Saturday, January 10, 2015

एम आय रेप प्रूफ नाउ ???

थोड़ा ध्यान से  के एक दृश्य में मल्लिका तनेजा
जयपुर में रविवार की दोपहर कुछ ज्यादा ही सर्द थी, लेकिन जयरंगम नाट्य उत्सव के तहत आयोजित एक नाटक थोड़ा ध्यान से ने मौजूद दर्शकों के दिमाग की नसें गर्म कर दी थी। सभागार के अंधेरे में लाल किरणों की रोशनी में एक लड़की केवल अंत:वस्त्रों में नजर आती है। फिर, एक-एक कर वह अपने तमाम वस्त्र पहनती जाती है, जिनका ढेर उसके सामने लगा है। वह कहती है उसे ऑफिस पार्टी में जाना है... आपको दिख ही रहा है कि मुझे कपड़ों का कितना शौक है... पर तैयार होने का मतलब ये तो नहीं कि आप कुछ भी बेढंगा पहनकर निकल जाओगे? लड़कियों को ध्यान देना चाहिए कि वे क्या पहनकर निकल रही हैं। उसकी आवाज में तीखा व्यंग्य है और वह अपने शरीर पर एक के ऊपर एक कपड़े डाल रही है। टी-शर्ट, स्टोल, लेगिंग, फिर सलवार, फिर कुर्ता और अंत में एक हेलमेट लगाकर वह दर्शकों से पूछती है कि मैं कैसी लग रही हूं।
दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा मल्लिका तनेजा के इस बारह मिनट के स्केच ने ऐसे सवाल पूछ डाले थे, जिसका कोई जवाब किसी के पास नहीं है। अगर कुछ है तो वे बयान, जिसमें वे कहते हैं कि लड़कियों को अपने पहनावे का ध्यान रखना चाहिए। ऐसे छोटे-छोटे कपड़े पहनेंगी तो दुष्कर्म तो होंगे ही। निर्भया ने, जिसके साथ दो साल पहले चलती बस में छह लोगों ने दुष्कर्म किया था कौन-से कम कपड़े पहने थे। मुंबई की शक्ति मिल में अपने साथी के साथ गई फोटोजर्नलिस्ट तो दिन में अपना दायित्व निभा रही थी और हाल ही दिल्ली में रेडियो टैक्सी में सवार एक महिला ने क्या पहना था जो चालक ही वहशी हो गया? मल्लिका सवाल करती है कि आखिर कितने कपड़े पहने जाएं कि लड़की 'रेपप्रूफ" हो जाए? कोई जवाब नहीं है क्योंकि कपड़े और दुष्कर्म कतई एक-दूसरे के समानुपाती नहीं हैं।
दरअसल, इस एक्ट को लेकर कहा जा रहा है कि दर्शक ऐसी अश्लीलता देख असहज हो गए। उन्हें बताया नहीं गया कि यह वयस्कों के लिए है। इससे रंगमंच की पवित्रता पर आंच आती है। जबकि मल्लिका तमाम आलोचनाओं को बेबुनियाद बताते हुए अपने फेसबुक खाते पर लिखती हैं कि पूरे समय दर्शक शांत भाव से मेरे परफॉर्मेंस को देखते रहे। वे बेहद सहज थे, उन्होंने आखिर में मुझसे सवाल-जवाब भी किए। कहीं आपत्ति और विरोध का स्वर नहीं था। उन्होंने तमाम अखबार की कतरनें साझा करते हुए अफसोस जताया है कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। किसी दर्शक ने नहीं कहा कि मैं अश्लील या आपत्तिजनक लगी हूं। प्ले से पहले आयोजकों ने स्पष्ट कर दिया था कि यह बारह वर्ष से कम उम्र वालों के लिए नहीं है।
बेशक, हम सबको निर्भया ने झकझोरा है। सोलह दिसंबर की वह भयावह रात दो साल की हो गई है। चलती बस में एक लड़की के साथ छह पुरुष दुष्कर्म करते हैं, फिर उसे और उसके साथी को दिल्ली की सर्द रात में मरने के लिए छोड़ देते हैं। हममें से जिससे भी, जैसे भी, जो भी बन पड़े इसका प्रखर विरोध करना चाहिए। मंच पर कपड़े उतरते देख यदि हम असहज होते हैं तो जाहिर है हमें अपने भीतर सुधार की जरूरत है। हमारी जेहनियत केवल कपड़ों को गिनने की है तो हम अभी भी परिष्कृत नहीं हुए हैं। हमें उस सभ्य आदिवासी समाज के भीतर प्रवेश की इजाजत नहीं है जहां कम कपड़ों के बावजूद कोई अपराध नहीं होता। उल्टे हमारे जैसे लोगों ने वहां जाकर उन्हें भी ब्लाउज पहनने पर मजबूर कर दिया है। बहरहाल, मल्लिका की सशक्त अभिव्यक्ति निर्भया जैसी घटनाओं का अपने तरीके से विरोध है। यह किसी आइटम गीत में नाचना या किसी अश्लील विज्ञापन का हिस्सा नहीं, एक सार्थक प्रस्तुति है।

एम आय रेप प्रूफ नाउ ??? ऐसी तो नहीं ना कि मेरे साथ रेप हो जाए।