तो जल भलो
भाई रो बल भलो, गाय रो तो दूध भलो।
यानी सूरज का तो तप अच्छा है। जल नदी का अच्छा है। भाई का बल भला है और दूध गाय का अच्छा है।
अनुभव के ताप से गुज़रा ग्वाला उत्तर देता है-
आंख रो तप भलो, कराख रो तो जल भलो।
बाहु रो तो बल भलो, मा रो तो दूध भलो
 
यानी तप तो आंख यानी अनुभव का, पानी कराख यानी कंधे पर लटकी सुराही का, बल अपनी भुजा का ही काम आता है और दूध तो मां का ही भला है।
पूरे मारवाड़ में अपनी विरासत को समेटने की होड़ थी जैसे। कई कथाकार, कवि, लेखक अरसे से अपने समय को दर्ज कर रहे थे। लंगा, मांगणियार के महान संगीत को कोमल कोठारी ने सहेजा, तो विजयदान देथा 'बिज्जी'

की कहानियां रेत से निकले वे रंग थे कि इंद्रधनुष शरमा जाए। शीन काफ निजाम साहब का कोई शेर दाद पाए बिना नहीं गुजरता था। खूबसूरत किलों, पत्थरों के इतने अद्भुत रंग के बीच सृजन का अद्भुत सिलसिला इस पूरी पट्टी को विशेष बनाता था। हबीब कैफी कहानियां लिख रहे थे तो हसन जमान अपनी हिंदी उर्दू पत्रिका शेष के साथ अशेष और अथक परिश्रम से जुड़े थे।
सरहद से लगा पाकिस्तान इस पूरे इलाके में आजादी के बाद से ही सैनिक हलचल बनाए था। गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर की 1070 किलोमीटर सीमा पाकिस्तान से लगी है। जैसलमेर जिले के पोकरण  ने ही 1998 में देश को परमाणु ताकत बख्शी। आधुनिक राजस्थान पत्थरों, प्राकृतिक गैस और खनिज संपदाओं से भरपूर है। केवलादेव की बर्ड सेंचुरी में पक्षी किलौल करते हैं तेा रणथंबोर में टाइगर की दहाड़ सुनना हर सैनी की हसरत। पूरी संभावना है कि सही दिशा देश के सबसे बड़े प्रांत को सबसे विकसित राज्य की श्रेणी में खड़ा कर सकता है। मेट्रो, पुल सड़कें, रेल जितने ही जरूरी है स्कूल और बिजली। कई ढाणियां और गांव इन सुविधाओं से वंचित है। समृद्ध विरासत के साथ जब विधिवत शिक्षा और विकास का समावेश हो जाएगा तो कोई शक नहीं कि इस प्रदेश की रफ्तार कभी नहीं थमेगी। मारवाड़ हो या मेवाड़ या फिर मेवात, ढूंढाड़ और हड़ौती, आधी दुनिया बेहद श्रमशील है, लेकिन उसका हक अब भी दबा और अधूरा है। जिस दिन यह ईमानदारी से मिल जाएगा, सूरत और बेहतर होगी। खम्मा घणी।

जो अपनी मोहब्बत को भी यहीं पनाह मिले तो क्यों न इस सरज़मीं  से मोहब्बत हो...HAPPY BIRTHDAY RAJASTHAN LUV U

