Wednesday, April 22, 2015

तुम तो पढ़ी-लिखी काबिल थीं


काबिल डॉक्टर की खुदकुशी से पहले लिखी गई चिट्ठी समाज से भी कई सारे सवाल करती है 
कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका नाम क्या है और वह किस शहर की है। फर्क पड़ता है तो उसके खत से जो उसने खुदकुशी से पहले अपने फेसबुक अकाउंट पर समाज को संबोधित करते हुए लिखा है। फर्क पड़ता है इस बात से कि वह पढ़ी-लिखी काबिल एनेस्थेटिस्ट युवा थी। फर्क पड़ता है कि जिस कॅरिअर को हासिल करने के लिए उसने कड़ी मेहनत की होगी उसने उसे एक  पल में मिटा दिया। वह व्यक्ति उसका पति था। पति-पत्नी दोनों डॉक्टर। हैरानी होती है कि चिकित्सक होते हुए भी वह अपने शारीरिक रुझान को समझ नहीं पाया। अठारह अप्रेल के खतनुमा फेसबुक स्टेटस में उसने लिखा है कि उसका पति समलैंगिक था। शादी के पांच सालों में दोनों के  बीच कोई संबंध नहीं बना और जब वह पति के समलैंगिक संबंधों को भांप गई तो पति ने उसे प्रताड़ित  करना शुरू कर दिया।
युवती का खत महसूस कराता है कि वह अपने पति से बहुत प्रेम करती थी उसका यह व्यहार उसके बरदाश्त से बाहर हो रहा था। वह लिखती है कि मैं सिर्फ उसका साथ चाहती थी अगर कोई समस्या भी है तो हम मिलकर सुलझा सकते थे, लेकिन मैं ऐसा कर पाने में नाकाम रही।  मैंने कहीं कोई संबंध नहीं बनाए। इसकी भी तसदीक कराई जा सकती है। मुझे उम्मीद थी कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा। अफसोस ऐसा नहीं हुआ।
युवती ने दिल्ली की एक होटल में कमरा बुक कराया और कलाई की नस काट लीं। माता-पिता को अपनी तकलीफ के बारे में बताया लेकिन जब तक माता-पिता उस तक पहुंच पाते एक पढ़ी-लिखी समझदार लड़की का जीवन खत्म हो चुका था। कुछ पाठकों के खयाल में तुरंत यह बात आ सकती है कि इसीलिए तो हम कहते हैं कि समलैंगिकता गलत और असामान्य है, समाज को इसे हतोत्साहित करना चाहिए। जबकि विशेषज्ञों की राय में यह असामान्य नहीं है। व्यक्ति कुदरती ऐसा हो सकता है। समाज की यही धारणा है कि इनकी शादी होने के बाद सब सामान्य हो जाता है। ये अपने रूझान को भूल जाते हैं। वे तो नहीं भूलते, लेकिन भूल समाज से हो जाती है और नतीजा इस युवती के अंत की तरह सामने आता है।
लड़की ने खत में लिखा है कि भावनात्मक रूप से वह इतनी आहत हुई कि उसका सांस लेना मुश्किल हो गया।वह लिखती है तुम शैतान हो जिसने मेरी सारी खुशियां छीन ली। अजीब दास्तां यह भी है कि पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर महिलाओं में असुरक्षा और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सुनंदा पुष्कर भी ऐसे  ही मृत मिली थीं। एक बड़े नेता की बहू भी।  युवती के खत का यह हिस्सा गौर करने लायक है, 'यदि हमारे समाज में कोई भी उसकी तरह है तो प्लीज खुद को बचाने के लिए उसकी शादी किसी लड़की से मत करना। ऐसा करके आप लड़की की भावनाओं के साथ तो खेल ही रहे हैं उसके परिवार और उसकी जिंदगी से भी खिलवाड़ कर रहे हैं।
युवती के खत का यह हिस्सा उस समाज को जगानेवाला होना चाहिए जो मानता है कि शादी कई मुसिबतों का इलाज है। एक युवती जो शादी से प्रेम, निष्ठा और अपनत्व चाहती थी वह उसे नहीं मिला। वह खुद को इस पवित्र रिश्ते की भेंट चढ़ा गई जो कभी बना ही नहीं था। आज भले ही युवती के  इस खत को ढाई हजार लोग शेयर कर चुके हों लेकिन जिंदा रहते हुए उसके दर्द को कोई महसूस ना कर सका। 

