Wednesday, May 13, 2015

अच्छे लगे पीकू के बाबा





पीकू कब्ज की चर्चा पर बनी ऐसी फिल्म है कि अच्छे-अच्छों की सोच में जमा बरसों बरस का पाखाना साफ कर सकती है। मुख्य किरदार पीकू भले ही पिता की मां बनकर तीमारदारी करने वाली बेटी हो, लेकिन जब पिता बेटी के लिव इन या वर्जिनिटी पर सहजता से चर्चा करता है तो फिल्म बहुत ही व्यापक कैनवस ले लेती है। पीकू के पिता अपनी मृत पत्नी को खूब शिद्दत से याद करते हैं, लेकिन इस भाव के साथ कि उसने अपनी सारी जिंदगी मेरे लिए खाना पकाने और मेरी दूसरी जरूरतें पूरी करने में समर्पित कर दी। वह काबिल महिलाओं के यूं अपनी जिंदगी होम कर देने को लो आईक्यू वाली कहते हैं। उन्हें आश्चर्य है कि रानी लक्ष्मी बाई, सरोजिनी नायडू और एनी बेसेंट के देश में ये कैसा समय आया है जो पढ़ी-लिखी स्त्रियां अपने जीवन को एक स्टुपिड रुटीन में तब्दील कर देने पर आमादा हैं।
पीकू उनकी पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर बेटी है और वे बिल्कुल नहीं चाहते कि ब्याह-शादी के नाम पर उनकी बेटी भी ऐसी ही शोषित जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो जाए। कथा यहीं नहीं रुकती, वह पीकू की चाची के उस भाव में भी अभिव्यक्त होती है कि अगर एक दिन उनकी शादी देर से होती तो वह अपना इम्तिहान दे पातीं। एक पारंपरिक बांग्ला परिवार में आधुनिक सोच के बावजूद कुछ ऐेसे पैबंद दिखाए गए हैं जो कई समाजों का पूरा-पूरा सच है। पति के आसपास पूरी जिंदगी समेट देने वाली ये स्त्रियां जब अपने लिए जागती हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। जीवन की अपनी रफ्तार है वह अवसर देने के बाद रुकता नहीं है। हमारा साहस इंटेलीजेंस उस समय बड़ी भूमिका अदा करता है।
बांग्ला परिवार की इस सोच को झुंपा लाहिरी का उपन्यास 'द लो लैंड'  बेहतर अभिव्यक्त करता है। पारंपरिक बांग्ला परिवार जब अमेरिका जाकर बसते हैं तो धीमे-धीमे कैसे उनके बच्चे इन खोलों से निकलकर अपने वजूद के लिए संघर्ष करते हैं। स्कूल, कॉलेज, रिश्ते, विवाह इन सबमें वे एक जबरदस्त बदलाव को आत्मसात करते हैं लेकिन उनकी जड़ें कभी उनके लिए मजबूती का आधार बनती हैं तो कहीं जकड़ भी लेती  हैं। भारतीय समाज आज ऐसे ही द्वंद से गुजर रहा है।

Wednesday, May 6, 2015

माँ पर नहीं लिखी जा सकती कविता



मां के प्रेम और समर्पण को यहां लिखा कोई शब्द हूबहू बयां नहीं कर सकता। मां वह है जो अपनी जान देकर भी अपने दिल को बच्चे में धड़कते देखना चाहती है। इसे हिंदी फिल्म हार्टलेस में पूरी संवेदना के साथ दिखाया गया है। वह खुद को खत्म कर अपना दिल बीमार बेटे में लगवाती है। मां  बच्चे से अगर कुछ चाहती है तो वह है उसकी सलामती उसकी सेहत। मालवा के कवि चंद्रकांत देवताले सही लिखते हैं कि मैं नहीं लिख सकता मां पर कविता


