Thursday, October 29, 2015

छंद की तरह गूंजते तुम


दो जिंदगियों के बीच ऐसा कौनसा गठजोड़ है जो ताउम्र उन्हें एक रखता है। अरसा पहले यही सोच थी कि कहीं भी चले जाओ पति-पत्नी अक्सर जूझते हुए ही नजर आते हैं। जोधपुर में पैंतीस साल के दांंपत्य के बावजूद उम्रदराज जोड़े को लड़ते-झगड़ते देखना हैरत में डाल देता था। आखिर इतने बरस बीत गए लेकिन इनके मतभेद उतने ही ताजादम क्यों हैं। वे छोटी-छोटी बातों पर उलझते रहते। जयपुर में एक और जोड़े को करीब से देखने का मौका मिला। उनमें गजब का मतैक्य इस बात को लेकर था कि इन मुद्दों पर हम एक दूसरे को बिलकुल नहीं टोकेंगे। तुम तुम्हारे हिसाब से और मैं मेरे हिसाब से। अलवर के एक जोड़े को देखकर लगता था कि पत्नी कुछ कहती भी नहीं हैं और पति समझ लेते हैं। पति-पत्नी आंखों ही आंखों में पूरी बात कर लेते। कभी उन्हें तेज संवाद करते नहीं सुना।
    इन सभी सूरतों में जो सीधे नुमाया नहीं था वह था प्रेम। वह भाव कि हम दोनों को एक ही रहना है। साथ देना है एक दूसरे का। एक दूसरे को इस रिश्ते में इतना खुलापन देना है कि एक का भी दम ना घुटे। जो पति-पत्नी कहते हैं कि हममें कभी झगड़ा नहीं हुआ वे झूठ कहते हैं। जिस दांपत्य में बहस नहीं, विचारों की अभिव्यक्ति नहीं वह रिश्ता एक तरफा है। अधूरा है। वहां घुटन होगी क्योंकि एक बस केवल दूसरे की आज्ञा शिरोधार्य कर रहा है। उसके पास अपनी बात कहने का साहस नहीं या फिर उसे सुना नहीं जा रहा है। पत्नी वक्त पर चाय, धुले कपड़े और भोजन परोस दे यह दांपत्य नहीं। इसमें कोई नयापन नहीं। यह लीक पर चलना होगा। लीक पर गाडिय़ां चलती हैं, भेड़ें चलती हैं। रिश्ते में नवोन्मेश, ऊर्जा, उत्साह का संचार इन लीकों पर चलने से नहीं होगा।
बरसों-बरस इसी ढर्रे को जीते हुए एक दूसरे की आदत हो जाती है। आदत तब टूटती है जब दोनों में से कोई एक विदा लेता है। हम अक्सर उस पत्नी की चिंता करते हैं जिसका सोलह शाृंगार अब छूट चुका है, मांगलिक कार्यों में उसकी उपस्थिति अब अपेक्षित नहीं है। लेकिन अकेले उस पति का जीवन भी आसान नहीं जिसका साथी विदा ले चुका है। वह अकेला केवल उस सुबह के इंतजार में रहता है जो पार्क में उसके मित्रों के आने से गुलजार होती है। उस सुबह के बाद जो शाम आती है उसमें वह खुलकर आंसू बहाना चाहता है लेकिन इसकी इजाजत नहीं है। कवि अशोक वाजपेयी लिखते हैं
तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति
छंद की तरह गूंजता
तुम्हारे पास होने का अहसास।
तुम चले जाओगे
और थोड़ा सा यहीं रह जाओगे!
जब ये रिश्ता इतना मधुर और मीठा है तो इसे हर हाल में क्यों ना संजोया जाए। दुनिया में शायद ही कोई रिश्ता इतने करीब का हो। दो अंजान कब जान बनकर एकदूसरे के होते चले जाते हैं इसका कोई गणित किसी के पास नहीं है। यहां गणित नाकाम है जो कामयाब है वह है एक दूसरे को महसूस करने का भाव। जो जोड़े एकदूसरे से झगड़ते हैं उनमें भी यही भाव प्रबल है। यूं कौन किसी पर कान धरता है और प्रतिक्रिया देता है। इस इजहार में केवल प्रेम है। जीवन का ऐसा शाृंगार जो गर्म मौसम की वजह से आई ऊब को ऊर्जा से लबरेज करता है। 