   एक और बात जाहिर होती है कि हम महिलाएं कितनी भी आत्मनिर्भर क्यों न हो जाएं, रिश्तों को हम जान से भी ज्यादा अहमियत देती हैं। संवेदनाओं का ऐसा ज्वार हमारे भीतर होता है जो अपनी जान तक ले डालने को मजबूर कर देता है। रोते माता-पिता, भाई, बहन की शक्ल एक बार भी आंखों में नहीं आती। लड़कियों को अपनी जरूरत इससे आगे भी देखनी होगी। एक काबिल युवती का यूं जाना हमसे भावनात्मक रूप से और मजबूत होने की अपेक्षा करता है।

Saturday, April 18, 2015

मार्गरीटा चखने से पहले

मार्गरीटा चखने से पहले कुछ लिखा था दोस्तों
एक फिल्म ने रिलीज से पहले ही अखबार, टीवी चैनल्स, सोशल मीडिया को बाध्य कर दिया है कि वह इस मुद्दे पर सोचे और बात करे। मुद्दा सेरिब्रल पल्सी नामक बीमारी से जुड़ा है, जिसमें मरीज के  दिमाग का वह हिस्सा चोटग्रस्त या कमजोर होता है जो संतुलन और गति को बनाए रखता है। मसल्स सख्त हो जाती हैं। मरीज बोलने, करवट लेने में तकलीफ महसूस करता है और कभी-कभी इसका असर आंखों पर भी देखा जा सकता है। प्रति एक हजार पर 2.1 ब"ो सेरिब्रल पल्सी का शिकार होते हैं।
एक और बहस साथ में चलती है कि विकलांग और अपंग को फिजिकली डिसएबल्ड ना कहा जाए इन्हें डिफरेंटली एबल्ड कहा जाए यानी इनमेेंं ऐसी असमर्थता है, तो कई ऐसे गुण भी हैं जो इन्हें समर्थ बनाते हैं। बेशक लेकिन हमारा सारा जोर एबल्ड या समर्थ बनाने की ओर ही क्यों है? इतने सक्षम बनो कि जीवन की रफ्तार से कदम मिला सको। हम आम बच्चों  को तो इस रफ्तार में धकेल ही रहे हैं इन बच्चों  को जिन्हें कुदरत ने कुछ अलग नेमत देकर भेजा है वे भी इसी दौड़ में शामिल कर लिए हैं। कुदरत ने ऐसे बच्चों  को बड़ा ही सुंदर दिल बख्शा होता है। ये हरेक से बहुत प्यार से मिलते हैं। इनकी नजरों में कोई खाका नहीं होता। ना अहंकार, ना ईगो, ना झूठी शान, ना शेखी। ये केवल प्यार भरा दिल लिए चलते हैं। हम इस दिल को तो नहीं समझते, लेकिन हमदर्दी जताते हुए उन्हें पानी का पूछते हुए आंखों में अतिरिक्त दया भाव जरूर ले आते हैं जिसकी शायद इन्हें जरूरत ही नहीं। उन्होंने उस संवाद की अपेक्षा है जो समभाव पर हो, सामान्य हो।
फिल्म जिसने इस मुद्दे पर बातचीत के लिए सबको विवश किया है वह है मार्गरीटा विद ए स्ट्रॉ। निर्देशक शोनाली बोस की फिल्म इसी हफ्ते रिलीज होगी। शोनाली की बहन मालिनी सेरिब्रल पल्सी से पीडि़त रही हैं। वे उसके साथ आम भाई-बहनों जैसी ही बड़ी हो रही होती है, लेकिन तकलीफ तब आती है जब वे बाहर निकलती हैं। समाज मालिनी को अलग नजरिए से देखता है। साथ बड़ी होती हुई शोनाली चौंकती है कि मालिनी उससे कहीं Óयादा रोमांटिक है और वह