Wednesday, December 23, 2015

तेरा ज़िक्र होगा अब इबादत की तरह...

original picture of mastani(1699 -1740 )



sanjay leela bhansali 's mastani
mastani mazar/samadhi in pune

मस्तानी कहने को मराठा साम्राज्य के पास बुंदेलखंड रियासत की ओर से नजराने में आई हो लेकिन उसने साबित किया कि वह उन बेजान सौगातों की तरह नहीं है। वह अपनी धड़कनों की मलिका थी। वह योद्धा थी, घुड़सवारी, तलवारबाजी जानती थी, बेहद खूबसूरत थी और संगीत उसकी रगों में था। हम जिस बुंदेलखंड को 'सौ डंडी एक बुंदेलखंडी' कहावत  से जानते हैं, उसी बुंदेलखंड की वह पैदाइश थी। बुंदेलखंड के राजपूत राजा छत्रसाल को मोहम्मद खान बंगश से खतरा था। उसका आक्रमण किसी भी क्षण उनके राज को तबाह कर सकता था।  गरुड़ दृष्टिवाले बाजीराव पेशवा यानी मराठा साम्राज्य से मिली ताकत से ही वे राज्य को बचा पाए। सौगात में झांसी, कलपी,सागर और 33 लाख सोने के सिक्के  दिए गए। मस्तानी भी पहुंची। मस्तानी-बाजीराव की कुरबत को मराठा राजघराना पचा नहीं पाया। मस्तानी राजपूत राजा और मुस्लिम मां रूहानी बाई की संतान थी। बाजीराव की शोहरत और वीरता उसे एक महायोद्धा में तब्दील करती जा रही थी लेकिन महल के गलियारे बाजीराव की पत्नी काशीबाई और मां राधाबाई के विरोध की चुगली करने लगे थे। काशीबाई मस्तानी को कभी कुबूल नहीं कर पाईं लेकिन अपने पति की मोहब्बत को चाहकर भी खारिज ना कर सकी।
पेशवाई मस्तानी-बाजीराव के बेटे को भी नहीं अपना पाती। वह उसे मुसलमान मानते हुए दूरी बनाए रखती है। रजवाड़ों के अजीब दस्तूर हैं जोधा-अकबर के पुत्र को मुगल सल्तनत का वारिस माना गया जबकि बाजीराव-मस्तानी की संतान को नहीं अपनाया गया। बाजीराव (बाजीराव 1700-1740) ने मस्तानी के लिए पुणे में मस्तानी महल का निर्माण कराया। मस्तानी और परिवार के द्वंद के बीच वह युद्ध लड़ता गया और चालीस बरस की उम्र में बुखार से चल बसा। मस्तानी इस दुख को सह ना सकी और उसने खुदकुशी कर ली। इतिहास की किताबों में यह स्पष्ट नहीं है कि मस्तानी ने जौहर किया। मस्तानी की कब्र आज भी पुणे से साठ किलोमीटर दूर एक गांव में है। हिंदू-मुस्लिम सभी वहां श्रद्धा से जाते हैं। हिंदू उसे समाधि और मुस्लिम मजार कहते हैं। इस जगह को संभालने वालों का कहना है कि जब मस्तानी और बाजीराव को एकदूसरे से कोई दिक्कत नहीं थी तो हम फर्क करने वाले कौन होते हैं।
बाजीराव-मस्तानी की संतान के बारे में कहा जाता है कि उसे काशीबाई ने पाला। उसका नाम कृष्णाराव भी था और शमशेर बहादुर भी। बाजीराव - मस्तानी अपने पुत्र को कृष्णा नाम के साथ ब्राह्मण संस्कार से बड़ा करना चाहते थे लेकिन ब्राह्मणों के विरोध के कारण बाजीराव तय करते हैं कि वह मुस्लिम मां का बेटा है इसलिए उसका नाम शमशेर बहादुर होगा।  बाद में वह बांदा का नवाब बनता है और पानीपत की तीसरी लड़ाई में अपने चचेरे भाईयों के साथ मारा जाता है। 