Wednesday, October 21, 2015

लौटाने वालों के हक़ में

सब अपने-अपने तर्क गढ़ रहे हैं।  शशि थरूर कहते हैं रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेजों का नाइटहुड  सम्मान था कोई साहित्य का नोबेल नहीं।  राजस्थान के आईदान सिंह भाटी लिखते हैं जिस साहित्य अकादमी ने मेरी राजस्थानी भाषा को मान्यता दी, उसे लौटाने का कदम कोई कैसे उठा सकता है। सबके अपने तर्क हैं लेकिन विरोध के विरोध में शायद कोई नहीं



लेखक अपने अवार्ड्स लौटा रहे हैं। वह सम्मान, जिसे पाकर उन्हें अपना जीवन सार्थक लगा होगा उसे वे लौटा रहे हैं। क्यों लौटा रहे हैं? क्या मिल जाएगा उन्हें? शायद आत्मरक्षा। यह सुरक्षा के  लिए उठाया गया कदम है। उन्होंने देखा कि कन्नड़ साहित्यकार कलबुर्गी गोलियों से शूट कर दिए जाते हैं। पानसरे  और दाभोलकर की भी हत्या कर दी जाती है। किसी के लिए किसी की विचारधारा को सहन नहीं कर पाने की संकीर्ण मानसिकता इस कदर सिर उठाती है कि कभी भीड़ तो कभी हथियारबंद समूह व्यक्ति को मार डालते हैं। या तो मरने के लिए तैयार हो जाओ या फिर अपना रक्षाबल खुद खड़ा करो। लेखकों ने यही किया है उन्होंने प्रतीकात्मक विरोध खड़ा किया है। लोकतंत्र में इससे शांतिप्रिय और कुछ नहीं हो सकता।  नाइटहुड सम्मान लौटाकर ही रवींद्रनाथ टेगौर ने अंग्रेजों के जलियावाला बाग हत्याकांड का विरोध किया था। 
क्या कहा, ये राजनीति है? ये लोग उस समय क्यों नहीं सामने आए जब पश्चिम बंगाल सरकार ने तसलीमा नसरीन  की किताब पर प्रतिबंध लगाते हुए उन्हें अपने राज्य से बाहर चले जाने के  आदेश दिए थे।सलमान रश्दी की किताब द सैटेनिक वर्सेज पर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने प्रतिबंध लगाया था। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भी उन्हें शामिल होने नहीं दिया गया। मकबूल फिदा हुसैन को दुनिया बतौर भारतीय पेंटर जानती है, लेकिन उन्हें अपने प्राण कतर नामक मुल्क में त्यागने पड़े। हम गुस्से में कहते हैं कि यह स्वनिर्वासन उन्होंने खुद को दिया था, लेकिन आताताइयों के डर से सुरक्षा कवच तो लेना ही पड़ता है। तसलीमा कहती हैं यह चयनित विरोध है। आप केवल एक तरह के कट्टरपंथ का विरोध करते हैं। दूसरे और तीसरे पक्ष की ओर नहीं देखते। उनका कट्टरपंथ क्यों जायज माना जाता है? बहरहाल तसलीमा को जवाब देना चाहिए कि जब बीस साल पहले बांगलादेश में रहते हुए उन्होंने हिंदुओं पर मुसलमानों के जुल्म पर आधारित लज्जा लिखी थी वह क्या था?      