Thursday, November 26, 2015

ब्याह के इस मौसम मे

 शादी, ब्याह इस दिव्य संबंध को चाहे जिस नाम से पुकारा जाए जब दो जिंदगियां साथ चलने का फैसला करती हैं तो कुदरत दुआ देती ही मालूम होती है। शहनाई की मंगल ध्वनि इसी दुआ की संगीतमय अभिव्यक्ति है। ब्याह की तमाम परंपराएं, फेरे, वचन, आहुति, मंत्र ऐसे दिव्य वातावरण का आगाज करते हैं कि ब्याह को बरसों-बरस जी चुका जोड़ा भी नई ताजगी का अनुभव करता है। सच है कि हम विवाह संस्था और कुटुंब का हिमायती समाज हंै। हम किसी भी कीमत पर इस संस्था को बचाए रखना चाहते हैं। शादी में ईमानदारी बुनियादी जरूरत है लेकिन हम इस नींव के खिसकने के बाद भी शादी को बचाए रखने में यकीन रखते हैं। आखिर क्या वजह है इसकी?
हमारी अदालतें, हमारा समाज सब शादी को बचाए रखने में यकीन रखते हैं क्योंकि तमाम मतभेदों के बावजूद सुबह झगड़ते पति-पत्नी शाम को फिर एक हो जाते हैं। यह स्पेस इस रिश्ते में हमेशा बना रहता है। कई जोड़े तलाक की सीमारेखा को छूने के बाद इस कदर एक होते हैं कि मालूम ही नहीं होता कि विच्छेद शब्द उन्हें छूकर भी गुजरा था। सवाल यह उठता है कि हमारे पुरखों ने एकनिष्ठ होने की अवधारणा के साथ विवाह संस्था को स्थापित किया था तो आज क्यों ये विघटित होती दीख रही है। अलगाव के अनेक मामले पारिवारिक अदालतों की देहरी चढ़े बैठे हैं और पुलिस थाने दहेज के सामान से भरे हुए हैं। यही कारण है कि अब शादी के साथ ही पति-पत्नी को अपनी प्रॉपर्टी स्पष्ट करनी होगी । ये दस्तावेज शादी के बाद के विवाद से बचाएंगे।
 क्या एकनिष्ठ होने की सोच में कोई घुन लगा है या फिर परिवार की अनावश्यक दखलअंदाजी रिश्तों को टिकने नहीं दे रही है? मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने पांच हजार साल पहले जब एक पत्नी की अवधारणा को रखा तो केवल एक जोशीला फैसला भर नहीं था बल्कि एक जीवन पद्धति थी जबकि उनके पिता दशरथ की चार पत्नियां थीं। एकनिष्ठ होने में सुकून है। सात जन्मों की शांति है।
बहरहाल, रिश्तों की सिसकियां, टूटन, बिखराव के बीच समाज में ब्याह के कायम रहने के ही उदाहरण मौजूद हैं। तलाक लगभग अस्वीकार्य । अब भी तलाक लेने वालों को सम्मानित निगाहों का इंतजार है। हम नहीं स्वीकार पाए हैं कि दो शख्स साथ-साथ चले लेकिन जब नहीं चल पाए तो उन्होंने राहें बांट लीं। स्वस्थ समाज में इसकी स्वीकार्यता होनी चाहिए। विवाह संस्था श्रेष्ठ है इसका पालन करते हुए दो मन जिंदगी भर घुटते रहें, इस सोच में बदलाव आना चाहिए।
 ब्याह की तमाम परंपराएं सर माथे लेकिन शोशेबाजी, दिखावा यहां अपने पूरे तामझाम के साथ मौजूद है। दहेज विवाह की अनिवार्य बुराई में से एक है। बारातियों का सड़क रोकना, आतिशबाजी, भोजन की बर्बादी, कब इस पवित्र बंधन का अपवित्र सा हिस्सा बन गए, हमें पता ही नहीं चला। एक घोड़ी दूल्हे को बैठाने के लिए किस तरह दौड़ती और पिसती है, बारात को रोशनी दिखाने वाले कंधे किस कदर कमजोर और फटेहाल हैं, भीड़  भरे इन सामाजिक समारोहों में सफाई व्यवस्था किस कदर खाई में होती ये सब हम नहीं देखते। लकदक बारात के ये स्याह रंग हमें नजर नहीं आते। क्या ये ब्याह समारोह सादगी और शालीनता के शामियाने तले नहीं हो सकते? आशीर्वाद समारोह में दूल्हा-दुल्हन क्यों मेहमानों को ना पहचान कर भी नकली मुस्कान ओढ़े रखते हैं? क्या ये हमारे अति आत्मीय प्रियजनों के साथ संपन्न नहीं हो सकता?
आखिर में एक बात जो बरखा दत्त के टीवी शो वी द पीपल में नजर आई। कल्पना सरोज दलित व्यवसाई हैं जिनका मानना था कि आर्थिक संपन्नता के बाद भी समाज के रवैये में कोई खास बदलाव उन्होंने महसूस नहीं किया है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी ने ब्राह्मण से शादी की है। जब उनसे पूछा गया कि क्या उस परिवार ने आपके आर्थिक रुतबे को देख अपने बेटे की शादी की है, कल्पना ने कहा कि दामाद आशीष देशपांडे स्वयं यहां आए हैं आप खुद पूछ लीजिए। आशीष का जवाब था, मुझे वह पसंद थी और मैं मानता हूं कि पूंजी-वूंजी नहीं बल्कि प्रेम ही है जो समाज में बराबरी के बीज बो सकता है। वो कोई भी होती मैं शादी करता। कल्पना सरोज ने भी माना कि बेटी का ससुराल पक्ष कोई भेदभाव नहीं बरतता। शादी दो दिलों का ही मेल है इस परम सत्य के अलावा बाकी सब झूठ है।