Wednesday, March 16, 2016

ये दोज़ख़नामा नहीं जन्नत के रास्ते हैं


कल्पना कीजिए उन्नीसवीं सदी अगर बीसवीं सदी को आकर गले लगाए तो? दो सदियों के एक समय में हुए मिलन के जो हम गवाह बने तो? अंकों के हिसाब से यह अवसर सोलह साल पहले आया था जब दो सदियां 31 दिसंबर 1999 को रात बारह बजे एक लम्हे के लिए एक हुई थी लेकिन यहां बांग्ला लेखक रविशंकर बल ने तो पूरी दो सदियों को एक किताब की शक्ल में कैद कर लिया है। दो सदियों की दो नामचीन हस्तियों की मुलाकात का दस्तावेज है बल का उपन्यास दोज़खनामा। उन्नीसवीं सदी के महान शायर मिर्जा असदउल्ला बेग खां गालिब(1797-1869) और बीसवीं सदी के अफसानानिगार सआदत हसन मंटो (1912-1955 )की कब्र में हुई मुलाकात से जो अपने-अपने समय का खाका पेश होता है वही दो
ख़नामा है। गालिब अपने किस्से कहते हैं कि कैसे मैं आगरा से शाहजहानाबाद यानी दिल्ली में दाखिल हुआ जो खुद अपने अंत का मातम मनाने के करीब होती जा रही थी। बहादुरशााह जफर तख्त संभाल चुके थे और अंग्रेज आवाम का खून चूसने पर आमादा थे। 1857 की विफल क्रांति ने गालिब को तोड़ दिया था और उनके इश्क की अकाल मौत ने उन्हें तन्हाई के साथ-साथ कर्ज के भी महासागर में धकेल दिया था। सरकार जो पेंशन उनके वालिद (जो अलवर राजा की तरफ से लड़ते हुए शहीद हो गए थे) के नाम पर पेंशन दिया करती थी वह भी मिलनी बंद हो गई। ये सब सिलसिलावार किस्से मंटो के साथ जब गालिब साझा करते हैं तो मंटो भी हिंदुस्तान में जिए हुए किस्सों और पाकिस्तान से मिली निराशा को बखूबी शब्दों में ढालते हैं। दोनों की जीवनगाथा के साथ किताब कई और किस्सों के साथ भी आगे बढ़ती है जिन्हें वक्त की आपाधापी में हमने भुला दिया है।
  उपन्यास में दर्ज मंटो के अफसाने वही हैं जो हमने उनकी कहानियों में पढे़ हैं लेकिन वे इस तरह गढ़े गए हैं कि लगता है मंटो आत्मकथा सुना रहे होंं क्योंकि मंटो ने वही लिखा जो उनके आसपास का सच था। जहां-जहां मंटो की किस्सागोई है वहां दिल की धड़कनें थमती मालूम होती हंै क्योंकि उन शब्दों की रफ्तार ही इस कदर तेज है कि दिल धक से रह जाता है। उनके एक साल के बच्चे का इंतकाल हो या उनके जिंदा गोश्त (देहमंडी को वे यही कहते थे) के बाजार से आए किस्से या फिर बंटवारे का दर्द। वहीं गालिब से जुडे़ किस्से काफी ठहरे और गहरे मालूम होते हैं। एक किस्सा  किताब से...
 मंटो भाई, मैं राममोहन राय की बात बता रहा था न? उनको मैंने नहीं देखा था, पर उनके बारे में बहुत बातें सुनी थीं। सतीदाह के विरुद्ध उनकी लड़ाई की बात सुन कर मैंने उनके बारे में कही और बातों को याद नहीं रखा। नीमतला घाट के श्मशान पर मैंने सतीदाह देखा था। और गंगायात्रियों को भी देखा था। मृतप्राय: लोगों को गंगा के किनारे ले जाया जाता था, वहां उन्हें एक घर में रख दिया जाता था, रोज ज्वार के समय नाते-रिश्तेदार उनके शरीर को बहुत आगे तक गंगा के पानी में डुबोकर रख देते थे। इसका नाम अन्तर्जली यात्रा थी, मंटोभाई। वे दिनों-दिन धूप में जलकर, बारिश में भीगकर, ठंड से तकलीफ पाकर मरते थे। जब जरा सी मुखाग्नि देकर उन्हें पानी में बहा दिया जाता था।
   उसी तरह  बनारस के समीप पहुंचकर गालिब जो कहते हैं- सोचता था इस्लाम का खोल उतार फेंकू, माथे पर तिलक लगा, हाथ में जपमाला लेकर गंगा किनारे बैठकर पूरी जिंदगी बिता दूं, जिससे मेरा अस्तित्व बिलकुल मिट जाए। गंगा नदी की बहती धारा में एक बूंद पानी की तरह खो जा सकूं। अपने लेखन के हवाले से मंटो कहते हैं न मैं उन्हें और न प्रगतिशील मुझे बर्दाश्त कर पाते थे क्योंकि उनके हाथ में जो गज फीता होता है न उसके हिसाब से मैं कहानी नहीं लिख पाता। उन्हें कैसे बताता कि एक टूटी हुई दीवार का पलस्तर झड़ रहा है और फर्श पर अनजाने नक्शे बनते जा रहे हैं मैं उसी तरह की एक दीवार हूं।
  बहरहाल, एेसे बेहिसाब किस्सों से दोखनामा आबाद है। दो जिंदगियां पूरे संताप और शबाब के साथ खुलती और खिलती हैं। इक्कीसवीं सदी का पाठक सीधे तौर पर दो सदियों से और यूं कई सदियों का दौरा कर आता है। मूल बांग्ला से अनुवाद अमृता बेरा का है जो इस संताप और शबाब को महसूस करने में कहीं बाधा नहींं बनता।   आखिर में गालिब के दो शेर
थी खबर गर्म के गालिब के उडे़ंगे पुर्जे
देखते हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ

जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

जो भी हो आने वाली कई पीढि़यां इस राख को कुरेदती रहेंगी क्योंकि यहीं से मानवता की खुशबू आती है। इन किस्सों में विभाजन, फिरकों की वीभत्सता भी है तो मानवता का मरहम भी।


Wednesday, March 9, 2016

पधारो म्हारे देश से जाने क्या दिख जाए


इन दिनों एक जुमला हरेक की जुबां पर है। कुछ अलग हो, एकदम डिफरेंट, जरा हटके। सभी का जोर नएपन पर है, नया हो नवोन्मेष के साथ। कैसा नयापन? पधारो म्हारे देश से जाने क्या दिख जाए जैसा? बरसों से पावणों को हमारे राजस्थान में बुलाने के लिए इसी का उपयोग होता था। पंक्ति क्या दरअसल यह तो राजस्थान के समृद्ध संस्कारों को समाहित करता समूचा खंड काव्य है जिसके साथ मांड गायिकी की पूरी परंपरा चली आती थी। जब पहली बार सुना तो लगा था, इससे बेहतर कुछ नहींं हो सकता । खैर, अब नया जमाना है, नई सोच है मेहमानों को बुलाने के लिए नई पंक्ति आई है जाने कब क्या दिख जाए।
यूं भी हम सब चौंकने के मूड में रहते हैं, किसी अचानक, अनायास की प्रतीक्षा में ।    ...और जब सैर-सपाटे पर हों तो और भी ज्यादा। कभी रेगिस्तान में दूर तक रेत  के धोरे हों, कभी यकायक ओले गिर जाएं, कभी पतझड़ की तरह पत्ते झडऩे लगे और कभी बूंदे ही बरसने लगे। यही तो मौसम का मिजाज है इन दिनों हमारे यहां। इस  कैंपेन के जनक  एड गुरु पीयूष पाण्डे  हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान उन्होंने बताया कि मेहमान आ नहीं रहे थे  इसलिए बदलना पड़ा।  खैर यह बहस का मुद्दा हो  सकता है।
      बहरहाल, हम सब क्रिएटिविटी से जुडऩा चाहते हैं। कुछ नया रचने की ख्वाहिश में सृजनशील सदा ही प्रयासशील रहते हैं। सवाल उठता है कि बच्चों में कैसे क्रिएटिविटी का बीज रोपा जाए? वे कैसे इस विधा को साधें क्योंकि आने वाले वक्त में यही बाजार, नौकरी में भी टिके रहने के लिए जरूरी होगा। सृजन केवल लेखक, कवि, चित्रकार का हक नहीं है। 