सोमवार को ऑस्ट्रेलियाई मूल के जोड़े को बेंगलूरु में इसलिए प्रताडि़त किया गया कि उनके पैर में जो टैटू था वह एक समूह विशेष को देवी मां जैसा लगा। इस विराट और वैभवशाली संस्कृति की पैरवी करने  ये कौन लोग इन दिनों निकले हुए हैं। कौन हैं जो ये कह रहे हैं कि यहां लिखा है कि ये खाने पर इन्हें मार दो। खुर्शीद कसूरी पाकिस्तानी हैं, जो इनकी किताब का मुंबई में विमोचन करवा रहे हैं उनके मुंह पर कालिख पोत दो। कालिख पुते चेहरे के साथ सुधींद्र कुलकर्णी कहते हैं- ये मेरा नहीं मेरी शर्ट पर लगे इस तिरंगे का अपमान है जिसे भी काला कर दिया गया है। कौन इजाजत देता है इन्हें कि  क्रिकेट मैच के लिए जिम्मेदार लोगों के कैबिन में जबरन घुसकर हंगामा करो। यह किस दौर में पहुंच रहे हैं हम। पाकिस्तान से मैच नहीं कराने हैं, ना हो। सरकार फैसला करेगी लेकिन  यहां तो कोई और ही फैसले पर आमादा है।
कल को हमें अपने पड़ोसी का चेहरा पसंद नहीं है तो हम खुद ही हिसाब करने लगेंगे। सभ्यता हमें हर हाल में हद में रहने की ताकीद करती है। यही कानून और व्यवस्था संभालने वालों के भी प्रयास होते हैं, लेकिन बात-बात में लोग और भीड़ कानून हाथ में लेने लगेंगे, तो भरोसा किस पर होगा। फिलहाल यहीं भरोसा टूट रहा है। बेशक लेखक समूह अपनी बरसों की इस पूंजी को लौटाकर खुश नहीं होगा लेकिन उसके पास चारा नहीं है। उसे आश्वासन चाहिए। प्रजातांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार से आश्वासन। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुखिया से आश्वासन। उस मजबूत सरकार से मजबूत वादा जिसे भारतीयों ने चुना है। विकास की राह में दौड़ते हुए यह भटकाव किसी को भी तकलीफदेह लगेगा। यह संघर्ष खत्म होना चाहिए। इस लौटाने पर उनका यह कहना कि ये लेखक दूसरे दलों के मोहरे हैं, अशोभनीय है। संवादहीनता की इस परिस्थिति को बदलना चाहिए। संवाद का पुल बनना ही चाहिए। जो बात भारत-पाकिस्तान के संदर्भ में लागू होती है वह हालात देश में क्यों बनने चाहिए? कौन जिम्मेदार होगा इसके लिए?