लड़कों के बारे में बात करती है। वह उस सुख को महसूस करना चाहती है, जिसे हमारा समाज शादी के बाद महसूस करने की इजाजत देता है। फिल्म में मां-बेटी का रिश्ता रेवती और कल्की कोचलिन ने निभाया है। किरदार जैसा बोल सके इसके लिए कल्की ने मुंह में कंचे भरे। मां जिसने अब तक  बेटी को सामान्य तरीके से पाला है और जहां जरूरत पड़ी है वह उसके लिए लड़ी भी हैं, वह मार्गरीटा के ऐसा कहते ही सहम जाती है। वह चाहती है कि मार्गरीटा ऐसा ना सोचे। वह उसे सुरक्षित रखना चाहती है क्योंकि लड़की के संदर्भ में ऐसी विकलांगता एक नहीं कई तकलीफों का झुंड बनकर सामने आती है।
मार्गरीटा की मां जैसी सोच ही हम सबकी है। हम तो यूं  भी  इस मुद्दे पर बात करना नहीं चाहते फिर ऐसे बच्चों  के लिए तो बिलकुल भी नहीं। हमें तो अब भी लगता  है कि यह किसी जन्म के पाप या बुरे कर्मों का नतीजा है। दुखद है कि समाज के बड़े हिस्से में अब भी बीमारियों की वजह किसी जन्म में किए गए पाप हैं। हम मान लेते हैं कि कोई पाप हमने चक्की में डाले हैं और जो आटा आया है वह खराब है। सवाल यह उठता है कि इस कथित खराब आटे को हम आपसी संबंधों के बारे में सजग करे या नहीं। ऐसे ब"ाों से जब यह सवाल किया जाता है तो वे इधर-उधर देखने लगते हैं या फिर जीभ निकालकर ऐसे जाहिर करते हैं जैसे यह तो आपने बुरी बात कर दी क्योंकि यही हम उनमें भरते हैं। मार्गरीटा यह हिम्मत  इसलिए कर पाती है क्योंकि उसकी अन्य इ'छाओं को दबाया नहीं गया था।
ऐसे ब"ाों के माता-पिता भाई-बहनों की दिक्कत समझ में आती है कि वे अपने काम के लिए ही आत्मनिर्भर नहीं तो शादी-संबंध की जिम्मेदारी कैसे लेंगे। वे दुविधा में ही रहते हैं और ऐसे बच्चों  पूरी जिंदगी अकेलेपन के साथ। लेकिन कोलकाता के जीजा और बापा ने इस दुविधा को तोड़ा है। जीजा इस बीमारी से ग्रस्त है और बापा सामान्य। बापा और जीजा के बीच यह लगाव उस समय हुआ जब वे उसे हाथ पकड़कर सड़क पार करा रहे थे। बापा कहते हैं वह बिलकुल सामान्य है लेकिन मैं उसे लेकर किसी ढाबे पर नहीं जा सकता, थड़ी पर चाय नहीं पी सकता।
विकलांगता कोई असाधारण बात नहीं है। उनकी सभी साधारण इ'छाएं पूरी होनी चाहिए। हम भले ही बंद समाज हैं, लेकिन इनके लिए हमें खुलना होगा। इन्हें सुर्ख रंग की लिपस्टिक अ'छी लगती है तो लगाने दीजिए। आमजन की दया को हाशिए पर रखिए और दुआओं को मुख्य धारा में लाइए। इनके बड़े दिलों में झांकिए। ये जीवन के प्रति आपका नजरिया बदलने की ताकत रखते हैं। उन माताओं को सौ-सौ सलाम, जो इन बच्चों के लिए अपनी सोच को तो आसमान जैसा विशाल बना देती हैं लेकिन जिंदगी को इन्हीं के आसपास समेट देती हैं।