 उत्तर पुस्तिकाओं में एक जैसे उत्तर लिखकर अंक तो हासिल किए जा सकते हैं, लेकिन भविष्य में कुछ बेहतर रचा जा सकता है इसकी संभावना बहुत ज्यादा नहीं रहती है। भविष्य रचनाशीलता का है। लेखिका एलिजाबेथ गिल्बर्ट ने इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की है। ईट, प्रे एंड लव और बिग मैजिक की लेखिका गिल्बर्ट के अपने कोई बच्चे नहीं हैं, लेकिन वे कभी बच्ची थीं और यह जवाब वहीं से आया है। वे लिखती हैं हम भी किसी सामान्य अमेरिकी परिवार की तरह अस्सी के दशक में अपना शहरी जीवन जी रहे थे। सब परिवारों के अपने घर थे, गाड़ियां  थीं, टीवी था। सब काम पर जाते थे और लौट आते थे। मेरे पिता नेवी छोड़ चुके थे और एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर थे। मां पार्ट टाइम नर्स थीं और शेष समय में वे बेहतरीन गृहिणी की तरह हम दो भाई-बहन को संभालती थीं। एक दिन उन दोनों को लगा कि यह तो वो जिंदगी नहीं जिसे वे जीना चाहते थे। वे हम दोनों बच्चों को लेकर शहर से बाहर अपने पुराने फार्म हाउस में आ गए। वह एक टूटा-फू टा घर था जहां बिस्तर से उठते ही पानी के नाम पर बर्फीले पानी का गिलास मिलता। बर्फ के क्रिस्टल मेरी खिड़की पर जमे होते। घर का केवल एक हिस्सा गर्म किया जाता वो भी उस लकड़ी से जिसे मेरे पिता काटकर लाते। हमने वहां बकरियां, बत्तख और मुर्गियां पाली थीं। मां घर का बना मक्खन, चीज हमें खिलाती थीं। सब्जियां भी फार्म हाउस में उगार्ई थींं।
   बेशक हम बच्चों को यह जिंदगी काफी मुश्किल लगती थी क्योंकि कभी-कभी तो बाथरूम में पानी भी नहीं होता था। हम बारिश के इकट्ठे  पानी से काम चलाते थे। पिता ने कार चलाना, शेविंग करना छोड़ दिया था। वे साइकिल से आते-जाते थे। वे दिनभर अपने काम में लगे रहते। उन्होंने अपने लिए जैसी जिंदगी सोची थी वैसा ही किया। वे खुश थे। उन्होंने उपभोक्ता बनने की बजाय नया रचने की कोशिश की। तब वाकई बुरा लगता था, लेकिन आज सोचती हूं तो अच्छा लगता है। आज मैं उस चुनौतीपूर्ण बचपन के लिए उनकी आभारी हूं। मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि मेरे माता-पिता ने कुछ अलग करने की कोशिश की। बच्चों को कुछ भी कहने से वो नहीं सीखते, वे सीखते हैं यदि अपने सामने कुछ होता हुआ देखें। मेरे पिता को नौ से पांच की वह ऊब भरी जिंदगी पसंद नहीं थी इसलिए उन्होंने खुद को बदला।
    जाहिर है क्रिएटिविटी की कोई कक्षा नहीं होती। इसे किसी पाठ की तरह भी नहीं पढ़ाया जा सकता। जीवन जीने की शैली इस बीज को रोपती है। क्रिएटिविटी का यह बीज मशीनी मानव तैयार करके नहीं पल्लवित होगा। सृजन कारखानों में नहीं होता। उस जमीन से होता है जहां उसे खुलकर खिलने की आजादी हो। बंधे-बंधाए ढर्रे को तोडऩा ही सृजन है। हम लीक पर चलकर नया नहीं करे सकते।
लीक लीक गाड़ी चले लीकहिं चले कपूत
 लीक छोड़ तीनों चलें शायर सिंह सपूत

Wednesday, March 2, 2016

आंदोलन की आड़ में अस्मत


मुरथल के हालात बताते हैं कि आधी दुनिया के लिए शेष आधी दुनिया अब भी उपभोग की वस्तु है। जिसे जब भी मौका मिलेगा वह उसे दबोच लेगा। यह भयावह है कि आंदोलन का एक हथियार यह भी था। अव्यवस्था और अविश्वास का आलम देखिए कि पीडि़त को ना तो पुलिस पर भरोसा है और ना व्यवस्था पर। कोई सामने नहीं आ रहा। एक पीडि़ता सामने आई है जिन्होंने अपने देवर को भी दुष्कर्म के गुनाह में शामिल किया है। पुलिस को लगता है कि ये पारिवारिक मामला हो सकता है। किसके खिलाफ लिखाएं रिपोर्ट? कौन सुनवाई करेगा, कहां-कहां अपने जख्मों को दिखाएंगी वे? आठ मार्च महिला दिवस  से  जुड़े सप्ताह में एेसी कहानियां कौन लिखना चाहता है लेकिन समय तो जैसे वहीं रुका हुआ है। वह सभ्य होना ही नहीं चाहता। बर्बरता उसकी रग-रग में समाई है।
 