Wednesday, October 14, 2015

न मनाएं no bra day लेकिन ....


पिछले कई महीनों से खुशबू में प्रकाशन के लिए एक आलेख रखा है। आलेख अंदर पहने जाने वाले वस्त्र को लेकर है कि इसकी खरीदारी में क्या सावधानी बरती जाए कि यह स्वास्थ्य को कम नुकसान पहुंचाए। हर सप्ताह यह लेख हमारी टीम चुनती और फिर संकोच के साथ इसे रोक दिया जाता। सच है कि यह महिलाओं की ही पत्रिका है और यहां ब्रा के बारे में प्रकाशन से संकोच की क्या जरूरत  है। सच यह भी है कि हम इस बारे में सबके सामने ज्यादा बातचीत नहीं करतें और इन्हें सुखाया भी छिपाकर ही जाता है। कोशिश यह हो कि खराब सेहत को ना छिपाया जाए।
सवाल यह भी है कि  किसी भी मसले पर जागृति बढ़ाने वाले कदमों पर रोक क्यों? इस पर वैसे ही बातचीत होनी चाहिए जैसे हम सर्वाइकल कैंसर या किसी भी अन्य कैंसर के बारे में बात करते हैं। कल तेरह अक्टूबर को 'नो ब्रा डे' मनाया गया। इस अंग को अतिरिक्त कसकर रखने से कोशिकाओं की गतिशीलता प्रभावित होती है जिनसे गांठें बनती हैं और ये सख्त होकर कैंसर का कारण बनती हैं। कसी हुई ब्रा के कारण बीच के हिस्से में पसीने की वजह से संक्रमण भी हो सकता है और यह त्वचा के कैंसर में बदल सकता है।
एक टीवी चैनल ने भले ही इस दिन को लेकर एक फूहड़ कार्यक्रम पेश किया हो लेकिन फेसबुक पर इसे लेकर महिलाओं ने खूब संवेदनशील पोस्ट साझा की हैं। स्वर्ण कांता लिखती हैं, ये अभियान इसलिए नहीं है कि ब्रा मत पहनो बल्कि इसका उद्देश्य ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरुकता पैदा करना है। यह देश का तेजी से बढऩे वाला घातक रोग बनता जा रहा है। पश्चिमी देशों में ये जागरुकता पहले ही आ गई। यहां तो शालीनता के नाम पर क्या ना झेलना पड़ जाए। शबनम खान लिखती हैं, ब्रा रेग्युलर पहनने से ब्लड सर्कुलेशन रुकता है जो सेहत के लिए अच्छा नहीं है। डे मनाने या ना मनाने पर अलग बहस हो सकती है लेकिन चुस्त कपड़े पहनने के कुछ नुकसान प्राणघातक भी हैं।
हॉलीवुड एक्ट्रेस जूलिया रॉबर्ट्स कहती हैं, घर मेरे लिए वह जगह है जो मुझे ब्रा से आजादी देता है। सच है यह आजादी का ही एहसास है जब आप इस सामान्य से अंग को किन्हीं और निगाहों से ना देखकर अपनी निगाहों से देखते हैं। फैशन के इस दौर में हर उम्र की लड़की-स्त्री अपने शरीर को किन्हीं और के मानदंडों पर खरा उतारने पर आमादा है। कद से लेकर कदम तक के मानक तय हैं। चमड़ी को उजला करने पर पहले ही बाजार उतारु है क्योंकि गोरा रंग ही सौंदर्य का पैमाना है। हम खुद क्यों नहीं हो सकते हमारे सौंदर्य का पैमाना। शो बिज की मॉडल्स, डांसर्स को फॉलो करने के लिए किशोरियां किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। किसी पार्टी या शादी समारोह के लिए नए स्टाइल्स और डिजाइन्स चुनने में कोई बुराई नहीं है लेकिन स्टाइल वैसा हो जैसा उस फिल्म में उस एक्टर का था, सचमुच हैरान करता है। बुटीक्स, ब्यूटी पार्लर्स, जिम लड़कियों को मॉडल्स जैसे कपड़े, खूबसूरती और बॉडी देने के लिए दिन-रात जुटे हुए हैं। यहां  से पैसा जनरेट होता है। कोई बेहतर स्वास्थ्य देने का दावा या पैरवी नहीं करता। ये नई जीवन शैली सिर्फ और सिर्फ खराब स्वास्थ्य की ओर प्रवृत्त कर रही है।
भारत में सर्वाधिक स्तन कैंसर के मामले हैं। सर्वाइकल कैंसर का भी बड़ा कारण माहवारी यानी मेंस्ट्रुएशन सायकल के दौरान संक्रमित कपड़ों और वर्जित वस्तुओं का इस्तेमाल है। यहां तक की कागज, मिट्टी का भी इस्तेमाल होता है। मणिपुर की उर्मिला चोम को बचपन में पॉलिएस्टर का कपड़ा इस्तेमाल करना पड़ता था जो इतना सख्त हो जाता था कि उनकी दोनों जांघें छिल जाती थीं। उर्मिला आज पूरे देश में एक बड़ा अभियान छेड़ चुकी हैं। वे कहती हैं, माहवारी का रक्त कोई अपवित्र चीज नहीं है। चुप्पी तोडि़ए। खेत, खलिहान, रसोई को यह अपवित्र कैसे कर सकता है जो नई संतान को जन्म देने का कारण है।
'नो ब्रा डे'  एक शुरुआत हो सकती है खुद को निर्धारित मानदंडों से मुक्त करने की। शरीर के अन्य अंगों की तरह ये भी सामान्य अंग है। सौंदर्य कलाकृतियों में ढले जिस्म जिंदा नहीं होते। उन्हें सांचे में ढला या किसी की निजी स्मृतियों का सुंदर ख्वाब बने रहने दीजिए। आप क्यों मोम की गुडिय़ा बनने की दिशा में चली जा रही हैं। आपकी तो धड़कनें हैं, उन्हें महसूस कीजिए।

