Wednesday, July 29, 2015

महाभारत में कौन है चाचा कलाम को प्रिय


 मेरी पीढ़ी ने महात्मा गांधी को नहीं देखा, शास्त्री को नहीं देखा केवल सुना था कि उनके एक आह्वान पर देश उस दिशा में चल देता था। जिन्हें देखा वे थे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम। उनकी बात मानने का मन करता था। उनसे वादे करने का जी चाहता था। उनके साथ शपथ लेने को दिल करता था। इस साल जब जनवरी माह में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पधारे तो वहां का जर्रा-जर्रा कलाम-कलाम पुकार रहा था। सारे रास्ते वहीँ जा रहे थे जहाँ वे बोलने वाले थे।  हजारों बच्चों ने उनके साथ शपथ ली कि वे जिसे भी वोट देंगे उससे पहले उसके काम की गणना करेंगे। उन्होंने वहां मौजूद सबसे दोहराने के लिए कहा कि यदि दिल में सुंदर चरित्र बसता है तो घर में सौहार्द्र होता है और जो घर में साौहाद्र्र होता है तो देश व्यवस्थित होता है और जब देश व्यवस्थित होता है तो दुनिया में शांति स्थापित होती है।
  लेकिन हमने ये क्या किया देश के सबसे कर्मठ व्यक्ति के देह त्यागते ही स्कूलों में छुट्टी घोषित कर दी। सोमवार रात ही बच्चों के स्कू ल से मोबाइल पर मैसेज आ गया कि पूर्व राष्ट्रपति के दुखद निधन पर स्कूल में अगले दिन अवकाश रहेगा और परीक्षा उसके अगले दिन होगी जबकि बच्चों के कलाम चाचा कहते थे कि मेरी मृत्यु पर अवकाश घोषित मत करना। अगर तुम मुझसे प्यार करते हो तो एक दिन ज्यादा काम करना। हमारे विद्यालयों ने जाहिर कर दिया है कि वेे केवल शख्स का सम्मान करते हैं शख्सियत का नहीं।
       जयपुर में  'विजन २०-२०'  के बारे में बात करते हुए उन्होंने पूछा - ''बच्चो क्या तुम बता सकते हो कि महाभारत का मेरा प्रिय पात्र कौनसा है? बच्चों ने कहा अर्जुन फिर युधिष्ठिर फिर भीम...कलाम चाचा नो-नो कहते गए और फिर बोले विदुर क्योंकि वे निर्भय, निष्पक्ष और निर्लिप्त थे। उन्होंने बच्चों से बुलवाया कि अगर हर भारतीय एक बेहतर नागरिक होगा तो दुनिया को एक अरब बेहतर नागरिक मिलेंगे। उन्होंने जोर दिया कि शिक्षा अगर रोजगारोन्मुख होगी तो 2020  तक हर भारतीय के पास काम होगा।
   कलाम साहब की रुखसती से हर आंख नम और सर सजदे में है। जैसे हर एक को तलाश है एक ऐसे कंधे कि जहां आंखें बरस सकें। वैसे ऐसा प्रस्थान किसी का भी ख्वाब हो सकता है। यह महादेशभक्त का महाप्रयाण है। जिंदगी भर जिस काम को लक्ष्य मानकर पूरा करने में लगे रहे उसी के साथ इस लिविंग प्लानेट यानी  पृथ्वी को अलविदा कहा। यह क्या कम है कि अपने महाप्रयाण से उन्होंने आतंकवादियों की गोलियों की भयावह गूंज को कम कर दिया। सुबह से भारत जिस दहशत को जी रहा था, देर शाम इस पर कलाम साहब का नजरिया छाने लगा। आतंक हार गया। देशभक्ति, मानवता की जीत हुई। आखों की नमी में शहादत के रंग इंद्रधनुष की तरह नजर आने लगे। बरगद-सी सोच ऐसा ही आभा-मंडल रचती है। हैरान हो सकते हैं कि कोई इतनों का इतना प्रिय कैसे हो सकता है। इतने सादा अंदाज में रहने वाली असाधारण आत्मा को कोटि-कोटि प्रणाम।