Wednesday, April 15, 2015

ये लाडली न रीझती है न रिझाती


अक्सर हम टीवी विज्ञापनों का जिक्र इसी हवाले से करते हैं कि ये आज भी स्त्री की छवि को एक प्रोडक्ट की तरह ही इस्तेमाल करते हैं। बेचना चाहे शेविंग क्रीम या कच्छे-बनियान हो, स्त्री इस अंदाज में प्रस्तुत की जाती है जैसे दूसरे पक्ष पर रीझने और रिझाने के अलावा उसकी कोई भूमिका ही नहीं। वक्त बदला है और स्त्री की बदलती हुई छवि को विज्ञापन की दुनिया ने भी स्वीकारना सीखा है। थिएटर तो हमेशा से ही प्रगतिशील रहा है। फिल्में भी यदा-कदा अपनी मौजूदगी का एहसास करा देती हैं लेकिन चंद सेकंड्स की इन विज्ञापन फिल्मों का बदलना बड़ा बदलाव है। एक ऋण देने वाली बैंक के विज्ञापन पर गौर कीजिए। तेज बारिश में एक बेटी अपनी बुजुर्ग मां को अस्पताल ले जाने के लिए ऑटो वालों की मिन्नतें करती है लेकिन कोई नहीं चलता। कुछ दिनों बाद यही लड़की फिर एक ऑटो वाले को रोकती है कि भैया एमजी रोड चलोगे? ऑटो वाला मुस्कुराते हुए कहता है-'हां'

क्वीन के लिए डायना हेडन ने लाड़ली अवार्ड  लिया 

  मेरे  कॉलम खुशबू की पाती को भी मिला लाडली नेशनल अवार्ड 
lataji ki aur se in search of lata ke lekhak harish bhimani ne award liya. lataji ne apne sandesh mein kaha ki sab unhen lata didi kahte hain,ab shayad lata ladli kahenge to mujhe bahut khushi hogi.


