Thursday, September 24, 2015

दुनिया की पहली स्मार्ट सिटी मुअन जो दड़ो


 चलते हैं अपनी जड़ों की ओर। कहीं दूर नहीं जाना बस पास ही है राजस्थान से लगा हुआ सिंध। वहीं है मुअन जो दड़ो यानी मुर्दों का टीला। सिंधी भाषा में मुअन यानी मरे हुए और दड़ा यानी टीला। कोई क्या दावा करेगा स्मार्ट सिटी बनाने का! हमारे पुरखे तो पांच हजार साल पहले ही सुनियोजित नागर व्यवस्था को जी चुके हैं।



को जी चुके हैं।


  सिंध कभी दूर नहीं था हमसे। ना राजस्थानियों से ना उन सिंधियों के दिलों से जो विभाजन के बाद पाकिस्तान छोड़कर हिंदुस्तान आ गए थे। पश्चिमी राजस्थान पड़ोस के सिंध से बहुत कुछ साझा करता है। पहनावा, घरों की बनावट, खानपान, ब्याह-शादी के रस्म-ओ-रिवाज और इनमें गाए जाने वाले लाडे। लाडे यानी वे गीत जो शादी से एक माह पहले ही गाए जाते थे। सिंधी घरों में आज भी गाए जाते हैं। सिंधी स्त्रियों की वेशभूषा में भी चटख रंग का कढ़ाईदार घाघरा और कांच की जरदोजी वाली कुर्ती शामिल है। गहने लाख और चांदी के। दादाजी अकसर इस पहनावे का जिक्र करते थे और उसे 'पड़ो-कोटी' कहते थे। पुरखों के सिंध से आने के कारण मुअन जो दड़ो और हड़प्पा नाम से हमेशा ही लगाव रहा। यहां-वहां से मिली जानकारियों ने हमेशा एक 'कनेक्ट-सा'बनाए रखा लेकिन हाल ही जब पत्रकार ओम थानवी  की किताब मुअन जो दड़ो पढऩे में आई तो लगा जैसे एक स्वप्निल यात्रा को जी लिया हो। विश्व पर्यटन दिवस पर दुनिया की इस ऐतिहासिक धरोहर की शब्द यात्रा।

कहां है मुअन जो दड़ो

सिंध (अब पाकिस्तान)में है कराची और कराची से 440 किमी दूर लाड़काणा में है मुअन जो दड़ो।  यहां सिंधी जुबां में एक कहावत प्रचलित है 'हुजैई नाणो तो घुम लाड़काणो' यानी पैसा है, दम है तो लाड़काणा घूमो। विभाजन के बाद जब सिंधी पूरे देश में रोजगार की आस में बस गए तब वे एकदूसरे से कैसे परिचय प्राप्त करते थे यह जानना रोचक होगा। मेरे दादाजी नवाबशाह जिले के कंड्यारे से आए थे। वे बातचीत में या ब्याह का रिश्ता जोडऩे से पहले यही पूछते कि आप सिंध में कहां के हैं। कोई कहता लाड़काणा, कोई जेकमाबाद कोई हैदराबाद और फिर रिश्तों के तार इस आधार पर जुड़ते कि किसके मन में किस क्षेत्र की कैसी पहचान है। लाड़काणा से अट्ठाइस किलोमीटर दूर है यह ऐतिहासिक सभ्यता जिसे यूनेस्को ने संरक्षित घोषित किया हुआ है। वह सभ्यता जिसने दुनिया के सामने भारत को अति प्राचीन और सभ्य समाज के दावे को प्रमाणित कर दिया। ऐसा वैज्ञानिक आधार कि जब यूरोप के लोग जानवरों की खाल ओढ़ा करते और अमेरिका आदिम जातियों का इलाका था सिंधु घाटी के लोग बहुत विकसित समाज बनकर जी रहे थे। यह तबाह कै से हुआ बाढ़ से या सूखे से यह अब भी पूरी तरह मालूम नहीं