Wednesday, July 22, 2015

मंटो से विजयेंद्र तक हम

मंटो ने  बंटवारे का जो दर्द कहानी टोबाटेक सिंह में लिखा वह खुशवंत सिंह के उपन्यास ट्रेन  टू पाकिस्तान से अलग था। ये दर्द इन दोनों ने जिया था।  आज के लेखक वी. विजयेंद्र प्रसाद हैं  और वे बजरंगी भाईजान रचते हैं। यह आज के समय की ज़रूरत है।

हमारे बच्चे भारत के साथ जिस एक और मुल्क का नाम लेते हुए बड़े होते हैं वह है पाकिस्तान। अखबार की सुर्खियां पढ़ते हुए, टीवी पर बहस देखते हुए उन्हें समझ में आ जाता है कि यह दुश्मन मुल्क केवल हमारे देश का अमन-चैन बर्बाद करने के लिए बना है। यह एक ऐसा देश है जिसकी ओर हमारी तमाम मिसाइलों का रुख होना चाहिए। हमारे जन्नत से खूबसूरत कश्मीर में इन्होंने ही तबाही मचा रखी है और सरहद पर ये आए दिन गोलीबारी करते रहते हैं। बच्चे ये भी जानते हैं कि क्रिकेट के मैदान में हमें पाकिस्तान को हराकर जितनी खुशी मिलती है उतनी इंग्लैंड को परास्त कर नहीं मिलती। उन्होंने हिंदुस्तान के एथलीट मिल्खा सिंह की ओलंपिक्स में हार के लिए बंटवारे को जिम्मेदार ठहराने वाली फिल्म भाग मिल्खा भाग देखी और पसंद की है। उनके जेहन में पाकिस्तान के लिए नफरत है। उतनी नहीं जितनी बंटवारे के आसपास जन्मी पीढ़ी की है, पर है। जिन्होंने अपना सबकुछ छोड़ दो मुल्क को यात्रा सआदत हसन मंटो की कहानियां पसंद करने वाले जरूर खुद की जहनियत टोबा टेकसिंह कहानी के उस पागल बिशन सिंह जैसी मानते हैं जो विभाजन को कभी कुबूल नहीं कर पाया।
   एक दूसरी हकीकत  में मंटो (बंटवारे के समय वे पाकिस्तान चले गए थे) लिखते हैं, अदालतें मुझे अश्लील लेखक की हैसियत से जानती है। सरकार मुझे कभी कम्युनिस्ट कहती है कभी देश का सबसे बड़ा अदीब। कभी मेरे लिए रोजगार के दरवाजे बंद किए जाते हैं और कभी खोले जाते हैं। कभी मुझे गैर जरूरी इंसान बताकर मकान से बाहर कर दिया जाता है और कभी मौज में आकर, यह कह दिया जाता है कि नहीं तुम मकान के अंदर रह सकते हो। मैं पहले सोचता था, अब भी सोचता हूं कि इस देश में, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा इस्लामी राज्य कहा जाता है मेरी क्या जगह है और मेरी क्या जरूरत है। खैर, ऐसी दुविधा में दोनों तरफ कई लोग रहे लेकिन आम पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी एकदूसरे से नफरत करते हुए ही बड़े हुए हैं। इस नफरत को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जरूर अमन की आशा नामक बस चलाकर कम करने की कोशिश की