टंकी में जा छिपी लड़कियां
ये वाकई दहलाने वाला है कि दिल्ली से 50 किमी दूर सोनीपत जिले में मुरथल एक सैर-सपाटे की जगह है जहां अकसर परिवार और जोड़े घूमने के लिए जाया करते हैं। बाईस और २३ फरवरी के दरम्यान जाट आंदोलन के दौरान तीन ट्रक चालकों ने कहा है कि उन्होंने देखा है कि आंदोलनकारी महिलाओं को गाडि़यों से खींचकर निकाल रहे थे। कुछ ने भागकर सुखदेव ढाबे में छिपकर खुद को बचाया तो कुछ को ये राष्ट्रीय राजमार्ग (एन एच-वन) के आसपास के खेतों में ले गए। कुछ लड़कियां घंटों तक टंकियों में छिपी रहीं। आरोप है कि उनके साथ दुष्क र्म हुआ। पुलिस ने इन खेतों से कपड़ों के टुकडे़ भी जमा किए हैं। इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक ट्रक मालिक-चालक निरंजन सिंह के बयान के मुताबिक इसी हाईवे पर भीड़ ने मेरे ट्रक को भी जला दिया। २२ फरवरी को सुबह साढे़ ग्यारह बजे के आसपास कुछ आंदोलनकारी मोटर साइकिल पर सवार होकर आए। उसी समय कुछ स्त्रियां उस क्षेत्र में स्थित एक स्कूल में छिपने के लिए जा रही थीं तब इन्होंने उनसे कहा कि खतरा है आप चक्कर लगाकर जाएं। जब उन्होंने रास्ता बदला तो इन मोटर बाइक सवारों ने उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया। उनके बैग, जेवर छीने। उन्हें थप्पड़ भी मारे। मुझे नहीं लगता कि उन्होंने और नुकसान नहीं पहुंचाया होगा। तीन लड़कियों ने घंटों टंकी में छिपकर खुद को बचाया।
वे नहीं दौड़ पाईं
निरंजन सिंह पठानकोट के थे। जालंधर के सतवीर सिंह उस दिन चंढीगढ़ से दिल्ली आ रहे थे। उनका कहना था कि महिलाएं अपने वाहनों से निकलकर दौड़ रही थीं। जो नहीं दौड़ पाईं वे दबोच ली गईं। नहीं जानता था कि वे कौन थीं और उनके साथ क्या हुआ। नंगे पैर खुद को बचाते हुए दौड़ती महिलाओं को उस दिन कई लोगों ने देखा। मोहम्मद शाहीन जो पानीपत से दिल्ली लौट रहे थे उन्होंने भी कई महिलाओं को सुखदेव ढाबे में शरण लेते हुए देखा। भीड़ में से अधिकांश नशे में थे। उनकी कार को भी आग लगा दी गई। वे मानते हैं कि जो हालात थे उससे किसी भी अनहोनी से इनकार नहीं किया जा सकता। काश स्त्रियों से कहा जाता कि आप सुरक्षित हैं, हमारा कोई बंदा आपको तकलीफ नहीं देगा।
हक के नाम पर
जो आंदोलन की यही हकीकत है तो यह भयावह है। यह दुनिया अब भी स्त्रियों के जीने लायक नहीं है। भेडि़ए उनकी ताक में हमेशा हैं। एक ट्रक चालक का तो यह भी कहना है कि एेसा भयावह मंजर तो १९८4 में सिख दंगों के दौरान भी नहीं था। अराजक भीड़ इस कदर बेकाबू थी, जैसे उन्हें एेसा करने की छूट हो। दुष्कर्म के सबूत हैं, हालात को बयां करते बयान भी हैं लेकिन किसी के पास हिम्मत नहीं है कि वे आकर कहें कि हां हमारे साथ यह हादसा हुआ है। पुलिस न्यायालय इंतजार कर रहे हैं। हेल्प लाइन  18001802057 शुरू कर दी गई है लेकिन कोई नहीं बता रहा है। कोई क्या बताएगा? अनजानी जगह पर अनजाने लोगों ने उनके साथ बदसुलूकी की? कैसे साबित करेंगी वे? कोई यकीन करेगा? कौन ताजिंदगी उनके वकीलों के सवालों के जवाब देता फिरेगा? बेहतर है चुप्पी साधो। न्याय की उम्मीद में चुप्पी साधने में ही भलाई समझ रही हैं वे अपनी।
एक मामला आया सामने
इस मामले में एक महिला जो उस दिन बस से दिल्ली जा रही थी, ने पुलिस को शिकायत दर्ज कराई है। बस के खराब होने के बाद वे एक वैन में सवार हुई जब यह घटना हुई। उनकी चौदह साल की बेटी भी साथ थी जिसके कपड़े फाड़ दिए गए लेकिन अपराधियों ने उसे बख्श दिया। और भी महिलाएं हैं जिनके साथ एेसा हुआ। महिला ने कहा कि इसमें उसका देवर भी शरीक है इसलिए पुलिस उसे पारिवारिक विवाद की तरह भी देख रही है। यह चिंताजनक है कि बहन-बेटियों के लिए सुरक्षित समाज की रचना हम नहीं कर पाएं हैं। एेसी अराजकता कि आप गाडि़यों से निकाल-निकालकर उन्हें नुकसान पहुंचाएं। चित्तौड़ की महारानी पद्ििमनी के साथ स्त्रियों के जौहर, बंटवारे के समय दोनों ओर पैदा हुए उन्माद से किस तरह अलग किया जा सकता है इस वहशीपन को। जो भी इससे रूबरू हुआ होगा यह भयावह मंजर उसे जिंदगी के प्रति बेहद निराशा से भर देगा। यही तो हो रहा सदियों से। पढ़-लिखकर क्या बदला है हमने कि अभी कुछ पढ़ा-लिखा ही नहीं।
बनाई है तीन सदस्यीय जांच समिति
जाहिर है पुलिस चाहती है कि घटनाएं रिपोर्ट हों। पीडि़त अपना पक्ष रखे। इसके लिए डीआईजी राजश्री सिंह के नेतृत्व में डीएसपी भारती डबास और सुरिंदर कौर के साथ तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की गई है। तीनों महिलाएं हैं ताकि पीडि़ता नि:संकोच अपनी बात कह सकें लेकिन कोई हिम्मत नहीं कर सका है। बेशक कोशिश अपराध की तह में जाने की है लेकिन पहली ही पीडि़ता की शिकायत पर यह कहना कि ये पारिवारिक विवाद का मामला लगता है पुलिस की संवेदनशीलता को कम करता है। महिला उस दिन उस क्षेत्र में थीं, उनसे कई तरह के सबूत जुटाए जा सकते हैं।