Thursday, October 8, 2015

क्यों झांकना किसी की रसोई में


हमारे खान-पान की शैली को आप क्या कहेंगे? कहां से विकसित होती है? शायद आदत। खाना-पीना एक आदत ही तो है। जो बचपन से हमें खिलाया जाता है वही हमारी आदत बन जाता है। मेरी मित्र के घर प्याज-लहसुन बिलकुल नहीं खाया जाता तो उसने नहीं खाया। यहां तक कि उसकी गंध से ही उसकी हालत खराब हो जाती। वह वहां बैठ ही नहीं पाती जहां लहसुन का तड़का लगता। वक्त बीता शादी ऐसी जगह हो गई जहां लहसुन के बगैर कोई सब्जी नहीं पकती। पहले-पहल वह अपनी सब्जी अलग बनाती लेकिन इन दिनों मुस्कुरा कर कहती है -"अब तो आदत पड़ गई है, ऐसी आदत की अब टमाटर के झोल वाली सब्जी खाई ही नहीं जाती।" बहरहाल इसका उलट होना भी उतनी ही सहजता के साथ स्वीकारा जा सकता है।
                एक ओर मेरी मित्र की माताजी हैं चिकन इस कदर बनातीं कि उसके यहां खाने का इंतजार हर मित्र को होता। इस बार सभी दोस्त काफी अरसे बाद मिले और आंटी के हाथ का चिकन खाने की इच्छा जाहिर की। मित्र ने कहा भूल जाओ, चिकन-विकन।  खाना-पकाना तो दूर मां अब उस जगह खाना भी नहीं  खातीं जहाँ  ये सब पकता है। उनकी रसोई में अब कोई एक अंडा भी नहीं उबाल सकता। एक बांग्ला परिवार में हम सब खाने पर आमंत्रित थे। साथ में चलने वाले को कोई तकलीफ नहीं थी कि वो भी ब्राह्मण है। जब वहां सुना कि ये तो मछली को बड़े चाव से खाने वालों में सेे हैं तो उनका वहां पानी पीना भी मुश्किल हो गया। जयपुर के ही भारद्वाज अंकल जब कई साल पहले अमेरिका गए तो परेशान हो गए। सब कुछ ठीक था लेकिन खाने में मांस की बहुतायत ने उन्हें बहुत तकलीफ दी। क्या खाएं और क्या छोड़ें? भारत लौटे तो बच्चों के लिए घर में ही ऐसा इंतजाम किया कि वे नॉनवेज खाने की आदत विकसित कर लें। उन्हें डर था कि मेरी तरह मेरे बच्चे इस दुविधा से ना गुजरें। जब खानपान का मसला या उसकी इक्वेशन इस कदर समानुपाती है तो फिर उसे लेकर क्या बहस करना। ये बातचीत का मुद्दा तो हो सकता है लेकिन राष्ट्रव्यापी बहस या प्रतिबंध का मुद्दा कैसे बन सकता है? खाना आपकी आदत, आपके भौगोलिक क्षेत्र वहां की उपज से आपके संस्कारों में आता है। अब गोवा में मछली, नारियल बहुतायत में है तो वही आपकी भोजन की थाली में होगा ना कि वह जो हमारे राजस्थान में खाया जाता है।
थोड़ा सा विषय से भटकने की  की इजाजत। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सन 1943 में बैंकॉक रेडियो से एक भाषण दिया था। वे अंग्रेजों के भारत पर कब्जे की रणनीति पर रोशनी डाल रहे थे। उन्होंने कहा -"अंग्रेजों ने कभी भी देश के सब लोगों से एक साथ संघर्ष नहीं किया। बंगाल में मीरजाफर को अपने पक्ष में कर सिराजुद्दौला को हरा दिया जो वहां का आखिरी राजा साबित हुआ।  बाद में इन्हीं अंग्रेजों ने दक्षिण में टीपू सुल्तान पर हमला किया। इस बार भी कोई आगे नहीं आया। ना मध्य भारत से मराठा ना उत्तर से सिख। अगर यहां भी हम एकजुट हो जाते तो अंग्रेजों को हराना संभव हो जाता। अंग्रेज एक-एक भाग पर हमला करते और जीतते जाते। भारतीय इतिहास के इस पीड़ादायक अध्याय से हमें यह सबक मिला है कि बिना एकता के हम अपने शत्रु के सामने न तो खड़े हो सकते हैं और न आजादी पा सकते हैं। आजादी मिल भी जाए अगर तो बिना एकजुटता से उसकी रखवाली नहीं कर सकते।"
नेताजी ने यह भाषण गांधी जी की 75 वीं सालगिरह पर दिया था। एक को हिंसा और दूसरे को अहिंसा का पुजारी बताने वालों को जानकर हैरानी होगी कि इसी भाषण में नेताजी ने बापू को इतना सराहा और कहा कि बापू ही वह शख्स थे जिन्होंने 1857 की क्रांति के विफल संघर्ष के बाद उपजे लंबे शून्य को अपने होने से भरा। गांधी ने देशवासी को आत्मसम्मान लौटाया। देश के लिए सम्मान का जज्बा जगाया।    
खानपान पर लौटते हैं। क्या इतने बड़े देश का सम्मान और एकता खानपान के मुद्दे पर भंग करने की साजिश होगी? क्या यह एक बेहद निजी मसला नहीं है। मुल्क की बड़ी चुनौतियों को छोड़ अब हम इस पर उलझेंगे कि तेरी रसोई में क्या पक रहा है ??