थी। उन्हें उधर के लोग भी अमन पसंद इंसान के रूप में याद करते हैं। कुछ समय पहले लाहौर से एक युवा पत्रकार सहर मिर्जा जयपुर आईं थीं। यही सोचा था कि पत्रकार हैं देश-दुनिया के हालात के बारे में बात होगी लेकिन हैरानी हुई कि सहर की हर बात में केवल दोनों मुल्कों के लिए अमन की बातें थीं। उनकी दादी का ताल्लुक जयपुर से था और बंटवारे के दौरान उनके हिंदू पड़ोसियों ने उनकी खूब मदद की थी। वे पाकिस्तान में अपनी दादी और हिंदुस्तान के किस्से सुन-सुनकर बड़ी हुई हैं। इस मुल्क के लिए सहर के दिल में बेपनाह मुहब्बत नजर आती है।
बहरहाल, एक और कोशिश वी. विजयेंद्र प्रसाद की लिखी बजरंगी भाईजान है। एक गूंगी बच्ची सरहद पार कर हिंदुस्तान आ जाती है और बजरंगी उसे जान पर खेलकर पाकिस्तान छोडऩे जाता है। वहां उसकी मदद चांद नवाब (आप यू ट्यूब पर इनका एक असल वीडियो देख चुके होंगे जिसमें एक ट्रेन के बाजू से वे ईद की रिपोर्टिंग कर रहे हैं) और मौलवीजी करते हैं। बजरंगी भाईजान कहती है कि दोनों मुल्कों के लोग एकदूसरे से इतना बैर-भाव नहीं रखते जितना कि सियासत और उसका निजाम। आखिर में जब बच्ची बजरंगी को मामा और जयश्री राम कहते हुए विदा करती है तो हॉल में सिसकियों की आवाज सुनाई देती है। बतौर एक्टर सलमान इस बार पीके यानी आमिर की राह पर दिखे हैं। हीरानी-चौपड़ा टाइप सिनेमा की पगडंडी चौड़ी हो रही है और फोकट की हीरोगिरी देखने वाले दर्शक कम। एक दृश्य में बच्ची नॉनवेज खाने के लिए पड़ोस के मुस्लिम परिवार की गोद में दिखाई देती है। वाकई बच्चे अपने मनपसंद भोजन के लिए ऐसे ही दौड़ जाते हैं। बहरहाल, सच्चा सुंदर सिनेमा ही हमें अपील करता है।
बंटवारे के अड़सठ साल पहले लिखी कहानी टोबा टेकसिंह के नायक बिशन सिंह इसलिए पागल हो जाता है कि उसे समझ ही नहीं आता कि टोबा टेक सिंह (जहां का वह और उसकी जमीन है) हिंदुस्तान में है या पाकिस्तान में और जब उसे पता चलता है कि टोबा टेकसिंह पाकिस्तान में ही रह गया है और हिंदुस्तानी पागलों को अब सरहद पार भेजा जा रहा है, वह वहीं सरहद पर ही मर जाता है। आज की कहानी बजरंगी भाईजान का नायक बच्ची को पाकिस्तान में उसके खोए हुए शहर में सकुशल पहुंचाने जाता है। दोनों देश एकदूसरे का वजूद स्वीकार चुके हैं। सियासत भी स्वीकार ले तो अरबों-खरबों का बजट मुल्क की तरक्की में लगेगा। वैसे उस दौर को याद करने के लिए टोबा टेक सिंह पर भी एक फिल्म केतन मेहता बना रहे हैं। पंकज कपूर पागल बिशन सिंह के किरदार में होंगे।