Wednesday, February 17, 2016

ये राष्ट्रवाद और ये राष्ट्रद्रोह

साल 1947 में मिली आजादी खून में लिपटी हुई थी। बंटवारे ने आजाद देश तो बनाए, लेकिन वे अपनों के ही खून से रंगे हुए थे। हम चाहकर भी इसे भुला नहीं सकते। आजादी के बाद सांस ले रही तीसरी किशोर पीढ़ी भी इस पीड़ा से मुक्त नहीं है। नतीजतन, हम इस नफरत की आग से घिरे हुए हैं और पाकिस्तान, ये नाम ही हमारे खून में उबाल लाने के लिए काफी है। देशभक्ति की तमाम परिभाषाएं इस मुल्क में विरोध के आसपास सिमट गई हैं। टीवी चैनल्स भी दोनों तरफ के नुमाइंदों को बैठाकर इस कदर चीखते-चिल्लाते हैं कि लगता है यही सही है। अपशब्दों की जुगाली कइयों  की रोजी है। हाल में कु छ एेसा भी हो गया है कि पाकिस्तान का विरोध देशभक्ति है और पाकिस्तान के हक में बोल जाना देशद्रोह। क्या राष्ट्रवाद की इतनी सीमित परिभाषा के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने कुर्बानी दी होगी कि आजादी के बाद इतने साल साल नफरत की आग पर बने मुल्क को कोसते हुए बिता दो। सच है कि हमने युद्ध भी लड़े हैं लेकिन लड़ाई तो चीन ने भी हमसे की?
इन दिनों हम क्या कर रहे हैं? इसी आधार पर अपने विद्यार्थियों से जूझ रहे हैं। असहमति के लिए कोई जगह नहीं है हमारे पास। कोई उस मुल्क को जिंदाबाद कह रहा था, कोई आतंकवादी इस बरसी के आयोजन को सपोर्ट कर रहा था इस आधार पर हम पूरे विश्वविद्यालय को कटघरे में खड़ा नहीं कर सकते। बेशक आतंकवाद और आतंकवादी के समर्थकों की जगह समाज से बाहर है लेकिन फांसी जैसी बर्बरता को बरकरार रखा जाए या नहीं इस पर तो बहस हो ही सकती है। एक सहिष्णु देश में इस पर पूरी बहस करने का अधिकार हम सबको है। यहां दोहराना जरूरी है कि अगर आतंकवाद का समर्थन और देश के खिलाफ नारेबाजी साबित होती है तो जरूर कार्रवाई होनी चाहिए।  