हम ये क्या कर रहे हैं महज़ इस अफवाह पर  कि इनकी रसोई में ये पका था हम जान ले रहे हैं।

Thursday, October 1, 2015

मनु ने क्या लिखा बापू के बारे में

 कल बापू की 147वीं सालगिरह मनाई जाएगी। बापू हमारे जीवन में इस कदर रचे-बसे हैं कि यूं तो हमारा हर काम उन्हीं पर जाकर खत्म और शुरू होता है। वे हमारी मुद्रा यानी नोटो पर हैं। हमारे अस्पताल के नाम उन्हीं पर हैं। चौराहे, चौराहों की मूर्तियां, रास्ते, सब गांधीमय हैं।हैं फिर भी नहीं हैं । जीवन में भी दो तरह के लोग मिलते हैं। समर्पित गांधीवादी और दूसरे घोर गांधी विरोधी। इस कदर विरोधी कि लगता है गोड़से को फांसी जरूर दे दी गई लेकिन गोड़सेवाद पूरी ताकत से जिंदा है। बापू के जाने के 67 साल बाद भी लगता है कि हम उन्हें समझ ही नहीं पाए। कोई उनके नाम पर झाड़ू उठा लेता है तो कोई खादी का हवाला देने लगता है। बापू को हमने अपनी सुविधानुसार टुकड़ों में बांट दिया है। कुछ बातें जो बापू के व्यक्तित्व को रेखांकित करती हैं वह मनु गांधी की डायरी में मिलती हैं। मनु और आभा ये दोनों अंतिम समय में भी बापू के साथ थीं जब उन्हें गोली मारी गई। मनु लिखती हैं एक दिन रात साढ़े दस बजे बापू ने मुझे जगाया और कहा, 'मेरा वह पेंसिल का टुकड़ा ले आओ तो'। मैं घबरा गई और सोचा कि इस समय बापू पेंसिल के टुकड़े का क्या करेंगे। चूंकि बापू की पेंसिल बहुत छोटी हो गई थी कल रात ही मैंने उसे नई पेंसिल से बदल दिया था। अब मैंने याद रखकर तो टुकड़ा रखा नहीं था। सवा बज गए ढूंढ़ते हुए। वह नहीं मिला। बापू भीतर आए और पूछा- 'क्यों नहीं मिली'? मैंने कहा बापू कहीं रखकर भूल गई हूं। 'ठीक है सो जाओ सवेरे ढूंढ लेना'। बापू ने कहा। लेकिन मनु की आंखों में नींद कहां। एक ही चीज रह गई थी बापू का बगल झोला। उसी मेंं से वह टपक पड़ी। तड़के सुबह प्रार्थना के वक्त तीन बजे जब यह पेंसिल बापू को दी तो उन्होंने कहा ठीक है, मिल गई तो अब रख दो। अभी जरूरत नहीं है। मनु को बहुत गुस्सा आया। रातभर खुद भी नहीं सोए मुझे भी परेशान किया। अब नहीं चाहिए का क्या मतलब लेकिन इस बार संभालकर रख ली।