Wednesday, July 15, 2015

क्यों कोई स्त्री नहीं बनती FTII की अध्यक्ष

  गजेंद्र चौहान विवाद को छोड़कर किसी महिला को एफटीआईआई का अध्यक्ष बना देना चाहिए जो आज तक नहीं बनी। कई हैं जो इस पद के काबिल हैं। युधिष्ठिर ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनके नाम पर यूं महाभारत छिड़ेगी। कौरव-पांडव यूं बंट जाएंगे। जाहिर है जो उनके पक्ष में होगा वो उन्हें पांडव लगेगा और उनका विरोधी कौरव। उनके लिहाज से कौरवों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। दरअसल, फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट््यूट जो पुणे में है उनके सभी पूर्व अध्यक्षों का प्रोफाइल बेहद गंभीर और शानदार रहा है। आरके लक्ष्मण (1970-1980) श्याम बेनेगल 1981-83) मृणाल सेन (1984-86) अडूर गोपालकृष्णन 1987-89) महेश भट्ट (1995-97) गिरीश कर्नाड (1999-2001) और यूआर अनंतमूर्ति (2008 -2011  )  जैसे दिग्गजों  के आगे गजेंद्र चौहान का कद छोटा मालूम होता है। एक समय विनोद खन्ना भी अध्यक्ष रहे। बेशक टीवी धारावाहिक रामायण में वे पांडवों के सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर की भूमिका में थे लेकिन मुंबई फिल्म उद्योग को यह नाकाफी लग रहा है। वे रहे होंगे युधिष्ठिर की भूमिका में लोकप्रिय लेकिन इंस्टीट्यूट को चलाने के लिए यह काफी नहीं है। ऐसा कहते हुए इंडस्ट्री के महत्वपूर्ण लोग इकट्ठे होकर विरोध करने लगे हैं।
जिस शख्स के उत्तराधिकारी गजेंद्र बने हैं वे सईद अख्तर मिर्जा हैं। फिल्म और टेलीविजन के बेहतरीन पटकथा लेखक और निर्देशक। हममें से कुछ को दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक नुक्कड़, और उसके किरदार आज भी याद होंगे। खोपड़ी शराबी, गणपत पुलिसवाला, धनसुख भिखारी को  शायद ही कोई भूला हो। इस धारावाहिक को उन्होंने ही बनाया था। मिर्जा के खाते में अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है, सलीम लंगड़े पर मत रो, मोहन जोशी हाजिर हो और नसीम जैसी बेहतरीन फिल्में हैं। पुणे का यह संस्थान है ही फिल्म और टीवी का मिला-जुला रूप। मिर्जा इस लिहाज से सही चुनाव थे जबकि चौहान की पृष्ठभूमि इसकी तस्दीक नहीं करती। हो सकता है कि चौहान सोच रहे हैं कि सरकार ही फैसला ले और सरकार इस उम्मीद में कि चौहान पीछे हट जाएं। वैसे  इस नियुक्ति को चुनौती देते हुए विद्यार्थी और कलाकार तो सड़क पर आ गए हैं।
संस्थान 1960 में बना है। यह पुणे के प्रभात स्टूडियो के एक हिस्से में था। फिल्मों की पढ़ाई 1961 से शुरू हुई। तब इसके मुखिया प्रिंसिपल होते थे। 1961  तक निर्देशक सिनेमेटोग्राफर जगत मुरारी इसके प्रिंसिपल रहे। १९७१ में टीवी विभाग को दिल्ली से लाकर इसमें जोड़ दिया गया।1974  से ये भारत सरकार के सूचना मंत्रालय के अधीन आया। शुरुआती दो अध्यक्ष ब्यूरोक्रेट्स रहे हैं जो मंत्रालय के सचिव थे। जाहिर है संस्थान का शानदार इतिहास रहा है और दायित्व बड़े। अध्यक्ष को तेरह सदस्यीय परिषद के चुनाव कराने पड़ते हैं। एकेडमिक कोर्सेस की जिम्मेदारी भी अध्यक्ष की होती है। संस्थान के निदेशक का चयन भी अध्यक्ष ही करता है। पुणे ने जया बच्चन, नसीरुद्दीन शाह, स्मिता पाटिल, विधु विनोद चौपड़ा, राजकुमार हीरानी, शबाना आजमी, ओम पुरी, सतीश शाह जैसे बेहतरीन कलाकार उद्योग को दिए हैं।
कमाल ये है कि संस्थान के अध्यक्षों की लंबी फेहरिस्त में एक भी महिला शामिल नहीं है। जबकि भारतीय सिनेमा और टेलिविजन से स्त्री को निकाल दिया जाए तो वह लकवाग्रस्त ही नजर आएगा। चौहान से बड़ी विडंबना यह है कि अब तक किसी भी स्त्री को इस काबिल नहीं समझा गया जबकि केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड में जरूर लीला सैमसन, शर्मिला टैगोर जैसे नाम रहे हैं। चौहान को हटाने की बजाय किसी महिला अध्यक्ष को लाने की बात होनी चाहिए। सई परांजपे, कल्पना लाजमी, मीरा नायर, शबाना आजमी जैसे नामों पर विचार हो सकता है। इनका सिनेमा इनके व्यक्तित्व को बयां करता है। बॉलीवुड मेल डॉमिनेटेड सोसायटी हो सकता है लेकिन पुणे का संस्थान नहीं। भारत सरकार का चयन भी नहीं।

Wednesday, July 8, 2015

दुष्कर्मी को ही पति बना देने वाले वैवाहिक दुष्कर्म को कैसे मानेंगे अपराध


जब हम दुष्कर्मी को ही पति बना देने का मानस रखते हैं तो हम शादी के बाद वैवाहिक दुष्कर्म को कैसे अपराध ठहरा सकते हैं। 