पांच हजार साल पहले की स्मार्ट सिटी

सिंधु नदी के किनारे पनपी यह दुनिया की पहली नागर सभ्यता थी। आसुदा और बेहद करीने की। खेती विकसित थी और बाशिंदे दूर-दूर तक व्यवसाय के लिए जाते थे। व्यापार आज भी सिंधियों की विशेषता बना हुआ है। सिंधी दुनिया के हर कोने में अपने पुख्ता व्यवसाय के साथ मिलेंगे। इतने विनम्र कि कोई अपशब्द भी कह दे तो पलट के वे ऐसा नहीं करते। व्यापार का यही मूल मंत्र भी है शायद। घाटी के लोग माप-तौल जानते थे। वह साक्षर सभ्यता थी। लिपी थी लेकिन वह बूझी नहीं जा सकी है। मुअन जो दड़ो और हड़प्पा में तांबे का उपयोग होता था। लौह युग बाद का है। हड़प्पा के अवशेष ज्यादा नहीं मिलत।े रेल लाइन बिछाने के दौरान ये विकास की भेंट चढ़ गए। खुदाई से पहले ही ईंट चोरों ने खोद डाला।

पक्की ईंटों का मुअन जो दड़ो

यह घाटी की राजधानी रहा होगा। दो सौ हेक्टेयर के इस क्षेत्र की आबादी कोई पचासी हजार। उस समय का महानगर टीलों पर बसा था। ये टीले बनाए गए थे। ईंटों से ऊंचे किए गए टीले ताकि सिंधु नदी का पानी वहां तक आ जाए तो शहर डूब में ना आए। आजकल बांध बनाकर शहर डुबोए जाते हैं। मध्यप्रदेश में हरसूद ऐसा शहर था जिसे विकास के नाम पर डुबो दिया गया। मुअन जो दड़ो के खंडहर इतने तो आबाद हैं कि इनकी गलियों में घूमा जा सकता है। सामान तो संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहा है लेकिन शहर को कोई कहां ले जा सकता है। सबसे ऊंचे चबूतरे पर बौद्ध स्तूप है। यह सभ्यता के बिखरने के बाद एक ध्वस्त टीले पर बनाया गया था। लगभग ढाई हजार साल पहले। पश्चिम में प्रशासनिक इमारतें, सभा भवन, ज्ञानशाला और कोठार हैं। एक आनुष्ठानिक स्नानागार भी है जो बेहतर हालात में है। सड़कें सीधी हैं या फिर आड़ी। एक तरफ उच्च वर्ग की बस्ती है तो दूसरी ओर कामगारों की। पक्की ईंटे इस सभ्यता की सबसे बड़ी खासियत है। शहर की मुख्य सड़क बहुत लंबी है। अब खाली आधा मील बची है। दो बैलगाडिय़ां एक साथ गुजर सकती हंै। सड़क के दोनों ओर घर हैं। कोई घर सड़क पर नहीं खुलता। प्रवेश अंदर गलियों से है। चंडीगढ़ भी ऐसा ही शहर है। हर घर में एक बाथरूम है। बंद, पक्की नालियां सड़क के दोनों ओर हैं जिनका संबंध स्नानघर से है। पानी की निकासी का श्रेष्ठ बंदोबस्त। हर घर में कुंआ है। कुंए का प्राचीन प्रमाण इसी सभ्यता सेें मिलता है।

कौन सी थी फसलें

यह खेतीहर और पशुपालक सभ्यता थी लेकिन घोड़े का उल्लेख नहीं मिलता है। पत्थर और तांबा खूब था। इन्हीं के उपकरण खेती में काम आते थे। मिस्र और सुमेर की सभ्यता में लकड़ी और चकमक का इस्तेमाल होता था। कपास, गेंहू, जौ सरसों और  चने की फसल के सबूत मिलेे हैं। बाजरा, ज्वार, रागी भी होती थी। फलों में खरबूजा, खजूर, अंगूर और बेर। यहां दुनिया का सबसे पुराना सूती कपड़े का टुकड़ा भी मिला है। खुदाई में तांबे, कांसे और सोने की सुईयां भी मिली है। इस महान संस्कृति का सौंदर्य बोध अद्भुद था। यह धर्मपोषित या राजपोषित ना होकर समाज पोषित था।