मनु एक ओर वाकया लिखती हैं। प्रार्थना के बाद इलाहाबाद से पति-पत्नी बापू के पास रहने आए। तुम दोनों को हरिजन बस्ती में जाकर बच्चों की पढ़ाई-सफाई का काम हाथ में लेना चाहिए। मनुष्य को काम ढूंढ ही लेना चाहिए। ऐसे समय काम के बिना एक मिनट भी बैठना पाप है। काम की कमी नहीं यहां तो आदमी की कमी है। कहते हुए बापू ने दोनों को जरूरी काम से जोड़ दिया। तीसरा वाकया सामूहिक सूत कताई दौरान हुआ। सूत कातकर जब बापू अंदर गए दो भाई अंग्रेजी में बात कर रहे थे। वे बोले, हमारा कितना बड़ा दुर्भाग्य है दो सगे भाई अंग्रेजी में बोलते हैं। एक तो कहते हैं कि मुझे विचार अंग्रेजी में ही सूझते हैं। हम अंग्रेजी के गुलाम हो गए हैं और यह गुलामी हमने खुद मोल ली है। अंग्रेजी बोलना हमारी महत्वाकांक्षा रहती है हम कितना समय बिगाड़ते हैं इस भाषा के लिए। हम बिना भूल किए अंग्रेजी बोलते हैं और कोई अंग्रेज इस पर हमारी पीठ ठोक दे तो हम फूलकर कुप्पा हो जाते हैं। हिसाब लगाएं कि जो समय हमने अंग्रेजी सीखने में लगाया, उतना यदि देश सेवा को दें तो कितना बदलाव आएगा।
एक और बात जो बापू ने अपने भाषण में कही थी। अपनी भलाई न छोड़ें। आप सबने रामायण,महाभारत पढ़ी है। ना पढ़ी हो तो इसे पढऩे की मैं सिफारिश करता हूं। इन्हें धार्मिक पुस्तकें तो इसलिए बनाया है कि हम सब उन्हें पढ़ें। हमारे पूर्वज यह मानते थे कि धर्म के नाम पर हम कुछ भी कर सकते हैं। उस समय उन्हें यह कल्पना भी नहीं रही होगी कि इसी धर्म के नाम पर हम भाईयों के गले भी काट सकते हैं। महाभारत में जो बातें हैं केवल हिंदुओं के लिए नहीं है। युद्ध करने से किसी का भला नहीं हुआ। ना कौरवों को शांति मिली ना पांडवों को। ये छोटी-छोटी बातें बापू के बड़े व्यक्तित्व की झलक देती हैं। ये कहती हैं कि वे भी एक साधारण इंसान ही थे। ये और बात है कि आइंस्टीन ने कहा था कि आने वाली पीढिय़ों को यकीन करना मुश्किल होगा कि हाड़-मांस का ऐसा इंसान भी धरती पर हुआ था। उस पेंसिल को बापू नहीं भूले थे। करीब महीने भर बाद उन्होंने रात को मनु को याद दिलाया कि मुझे वह छोटी सी पेंसिल दो जो मैंने तुम्हें पटना में दी थी। मनु को पता था, झट से ला दी।
ऐसे ही थे बापू। उन्होंने मनु से कहा अब तुम परीक्षा में पास हुई हो। जानती हो हमारा देश कितना गरीब है। हजारों गरीब बालकों को पेंसिल का एक टुकड़ा भी लिखने को नहीं मिलता। हमें क्या अधिकार है कि इसे बेकार समझकर फेंक दें। सवाल बहुत ही साधारण से हैं-  क्या इतने बरसों बाद हर भारतवासी को शिक्षा नसीब हुई है? क्या उसका पेट भरा हुआ है? क्या पेट भरने वाला अन्नदाता सुखी है? इंडिया को डिजिटल होना चाहिए लेकिन इंडियावासी का पेट भी भरा होना चाहिए और हाथ में छोटी पेंसिल होनी ही चाहिए। बड़े लोगों को इसके लिए भी दुनिया के बड़े मंचों पर माथा जोडऩा चाहिए।