क्योंकि मां ने केवल मटर, मूंगफली के नहीं अपनी आत्मा, आग और पानी के छिलके उतारे हैं मेरे लिए। वाकई मां शब्द-शिल्पियों के लिए चुनौती है। संकट शब्दों का है, साहित्यकारों का है। मां तो निर्बाध नदी की तरह अपना सब कुछ अपने बच्चों पर वारती है, कुर्बान करती है, न्यौछावर करती है।               
बदलते वक्त में मां की भूमिका भी बदली है। अब तक भारतीय समाज में एक लड़की की तरबियत ऐसी ही की जाती थी कि वह शादी के बाद ससुराल में सबकी सेवा करते हुए अपने बच्चों का लालन-पालन करे। उसकी समूची टे्रनिंग ऐसी होती थी कि वह एक बेहतरीन बीवी, बहू और मां साबित हो। काम पर जाने वाले पुरुषों के तमाम हितों का खयाल रखना उसका दायित्व था। वह श्रेष्ठ भोजन और श्रेष्ठ सेवा अपनों को परोसती थी। इस भूमिका में उसकी आर्थिक निर्भरता कायम थी। समर्पण का भाव इस कदर कि वह गृहस्थी में खुद को खत्म कर देने की हद तक लगी रहती।
मैं एक स्त्री को जानती थी। नाम रावी था। रावी की जिंदगी का एक ही लक्ष्य था, परिवार। वह कुर्बानी की हद तक सबके लिए काम करती। पति की प्रिय सब्जियों को बनाने में उसे इतना सुख मिलता कि वह देर शाम भी खुद सब्जी चुनकर मंडी से लाती। बचे वक्त  को भी जाया नहीं होने देती। पति के कारोबार में हाथ बंटाती। बच्चे मां के  इसी समर्पण के साथ आगे की कक्षाओं में जाते हुए किशोर हो रहे थे। कब वे सांस की तकलीफ की शिकार हुई कोई समझ नहीं पाया। अपने समर्पण में उन्होंने किसी को ऐसे संकेत नहीं दिए। लेकिन गिरती सेहत चुगली कर रही थी। एक दिन वे नहीं रहीं। चालीस से भी कम उम्र की रावी इस दुनिया को अलविदा कह चुकी थी। उस मां की अर्थी उठती देख हर आंख नम थी लेकिन स्त्रियों की आंखों में शिकायत थी कि रावी बच सकती थी, बशर्ते उसकी कद्र की जाती। क्या स्त्री केवल इसलिए अपनी सेहत के प्रति लापरवाह होती है क्योंकि उसे लगता है कि खामखां धन खर्च होगा। वह धन जो वह नहीं कमाती और उसे बताया जाता है कि वह बड़ी मुश्किलों से कमाया जाता है।
बदलाव यह है कि अब नई मध्यमवर्गीय पीढ़ी में लड़कियां खूब पढ़-लिख रही हैं और करिअर उनकी प्राथमिकता में है। जो आदर्श गुण लड़कियों को बड़ा करते हुए घुट्टी में पिलाए जाते थे उनमें सबसे पहले अब करिअर है। आर्थिक आत्मनिर्भरता माता-पिता ने बेटियों के एजेंडे में शामिल कर ली है। एक मित्र के दादाजी कहा करते थे अच्छी रोटी भले ना बेल सको अच्छी पढ़ाई जरूर करना। शायद ऐसे ही बुजुर्गों की सोच ने लड़कियों में भी खूब पढऩे का साहस भरा होगा। ऐसे ही बुजुर्गों ने कथित अच्छे रिश्ते भी यह कहकर ठुकराए होंगे कि लड़की इस समय पढ़ रही है। अभी उसकी शादी नहीं करनी है।
ऐसी पढ़ी-लिखी नौकरीपेशा लड़कियां अब मां बन चुकी हैं। क्या वे कमजोर मां हैं? क्या वे अपराधबोध से  ग्रस्त हैं कि अपने बच्चों को पूरा समय नहीं दे पा रही हैं? क्या उनके बच्चे नाराज हैं? क्या वे जॉब के प्रति लापरवाह हैं? क्या अब का समाज उन्हें संदेह की निगाह से देखता है?  ऐसे कई सवाल हो सकते हैं लेकिन इनका जवाब ना ही है। आज की 'कॅरिअरिस्टिक मॉमÓ हर मोर्चे को फतह करने में लगी है। उसने अपनी शक्ति को इतना बढ़ा लिया है कि हैरानी होती है।
यह भी खामखयाली है कि करिअर की चाहत में लड़कियां शादी नहीं कर रहीं, बच्चे नहीं पैदा कर रही। सब कुछ हो रहा है लेकिन थोड़ा देर से। वह सूझ-बूझ से अपनी जिंदगी  साध रही हैं। ये उसके अच्छे दिन कहे जा सकते हैं। उसमें इतनी समझ भी है कि परिवार के लिए कुछ समय का ब्रेक लेकर फिर काम पर लौटे। बेशक वह रस्सी पर चलती उस नटनी की तरह है जो हर तरह से संतुलन साधने की जुगत में है। आज की पाती इन्हीं हुनरमंद और हैरतअंगेज मां के नाम है। सच है इन पर भी नहीं लिखी जा सकती कविता। इन्हें सिर्फ सलाम किया जा सकता है। हेप्पी मदर्स डे।