         पाकिस्तान का नाम लेना इतना ही बड़ा गुनाह है तो क्यों हमारे देश के लोकप्रिय लीडर वहां जाकर जन्मदिन की बधाई देते हैं। उनकी माताजी को शॉल भेंट करते हैं। क्यों वे भी यहां आकर शपथ समारोह का हिस्सा बनते हैं? ये बर्फ पिघलाने की कोशिश करें तो दुनिया के समझदार लीडर्स और जो इनके देशवासी करें तो दोषी? कोई पाकिस्तानी खिलाड़ी की तारीफ करे या टीम को जीत के काबिल बताए तो देशद्रोही। राष्ट्रवाद की इस परिभाषा को बदलने की जरूरत है। सोशल  नेटवर्किंग साइट्स पर भावनाओं का ज्वार ज्वर में बदल चुका है। विश्वविद्यालय और उसके विद्यार्थियों पर बेहिसाब आरोपों की गोलियां हैं। सही समय है कि हमें तय करना होगा कि ये पड़ोसी मुल्क हमारा जानी दुश्मन है। हमारे सैनिक शांतिकाल में भी लगातार कश्मीर में शहीद हो रहे हैं। मौसम से लड़ाई वे सियाचिन में लड़ते हैं। माइनस पचास डिग्री तक के तापमान में अब तक हमारे नौ सौ शहीदों में से अस्सी फीसदी मौसम का शिकार हुए हैं। पठानकोट जैसी घटनाएं भी हो रही हैं। एेसे में हमें आर-पार की लड़ाई लडऩी चाहिए। विद्यार्थियों को भी ये स्पष्ट होना चाहिए कि पाकिस्तान की बात करना ही गुनाह  है, देशद्रोह है। इस दुविधा या कन्फ्यूजन को दूर होना चाहिए कि हमारा दुश्मन देश पाकिस्तान ही है। किसी को नागरिकता देने, गीता को लौटा लाने की पहल जैसे भाव युवाओं को भ्रमित करते हैं।
मेरे पुरखे सिंध से विभाजन के दौरान भारत आए थे। अपना सब कुछ छोड़कर हिंदुस्तान आने के लिए मजबूर सिंधियों का दिल अब भी सिंध में रखा है। वे सिंध को खूब याद करते हैं और अब भी सिंधी सम्मेलनों में वही गीत, वही नाटिकाएं मंचित होती हैं, जो देखने वालों को सिंध की याद में रुला देती हैं। क्या वे देशद्रोही हो गए?  वैसे वे पाकिस्तान से नफरत करते हैं। उन्हें लगता है कि इसी पाकिस्तान के कारण उन्हें अपना अबाणा (अपनी जमीन) छोडऩी पड़ी थी। भारत की सहिष्णुता और उनके व्यवहार ने उन्हें कभी महसूस नहीं होने दिया कि वे बेघर या शरणार्थी हैं, जबकि पाकिस्तान के कई शोधार्थी यह जानना चाहते हैं कि क्या यहां सिंधी-पंजाबियों के साथ मुहाजिरों जैसा बर्ताव नहीं होता। खैर, विषय से भटकने का एकमात्र मकसद यही था कि हम कुछ चीजों को पूरी तरह काटकर रखना चाहने के बावजूद  काट नहीं पाते।
बहरहाल, पुणे, अलीगढ़ हैदराबाद के बाद दिल्ली के विद्यार्थी निशाने पर हैं। सारे विद्यार्थियों में खोट है क्या? कहीं हमारे चश्मे पर ही तो धुंध नहीं छा गई है?




Friday, February 5, 2016

इश्क़ रंगता है मुझे रोज़

आज किसी ने कहा
आपको देखकर लगता है
कोई नई ऊर्जा छू गई है
अब क्या कहती
सीधे तुम तक आ गयी
मेरी नई चेतना भी तुम
पुराना अचेत भी तुम
चेत, अचेत, अवचेतन सब तुम
मेरा हर फ़ेरा बस तुम

नित बदलती नई दुनिया में
तुम्हारा  हिमालय-सा यकीन
हर रोज नए मायने गढ़ लेता है
मैं उसी पुराने प्रेम के
नए रस में रोज भीगती हूं, बढ़ती हूं
नए समय के नए केनवस पर
भीगती,रंगती, खिलती, डूबती, मैं