। जवाब में लड़की इतराते हुए कहती है-'तो जाओ'। ... और वह फक्र से अपनी कार की ओर मुड़ जाती है।
एक और विज्ञापन पुरुषों के कपड़ा ब्रांड का है। अपने नन्हेे बच्चे को छोड़कर मां काम पर जा रही है। बच्चे से बिछडऩे का गम उसकी आंखों में है लेकिन उन्हीं आंखों में एक संतोष भी है क्योंकि दरवाजे पर उसके कामकाजी पति बच्चे को गोद में लिए आश्वस्त करते हैं कि तुम जाओ। मैं हूं इसकी देखभाल के लिए। यह एक ऐसे पति का चित्रण है जो अपने अभिभावकीय दायित्व तो निभा ही रहा है पत्नी की कामकाजी प्रतिबद्धता को भी समझ रहा है।
बहरहाल, यह उस समाज में है जहां स्त्री का कामकाजी होना तब ही स्वीकार्य है जब उसे धन की जरूरत हो। आम धारणा यही है कि जब पति अच्छा खासा कमाता है तो फिर पत्नी को बाहर निकलने की क्या मजबूरी। वाकई ये विज्ञापन बंधे-बंधाए ढर्रे को तोड़ते हैं। एक और एड कलाई घड़ी का हैे। लड़की गहरे प्रेम के बावजूद रिश्ता इसलिए नहीं स्वीकार कर पाती क्योंकि उसके होने वाले पति को शादी के बाद उसका बाहर जाकर काम करना पसंद नहीं। वह शादी से इंकार कर देती है। कुछ सालों बाद जब वे मिलते हैं तब भी लड़का वही सवाल करता है और वह कहती है तुम कभी नहीं बदलोगे। ऐसे ही कुछ विज्ञापनों को सम्मानित करने की शाम थी वह जब लाडली मीडिया एंड एडवरटाइजिंग अवॉर्ड ने मुंबई में पिछले सप्ताह इनके क्रिएटर्स को सराहा। युवा टीम के ये युवा आइडियाज नए हैं। अब लड़की केवल किसी की सोच के प्रतिरूप में नहीं ढल रही, अपनी सोच और वजूद को सामने रख रही है। ध्यान रहे कि कोई भी टीवी धारावाहिक चाहकर भी सम्मानित नहीं किया जा सका।
इसी कड़ी में फिल्म क्वीन भी पुरस्कृत हुई। क्वीन एक ऐसी लड़की की कहानी है जो एन वक्त पर विवाह से नकार दी जाती है। अकेले हनीमून पर  पेरिस यात्रा के लिए निकली रानी खुद की नई पहचान गढ़ती है। यात्रा उसे इतना साहस देती है कि अबकी बार वह खुद इस रिश्ते को छोड़कर आगे बढ़ जाती है। एक लड़की को समझना होगा कि कई सारी ज्यादातियां तो उसके साथ केवल इसलिए होती हैं क्योंकि वह उन्हें स्वीकारती चली जाती है। वह जाने क्यों इसे अपनी नियति मानने लगती है जो कि उसके एक फैसले भर से बदल सकती है।
इसी समारोह में लता मंगेशकर को लाडली वॉइस ऑव द सेंचुरी अवॉर्ड से नवाजा गया। हरीश भिमानी ने उनकी ओर से सम्मान ग्रहण किया। लता ने अपने संदेश में कहा कि वे अपने पिता दीनानाथ की बेहद लाड़ली रही हैं। सारा देश उन्हें लता दीदी कहता है। अब इस सम्मान के बाद शायद लता लाड़ली कहे। दानिश रजा की कहानी का जिक्र इसलिए जरूरी है, क्योंकि उन्होंने हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उस सच का खुलासा किया जहां स्त्री की कीमत पशुओं से भी कम है। 'चीपर देन कैटल' नाम से  प्रकाशित यह स्टोरी समाज में स्त्री के हालात बयां करती है। छत्तीसगढ़ की प्रियंका कौशल की स्टोरी भी उन युवतियों के हक में उठी आवाज है जो मानव तस्करी के लिए जिम्मेदार बड़े गिरोहों का मोहरा बन जाती है। अशिक्षा, गरीबी और एक स्त्री का स्त्री होना ऐसे भयावह दलदल में धकेलता है जहां से इंसाफ और फिर पुनर्वास की कोई उम्मीद नहीं दिखाई पड़ती। उपमिता वाजपेयी के अभियान तेज़ाब के खिलाफ को बेस्ट कम्पैन मन गया।मणिपुर की उर्मिला माहवारी के मिथ को तोड़ते हुए बेस्ट सोशल मीडिया कम्पैन का अवार्ड लेती हैं तो डॉ स्वाति तिवारी भोपाल गैस त्रासदी पर लिखी किताब सवाल आज भी ज़िंदा हैं के लिए.  मिनती को Best news reporting - TWO GUTSY WOMEN BREAK GLASS CEILING के लिए। ऐसे ही अवॉर्ड्स  की श्रृंखला  में सम्मानित खुशबू के पाठकों के लिए लिखा जाने वाला यह कॉलम भी है। यह डेली न्यूज़ अखबार की पत्रिका में हर सप्ताह प्रकाशित होता है। खुशबू की पाती को बेस्ट कॉलम, प्रिंट का राष्ट्रीय लाडली मीडिया अवॉर्ड मिला है। यह खुशबू के पाठकों का सम्मान है।