रसिक मोहन को साची पसंद थी। वो उसका खूब पीछा करता। छेडऩे की हद तक। फोन, मैसेजेस रसिक मोहन ने कोई जरिया नहीं छोड़ा था साची को परेशान करने का। साची कई बार उसे लताड़ चुकी थी, झिड़क चुकी थी लेकिन रसिक मोहन हरकतों से बाज नहीं आया। चूंकि साची की जरा भी रुचि रसिक मोहन में नहीं थी, उसने सारी बात अपनी मां को बताई। साची की मां कुछ सोचती इससे पहले एक प्रतिष्ठित जरिए से साची के लिए रिश्ता आया। यह रसिक मोहन की तरफ से था। मां-बेटी दोनों हैरान-परेशान थे लेकिन पिता की राय थी कि परिवार अपनी बिरादरी का है, आर्थिक हैसियत भी अच्छी है, हमें इसे मंजूर कर लेना चाहिए। मां चाहकर भी ये नहीं कह पाई कि यह लड़का साची को काफी समय से परेशान कर रहा है और यह साची को नापसंद है। शादी हो गई और रसिक मोहन ने बड़े गर्व से साची को बताया कि उसे बहुत अच्छा लगा जब साची ने उसके प्रणय निवेदन को ठुकरा दिया था। साची ने समझ लिया था कि यह रसिक मोहन का लड़कियों की शुचिता परखने का उपक्रम था। हालंांंकि अब साची उस बात को ज्यादा तूल  नहीं देना चाहती क्योंकि वह उसका पति है।
हमारे यहां रिश्ते ऐसे ही तय होते हैं। शादी का पैगाम आते ही हम तमाम हरकतों को नजरअंदाज करते हैं। हम वो समाज हैं जो लड़का-लड़की को साथ देखकर ही उन्हें शादी के बंधन में बांधने की जुगत में लग जाते हैं। यहां तक कि दुष्कर्म कर चुके लड़के से भी यही उम्मीद रहती है कि जैसे-तैसे इन दोनों का ब्याह हो जाए तो कलंक से मुक्ति मिले। कलंक उस अपराधी लड़के पर नहीं निर्दोष लड़की पर लगता है। तभी तो अलवर जिले के झाड़ोली गांव की किशोरी रविवार को सूखे कुएं में कूद गई क्योंकि लड़का उसके साथ दुष्कर्म करना चाहता था। निर्भया से लेकर इस किशोरी तक हर कोई खुद की अस्मत को जान से ज्यादा कीमती मानती है। इतिहास राजघरानों की महिलाओं के जौहर का भी साक्षी है। वे आग को गले लगाना बेहतर समझती हैं। पंजाब में आजादी की लड़ाई में कुएं में कूद जाने वाली माताओं और बहनों को कोई कैसे भूल सकता है। जब इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है फिर कैसे हम ेदुष्कर्मी के साथ लड़की की शादी कराने पर उतारू हो जाते हैं। दुष्कर्म सबसे बड़ा अपराध है और उसी अपराधी को पति बनाकर हम लड़की को सबसे बड़ी सजा भुगतने पर मजबूर कर देते हैं।