नर्तकी और नरेश

यह एक कांसे की प्रतिमा है जो साढ़े दस सेंटीमीटर लंबी है। इसे 1926 में खोजा गया। इस प्रतिमा के बारे में अंग्रेज पुरातत्वविद मार्टिमर बीलर कहते हैं 'यह मेरी पसंदीदा मूर्ति है। यह पंद्रह साल की एक लड़की है जिसका आत्मविश्वास बस देखते ही बनता है। दूसरी मूर्ति नरेश की है हालांकि ऐसे कोई प्रमाण नहीं कि किसी राजा ने मुअन जो दड़ो पर राज किया था। यह साढ़े सत्रह सेंटीमीटर की है। बाल पीछे की तरफ कंघे से किए गए हैं। मूंछ नहीं लेकिन दाढ़ी है। दोनों मूर्ति की आंखें बंद हैं। शैली बुद्ध और महावीर की मूर्तियों में मिलती है। जागते हुए भी थोड़ा खो जाना और खोकर भी थोड़ा जागे रहना।

Monday, September 14, 2015

हिंदी मेरी जां

हिंदी दिवस से दो दिन पहले कोई इरादा नहीं है कि हिंदी ही बोलने पर जोर
दिया जाए या फिर अंग्रेजी की आलोचना की जाए। हिंदी बेहद काबिल और घोर
वैज्ञानिक भाषा है जो खुद को समय के साथ कहीं भी ले चलने में सक्षम है। क
से लेकर ड तक बोलकर देखिए तालू के एक खास हिस्से पर ही जोर होगा। च से ण
तक जीभ हल्के-हल्के ऊपरी दांतों के नीचे से सरकती जाएगी और व्यंजन बदलते
जाएंगे। ट से न तक के अक्षर तालू के अगले हिस्से से जीभ लगने पर उच्चारित
होते हैं। सभी व्यंजनों के जोड़े ऐसे ही विभक्त हैं।
हिंदी इतनी उदार है कि उसने हर दौर में नए शब्दों और मुहावरों को शामिल
किया। अरबी से तारीख और औरत ले लिया तो फारसी से आदमी आबादी, बाग, चश्मा
और चाकू। तुर्की से तोप और लाश, पोर्चूगीज से पादरी, कमरा, पलटन और
अंग्रेजी के तो अनगिनत शब्दों ने हिंदी से भाईचारा बना लिया है। डॉक्टर,
पैंसिल, कोर्ट, बैंक, होटल, स्टेशन को कौन अंग्रेजी शब्द मानता है।
अंग्रेजी हमारी हुई, हम कब अंग्रेजी के हुए।
हिंदी भाषा पर इतने फक्र की वजह, बेवजह नहीं है। हाल ही जब अंग्रेजी में
पढ़ी-लिखी अपने मित्रों और परिचितों में हिंदी की ओर लौटने की जो
व्यग्रता दिखी वह विस्मय से भर देने वाली थी। कविता एक बेहतरीन ब्लॉगर
हैं। नॉर्थ ईस्ट की शायद ही कोई परंपरा या त्योहार होता होगा जो कविता की
कलम से छूटा हो। देश-विदेश में उसके कई पाठक हैं। अंग्रेजी में लिखा जा
रहा उसका यह ब्लॉग बहुत लोकप्रिय है। अचानक वह ब्लॉग से यह कहकर नाता
