Thursday, October 29, 2015

छंद की तरह गूंजते तुम


दो जिंदगियों के बीच ऐसा कौनसा गठजोड़ है जो ताउम्र उन्हें एक रखता है। अरसा पहले यही सोच थी कि कहीं भी चले जाओ पति-पत्नी अक्सर जूझते हुए ही नजर आते हैं। जोधपुर में पैंतीस साल के दांंपत्य के बावजूद उम्रदराज जोड़े को लड़ते-झगड़ते देखना हैरत में डाल देता था। आखिर इतने बरस बीत गए लेकिन इनके मतभेद उतने ही ताजादम क्यों हैं। वे छोटी-छोटी बातों पर उलझते रहते। जयपुर में एक और जोड़े को करीब से देखने का मौका मिला। उनमें गजब का मतैक्य इस बात को लेकर था कि इन मुद्दों पर हम एक दूसरे को बिलकुल नहीं टोकेंगे। तुम तुम्हारे हिसाब से और मैं मेरे हिसाब से। अलवर के एक जोड़े को देखकर लगता था कि पत्नी कुछ कहती भी नहीं हैं और पति समझ लेते हैं। पति-पत्नी आंखों ही आंखों में पूरी बात कर लेते। कभी उन्हें तेज संवाद करते नहीं सुना।
    इन सभी सूरतों में जो सीधे नुमाया नहीं था वह था प्रेम। वह भाव कि हम दोनों को एक ही रहना है। साथ देना है एक दूसरे का। एक दूसरे को इस रिश्ते में इतना खुलापन देना है कि एक का भी दम ना घुटे। जो पति-पत्नी कहते हैं कि हममें कभी झगड़ा नहीं हुआ वे झूठ कहते हैं। जिस दांपत्य में बहस नहीं, विचारों की अभिव्यक्ति नहीं वह रिश्ता एक तरफा है। अधूरा है। वहां घुटन होगी क्योंकि एक बस केवल दूसरे की आज्ञा शिरोधार्य कर रहा है। उसके पास अपनी बात कहने का साहस नहीं या फिर उसे सुना नहीं जा रहा है। पत्नी वक्त पर चाय, धुले कपड़े और भोजन परोस दे यह दांपत्य नहीं। इसमें कोई नयापन नहीं। यह लीक पर चलना होगा। लीक पर गाडिय़ां चलती हैं, भेड़ें चलती हैं। रिश्ते में नवोन्मेश, ऊर्जा, उत्साह का संचार इन लीकों पर चलने से नहीं होगा।
बरसों-बरस इसी ढर्रे को जीते हुए एक दूसरे की आदत हो जाती है। आदत तब टूटती है जब दोनों में से कोई एक विदा लेता है। हम अक्सर उस पत्नी की चिंता करते हैं जिसका सोलह शाृंगार अब छूट चुका है, मांगलिक कार्यों में उसकी उपस्थिति अब अपेक्षित नहीं है। लेकिन अकेले उस पति का जीवन भी आसान नहीं जिसका साथी विदा ले चुका है। वह अकेला केवल उस सुबह के इंतजार में रहता है जो पार्क में उसके मित्रों के आने से गुलजार होती है। उस सुबह के बाद जो शाम आती है उसमें वह खुलकर आंसू बहाना चाहता है लेकिन इसकी इजाजत नहीं है। कवि अशोक वाजपेयी लिखते हैं
तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति
छंद की तरह गूंजता
तुम्हारे पास होने का अहसास।
तुम चले जाओगे
और थोड़ा सा यहीं रह जाओगे!
जब ये रिश्ता इतना मधुर और मीठा है तो इसे हर हाल में क्यों ना संजोया जाए। दुनिया में शायद ही कोई रिश्ता इतने करीब का हो। दो अंजान कब जान बनकर एकदूसरे के होते चले जाते हैं इसका कोई गणित किसी के पास नहीं है। यहां गणित नाकाम है जो कामयाब है वह है एक दूसरे को महसूस करने का भाव। जो जोड़े एकदूसरे से झगड़ते हैं उनमें भी यही भाव प्रबल है। यूं कौन किसी पर कान धरता है और प्रतिक्रिया देता है। इस इजहार में केवल प्रेम है। जीवन का ऐसा शाृंगार जो गर्म मौसम की वजह से आई ऊब को ऊर्जा से लबरेज करता है। 

3 comments:

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 30 अक्टूबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

varsha said...

shukriya yashoda ji

Kavita Rawat said...

आपका यह आलेख स्टार,भोपाल रविवार, 29 नवंबर, 2015 में प्रकाशित हुआ है