यह इतिहास है लेकिन  संजय लीला भंसाली ने इसे फिर जिंदा कर दिया है जिसका आधार नागदेव इनामदार का मराठी उपन्यास राव है। इनकी मोहब्बत फिर जिंदा हो उठी है और जिंदा हो चुका है मस्तानी का जुनून। तुझे याद कर लिया है आयत की तरह तेरा ज़िक्र होगा अब इबादत की तरह... मस्तानी के ये लफ्ज उसकी बाकी जिंदगी  का अक्स हैं। काशीबाई की भूमिका में प्रियंका चोपड़ा हैं और वे दीपिका के साथ हर दृश्य में बेहतर हैं। ुनृत्य में भी माहिर नजर आती हैं। दूसरी स्त्री के आगमन से पत्नी काशीबाई के दर्द को प्रियंका ने गहराई से जिया है। मराठी तेवर कमाल का पेश हुआ है। रणवीर सिंह ने भी मराठी एक्सेंट को खूब साधा है और पेशवाई को रूह में उतारा है। मोहब्बत और योद्धा का जुनून आंखों से जाहिर होता है। वे मल्हारी गीत में भी कमाल करते हैं। मस्तानी यानी दीपिका की यह लगातार तीसरी फिल्म है जो उन्हें बेहतरीन साबित करती है। पीकू , तमाशा के बाद बाजीराव-मस्तानी दीपिका को नए आयाम देती है। मराठा साम्राज्य के कालखंड का हर फे्रम मुकम्मल मालूम होता है। जयपुर फिल्म के कई दृश्यों का जोड़ीदार है। छत्रसाल का बुंदेलखंड हो या मराठाओं का पुणे फिल्म को सहारा जयपुर के जीवंत आमेर से ही मिलता है। फिल्म के कई दृश्य जयपुर में शूट हुए हैं।

Wednesday, December 16, 2015

आज 16 दिसंबर है

सामंजस्य उस घटना पर ही नहीं है जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। दिल्ली सरकार निर्भया के नाबालिग अपराधी का पुनर्वास करना चाहती है  और केंद्र  उसे कैद में रखना चाहता है। 