तोडऩा चाहती है कि उसे कुछ तलाश है। वह हिंदी में बात करना चाहती हैं।
हिंदी लिखना चाहती हैं। हिंदी फिल्मी गीतों और पहाड़ की लोकधुनों पर
नाचना चाहती हैं। अपने नन्हे बच्चों को बताना चाहती हैं कि उसकी मां की
जड़ें कहां हैं। अपने पति से पूछती हैं, क्यों यह मध्यवय का संकट तो
नहीं। उनके पति हंसकर कहते हैं, तुम बहुत प्यारी हो। यह बात उसे और
प्रेरित करती है कि अबकी बार वह उत्तर के पहाड़ों पर अपने बच्चों सहित
जाएगी। एक और प्रोफेसर हैं जिनकी अंग्रेजी ने उन्हें बेहतरीन मुकाम
दिलाया है लेकिन वे भी चुपके से कभी बच्चन तो कभी सर्वेश्वर दयाल
सक्सेना, पड़ोसी देश की सारा शगुफ्ता और परवीन शाकिर को गुनती रहती हैं।
उन्हें हिंदी में रस आता है। इतना कि वे खुद कविताएं करने लगती हैं।
अंग्रेजी ने उन्हें सब कुछ दिया है लेकिन उनकी मूल पहचान कहीं गुम कर दी
है। हिंदी, हिंदीयत और हिंदुस्तानी होने का सुख छीन लिया है। ये दोनों
अपने मर्ज को पहचान गई हैं। लेकिन हममें से कई अब भी लगे हुए हैं उस दौड़
में जिसका नतीजा हमारा सुकून छीन लेगा। अंग्रेजी माध्यमों के इन स्कूलों
में पढऩे वाले बच्चे इस भाषा को सीखने में इतनी मेहनत करते हैं कि अगर यह
सब उनकी अपनी भाषा में हो तो वे आसमां छू लें। अभी उन्हें पचास फीसदी इस
भाषा को देना पड़ता है। केले को बनाना, कद्दू को पंपकिन बोलते-बोलते ये
बच्चे खिचड़ी का भी अनुवाद ढूंढने लगते हैं। कोई पूछे उनसे कि गुलजार जब
लिखते हैं -
बारिश आती है तो मेरे शहर को कुछ हो जाता है/टीन की छत, तिर्पाल का
छज्जा, पीपल,पत्ते पर्नाला सब बहने लगते हैं/तंग गली में जाते-जाते साइकल
का पहिया पानी की कुल्लियां करता है......
अब भला कोई बताए तिर्पाल , पीपल और कुल्लियों का अनुवाद क्या होगा।
अंग्रेजी जाने क्या दे रही है लेकिन हमसे हमारी पहचान जरूर अलग कर रही है
और कुछ समझदार लोग इसे वक्त रहते पहचान लेते हैं लेकिन कई अवसाद से घिरने
लगते हैं। यह ऐसा अवसाद है जो किसी मनोचिकित्सक की पकड़ में नहीं आता
जबकि हमने पूरी जनरेशन को इसकी चपेट में लाने का कार्यक्रम बना दिया है।
हिंदी महज भाषा नहीं हमारी जड़ है। जड़ में मट्ठा  तो नहीं ही पडऩा चाहिए।

