Friday, February 27, 2015

.और अंत में क्या बचता है

.और   अंत में क्या बचता है
लकड़ी की आदिम कंघी
संग ए मरमर की नक्काशीदार प्लेट
टेराकोटा से बने कर्णफूल
चंद हसीन लम्हों से घिरे खत
हैंडमेड पेपर से बनी रंगीन डायरी के नीले लफ्ज़

बचा रहे मौला
जो ये बचा रहा
बचे रहेंगे
तेरे-मेरे  जज़्बात
सुर सौरभ और सपने
सच ज़िन्दगी और कुछ भी नहीं
सिर्फ तेरी मेरी कहानी है.…

Wednesday, February 18, 2015

डर्टी पिक्चर्स अब हो जाएंगी गुड

ऐसे छत्तीस शब्द  केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने सामने रख दिए हैं जो तमाम डर्टी पिक्चर्स को गुड में बदल देंगे।  मज़े की बात इसलिए भी है क्योंकि जिन गालियों को प्रतिबंधित  किया गया अतीत में वैसी ही फ़िल्में राष्ट्रीय पुरस्कार पा  चुकी हैं।  बोर्ड के नए-नए अध्यक्ष पहलाज निहलानी ने हाल ही ये सूची जारी की है




 हम सब अभिव्यक्त होना चाहते हैं। खुलकर बोलने  में हमारा सुकून छिपा है। हमारा संविधान भी अभिव्यक्ति की आजादी का पक्षधर है, लेकिन इसके साथ भी अश्लीलता से जुड़े कानून भी हैं। जाहिर है, पूरी तरह जाहिर होने के कई खतरे हैं । कुछ अंकुश तो जरूरी हैं। कौन लगाएगा ये अंकुश, सरकार जिन्हें हमने चुना है वो या  हम खुद लेकिन इन सरकारी इकाइयों के नुमाइंदे जब कुछ शब्दों की सूचि जारी कर देते हैं तो हैरानी होती है कि इनमें से कई लफ्ज उन्हीं फिल्मों में खूब हैं, जिन्हें राष्ट्रीय फिल्म अवॉर्ड मिल चुका है। द डर्टी पिक्चर, ओंकारा, चांदनी बार, डर, विकी डोनर ऐसी ही फिल्में हैं। अलग-अलग सरकारों के अश्लीलता के पैमाने भी अलग-अलग हैं। ये संविधान से कम अपने निजी एजेंडे से ज्यादा बंधे हैं और उसी मुताबिक बदलते हैं।
    पीके जैसी फिल्म को थियेटर में बंद करवाने के लिए एक समूह विशेष सक्रिय हो जाता है तो डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम की फिल्म मैसेंजर को थिएटर में लाने के लिए। पीके को बैन करना भी अभिव्यक्ति की आजादी और मैसेंजर को दिखाना भी।  और तो और एआईबी रोस्ट जैसा एडल्ट कॉमेडी शो करना और फिर उसके लिंक्स यूट्यूब पर डाल देना भी। उस बेहयाई का फिर ट्रेंड करना यानी सूची में सबसे ऊपर आ जाना। रोस्ट अमेरिका से आयातित अवधारणा है। भारत में चंद बॉलीवुड स्टार्स ने मिलकर इसकी नकल की जिसका उद्देश्य ही था आओ, गंद मचाएं। जोक्स जिसे हम भद्दा कहेंगे और अश्लीलता जिसे ना दोहराना चाहेंगे के लिए चार हजार रुपए का टिकट लेकर लोग खूब हंसे। ओबामा साहब को आमंत्रित करना और रोस्ट जैसी अवधरणाओं से बचना ऐसा कैसे संभव है?
    जिन शब्दों पर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के नए-नए अध्यक्ष पहलाज निहलानी ने प्रतिबंध लगाया है, हम आम बातचीत में उनका इस्तेमाल नहीं करते लेकिन गुस्से में भारतीय ये शब्द बोलते हैं और जो फिल्म में ऐसे ही किसी गुस्से वाले पात्र का चित्रण हो तो? तब केवल बीप बजेगी। कल्पना कीजिए शेखर कपूर की फूलन देवी पर आधारित द बैंंडिट क्वीन में से नग्न दृश्य और गालियां निकाल दी जाएं तो फिल्म क्या होगी? श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी और राही मासूम रजा के  टोपी शुक्ला के पात्रों से  गालियां छीन ली जाएं जो कथानक कैसे बढ़ेगा? वैसे एक प्रयोग हाल ही रिलीज जेड प्लस में हुआ है जिसके नायक असलम ने पूरी फिल्म में कैंचो कंैचो कहा है। आपको याद होगा धूम्रपान और शराब पीने के हर दृश्य से पहले  डिस्क्लेमर देने की अनिवार्यता पर भी अजीब प्रतिक्रियाएं आर्इं थीं। आज महसूस होता है कि ये डिस्क्लेमर बच्चों के बीच ऐसा ना करने का संदेश तो रखते ही हैं। दृश्य प्रतिबंधित नहीं किए गए।
   समाज कार्य से जुड़ी स्त्रियां अकसर  दोहराती हैं  कि फिल्मों में स्त्री की छवि का चित्रण भी इन दुष्कर्मों के लिए जिम्मेदार है। दुष्कर्म, प्रताडऩा जैसे अपराध उस मानसिकता से होते हैं कि ये तो हमारा हक है, हम इनके साथ जैसा चाहें वैसा कर सकते हैं। ऐसी मानसिकता को बढ़ावा देनेवाली फिल्मों पर बैन होना चाहिए। दुष्कर्म के अतिरंजित दृश्य गैर-जरूरी
हैं लेकिन  पीड़ा की अभिव्यक्ति बेहद जरूरी।
   बीप बीप के साथ गब्बर सिंह के संवादों का क्या होगा? गैंग्स ऑव वासेपुर कैसे बनेगी?  राही मासूम रजा ने अपने उपन्यास ओस की बूँद की भूमिका में लिखा है  मैं एक साहित्यकार हूँ। मेरे पात्र यदि गीता बोलेंगे तो मैं गीता के श्लोक लिखूँगा। और वह गालियाँ बकेंगे तो मैं अवश्य उनकी गालियाँ लिखूँगा। मैं कोई नाज़ी साहित्यकार नहीं हूँ कि अपने उपन्यास के शहरों पर अपना हुक्म चलाऊँ और हर पात्र को एक शब्दकोष थमाकर हुक्म दे दूं कि जो एक शब्द अपनी तरफ से बोले तो गोली मार दूंगा। कोई बताए कि जहाँ मेरे पात्र गाली बकते हैं, वहां मैं गालियाँ हटाकर क्या लिखूं ?