 आज 16 दिसंबर है, वो तारीख जिस रात निर्भया छह दरिंदों की हैवानियत का शिकार हुई थी। हर भारतवासी दहला हुआ था। दुष्कर्म जैसे अपराध के खिलाफ एक ज्वाला-सी धधक रही थी। ये वह समय था जब लगता था कि अब हर स्त्री का सम्मान सुरक्षित रहेगा। क्या स्त्री क्या पुरुष हरेक मोमबत्तियों की  लौ में इस कुत्सित प्रवृत्ति को जलते हुए देख रहा था। मानना था कि ऐसे अपराधों पर यहीं विराम लग जाना चाहिए। संभावना से भरपूर निर्भया फिजियो थेरेपिस्ट बनने वाली थी। वह माता-पिता के सपनों को साकार कर देना चाहती थी। दिल्ली में एक एअरपोर्ट श्रमिक की यह बेटी परिवार की उम्मीद थी लेकिन उस रात एक बस में उसके मित्र के सामने दरिंदों ने उसके साथ दुष्कर्म किया और उसे इस कदर घायल कर दिया कि तेरहवें दिन सिंगापुर में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। यह हत्या थी जिसके बारे में उसके अपराधी ने कहा था कि अगर वह विरोध नहीं करती तो नहीं मरती।
    इस अपराध से जुड़े एक नाबालिग अपराधी के बारे में कहा जाता है कि उस दिन वहशीपन को नई धार देने वाला वही था। हमारा कानून कहता है कि नाबालिग को सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए और वह वयस्क-सी सजा का हकदार नहीं है। केंद्र सरकार का मानना है कि यह अपराध इतना गंभीर है कि नाबालिग को सजामुक्त नहीं रखा जा सकता। वह ऐसा अपराधी है जो मुक्त रहकर या तो खुद अपराध करेगा या दूसरों को उकसाएगा। सरकार की ओर से न्यायालय में सुब्रमणियम स्वामी हैं और एक ऐसा बिल भी लोकसभा में पारित हो चुका है जहां नाबालिग अपराधी की अधिकतम आयु अठारह की बजाय सोलह करने की पेशकश है। यह बिल अभी राज्यसभा में पारित नहीं हुआ है। बहरहाल, बिल अगर पारित भी होता तब भी निर्भया के दोषी को सजा नहीं हो पाएगी। उच्च न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा है।  वह 20 दिसंबर को छूट सकता है। दिल्ली सरकार उसे दस हजार रुपए सहायता राशि दे रही है ताकि वह सिलाई मशीन खरीद सके।
     निर्भया के पिता की स्पष्ट राय है कि उसे बख्शा नहीं जाना चाहिए क्योंकि ऐसे कई मामले लगातार प्रकाश में आ रहे हैं जहां किशोरों ने संगीन अपराध किए हैं। इसे बचाकर हम उन्हें प्रोत्साहित करेंगे कि वे अपराध करके भी बच निकल सकते हैं। मैं अपनी बेटी के साथ-साथ उस भविष्य के बारे में भी कहना चाह रहा हूं जहां बेटियां सुरक्षित हों।
    यह सच है कि समय के साथ वयस्क होने की उम्र भी घटती मालूम होती है। जब नन्हें बच्चे जो सकारात्मक दिशा में हैं वे ही इतनी उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं तो जाहिर है नकारात्मक दिशा में जाने वाले अपराधियों का ग्राफ भी बढ़ा है। अठारह में ब्याह, मतदान, लाइसेंस, बैंक खाते का स्वामित्व देने वाला समाज/कानून अब सोलह में बालिग करार देने की तैयारी कर रहा है। यह फैसला बहस का आधार बनाता है। इसे सब पर लागू किया जा सकता है या अपराध की प्रकृति को देखकर निर्णय किया जाना चाहिए। मासूमियत की उम्र छीनने के लिए कौन जिम्मेदार है। बच्चे  क्यों जल्दी बड़े हो रहे हैं? क्यों निश्छलता गायब हो रही है?
    हम इंटरनेट, टीवी, सिनेमा, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, सबको दोष दे सकते हैं लेकिन हमें खुद से पूछना होगा कि हमने किसी काम को बिना अपेक्षा के करना कब से छोड़ दिया है? हम अपने हर निवेश के बदले केवल पाना ही चाहते हैं। बच्चे को स्कूल में दाखिल कराया है तो वह वहां बेस्ट हो, वह डांस सीख रहा है तो वहां भी। वह कोचिंग जा रहा है तो आईआईटी या मेडिकल में ही चयनित हो। जब हमने हर कोशिश में उससे कामयाब होने की ही अपेक्षा की तो उसने भी मासूमियत छोड़ दी। वह वक्त से पहले बड़ा हो गया। हम परिणाम चाहने वाला समाज बन गए हैं। टारगेट ओरिएंटेड समाज।
   ये बातें नाबालिग अपराधी से कोई ताल्लुक नहीं रखती लेकिन मासूमियत छीनने वाले हम ही हैं। हम चाहकर भी इसे लौटा नहीं सकते अलबत्ता जहां ये आज भी कायम हैं वे स्थान या समाज हमारे शोध का विषय जरूर हो सकते हैं। कोई पहाड़ी क्षेत्र या सुदूर आदिवासी इलाका जहां मानव इतना मशीनी नहीं हुआ है। कुदरत से उसका ताल्लुक कायम है। उसके बच्चों के हाथ वे गैजेट्स नहीं हैं  जो चुंबकीय तरंगों से परिचालित हैं । उसका सूर्य, जंगल और रोशनी से रिश्ता कायम है। अठारह से सोलह पर आने के लिए हम ही जिम्मेदार हैं। चौदह पर ना लुढ़क जाएं इसके प्रयास करने होंगे।

रुख से जो यूं चली गई मासूमियत
कैसे रूबरू होंगे तेरे-मेरे ये जज़्बात 

ps: pak story आज  ही के दिन एक साल पहले पाकिस्तान के पेशावर में स्कूल के बच्चों पर आतंकवादियों ने हमला किया था।  १५० मासूम इस हमले में मार दिए गए थे।