Wednesday, September 9, 2015

दर्द का यूं दवा बनना

अलविदा अलान पिता अब्दुल्लाह बच्चे को अंतिम विदाई देते हुए।  तस्वीर रायटर

हम में से लगभग सभी ने नीली शर्ट और लाल शॉर्ट्स  पहने उस बच्चे की तस्वीर देखी होगी जो टर्की के समंदर किनारे औंधा पड़ा है। टर्की के तटीय सुरक्षाकर्मी ने जब पिछले बुधवार उसे  उठाया तो उसके दिल ने यही कहा कि काश धड़कनें चल रही हों लेकिन वह मृत था।
तीन साल का अलान कुर्दी अपने बड़े भाई गालिब, मां रिहाना और पिता अब्दुल्लाह के साथ बरास्ता ग्रीस, कनाडा जाकर बस जाना चाहता था। उसके मुल्क सीरिया में इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने कहर मचा रखा है। इस कहर से बचने के लिए उसके पिता ने समुद्री स्मगलरों को चार हजार यूरो (एक यूरो लगभग ७५ रुपए) दिए। वह एक रबर बोट थी जिसमें पर्याप्त लाइफ जैकेट्स नहीं थे। रात के तीन बजे यह सफर शुरू हुआ। पता चला कि लहरें कभी-कभी पंद्रह फुट ऊंची भी हो जाती हैं। नाव पलट गई। माता-पिता ने दोनों बच्चों का सिर पानी से ऊपर रखने की भरपूर कोशिश की। अलान ने पापा से कहा 'पापा आप मेरा हाथ पकडऩा, मैं आपका पकडूंगा तो छूट जाएगा।' पकड़ नहीं बनी अलान छूट गया और अब्दुल्लाह का पूरा परिवार जल समाधि में लीन हो गया। 
 अलान की मासूमियत क्यों किनारे आ लगी? उसे क्यों समंदर में पनाह लेनी पड़ी? इस दर्द भरे सच ने पूरी दुनिया को झकझोरा है। ऐसी अनेक दुर्घटनाएं सीरिया छोड़कर यूरोप में शरण पाने की आस में जा रहे परिवारों के साथ घट रही हैं । यूरोपीय देशों की सीमा बंद करने की नीतियों ने ऐसे खतरनाक रास्तों को जन्म दे दिया है। जान बचाने के लिए लोग इन देशों में शरण लेना चाहते हैं और इसके लिए वे समुद्री दलालों को मुंहमांगी कीमत देने को मजबूर हैं। पूरे परिवार से बिछुडऩे के बाद अब अब्दुल्लाह किसी देश की शरण नहीं चाहते। वे कहते हैं- अब दुनिया के सारे देश भी मुझे पनाह  दें तो भी नहीं चाहिए, जो कीमती था वह चला गया है। व्यथित अब्दुल्लाह किनारे जाकर लोगों से इल्तिजा कर रहे हैं  कि यूं  सीमा पार मत करो, खतरा है। 
राहत की बात ये है कि अब यूरोपीय मुल्कों ने अपनी सरहद शरणार्थियों के लिए खोलने की पहल की है। लाखों लोग इस आंतरिक युद्ध का शिकार हैं लेकिन यह अलान की निर्जीव देह थी जिसने इन मुल्कों की मृत सोच में प्राण फूंके हैं। ऐसा क्यों है कि हर कहीं दो व्यक्ति, दो परिवार, दो मजहब, दो मुल्क , दो विचार एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं? क्या शांति के बीज बोने का पारिवारिक संस्कार खत्म हो रहा है। दुनिया के हालात तो यही बता रहे हैं। यह सुखद संयोग है कि ऐसेे माहौल में बोध गया को दुनिया की आध्यात्मिक राजधानी बनाने का विचार भारत सरकार की ओर से आया है। बोध गया वही जगह है जहां गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। वे बुद्ध जिन्होंने सांसारिक दुखों पर विजय पाने के लिए परिवार से मोह छोड़ा था और दुनिया को त्याग और अहिंसा के मार्ग पर अग्रसर किया था। बेशक बुद्ध, महावीर और गांधी की भारत भूमि दुनिया के लिए एक मिसाल है जहां शरण चाहने वालों का हमेशा स्वागत हुआ। हम ऐसे ही हैं, मानवतावादी। पाकिस्तान, बांग्लादेश, तिब्बत, अफगानिस्तान से करोड़ों शरणार्थी भारत आकर रह रहे हैं। इस संख्या बल ने भारत का नुकसान ही किया है लेकिन यह दुनिया एक परिवार है, के भारतीय संस्कार यहां हावी रहे। तिब्बत के दलाई लामा और बांग्लादेश की तस्लीमा नसरीन का भारत में रहना किसी एक राजनीति सोच का नतीजा नहीं, भारतीय संस्कार है।
शांति के  इस संदेश को हमारे पूर्व राष्ट्रपति और शिक्षक एपीजे कलाम ने भी खूब ताकत बख्शी। वे तो बच्चों के बीच पहुंचकर अक्सर उनसे एक कविता दोहराने के लिए कहते थे कि यदि दिल में सुंदर चरित्र बसता है तो घर में सौहार्द्र होता है और जो घर में सौहा
र्द्र होता है तो देश व्यवस्थित होता है और जब देश व्यवस्थित होता है तो दुनिया में शांति स्थापित होती है।
जाहिर है दो को एक होने की प्रेरणा के बीज घर से ही बोए जाने चाहिए। असद भोपाली का एक बहुत प्यारा गीत है दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज एक है, नग्मे जुदा-जुदा हैं  मगर साज एक है... जब ये दो यूं एक होंगे तब ही रोशनी से रूबरू हो सकेंगे। अलान जैसे मासूम बच्चे की जिंदगी सख्त बड़ों ने छीनी है। ये बड़े जो उदार होते, मानवता पर ऐसी तोहमत न लगती। इस बच्चे की तस्वीर भले ही दर्द भर देती हो लेकिन यही दवा बनकर भी सामने आई है। सरहद की हद से मानवता बड़ी है।