तमिलनाड़ु के कुड्डालोर जिले में महिला कोर्ट ने वी मोहन नामक शख्स को एक नाबालिग से दुष्कर्म का दोषी पाया। किशोरी गर्भवती हो गई और उसने बच्ची को जन्म दिया। महिला कोर्ट ने वी मोहन पर दो लाख का जुर्माना और सात साल की सजा सुनाई। फैसले के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट में अपील दायर की गई। हाईकोर्ट ने ना केवल जमानत मंजूर की बल्कि पीडि़त और आरोपी में शादी का बेहूदा सुझाव भी दे डाला। यहीं सबसे अहम भूमिका निभाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले बुधवार एक फैसले में कहा कि दुष्कर्म के मामलों में मध्यस्थता की कोई जगह नहीं। कोई भी समझौता अपराध की गंभीरता को कम नहीं कर सकता। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि कानूनी प्रावधान से कम सजा देना पीडि़त के खिलाफ संवेदनहीनता दर्शाना होगा। महिला के खिलाफ होने वाले अपराधों में 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई जानी चाहिए।
बेशक सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से ना केवल स्त्री मन की अनुगूंज परिलक्षित होती है बल्कि यह उस सामाजिक सोच को भी कड़ी फटकार है जो इन मामलों में ऐसी ही सोच की पैरवी करता नजर आता है। मध्यस्थता कई मसलों में होती है लेकिन यह अपराध इस काबिल नहीं। यह स्त्री की गरिमा पर गहरी चोट है। शायद इसी सामाजिक सोच का नतीजा है कि दुष्कर्म की घटनाएं रुकने का नाम नहीं लेती। इसे गंभीर और घृणित अपराध मानने से समाज बचता आया है। हम जिसे रावण कहते हैं वह भी ऐसा अपराधी नहीं था। सीता से निवेदन ही किया था रावण ने।
एक अपराधी को पति का दर्जा दिलाकर हम क्या साबित करना चाहते हैं। ब्याह कोई एहसान है जो अपराधी लड़की पर करेगा। दुष्कर्म एक स्त्री की आत्मा को तार-तार करता है। जब हम दुष्कर्मी को ही पति बना देने का मानस रखते हैं तो हम शादी के बाद वैवाहिक दुष्कर्म को कैसे अपराध ठहरा सकते हैं। तभी तो जब इस कानून की बात आती है तो हमारे नेता भारत की सांस्कृतिक विरासत का हवाला देने लगते हैं। तहमीना दुर्रानी ने अपने उपन्यास कुफ्र (जो एक स्त्री की असल कहानी है) में उस स्त्री की पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया है जिसका पति सिर्फ देह से बात करता है। वह इस अपराध बोध (जबकि वह अपराधी भी नहीं) से मुक्त होने के लिए घंटों शावर के नीचे आंसू बहाती है। बेशक सर्वोच्च न्यायालय की यह बात स्त्री अस्मिता की राह में मील का पत्थर साबित होगी। इसके बाद आया एक और फैसला भी इसकी अगली कड़ी मालूम होता है। एक अविवाहित महिला भी अपने बच्चे की कानूनन संरक्षक हो सकती है। पिता की सहमती जरूरी नहीं। बहरहाल परिवार अब बराबरी से और आपसी प्रेम से चलेंगे। एकतरफा समर्पण से नहीं।