प्रेम यूं भी देता है नए मायने
 

Wednesday, February 3, 2016

मेनका जी कैसे बता दें बच्चे का जेंडर


मेनका जी कैसे बता दें बच्चे का जेंडर ? आपको डॉक्टर्स के काम के बोझ की चिंता है उस स्त्री की नहीं जिसका दर्जा आज भी भारतीय समाज में दोयम ही है

 अब तक हम यही मानते आ रहे हैं कि गर्भ में पल रहे शिशु का लिंग जानना अपराध है। जोड़े जब अल्ट्रासाउंड (सोनोग्राफी) के लिए जाते भी तो एेसी कोई कोशिश नहीं करते। जिन्हें जानना होता था कि आने वाली संतान लड़की है और वे उसे गर्भ में ही समाप्त कर देना चाहते हैं, वे एेसी सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा भी नहीं बनते। ज्यादा पैसे लेकर जांच करने और उसे गर्भ में ही गिरा देने के लिए डॉक्टर्स, नर्सेस का स्टिंग ऑपरेशन हमारे शहर जयपुर में ही हुआ है। अब जयपुर में ही सोमवार को केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा  कि माता-पिता को  बताया जाए कि उनके गर्भ में पल रही संतान का लिंग क्या है और जो यह प्रक्रिया प्रसव तक नहीं पहुंचती है तो उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया जाए। मंत्री कहती हैं कि इससे घरों में होने वाले असुरक्षित प्रसवों पर भी रोक लगेगी और अनावश्यक तौर पर डॉक्टर्स और नर्सेस भी सलाखों के पीछे नहीं होंगे जो पहले ही ज्यादा काम के बोझ से दबे हैं।
     पहली नजर में यह सोच बेहतर लगती है लेकिन दूसरे ही पल लगता है कि गर स्त्री और उसके परिवार को गर्भस्थ शिशु का लिंग पता चल जाए तो क्या वे सामान्य रह पाएंगे। बेटी की मां बनने वाली को बेटे की मां बनने वाली जिताना ही दुलार और खान-पान मिल पाएगा? अगर स्त्री दूसरी या तीसरी बार भी बेटी की मां बनने जा रही है वह खुद को उत्फुल्लित रखकर गर्भस्थ शिशु का ध्यान रख पाएगी? गर्भस्थ शिशु को बिगाडऩे के तरीके केवल 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑव प्रेगनेंसी'(एमटीपी) के तहत ही नहीं होते, समाज ने सदियों से इन्हें ईजाद भी किया है और याद भी रखा है।
      यह भी याद किया जाना जरूरी है कि आखिर 1994 में मौजूद किन परिस्थितियों के चलते लिंग परीक्षण पर रोक लगाई गई थी। दुरुपयोग का जो खतरा तब था क्या आज 22 साल बाद टल गया है? क्या समाज  विकसित होकर नई करवट ले चुका है? क्या लड़के की आस में तीसरी बेटी भी कुबूल है? क्या हमने एक बेटी के बाद दूसरे चांस में बेटे की तमन्ना छोड़ दी है? क्या हम दूसरी-तीसरी बेटी के बाद भी दंपति को चहककर बधाई देते हैं ? इन सवालों के जवाब अगर हां है तब तो मंत्री बिलकुल सही कह रही हैं। हम लड़कियों के लिए उदार  समाज हैं हमें पैदा होने से पहले ही उनके आने का पता दे देना चाहिए। जो जवाब ना
4  बदलने की तैयारी चल रही है) वाला प्रतिबंध ही उचित है। बेटियों को गर्भ में तो शांति से पलने दो।
      ख्यात लोक नर्तकी गुलाबो को तो समाज ने पैदा होते ही दफन कर दिया  था। पैदा होने तक का ट्रेक रिकॉर्ड रख भी लिया तो पैदा होने के बाद गायब बच्चियों का क्या करोगे। स्त्री-पुरुष अनुपात तब सुधरेगा जब बेटियों के जिंदा रहने का माहौल होगा। शनिवार को धौलपुर में चौदह वर्षीय किशोरी उस समय दुष्कर्म के बाद कत्ल कर दी गई जब वह खेत में खाना लेकर जा रही थी। दुष्कर्म और हत्या की कई घटनाएं रोज पुलिस के रोजनामचे में चढ़ती हैं और कई तो नहीं भी चढ़ती। केवल गर्भ में ट्रैक रखकर कुछ नहींं होगा बल्कि इस तरह तो हम वहां भी उसका अहित ही करेंगे।