Wednesday, July 1, 2015

छोड़ गईं छुट्टियां

 छुट्टियां साथ छोड़ गई हैं बच्चे फिर स्कूल जा रहे हैं। वो बेफिक्री, वो मस्ती घर में छूट गई है। उनकी चीजों का जो पसारा घर के कमरों में फैला रहता था वह अब अलमारी में दुबका दिया जाएगा। वे फिर एक कसी हुई जिंदगी के पीछे कर दिए जाएंगे। जुलाई की पहली तारीख को घर लौटे बच्चों से जब भी पूछा कि क्या मैम ने आपसे आपकी छुट्टियों के बारे में बात की, बच्चों का जवाब ना होता। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि बच्चे जो अपने नाना-नानी के यहां या किसी दूसरे शहर या किसी पहाड़ पर गए हैं, उनसे उनके अनुभव साझा किए जाएं। उनसे पूछा जाए कि उन्होंने क्या महसूस किया। पूरी कक्षा के लिए ये यात्रा संस्मरण किसी बड़ी किताब को सुनाने वाले होंगे। बच्चे बोलने-सुनने की कला में प्रवीण होंगे। किसी बच्चे ने अगर किसी नए खेल या कला को सीखा है वह भी मैम को मालूम होगा। किसी कार्यक्रम या आयोजन में मैम उनकी प्रतिभा को शामिल कर सकती हैं। पहले दिन स्कूल से घर लौटे बच्चों से अगर किसी भी कक्षा में ऐसी सृजनशील बातचीत हुई है तो मान लीजिएगा कि वह स्कूल केवल प्रतिस्पर्धा के लिए घोड़े तैयार नहीं कर रहा है बल्कि उसका मकसद बच्चों के संपूर्ण विकास से है। बहुत अच्छे लगे इटली के वे शिक्षक जिन्होंने बच्चों को होमवर्क में सूर्योदय, पहाड़, चांदनी , समंदर को निहारने के   लिए कहा है। पढऩे के लिए कहा है और नकारात्मक परिस्थितियों से बचने की सलाह दी है।
    एक शिकायत उन माता-पिताओं से भी है जिन्होंने इन छुट्टियों में   टीवी, मोबाइल और कम्प्यूटर के स्क्रीन बच्चों के हवाले कर दिए हैं। वॉट्स एप पर अजीब-अजीब चुटकुले, फिल्मी पोस्टर, वीडियोज, बेतुकी शायरी पढ़कर वे खूब व्यस्त हो रहे हैं। आईटी सेक्टर से जुड़े कई बड़े नाम अपने बच्चों को इस जुनून से हमेशा दूर रखने की हिमायत करते हैं। वे कहते हैं हमने तय कर रखा है कि बच्चे तकनीक का कितना इस्तेमाल करेंगे। एपल के फाउंडर स्टीव जॉब्स ने भी ऐसा ही किया था। माइक्रोसॉफ्ट के मैनेजर ने तो बच्चों के लिए गैजेट्स टीवी के इस्तेमाल पर बैन लगा रखा है। आठ से तेरह साल के बच्चों के इंटरनेट पर सक्रिय रहने की तादाद 73 फीसदी बताई जाती है। ये सेहत, सोच, विकास में सबसे बड़ी बाधा है। तकनीक प्रेमी देश के बड़े नेता जब अपनी बात में अक्सर इन तकनीकी जरियों का गुणगान करते हैं तो वे स्वत: ही बड़े वर्ग को इस तरफ मुडऩे के लिए प्रेरित कर देते हैं। उनकी कोशिश होनी चाहिए कि बच्चों के माता-पिता को सचेत करें  कि केवल तकनीक आखिरी सच नहीं है।
     तकनीकी शिक्षा का ट्रेंड अलग दिशा में चल पड़ा है। पड़ोस की ईशा ग्यारहवीं कक्षा में ही स्कूल छोड़कर कोटा रवाना हो गई है। वह वहां दो साल आईआईटी की तैयारी करेगी। अपना नामचीन स्कूल छोड़कर वह किसी साधारण स्कूल से ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षा की परीक्षा पास कर लेगी और अपना सारा समय इंजीनियरिंग
प्रवेश परीक्षाओं में लगा देगी। जब दसवीं के बाद स्कूल कोई मायने नहीं रखते फिर ये ड्रामा क्योंं?   सालों से शिक्षा प्रणाली में ये सेंध लग चुकी है लेकिन कोई बदलाव नहीं। ये प्रतिस्पर्धा को अतिरिक्त  होड़ से जोडऩे वाली कोचिंग क्लासेस माता-पिता की इच्छाओं का प्रतिफल है या व्यावसायिकता का?     
     इस होड़ से निकली जनरेशन अब सामने आ चुकी है। अधिकांश बहुत इंटेलिजेंट लेकिन हिसाबी  हैं। उन्हें हर चीज का दाम चाहिए। वे घर-परिवार से दूर खूब कमा रहे हैं। उनके पास समय नहीं। कभी-कभी तो खुद के लिए भी नहीं। संवादहीनता के हालात रिश्तों को तोड़ रहे हैं। चूंकि कुदरत से कोई कनेक्ट नहीं है इसलिए उसकी तरह निस्वार्थ देना उनकी फितरत भी नहीं। उसकी तरह अपना खजाना लुटाने का साहस  बचा ही नहीं है। इंसान की कीमत उसकी चीजों के ब्रांड तय करते हैं। महंगी गाडिय़ों और मोबाइल की कोई सीमा-रेखा कभी नहीं खींची जा सकेगी। हमें समझना होगा हमारा सच क्या है। पंच तत्वों से बना हमारा शरीर कुदरत के साथ चलने में ही सार्थक है। नकली वातावरण में यह सर्वाइव नहीं कर सकेगा। समाज और नैतिकता इंसान को जीने की ताकत देते हैं। काश किशोर होते बच्चों के अभिभावक और स्कू ल ये फैसला कर सकें कि तकनीक के साथ इंसानियत, नैतिकता भी जीवन का हिस्सा रहें।  यह सत्र शुभ हो।